महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
नवाँ उल्लास--दस प्रकार के संस्कार
श्री सदाशिव ने कहा—हे सुव्रते ! सभी वर्णों और आश्रमों के आचार और धर्म को मैंने तुमसे कहा ।
अब सभी वर्णों के 'संस्कार' कहता हूँ, सुनो (१) ।
हे देवि ! 'संस्कार' के बिना देह की शुद्धि नहीं होती । असंस्कृत व्यक्ति देव और पैत्र कर्मों के करने का
अधिकारी नहीं हो पाता । इसलिए इस लोक और परलोक में अपना कल्याण चाहनेवाले ब्राह्मण, विप्रादि वर्णों
को प्रयत्न करके अपने-अपने वर्ण के लिए निर्दिष्ट 'संस्कार' को अवश्य करना चाहिए (२-३) ।
१ जीव-सेक अर्थात् गर्भाधान, २ पुंसवन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ निष्क्रमण,
७ अन्नप्राशन, ८ चूड़ाकरण (मुण्डन), ६ उपनयन (यज्ञोपवीत) और १० विवाह—ये 'दस संस्कार' कहे हैं। शूद्र
और सामान्य जाति में उपनयन नहीं होता, अतः उनके लिए नौ ही संस्कार हैं । द्विजों के लिए दस सस्कार
कहे हैं (४) ।
हे वरारोहे ! नित्य, नैमित्तिक और काम्य सभी कर्म शम्भु द्वारा बताए मार्ग से करे (५-६) । हे प्रिये !
जिस-जिस कर्म में जो-जो विधान निर्दिष्ट हैं, वह सब ब्रह्मा-रूप से मैंने पहले ही प्रकट कर दिये हैं (७) । सभी
संस्कार और ब्राह्मणादि वर्ण-भेद के अनुसार अन्यान्य मन्त्र मैंने प्रकाशित किए हैं (८) । हे कालिके ! सत्य, त्रेता
और द्वापर युगों में उन-उन सब कर्मों के अनुष्ठान-काल में पहले प्रणव लगाकर मन्त्रों का प्रयोग करे (६) ।
हे परमेशानि ! शङ्कर के आदेशानुसार कलि-युग में पहले ॐकार के स्थान पर माया-बीज 'ह्रीं' लगावे और उन
उन मन्त्रों द्वारा सारे कर्म करे (१०) । निगम, आगम, तन्त्र, वेद और संहिता में समस्त मन्त्र मेरे ही द्वारा कहे
गए हैं । युग-भेद से प्रयोग-भेद में कहे हैं (११) ।
हे कल्याणि ! कलि-काल के मनुष्यों के प्राण अन्न में रहते हैं, जिससे वे तेज-हीन होते हैं । उन्हीं के हित
के लिए 'कुल-धर्म' का निरूपण किया गया है (१२) । कलियुग के दुर्बल जीव परिश्रम सहने में असमर्थ हैं, उनके
लिए संस्कारादि की क्रिया संक्षेप में तुमसे कहता हूँ ।
हे सुर-वन्दिते ! 'कुशण्डिका' सभी शुभ कर्मों के आदि में की जाती है । अतः पहले उसे बताता हूँ, सुनो—
बुद्धिमान् व्यक्ति फूस, अङ्गार आदि से रहित, रमणीय, परिष्कृत स्थान में एक हाथ का स्थण्डिल बनाए
(१३-१५) । उस मण्डल के पूर्वाग्र में तीन रेखाएँ खींचे । उन्हें कूर्च—'हूँ' मन्त्र से अभ्युक्षित कर वह्नि-बीज 'रं'
से अग्नि लाये (१६) । वाग्भव अर्थात् 'ऐं' मन्त्र का स्मरण करते हुए मण्डल के बगल में अग्नि को स्थापित
करे (१७) । तब दाएँ हाथ से उसमें जलती हुई लकड़ी लेकर निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए दक्षिण दिशा
में राक्षस का अंश छोड़ दे (१८)—
ह्रीं क्रव्यादेभ्यो नमः स्वाहा ।
इसी प्रकार प्रतिष्ठित अग्नि को दोनों हाथों से उठाकर 'मायाद्या' अर्थात् आदि में माया-बीज 'ह्रीं' लगा
कर व्याहृति को स्मरण करते हुए अपने आगे अंकित तीन रेखाओं पर स्थापित तृण-काष्ठ द्वारा उक्त अग्नि को
[ ६३ ]
६४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
प्रज्वलित करे और इसी अग्नि में दो घृताक्त समिधाओं को आहुति देकर क्रमानुसार अग्नि का विहित नामकरण
करके अग्नि का ध्यान करे (१६-२०)। यथा--
बालार्कारुण-सङ्काशं सप्त-जिह्वं द्वि-मस्तकम् । अजारूढं शक्ति-धरं जटा-मुकुट-मण्डितम् ॥
अर्थात् बाल-सूर्य के समान अरुण वर्ण, सात जिह्वाओं वाले, दो मस्तकों से युक्त, छाग पर सवार, शक्ति
लिए हुए, जटा और मुकुट से शोभायमान अग्नि-देव हैं (२१) ।
इस प्रकार ध्यान कर हाथ जोड़कर अग्नि का आवाहन करे (२२) । आवाहन का मन्त्र यह है—
ह्रीं एह्येहि सर्व्वामर-हव्य-वाह ! मुनिभिः स्व-गणैः सह अध्वरं रक्ष रक्ष नमः स्वाहा ।
इस प्रकार अग्नि का आवाहन कर कहे कि—
अयं ते योनिः ।
फिर जो उपचार सुलभ हों, उनसे अग्निदेव की पूजाकर उनकी सप्त जिह्वाओं का पूजन करे (२३-२४) ।
सात जिह्वायें ये हैं—१ काली, २ कराली, ३ मनोजवा, ४ सुलोहिता, ५ सुधूम्र-वर्णा, ६ स्फुलिङ्गिनी, ७ विश्व-
निरूपिणी । ये सभी लोलायमाना अर्थात् लपलपाती हुई उज्ज्वल हैं (२५) । हे महेश्वरि ! अग्नि को पूर्व-दिशा से
आरम्भ कर उत्तर दिशा तक तीन बार प्रोक्षण करे । फिर यज्ञीय वस्तुओं पर भी तीन बार प्रोक्षण करे (२६-
२७)। तब मण्डल को पूर्व-दिशा से आरम्भ कर उत्तर दिशा तक कुश द्वारा आच्छादन करे । उत्तर दिशा में
स्थित कुशों को उत्तर-मुख और अन्य दिशाओं के कुशों को पूर्व-मुख रखे (२८)। अग्नि को दाएँ रखते हुए
अर्थात् अग्नि को बाईं ओर ब्रह्मासन के पास जाकर बाएँ हाथ की अंगुष्ठ-कनिष्ठा अंगुलियों से ब्रह्मा के कल्पित
आसन से एक कुश-पत्र लेकर निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए अग्नि को दक्षिण दिशा में फेंक दे (२६)—
ह्रीं निरस्तः परावसुः । सीद यज्ञ-पते ब्रह्मन् ! इदं ते कल्पितासनम् ।
अर्थात् हे यज्ञ-पते, हे ब्रह्मन् ! यह आसन तुम्हारे लिए प्रस्तुत है, इस पर बैठिए ।
ब्रह्मा कहे (ब्रह्मा के प्रतिनिधि-रूप कोई न हो, तो स्वयं कहे)—
सीदामि ।
अर्थात् 'मैं बैठता हूँ।' यह कहकर ब्रह्मा उत्तर-मुख होकर उक्त आसन पर बैठे (३०-३१) । गन्ध-पुष्पादि
से ब्रह्मा की पूजा कर उनसे प्रार्थना करे (३२) । यथा—
गोपाय यज्ञं यज्ञेश ! यज्ञं पाहि बृहस्पते ! मां च यज्ञ-पतिं पाहि कर्म-साक्षिन् नमोऽस्तु ते ॥
अर्थात् हे यज्ञेश्वर ! यज्ञ को रक्षा करो । हे बृहस्पते ! यज्ञ की रक्षा करो । मैं यज्ञ-पति हूँ, मेरी भी रक्षा
करो । हे कर्म-साक्षिन् ! तुम्हें नमस्कार है (३३) ।
उत्तर में ब्रह्मा कहें—
गोपयामि ।
अर्थात् 'मैं रक्षा करता हूँ।' ब्रह्मा के न होने पर स्वयं यह वचन कहे । यज्ञ की सिद्धि हेतु वहां दर्भ-मय
विप्र की कल्पना कर ले । फिर कहे—
ब्रह्मन् ! इहागच्छागच्छ ।
अर्थात् 'इस स्थान पर आइए, इस स्थान पर आइए।' इस प्रकारँ आवाहन कर पाद्यादि द्वारा उनकी
पूजा कर उनसे प्रार्थना करे—
नवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार | ६५
यावद् यज्ञ-समापनं तावद् भवद्भिः स्थातव्यम् ।
अर्थात् 'जब तक यज्ञ समाप्त नहीं होता, तब तक आप यहाँ स्थित रहें।' इस प्रकार प्रार्थना कर उन्हें
नमस्कार करे (३४-३५) । अग्नि के ईशान कोण से आरम्भ कर ब्रह्मा के निकट तक तीन बार स-जल हस्त से
पर्युक्षण करे। फिर तीन बार अग्नि को प्रोक्षित कर उसो अर्थात् पहले जिस पथ से आए थे, उसी पथ से
लौटकर अपने आसन पर बैठ जाय । तब मण्डल की उत्तर-दिशा में कुछ कुशों को उत्तराभिमुख करके बिछाये
(३६-३७) । उसो पर स-जल प्रोक्षणो-पात्र, आज्य-स्थालो, समिद् और कुश आदि सभी यज्ञीय वस्तुओं को रखे
(३८) । फिर स्रुकू, स्रुवा आदि रखकर 'ह्लां हौं ह्रूं' मन्त्र का उच्चारण करते हुए दिव्य दृष्टि अर्थात् एकटक
दृष्टि से उन सबको देखे और प्रोक्षण द्वारा उन्हें संस्कृत कर साधक भूमि पर दाएँ घुटने के बल बैठकर 'स्रुव'
नामक यज्ञ-पात्र में रखे घृत को 'स्रुक' से लेकर अपने कल्याण को कामना करते हुए निम्न मन्त्र से तीन आहु-
तियाँ दे (३६-४०)—
ह्रीं विष्णवे स्वाहा ।
इसी प्रकार अर्थात् 'स्रुक' के द्वारा 'स्रुव' में रखा घृत लेकर प्रजापति देव का ध्यान करते हुए वायु-
कोण से आरम्भ कर अग्नि-कोण तक होम करे (४१)—
ह्रौं प्रजापतये स्वाहा ।
पुनः घृत लेकर पुरन्दर देव का ध्यान करते हुए नैर्ऋत-कोण से ईशान-कोण तक घृत-धारा प्रदान
करे (४२)—
ह्रौं पुरन्दराय स्वाहा ।
हे परमेश्वरि ! फिर अग्नि के उत्तर, दक्षिण और मध्य में क्रमशः अग्नि, सोम और अग्निषोम को तीन
आहुतियाँ प्रदान करे—
ह्रीं अग्नये नमः । ह्रीं सोमाय नमः । ह्रीं अग्नी-षोमाभ्यां नमः ।
अब विधेय कर्म में कहे होम को करे (४३-४४) । तीन आहुति देने तक के उक्त कर्म को 'धारा-होम'
कहते हैं (४५) । जिस देवता के लिए आहुति दे, उसो देवता के उद्देश्य से देय वस्तु का उल्लेख करे । यथा—
ह्रौं विष्णवे स्वाहा, हविरिदं विष्णवे ।
इस प्रकार प्रकृत कर्म को समाप्त कर 'स्विष्ट-कृत होम' करे (४६) । हे वरानने ! कलि-काल में 'प्राय-
श्चित्त होम' नहीं होता, 'स्विष्टकृत' और 'व्याहृति होम' द्वारा प्रायश्चित्त हो जाता है (४७) । पूर्ववत् हवि
लेकर अर्थात् स्रुव में रखे घृत को स्रुक द्वारा ग्रहण कर मन-ही-मन ब्रह्मा का स्मरण कर निम्न मन्त्र से आहुति
प्रदान करे (४८)—
ह्रौं अस्मिन् कर्मणि देवेश ! प्रमादाद् भ्रमतोऽपि वा ।
न्यूनाधिकं कृतं यच्च सर्वं स्विष्ट-कृतं कुरु ।। स्वाहा ।
अर्थात् हे देवेश ! प्रमाद या भ्रम-वश इस कार्य में जो कुछ कम या अधिक हुआ हो, उस सबको मेरे
लिए उत्तम फल-दायक करो (४६) ।
फा—६
नवां उल्लास : दस प्रकार के संस्कार | ६५
यावद् यज्ञ-समापनं तावद् भवद्भिः स्थातव्यम् ।
अर्थात् 'जब तक यज्ञ समाप्त नहीं होता, तब तक आप यहाँ स्थित रहें।' इस प्रकार प्रार्थना कर उन्हें
नमस्कार करे (३४-३५) । अग्नि के ईशान कोण से आरम्भ कर ब्रह्मा के निकट तक तीन बार स-जल हस्त से
पर्युक्षण करे। फिर तीन बार अग्नि को प्रोक्षित कर उसी अर्थात् पहले जिस पथ से आए थे, उसी पथ से
लौटकर अपने आसन पर बैठ जाय । तब मण्डल की उत्तर-दिशा में कुछ कुशों को उत्तराभिमुख करके बिछाये
(३६-३७) । उसी पर स-जल प्रोक्षणी-पात्र, आज्य-स्थाली, समिद् और कुश आदि सभी यज्ञीय वस्तुओं को रखे
(३८) । फिर स्रुक्, स्रुवा आदि रखकर 'ह्मां ह्रीं हूं' मन्त्र का उच्चारण करते हुए दिव्य दृष्टि अर्थात् एकटक
दृष्टि से उन सबको देखे और प्रोक्षण द्वारा उन्हें संस्कृत कर साधक भूमि पर दाएँ घुटने के बल बैठकर 'स्रुव'
नामक यज्ञ-पात्र में रखे घृत को 'स्रुक्' से लेकर अपने कल्याण की कामना करते हुए निम्न मन्त्र से तीन आहु-
तियाँ दे (३६-४०) -
ह्रीं विष्णवे स्वाहा ।
इसी प्रकार अर्थात् 'स्रुक्' के द्वारा 'स्रुव' में रखा घृत लेकर प्रजापति देव का ध्यान करते हुए वायु-
कोण से आरम्भ कर अग्नि-कोण तक होम करे (४१) -
ह्रीं प्रजापतये स्वाहा ।
पुनः घृत लेकर पुरन्दर देव का ध्यान करते हुए नैर्ऋत-कोण से ईशान-कोण तक घृत-धारा प्रदान
करे (४२)-
ह्रीं पुरन्दराय स्वाहा ।
हे परमेश्वरि ! फिर अग्नि के उत्तर, दक्षिण और मध्य में क्रमशः अग्नि, सोम और अग्निषोम को तीन
आहुतियाँ प्रदान करे-
ह्रीं अग्नये नमः । ह्रीं सोमाय नमः । ह्रीं अग्नी-षोमाभ्यां नमः ।
अब विधेय कर्म में कहे होम को करे (४३-४४) । तीन आहुति देने तक के उक्त कर्म को 'धारा-होम'
कहते हैं (४५) । जिस देवता के लिए आहुति दे, उसी देवता के उद्देश्य से देय वस्तु का उल्लेख करे। यथा-
ह्रीं विष्णवे स्वाहा, हविरिदं विष्णवे ।
इस प्रकार प्रकृत कर्म को समाप्त कर 'स्विष्ट-कृत होम' करे (४६) । हे वरानने ! कलि-काल में 'प्राय-
श्चित्त होम' नहीं होता, 'स्विष्टकृत' और 'व्याहृति होम' द्वारा प्रायश्चित्त हो जाता है (४७) । पूर्ववत् हवि
लेकर अर्थात् स्रुव में रखे घृत को स्रुक् द्वारा ग्रहण कर मन-ही-मन ब्रह्मा का स्मरण कर निम्न मन्त्र से आहुति
प्रदान करे (४८) -
ह्रीं अस्मिन् कर्मणि देवेश ! प्रमादाद् भ्रमतोऽपि वा ।
न्यूनाधिकं कृतं यच्च सर्वं स्विष्ट-कृतं कुरु ।। स्वाहा ।
अर्थात् हे देवेश ! प्रमाद या भ्रम-वश इस कार्य में जो कुछ कम या अधिक हुआ हो, उस सबको मेरे
लिए उत्तम फल-दायक करो (४६) ।
फा-६
६६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
फिर निम्न मन्त्र से आहुति प्रदान करे—
ह्रीं त्वमग्ने ! सर्व-लोकानां पावनः स्विष्ट-कृत् प्रभुः ।
यज्ञ-साक्षो क्षेम-कर्त्ता सर्वान् कामान् प्रपूरय ॥ स्वाहा ।
अर्थात् हे अग्ने ! तुम सब लोकों को पवित्र करनेवाले, अभीष्ट देनेवाले, प्रभु, यज्ञ के साक्षी और मंगल-
कारी हो । तुम मेरी सभी कामनाओं को पूर्ण करो (५०) ।
इस प्रकार ‘स्विष्ट-कृत होम' को सम्पन्न कर यह प्रार्थना करे—
कर्मणोऽस्य परब्रह्मन्नयुक्तं विहितं च यत् । तच्छान्त्यै यज्ञ-सम्पत्त्यै व्याहृत्या हूयते विभो ॥
अर्थात् हे परब्रह्मन् ! इस कर्म में जो कुछ अयुक्त हुआ है, उसको शान्ति के लिए और यज्ञ-सम्पत्ति के
लिए मैं व्याहृति द्वारा होम करता हूँ (५१) ।
यह प्रार्थना कर व्याहृति-होम करे । यथा—
ह्रीं भूः स्वाहा । ह्रीं भुवः स्वाहा । ह्रीं स्वः स्वाहा । ह्रीं भूर्भुवः स्वः स्वाहा ।
इस प्रकार चार आहुतियाँ देकर ज्ञानी यज्ञ-कर्ता यजमान के साथ पूर्णाहुति प्रदान करे (५२-५३) । यदि
कर्म करनेवाला स्वयं ही यजमान हो, तो स्वयं आहुति दे । अभिषेक आदि विधानों में इसी प्रकार की विधि कही
है (५४) । पूर्णाहुति का मन्त्र यह है—
ह्रीं यज्ञ-पते पूर्णो भवतु यज्ञो मे हृष्यन्तु यज्ञ-देवताः । फलानि सम्यग् यच्छन्तु स्वाहा ॥
अर्थात् हे यज्ञ-पते ! मेरा यह यज्ञ पूर्ण हो, यज्ञ के देवता प्रसन्न हों, इस यज्ञ का पूरा फल प्रदान
करें (५५) ।
ज्ञानी व्यक्ति दण्डायमान होकर एकाग्र-चित्त से उक्त मन्त्र द्वारा फल और ताम्बूल-सहित अग्नि में पूर्णा-
हुति प्रदान करे (५६) ।
पूर्णाहुति देकर शान्ति-कर्म करे । पहले प्रोक्षणो-पात्र से कुश द्वारा गृहीत जल द्वारा निम्न दो मन्त्रों को
पढ़ते हुए अपने मस्तक का अच्छी तरह मार्जन करे (५७)—
१—आपः सुमित्रियाः सन्तु भवन्त्वोषधयो मम । आपो रक्षन्तु मां नित्यमापो नारायणः स्वयम् ॥
२—आपो हिष्ठा मयो भुवस्ता न ऊर्जे दधातनः ।
अर्थात् जल मेरे उत्तम बन्धु स्वरूप हों, मेरे लिए ओषधि-स्वरूप हों, जल मेरी नित्य रक्षा करें, जल
स्वयं नारायण है । हे जल ! तुम सुख दो, तुम मुझे ऐहिक विषय दो ।
उक्त दोनों मन्त्रों से क्रमशः मस्तक को सिक्त कर कुश द्वारा ईशान-कोण में निम्न मन्त्र पढ़ते हुए भूमि
पर जल-विन्दु छोड़े (५८-५६)—
ये द्विषन्ति च मां नित्यं यांश्च द्विष्मो नरान्वयं । आपो दुर्मित्रियास्तेषां सन्तु भक्षन्तु तानपि ॥
अर्थात् जो नित्य मुझसे द्वेष करते हैं, हम जिन लोगों से द्वेष करते हैं, उनके लिए जल शत्रु-स्वरूप हों
और उन्हें भक्षण करें (६०) ।
तदनन्तर कुशों का त्याग कर हाथ जोड़कर अग्नि से प्रार्थना करे (६१)—
बुद्धिं विद्यां बलं मेधां प्रज्ञां श्रद्धां यशः श्रियम् । आरोग्यं तेज आयुष्यं देहि मे हव्य-वाहन ॥
अर्थात् हे हव्य-वाहन ! मुझे बुद्धि अर्थात् शास्त्रादि तत्त्व-ज्ञान, बल अर्थात् शक्ति, मेधा अर्थात् धारणा-
नवां उल्लास : दस प्रकार के संस्कार | ६७
शक्ति, प्रज्ञा अर्थात् सारासार-विवेक की निपुणता, श्रद्धा, यश, श्री, आरोग्य, तेज, आयु—यह सब प्रदान करो।
(६२-६३) ।
हे शिवे ! इस प्रकार अग्निदेव की प्रार्थना कर निम्न मन्त्र द्वारा उनका विसर्जन करे —
यज्ञ यज्ञ-पतिं गच्छ यज्ञं गच्छ हुताशन । स्वां योनिं गच्छ यज्ञेश ! पूरयास्मन्मनोरथम् ॥
अग्ने ! क्षमस्व स्वाहा ।
अर्थात् हे यज्ञ ! तुम यज्ञ-पुरुष विष्णु के पास जाओ। हे हुताशन ! तुम यज्ञ में प्रविष्ट हो जाओ। हे यज्ञे-
श्वर ! तुम अपने स्थान को जाओ और मेरे मनोरथ को पूरा करो। हे अग्ने ! क्षमा करो (६४)।
इस मन्त्र को पढ़ते हुए अग्नि की उत्तर दिशा में दही की आहुति देकर अग्नि को दक्षिण दिशा में
खिसका दे (६५)। तब ब्रह्मा को दक्षिणा देकर भक्ति से नमस्कार कर उन्हें विदा करे। फिर निम्न मन्त्र पढ़ते
हुए यज्ञ-कर्ता 'स्रुव' नामक यज्ञ-पात्र में लगी भस्म से अपने ललाट पर तिलक लगाए (६६-६७)—
ह्रीं क्लीं सर्व-शान्ति-करो भव ।
तब निम्न मन्त्र पढ़ता हुआ मस्तक के ऊपर आयु बढ़ानेवाला पुष्प धारण करे—
शान्तिरस्तु शिवं चास्तु वासवाग्नि-प्रसादतः । मरुतां ब्रह्मणश्चैव वसु-रुद्र-प्रजापतेः ॥
अर्थात् इन्द्र, अग्नि, ब्रह्मा, प्रजापति, वसु-गण, रुद्र-गण और मरुद्-गण के प्रसाद से शान्ति हो और
मंगल हों (६८) ।
तब होम और प्रकृत कर्म की यथा-शक्ति दक्षिणा प्रदान करे (६६) । हे देवि ! मैंने तुमसे सभी सत्कर्मों में
की जानेवाले यह 'कुशण्डिका' कही। कुल-साधक लोग शुभ कर्म के पूर्व यत्न-पूर्वक इसका अनुष्ठान करें (७०)।
हे शिवे ! वंश-परम्परा के अनुसार जिन्हें प्रकृत कर्म में 'चरु' करने का नियम है, उनको कर्म-सिद्धि के
लिए 'चरु'-कर्म बताता हूँ (७१) । पहले ताम्र-मयो या मृण्मयी 'चरु'-स्थाली प्रस्तुत करे (७२) । फिर
कुशण्डिका में कही विधि से द्रव्य-संस्कार तक के सब कर्म करके अपने सामने 'चरु'-स्थाली को लाए (७३) ।
इस 'चरु'-स्थालो को अक्षत और अछिद्र देखकर प्रादेश-बराबर एक पवित्र कुश स्थाली के मध्य में रखे (७४) ।
हे सुर-वन्दिते ! फिर यज्ञ-स्थल में तण्डुल लाकर स्थण्डिल के पास रखे। जिस कर्म में जिस देवता की पूजा करने
की रीति हो, उसके नाम में चतुर्थी विभक्ति लगाकर उसका उल्लेख कर 'त्वा जुष्टम्' कहे और क्रमशः
'गृह्णामि' (लेता हूँ), 'निर्वपामि' (स्थाली में रखता हूँ), 'प्रोक्षामि' (जल छिड़कता हूँ) कह कर प्रत्येक देवता
के लिए चार-चार मुट्ठी तण्डुल ले, स्थाली पर रखे और उस पर जल छिड़के (७५-७७) । हे सुव्रते ! तब उन पर
दूध और चीनी देकर एकाग्र हृदय से सुसंस्कृत अग्नि में पाक-विधि से उस सबको उत्तम रूप से पकाये (७८) ।
जब समझे कि अन्न पक गया है और कोमल हो गया है, तब उसमें स्रुव से घृत छोड़े (७६) । तब अग्नि की
उत्तर दिशा में कुश के ऊपर 'चरु'-पात्र स्थापित कर उसमें पुनः तीन बार घृत देकर कुश द्वारा 'चरु'-
स्थाली को आच्छादित करे (८०)। फिर 'चरु'-स्थाली से 'स्रुव' नामक यज्ञ-पात्र में कुछ 'चरु' लेकर उसमें
घी देकर 'जानु'-होम करे (८१) । तदनन्तर 'धारा'-होम करके प्रधान कर्म में यहाँ जो देवता पूज्य हों, उन्हीं
देवताओं को मन्त्र द्वारा आहुति प्रदान करे (८२) । इस प्रकार प्रकृत होम को समाप्त कर प्रायश्चित्त-होम करके
कर्म समाप्त करे (८३) ।
दश-विध संस्कार के समय और प्रतिष्ठा के समय इसी प्रकार की विधि कही है। शुभ कर्म के आदि में
६८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
कर्म-सिद्धि के लिए यह करणीय है (८४) ।
हे महा-माये ! अब 'गर्भाधान' आदि सब क्रियाएँ बताता हूँ । उनके क्रम के अनुसार पहले 'ऋतु-संस्कार'
कहता हूँ, सुनो (८५) । नित्य-कर्म समाप्त कर शुद्ध-शरीर होकर ब्रह्मा, दुर्गा, गणेश, ग्रह-गण और दिक्-पति-गण
—इन पञ्च-देवताओं की पूजा करे (८६) । स्थण्डिल की पूर्व दिशा में घट के ऊपर इन सब देवताओं की पूजा
कर क्रमशः गौरी आदि सोलह मातृकाओं की पूजा करे (८७ । मातृ-गण ये हैं—१ गौरी, २ पद्मा, ३ शची, ४
मेधा, ५ सावित्री, ६ विजया, ७ जया, ८ देवसेना, ६ स्वधा, १० स्वाहा, ११ शान्ति, १२ पुष्टि, १३ धृति, १४
क्षमा, १५ आत्म-देवता, १६ कुल-देवता (८८) । निम्न मन्त्र पढ़कर इन सबका आवाहन करे—
आयान्तु मातरः सर्वास्त्रिदशानन्द-कारिकाः । विवाह-व्रत-यज्ञानां सर्वाभीष्टं प्रकल्प्यताम् ॥
यान-शक्ति-समारूढाः सौम्य-मूर्ति-धराः सदा । आयान्तु मातरः सर्वा यज्ञोत्सव-समृद्धये ॥
अर्थात् हे देव-गण को आनन्द-दायिनी सभी माताओं ! आप सब आयें । विवाह-व्रत और यज्ञों के सभी
अभीष्ट फल को प्रदान करें । हे सभी माताओं ! अपने-अपने यान और शक्ति पर आरूढ़ होकर, सदा सौम्य
मूर्ति धारण कर, यज्ञोत्सव की समृद्धि के लिए आप सब आएँ (८६-६०) ।
इस प्रकार मातृका-गण का आवाहन कर और यथा-शक्ति उनकी पूजा कर नाभि तक ऊँची—देहली से
प्रादेश तक स्थान मे सिन्दूर और चन्दन द्वारा सात या पाँच बिन्दु प्रदान करे (६१) । ज्ञानी व्यक्ति काम, माया
रमा अर्थात् 'क्लीं ह्रीं श्रीं' इन तीन बीजों का स्मरण करते हुए प्रत्येक बिन्दु को लक्ष्य कर अविच्छिन्न घृत-धारा
प्रदान करे और उनमें गन्ध-पुष्पादि से 'वसु' नामक देवता की पूजा करे (६२) । धीर व्यक्ति मेरे द्वारा कही
पद्धति से इस प्रकार 'वसु-धारा' की रचना कर, स्थण्डिल-विरचना के बाद, अग्नि-स्थापन-पूर्वक होम-द्रव्यों का
संस्कार कर श्रेष्ठ 'चरु-पाक' करे (६३) । इस ऋतु-संस्कार के कार्य में 'प्राजापत्य' नामक 'चरु' और 'वायु'
नामक अग्नि है । 'धारा-होम' तक का सब कार्य समाप्त कर 'ऋतु-संस्कार' कर्म आरम्भ करे (६४) । निम्न
मन्त्र पढ़ते हुए चरु-द्वारा तीन आहुतियाँ प्रदान करे—
ह्रीं प्रजापतये स्वाहा ।
फिर एक आहुति निम्न मन्त्र से दे—
विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु । आसिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते ॥ स्वाहा
अर्थात् विष्णु उत्पत्ति-स्थान (योनि) की रचना करें । त्वष्टा रूप को परिष्कृत करें । प्रजापति अभिषेक
करें । धाता तुम्हारे गर्भ का पोषण करें (६५-६६) ।
इसके बाद सूर्य, प्रजापति और विष्णु का ध्यान करते हुए घृत द्वारा, चरु द्वारा या सघृत-चरु द्वारा
आहुति प्रदान करे (६७) । यथा—देवी सिनीवाली, सरस्वती और दोनों अश्विनी-कुमारों का ध्यान कर निम्न
मन्त्र से उत्तम आहुति प्रदान करे—
गर्भं धेहि शिनीवाली, गर्भं धेहि सरस्वती । गर्भं ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्कर-स्रजौ ॥ स्वाहा
अर्थात् तुम शिनीवाली-स्वरूपा होकर गर्भं धारण करो । तुम सरस्वती-स्वरूपा होकर गर्भ धारण करो ।
पद्म-पुष्प-माला-धारी दोनों अश्विनीकुमार देव तुममें गर्भ स्थापित करें (६८-६६) ।
तब काम, वधू, माया, रमा और कूर्च अर्थात् 'क्लीं स्त्रीं ह्रीं श्रीं हूँ' इन बीजों का उच्चारण कर सूर्य
और विष्णु का ध्यान कर निम्न मन्त्र से आहुति प्रदान करे (१००)—
अमुष्यै पुत्र-कामायै गर्भमाधेहि स्वाहा ।
नवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार | ६५
फिर विष्णु का ध्यान करते हुए निम्न मन्त्र से आहुति दे (१०१)—
यथेयं पृथिवी देवी ह्युत्ताना गर्भमादधे । तथा त्वं गर्भमाधेहि दशमे मासि सूतये ।। स्वाहा
अर्थात् यह उत्ताना पृथ्वी देवी जिस प्रकार गर्भ धारण करे, उसी प्रकार दसवें मास में प्रसव होने के लिए
तुम गर्भ धारण करो।
पुनः आज्य (घृत) लेकर परात्पर विष्णु का ध्यान करते हुए निम्न मन्त्र से आहुति छोड़े (१०२)—
विष्णो ! ज्येष्ठेन रूपेण नार्यामस्यां वरीयसम् । सुतमाधेहि स्वाहा ॥
अर्थात् हे विष्णो ! तुम श्रेष्ठ रूप द्वारा इस नारी में श्रेष्ठ सन्तान का आधान करो।
इसके बाद काम-बीज-पुटित माया अर्थात् 'क्लीं ह्रीं क्लीं' और माया-पुटित वधू अर्थात् 'ह्रीं स्त्रीं ह्रीं'
तथा पुनः काम 'क्लीं', माया-बीज 'ह्रीं' का पाठ कर भार्या के मस्तक को छुये (१०३)। इसके बाद पति-पुत्र-
वती स्त्रियों से घिरकर पति अपने दोनों हाथों से पत्नी के मस्तक को छूते हुए विष्णु, दुर्गा, ब्रह्मा और सूर्य का
ध्यान कर उसके क्रोडाञ्चल में तीन फल देकर स्विष्टकृत्-होम कर प्रायश्चित्त-होम द्वारा कर्म को समाप्त करे
(१०४-१०५)। अथवा सायंकाल में गौरी-शङ्कर की पूजा कर सूर्यार्घ्य देकर दम्पति का शोधन करे (१०६)।
यह तुमसे 'ऋतु-शोधन' का कर्म कहा, अब 'गर्भाधान' बताता हूँ, सुनो (१०७)। उसी ऋतु-संस्कार की रात्रि
में अथवा किसी अन्य युग्म रात्रि में घर के भीतर जाकर प्रजापति देव का ध्यान कर पत्नी को छूते हुए पति
माया-बीज 'ह्रीं' का उच्चारण कर निम्न मन्त्र पढ़े (१०८-१०६)—
ह्रीं आवयोः सुप्रजाये त्वं शय्ये शुभकरी भव ।
अर्थात् हे शय्ये ! हम दोनों की उत्तम सन्तान के लिए तुम शुभ करनेवाली बनो।
तब पत्नी के साथ शय्या पर चढ़कर पूर्व-मुख या उत्तर-मुख होकर बैठे और पत्नी को देखते हुए उसके
मस्तक पर हाथ रखकर बाएँ हाथ से आलिङ्गन करने के बाद स्थान-स्थान पर मन्त्र का जप करे (११०)—
मस्तक पर काम-बीज 'क्लीं' का १०० बार, चिबुक पर वाग्भव 'ऐं' का १०० बार, कण्ठ पर रमा 'श्रीं'
का २० बार, दोनों स्तनों पर भी 'श्रीं' बीज का सौ-सौ बार, हृदय पर माया-बीज 'ह्रीं' का १० बार, नाभि
पर भी 'ह्रीं' बीज का २५ बार जप कर योनि पर हाथ रखकर काम-बीज-सहित वाग्भव अर्थात् 'क्लीं ऐं' का
१०८ बार जप कर लिङ्ग पर भी इसी 'क्लीं ऐं' मन्त्र का जप करे। तब 'ह्रीं' मन्त्र जप कर योनि को विकसित
कर सन्तान की कामना से पत्नी-गमन करे (१११-१३)। वीर्य-पात के समय प्रजापति का ध्यान कर पति नाभि
के नीचे चित्त-कुण्ड में रक्तिका नाड़ी में बीज का निक्षेप करे (११४)। वीर्य-त्याग के समय निम्न मन्त्र पढ़े—
यथाऽग्निना सगर्भा भूद्यौर्यथा वज्र-धारिणा । वायुना दिग् गर्भवती तथा गर्भवती भव ॥
अर्थात् जिस प्रकार पृथ्वी अग्नि द्वारा गर्भवती होती है, अमरावती इन्द्र द्वारा गर्भवती होती है, दिशा
जिस प्रकार वायु द्वारा गर्भवती होती है, उसी प्रकार तुम गर्भवती हो (११५-१६)।
हेममहेश्वरि ! उसी ऋतु में अथवा अन्य ऋतु में गर्भ रहने पर—गर्भाधान के तीसरे महीने में 'पुंसवन'
संस्कार करे (११७)। पति नित्यकर्म समाप्त कर पञ्च-देवताओं की पूजा करे। फिर गौरी आदि सोलह मातृकाओं
की पूजा कर वसु-धारा प्रदान करे (११८)। तब वृद्धि श्राद्ध कर पूर्वोक्त विधि से धारा-होम तक कर्म सम्पन्न कर
'पुंसवन'-क्रिया करे (११६)। उसमें 'प्राजापत्य' नामक चरु और 'चन्द्र' नामक अग्नि होते हैं (१२०)। पति
गव्य दही में एक यव (जौ) और दो माष (उड़द) छोड़कर पत्नी से तीन बार पूछे—
७० । हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
भद्रे ! किं त्वं पिबसि ?
अर्थात् हे भद्रे ! तुम क्या पीती हो (१२१) ? इस पर पत्नी तीन बार कहे —
ह्रीं पुंसवनम् ।
अर्थात् पुत्र-प्रसव के लिए भूत वस्तु पीती हूँ। तब पत्नी तीन प्रसृति यव और माष-युक्त दधि का पान
करे (१२२)। इसके बाद जीवित पुत्रोंवालो स्त्रियों के साथ पत्नी को पति याग-स्थान में लावे और अपनी बाईं
ओर उसे बैठाकर चरु-होम आरम्भ करे (१२३)। पहले पूर्व-वत् चरु लेकर 'रक्षोघ्न' हुताशन का ध्यानकर रुद्र
और प्रजापति का ध्यान करते हुए निम्न मन्त्र से बारह आहुतियाँ प्रदान करे (१२४-२६)—
ह्रीं हूं ये गर्भ-विघ्न-कर्त्तारो ये च गर्भ-विनाशकाः। भूताः प्रेताः पिशाचाश्च वेताला बाल-घातकाः।
तान् सर्वान् नाशय नाशय गर्भ-रक्षां कुरु कुरु स्वाहा ॥
अर्थात् गर्भ में विघ्न करनेवाले और गर्भ को नष्ट करनेवाले जो-जो भूत-प्रेत-पिशाच-वेताल तथा बाल-
घाती हैं, उन सबका नाश करो, गर्भ की रक्षा करो। इसके बाद निम्न मन्त्र से ५ आहुतियाँ दे—
ह्रीं चन्द्रमसे स्वाहा।
तब पत्नी के हृदय को स्पर्श कर माया-लक्ष्मी अर्थात् 'ह्रीं श्रीं' मन्त्र का १०० बार जप करे (१२७)।
फिर स्विष्टकृत-होम कर प्रायश्चित्त-होम द्वारा 'पुंसवन'-कर्म समाप्त करे।
पाँचवें महीने में पत्नी को पञ्चामृत प्रदान करे (१२८)। शर्करा, मधु, दुग्ध, घृत और दधि—सम-भाग
इन पाँच द्रव्यों को 'पञ्चामृत' कहते हैं। यह देह-शुद्धि के लिए विहित है (१२६)। हे शिवे ! पति इन पाँचों द्रव्यों
में से प्रत्येक द्रव्य के ऊपर वाग्भव 'ऐं', मदन 'क्लीं', लक्ष्मी 'श्रीं', माया 'ह्रीं', कूर्च 'हूँ' और इन्द्र 'लं'—अर्थात्
'ऐं क्लीं श्रीं ह्रीं हूँ लं' इन बीजों का पाँच-पाँच बार जप कर पञ्चामृत बनाकर पत्नी को पाँचवें महीने में
पिलाये (१३०)।
छठे या आठवें मास में 'सीमन्तोन्नयन' करे। जब तक सन्तान का जन्म न हो, तब तक की अवधि के
मध्य में 'सीमन्तोन्नयन' करना चाहिए (१३१)। ज्ञानी पति पूर्वोक्त धारा-होम तक के कर्म कर पत्नी-सहित
आसन पर बैठकर क्रमशः तीन आहुतियाँ निम्न मन्त्रों से प्रदान करे (१३२)—
विष्णवे स्वाहा । भास्वते स्वाहा । धात्रे स्वाहा ।
फिर चन्द्रमा का ध्यान कर 'शिव' नामक हुताशन में चन्द्र के लिए सात बार आहुतियाँ दे (१३३)। हे
शिवे ! दोनों अश्विनीकुमारों, इन्द्र, विष्णु, शिव, दुर्गा, प्रजापति—इन सबका ध्यान कर प्रत्येक को पाँच-पाँच
आहुतियाँ दे (१३४)। तब पति दाएँ हाथ में स्वर्ण कङ्कतिका (कंघी) लेकर उसे सीमन्त (माँग) से लेकर बंधे
हुए केश-पाश (जूड़े) में प्रविष्ट करे (१३५)। शिव, विष्णु और ब्रह्मा का ध्यान कर निम्न मन्त्र को पढ़े—
ह्रीं भार्य्ये कल्याणि सुभगे ! दशमे मासि सुव्रते ! सुप्रसूता भव प्रोता प्रसादाद् विश्व-कर्मणः ॥
आयुष्मतो कङ्कतिका वर्चस्वी ते शुभं कुरु ।
अर्थात् हे आर्ये ! हे कल्याणि ! हे सुभगे ! हे सुव्रते ! तुम दसवें मास में उत्तम सन्तान को जन्म देकर
प्रसन्न और आयुष्मती होओ और विश्वकर्मा के प्रसाद से कङ्कतिका (कंधी) तुम्हारे तेज को बढ़ाये। तुम शुभ
कार्य का अनुष्ठान करो (१३६-३७)।
नवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार | ७१
तदनन्तर स्विष्ट-कृत होमादि द्वारा कर्म समाप्त करे (१३८) । सन्तान उत्पन्न होते ही घोर व्यक्ति सुवर्ण
देकर पुत्र-मुख को देखकर सूतिका-गृह से भिन्न किसी अन्य गृह में पूर्वोक्त विधि से धारा-होम समाप्त करे
(१३६)। फिर अग्नि, इन्द्र, प्रजापति, विश्वदेव-गण और ब्रह्मा के लिए पाँच आहुतियाँ प्रदान करे । तब पिता
कांस्य-पात्र में मधु और घृत बराबर-बराबर लेकर उस पर वाग्भव 'ऐं' बीज का १० बार जप कर दाएँ हाथ
की अनामिका द्वारा निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए पुत्र को उसे चटाये (१४०-४१)—
आयुर्वर्चो बलं मेधा वर्धतां ते सदा शिशो ।
अर्थात् हे शिशो ! तुम्हारी आयु, तेज, बल और मेधा में निरन्तर वृद्धि हो (१४२) ।
इस प्रकार आयुष्यकर कार्य कर बालक का एक गुप्त नाम रखे । पुत्र के लाए जाने पर उसी नाम से उसे
बुलाए (१४३) । इसके बाद प्रायश्चित्तादि होम कर जात-कर्म पूर्ण करे । तब धात्री उत्साह-पूर्वक नारी-छेदन
करे (१४४) । जब तक नाड़ी-छेदन नहीं होता, तब तक शौच की बाधा नहीं होती अर्थात् अशौच नहीं होता ।
अतः नाड़ी-छेदन के पूर्व देवी और पैत्री क्रिया करता रहे (१४५) । कन्या के भी ये सभी कर्म अमन्त्रक करे ।
छठे या आठवें मास में प्रकाश्य 'नामकरण' करे (१४६) । 'नामकरण' के समय माता शिशु पुत्र को
स्नान कराकर उत्तम दो वस्त्र पहनाकर पति के पास लाए और उसे पूर्व-मुख करके बैठाए (१४७) । फिर पिता
सुवर्ण-सहित कुशोदक द्वारा शिशु के मस्तक पर निम्न तीन मन्त्रों से जल छिड़के—
जाह्नवी यमुना रेवा सु-पवित्रा सरस्वती । नर्मदा वरदा कुन्ती सागराश्च सरांसि च ।
एते त्वामभिषिञ्चन्तु धर्म-कामार्थ-सिद्धये ॥१
ह्रीं आपो हिष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन महे रणाय चक्षषे ॥२
ह्रीं यो वः शिवतमोरसस्तस्य भाजयतेऽन ऊष तीखि मातरः ।
तस्मा अरङ्ग माम वोयस्य क्षयाय-जिन्वथ आपो जनयथा च नः ॥३
अर्थात्-१. गङ्गा, यमुना, रेवा, सुपवित्रा सरस्वती, नर्मदा, वरदा, कुन्ती, सभी सागर और सभी सरोवर
—ये सब धर्म-काम-अर्थ की सिद्धि के लिए तुम्हारा अभिषेक करें (१४८-१४६) ।
२. हे जल ! तुम सुख-दाता हो, अतः हमारे लिए इस समय अन्न की व्यवस्था और पर-काल में पर-ब्रह्म
से हमारा मिलन कराओ (१५०) ।
३. माता के समान स्नेह-युक्त तुम हम लोगों को मङ्गलकारी रस का अधिकारी बनाओ । हे सभी जल !
तुमने जिस रस द्वारा जगन्मण्डल को व्याप्त कर रखा है, उससे हम तृप्त हों, हमें उसका भोग कराओ
(१५१) ।
तदनन्तर पिता पूर्ववत् वह्नि-संस्कार कर धारा-होम तक सभी कार्य कर पाँच आहुतियाँ प्रदान करे
(१५२) । पार्थिव नामक अग्नि में उक्त पाँच आहुतियाँ देते समय पहले अग्नि को, फिर वासव को, तब प्रजापति
को, फिर विश्व-देव-गण को और तब ब्रह्मा को आहुति दे (१५३) । फिर पुत्र को गोद में लेकर उसके दाएँ कान
में थोड़े अक्षरों का, सरलतः से उच्चारण होनेवाला उसका नाम सुनाए (१५४) ।
इस प्रकार तीन बार नाम सुनाकर स्विष्ट-कृत होम आदि सम्पन्न कर ब्राह्मणों का निवेदन कर कर्म
समाप्त करें (१५५) । कन्या-सन्तान का निष्क्रमण, वृद्धि श्राद्ध नहीं है। उसका नामकरण, अन्न-प्राशन और
चूडाकरण अमन्त्रक ही करे (१५६) ।
७२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
चौथे या छठे मास में शिशु का 'निष्क्रमण' संस्कार करे (१५७) । इस संस्कार के समय पिता स्नान व
नित्य-क्रिया कर गणेश-पूजा करने के बाद शिशु को स्नान करा वस्त्र व अलङ्कार से भूषित कर अपने सामने
बैठाए और निम्न मन्त्र पढ़े-
ब्रह्मा विष्णुः शिवो दुर्गा गणेशो भास्करस्तथा । इन्द्रो वायुः कुबेरंश्च वरुणोऽग्निर्वृहस्पतिः ।
शिशोः शुभं प्रकुर्वन्तु रक्षन्तु पथि सर्वदा ॥
अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महेश, दुर्गा, गणेश, सूर्य, इन्द्र, वायु, कुबेर, वरुण, अग्नि और वृहस्पति-ये सब
शिशु का मङ्गल करें और मार्ग में सदा रक्षा करें (१५८-१५६) ।
तब पिता शिशु को गोद में लेकर आनन्द-पूर्ण स्वजनों से घिर कर गीत-वाद्य के साथ बालक को बाहर
ले जाए (१६०) । मार्ग में कुछ दूर जाकर निम्न मन्त्र पढ़ते हुए बालक को सूर्य का दर्शन कराए (१६१)—
ॐ ह्रीं तच्चक्षुर्देव-हितं पुरस्तात् शुक्रमूच्चरत् । पश्येम शरदः शतं, जीवेम शरदः शतम् ॥
अर्थात् शुक्र का अतिक्रम कर जो देव-गण के लिए भी हितकारी सूर्य-रूप चक्षु वर्तमान है, उसे हम एक
सौ वर्ष तक देखें और एक सौ वर्ष तक जीवित रहें (१६२) ।
फिर बालक को वापस अपने घर में लाकर सूर्य को अर्घ्य देकर आत्मीय स्वजनों को भोजन कराये
(१६३) । हे शिवे ! कुमार के छठे या आठवें मास में पिता या पितृव्य (चाचा) उसका 'अन्न-प्राशन' संस्कार करे
(१६४) । पूर्ववत् देव-पूजा आदि और वह्नि-संस्कार कर यथा-विधि धारा-होम तक कर्म कर 'शुचि' नामक
हुताशन में पाँच आहुतियाँ दे । अग्नि के लिए प्रथम आहुति, वासव के लिए द्वितीय, प्रजापति के लिए तृतीय,
विश्वदेव-गण के लिए चतुर्थ और ब्रह्मा के लिए पञ्चम आहुति प्रदान करे (१६५-६७) । फिर पिता अग्नि में अन्नदा
देवी का ध्यान कर उनके लिए पाँच आहुतियाँ देकर उसी घर में या अन्य गृह में वस्त्रालङ्कार-भूषित पुत्र को
गोद में लेकर निम्न पञ्च प्राणाहुति-मन्त्र पढ़ते हुए क्रमशः पाँच बार उसे पायसामृत पिलाये (१६८)—
१. प्राणाय स्वाहा, २. अपानाय स्वाहा, ३. समानाय स्वाहा, ४. उदानाय स्वाहा,
५. व्यानाय स्वाहा ।
फिर अन्न के सभी पदार्थों में से थोड़ा-थोड़ा लेकर शिशु के मुख में स्पर्श कराये (चखाये) (१६६) । तब
शंख, तुरही आदि की ध्वनि कर प्रायश्चित्त होम कर क्रिया समाप्त करे । यह तुमसे 'अन्न-प्राशन' की विधि
कही । अब 'चूड़ाकरण' की विधि कहता हूँ, सुनो (१७०) ।
कुलाचार के अनुसार जन्म होने के तीसरे या पाँचवें वर्ष में संस्कार-सिद्धि के लिए बालक का 'चूड़ा-
कर्म' करे (१७१) । साधक देव-पूजा से धारा-होम तक के सभी कर्म सम्पन्न कर 'सत्य' नामक अग्नि की उत्तर
दिशा में वृष-गोमय-पूरित तिल और गोधूम (गेहूँ) संयुक्त एक नया शराव (पात्र), कुछ उष्ण जल और एक तेज
छुरी रखे (१७२-७३) । फिर पिता उसी स्थान में अपनी बाईं ओर बालक को मां को गोद में बैठाकर उक्त
समस्त कुछ उष्ण जल से वरुण बीज 'वं' का दस बार जप करते हुए उसके केशों को मार्जित करे । तब माया
अर्थात् 'ह्रीँ' मन्त्र का पाठ करते हुए दो कुश-पत्रों से उसके मस्तक पर एक चोटी बनाए (१७४-७५) । माया,
लक्ष्मी अर्थात् 'ह्रीँ श्रीँ' का तीन बार जप कर लोहे की छुरी को लेकर उक्त चोटी को काट कर उसे मां के हाथ
में रखे (१७६) । बालक की माता उस चोटी को दोनों हाथों से लेकर उस गोमय-युक्त शराव में रखें । फिर
पिता नाई के प्रति निम्न मन्त्र कहे—
नवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार । ७३
क्षुर-मुण्डिन् ! शिशोः क्षौरं सुखं साधय स्वाहा ।
अर्थात् हे नापित ! तुम सुखपूर्वक इस शिशु का क्षौर-कर्म करो ।
यह मन्त्र पढ़कर पिता नाई को देखता हुआ प्रजापति के लिए 'सभ्य' नामक अग्नि में तीन आहुतियाँ
प्रदान करे (१७७-७८) । तब नाई बालक का क्षौर-कर्म करे और पिता उस बालक को स्नान कराकर वस्त्र,
अलङ्कार, माला से विभूषित करे तथा अग्नि के पास अपनी बाईं ओर उसे बैठाकर स्विष्टकृत होम करे । फिर
प्रायश्चित्त होम कर पूर्णाहूति प्रदान करे (१७६-८०) । तब स्वर्ण, रजत या लोहे की शलाका द्वारा निम्न मन्त्र
को पढ़ते हुए शिशु का कर्ण-वेध करे—
ह्रीं शिशो ! ते कुशलं कुरुतां विश्व-कृद् विभुः ।
अर्थात् हे शिशो ! विश्व-स्रष्टा विभु तुम्हारा मङ्गल करें (१८१) ।
फिर 'आपोहिष्ठा मयो भुव' इस मन्त्र द्वारा पुत्र का अभिषेक कर शान्ति-कर्म और दक्षिणा प्रदान कर
'चूड़ा-कर्म' समाप्त करे (१८२) ।
गर्भाधान से चूड़ाकरण तक के संस्कार-कर्म सभी जातियों के एक समान हैं। शूद्र और सामान्य जाति
के ये सभी संस्कार अमन्त्रक होते हैं (१८३) । ब्राह्मण आदि पाँच वर्णों को कन्या के जात-कर्म से चूड़ाकरण
तक के संस्कार—एकमात्र निष्क्रमण को छोड़कर—अमन्त्रक करने चाहिए (१८४) ।
अब द्विज-गण के 'उपनयन'-कर्म को विधि कहता हूँ, जिसके करने से वे दैव और पैत्र कर्म करने के
अधिकारी होते हैं (१८५) । गर्भ से आठवें या आठवें वर्ष की आयु से आठ वर्ष के समय के भीतर अर्थात् ब्राह्मण
बालक का 'उपनयन' संस्कार सोलह वर्ष की आयु के भोतर ही होना चाहिए । उसके बाद 'उपनयन' करने की
विधि नहीं है और वह दैव एवं पैत्र कर्म के करने का अधिकारी नहीं होता (१८६) ।
विद्वान् पिता नित्य-क्रिया करके पञ्च-देवताओं का पूजन करे । गौरो आदि १६ मातृकाओं की पूजा करे ।
फिर वसु-धारा दे (१८७) । तब देवताओं और पितरों की तृप्ति के लिए वृद्धि-श्राद्ध करे । कुशण्डिकोक्त विधि
के अनुसार धारा-होम तक सभी कर्मों को करे (१८८) । प्रातःकाल अच्छी तरह स्नान कराकर, भोजन कराकर
उत्तम अलंकार से विभूषित कर, शिखा के सिवा पूर्ण रूप से मुण्डित, रेशमी वस्त्र पहनाकर बालक को छाया-
मण्डप में लाकर 'समुद्भव' नामक अग्नि के पास अपनी बाईं ओर सुन्दर स्वच्छ आसन पर बैठाए । फिर गुरु
उस शिष्य से कहे—
'ब्रह्मचर्यं कुरु वत्स !'
अर्थात् हे पुत्र ! ब्रह्मचर्य करो ।
शिष्य उत्तर में गुरु से निवेदन करे—
'ब्रह्मचर्यं करोमि ।'
अर्थात् मैं ब्रह्मचर्य करता हूँ (१८६-१६१) ।
तब गुरु प्रसन्न-हृदय से शान्त-हृदय शिशु के दीर्घायु और तेजोवृद्धि के लिए कषाय रंग के दो वस्त्र उसे
प्रदान करे (१६२) । कषाय-वस्त्र-धारी इस बालक को गुरु मूंज या कुश की बनी, गाँठ लगी, तीन लट वाली
मेखला मौन होकर दे (१६३) । बालक निम्न मन्त्र का उच्चारण कर मेखला को अपनी कमर में बाँधे—
ह्रीं सुभगा मेखला स्यात् शुभ-प्रदा ।
फा०-१०
७४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
अर्थात् यह सुन्दर मेखला मेरे लिए कल्याणकारिणी हो।
तब मौन होकर बालक गुरु के सामने खड़ा हो (१६४)। अब गुरु निम्न मन्त्र को पढ़कर बालक को
कृष्णाजिन से युक्त यज्ञोपवीत और वेणु या खदिर या पलाश या क्षीर-वृक्ष की लकड़ी से बना दण्ड प्रदान करे-
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, बृहस्पतिर्यत् सहजं पुरस्तात् ।
आयुष्यमग्र्यं प्रति-मुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥
अर्थात् यह यज्ञोपवीत परम पवित्र है, जो पूर्व काल में वृहस्पति का स्वाभाविक था। आयुष्यकर, श्रेष्ठ,
शुभ्र इस यज्ञोपवीत को तुम धारण करो। तुम्हारे बल ओर तेज की वृद्धि हो (१६५-१६६)।
इसके बाद दण्ड और उपवीत-धारी बालक को गुरु 'ह्रीं आपोहिष्ठा ह्रीं' मन्त्र का तीन बार उच्चारण
कर कुश-जल द्वारा अभिषिक्त कर जल से बालक की अञ्जलि को पूर्ण करें (१६७)। फिर ब्रह्मचारी उसी
जलाञ्जलि से सूर्य के लिए अर्घ्य प्रदान करे। तब गुरु 'तच्चक्षुर्देव-हितं' मन्त्र का पाठ करते हुए शिष्य को सूर्य
का दर्शन कराये (१६८)।
सूर्य का दर्शन कर चुकने पर बालक से गुरु कहे-
मम व्रते मनो धेहि, मम चित्तं ददामि ते । जुषष्वैक-मना वत्स ! मम वाचोऽस्तु ते शिवम् ।
अर्थात् तुम मेरे व्रत में मन लगाओ। मैं तुम्हें अपना चित्त देता हूँ। हे पुत्र ! तुम एक-मन होकर मेरे व्रत
का आचरण करो। मेरी वाणी से तुम्हारा कल्याण हो (१६६)।
इस मन्त्र को पढ़कर गुरु बालक के हृदय को छूकर उससे पूछे-
‘किं नामासि ?'
अर्थात् तुम्हारा नाम क्या है ?
उत्तर में शिष्य कहे-
‘अमुक-शर्माऽहं भवन्तमभिवादये ।'
अर्थात् मैं अमुक शर्मा आपको प्रणाम करता हूँ (२००)।
हे पार्वति ! तब गुरु यह पूछे-
‘कस्य त्वं ब्रह्मचारी ?’
अर्थात् तुम किसके ब्रह्मचारो हो ?
शिष्य सावधान होकर उत्तर दे-
‘भवतो ब्रह्मचार्यहम् ।'
अर्थात् मैं आपका ब्रह्मचारी हूँ (२०१)।
इस पर सद्गुरु कहें-
‘इन्द्रस्य ब्रह्मचारी त्वमाचार्यस्ते हुताशनः ।'
अर्थात् तुम इन्द्र के ब्रह्मचारी हो, तुम्हारे आचार्य हुताशन हैं।
ऐसा कहकर सद्गुरु निम्न मन्त्र पढ़कर शिष्य को देवताओं के निकट समर्पित करे-
त्वां प्रजापतये वत्स ! सवित्रे वरुणाय च, पृथिव्यै विश्व-देवेभ्यः सर्व-देवेभ्य एव च ।
समर्पयामि ते सर्वे रक्षन्तु त्वां निरन्तरम् ।
नवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार । ७५
अर्थात् हे पुत्र ! तुमको प्रजापति के लिए, सविता के लिए, वरुण के लिए, पृथिवी के लिए, विश्वदेवों के
लिए, सब देवों के लिए समर्पित करता हूँ। वे सब तुम्हारी निरन्तर रक्षा करें (२०३)।
इसके बाद माणवक (ब्रह्मचारी) दक्षिणावर्त्त-क्रम से अग्नि की ओर गुरु की प्रदक्षिणा कर पुनः अपने
आसन पर बैठे (२०४)। हे प्रिये ! तब गुरु शिष्य द्वारा स्पृष्ट होकर 'समुद्भव' नामक अग्नि में पञ्च-देवों को
पाँच आहुतियाँ प्रदान करे (२०५)। पञ्च-देव हैं—१. प्रजापति, २. शक्र, ३. विष्णु, ४. ब्रह्मा, ५. शिव
(२०६) । पञ्च-देवों में से प्रत्येक के नाम के आदि में माया अर्थात् 'ह्रीं' और अन्त में वह्नि-जाया अर्थात्
'स्वाहा' लगाकर आहुति दे । यथा—
ह्रीं प्रजापतये स्वाहा, ह्रीं शक्राये स्वाहा, ह्रीं विष्णवे स्वाहा, ह्रीं ब्रह्मणे स्वाहा, ह्रीं शिवाय स्वाहा
इसी प्रकार, जिस मन्त्र की कोई विधि न कही हो, उसके आदि में 'ह्रीं' और अन्त में स्वाहा कहे।
(२०७) । इसके बाद दुर्गा, महालक्ष्मी, सुन्दरी, भुवनेश्वरी, इन्द्रादि दश दिक्-पाल, सूर्यादि नव-ग्रह—इनमें से
प्रत्येक का नामोल्लेख कर आहुति दे। फिर बालक को वस्त्र से आच्छादित कर गुरु ब्रह्मचर्याभिमानी उस माण-
वक से पूछे—
'को वाश्रमस्ते तनय ! ब्रूहि किं ते मनोगतम् ?'
अर्थात् हे पुत्र ! तुम्हारा आश्रम क्या है ? तुम्हारा मनोगत भाव क्या है ? बोलो (२०८-२०६)।
इस पर शिष्य सावधान होकर गुरु के दोनों चरणों को पकड़ कर कहे—
'करोतु मामा श्रमणं ब्रह्म-विद्योपदेशतः ।'
अर्थात् ब्रह्म-विद्या का उपदेश देकर मुझे आश्रमी बनाइए ।
हे शिवे ! इस प्रकार प्रार्थना करनेवाले शिष्य के दाएँ कान में गुरु सर्व-मन्त्र-मय प्रणव (ॐ) को तीन बार
सुनाकर 'भूर्भुवः स्वः' इन तीन व्याहृतियों का उच्चारण कर गायत्री को सुनाए (२१०-२११)। यथा—
सदाशिव इस सावित्री के ऋषि कहे गए हैं। त्रिष्टुप् छन्द है। सावित्री अधिष्ठात्री देवी कही गई हैं।
मोक्षार्थ विनियोग है (२१२)। पहले 'तत् सवितुः,' फिर 'वरेण्यं' इस पद का उच्चारण करे। तब 'भर्ग' इस पद
के बाद 'देवस्य धीमहि' इस पद का पाठ करे (२१३)। हे परमेश्वरि ! उसके बाद 'धियो योनः प्रचोदयात्'
और पुनः प्रणव (ॐ) का उच्चारण कर गुरु शिष्य को गायत्री का अर्थ बताए (२१४)। यथा—
त्र्यक्षरात्मक 'प्रणव' (ॐ) द्वारा परमेश्वर का प्रतिपादन होता है। सृष्टि-स्थिति-प्रलय-कर्त्ता जो देव प्रकृति
से भी श्रेष्ठ है (२१५), वही देव त्रिलोक की आत्मा है। वह त्रिगुण अर्थात् सत्व, रज और तम को व्याप्त करके
वर्तमान है, अतः 'भूर्भुवः स्वः' इन तीन व्याहृतियों का वाच्य ब्रह्म है (२१६)। जो प्रणव और व्याहृति का
वाच्य है, सावित्री द्वारा उसी ज्ञेय सविता अर्थात् जगद्-रूप वस्तु के सृष्टि-कर्त्ता, दीप्त्यादि क्रियाओं के आश्रय
विभु के अन्तर्गत योगियों के वरणीय, सर्व-व्यापी और सनातन उसी महाज्योति का ध्यान करता हूँ (२१७-
२१८) । यह महा-ज्योति सबकी साक्षी और ईश्वर है। हम सबकी मन, बुद्धि, सभी इन्द्रियों को धर्म-अर्थ-काम-
मोक्ष में प्रेरित करो अर्थात् नियोजित करो (२१६)।
हे देवि ! सद्गुरु इसी प्रकार अर्थ-सहित ब्रह्म-विद्या का उपदेश कर शिष्य को गृहस्थाश्रम के कर्म में
नियुक्त करे (२२०) । यथा—
ब्रह्मचर्योचितं वेषं वत्सेदानीं परित्यज । शाम्भवोदित-मार्गेण देवान् पितॄन् समर्चय ।
ब्रह्म-विद्योपदेशेन पवित्रं ते कलेवरम् । प्राप्तां गृहस्थाश्रमिता तदुक्तं कर्म कल्पय ॥
७६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
उपवीत-द्वयं दिव्य-वस्त्रादलङ्करणानि च । गृहाण पादुका-छत्रं गन्ध-माल्यानुलेपनम् ॥
अर्थात् हे पुत्र ! अब ब्रह्मचर्योचित वेश को छोड़ो। शम्भु द्वारा दर्शित मार्ग के अनुसार देवों और पितरों
का अर्चन करो (२२१) । ब्रह्म-विद्या के उपदेश से तुम्हारा शरीर पवित्र हो गया है । तुम गृहस्थाश्रम को प्राप्त
हुए हो । अतः तुम उसके निर्दिष्ट कर्म करो (२२२) । दो उपवीत, दो दिव्य वस्त्र, अलङ्कार, पादुका, छत्र, गन्ध,
माला और अनुलेपन ग्रहण करो (२२३) ।
तदनन्तर शिष्य कृष्णाजिन से युक्त कषाय वस्त्र, यज्ञ-सूत्र, मेखला, दण्ड, भिक्षा-पात्र और आचार के
अनुसार उपार्जित भिक्षा को गुरु को समर्पित कर शुद्ध दो यज्ञोपवीत और उत्तम दो वस्त्रों को पहनकर गन्ध
तथा माला धारण कर आचार्य के पास मौन होकर बैठे । आचार्य गृहस्थाश्रमो से यह कहे (२२४-२२६)—
जितेन्द्रियः सत्य-वादी ब्रह्म-ज्ञान-परो भव । स्वाध्यायाऽऽश्रम-कर्माणि यथा-धर्मेण साधय ॥
अर्थात् तुम जितेन्द्रिय, सत्य-वादी और ब्रह्म-ज्ञान में तत्पर होओ। धर्मशास्त्र का लंघन न कर अध्ययन
करो और गृहस्थाश्रम के सब कर्मों का पालन करो (२२७) ।
द्विज शिष्य को गुरु इस प्रकार आदेश देकर पहले माया (ह्रीं) और सबसे अन्त में प्रणव (ॐ) का उच्चारण
करते हुए 'भूः भुवः स्वः' इन तीन मन्त्रों द्वारा 'समुद्भव' नामक अग्नि में तोन बार होम कराकर स्विष्टिकृत
होम कर हे भद्रे ! पूर्णाहुति देने के बाद 'उपनयन'-क्रिया को समाप्त करे (२२८-२२६) ।
हे प्रिये ! जीव-सेक से लेकर उपनयन तक के नौ संस्कार पिता द्वारा हो सम्पन्न हो सकते हैं । 'उद्वाह-
संस्कार' पिता अथवा स्वयं करे (२३०) । कार्य-कुशल व्यक्ति विवाह के दिन स्नान के बाद नित्य-क्रिया करके
पञ्च-देवों की पूजा कर गौरी आदि १६ मातृकाओं का पूजन करे । फिर वसुधारा देकर वृद्धि-श्राद्ध करे
(२३१) । पहले से निश्चित वर-पात्र के गीत-वाद्य के साथ निशा-काल में आने पर उसे छाया-मण्डप में लाकर
वर के आसन पर पूर्वाभिमुख करके बैठाए (२३२) । दाता पश्चिमाभिमुख होकर बैठे । कन्या-दाता पहले
आचमन कर ब्राह्मणों के साथ स्वस्ति और ऋद्धि का पाठ करे (२३३) । फिर कन्या-दाता वर से कुशल-प्रश्न
और अर्चना-प्रश्न करके प्रश्न का उत्तर लेकर पाद्यादि द्वारा वर का अर्चन करे (२३४) । 'समर्पयामि' शब्द
द्वारा देय द्रव्य प्रदान करे । दोनों चरणों में पाद्य और मस्तक पर अर्घ्य समर्पित करे (२३५) । मुख में आचमनीय
देकर उत्तम दो वस्त्र, गन्ध, माल्य, उत्तम आभूषण, रत्न और यज्ञ-सूत्र समर्पित करे (२३६) । फिर कांस्य-पात्र
में दधि, घृत और मधु रखकर इसे 'मधुपर्कं समर्पयामि' कहकर हाथ में प्रदान करे (२३७) । वर भी उस मधु-
पर्क-पात्र को लेकर बाएँ हाथ में रखकर प्राणाहुति-मन्त्र 'प्राणाय स्वाहा' इत्यादि को पढ़कर दाएँ हाथ के
अँगूठे और अनामिका द्वारा पाँच बार सूँघ कर उस पात्र को उत्तर दिशा में रख दे । इस प्रकार मधुपर्क समर्पित
कर वर को पुनः आचमन कराए (२३८-३६) । तब दूर्वा और आतप-तण्डुल हाथ में लेकर जामाता के दाएँ
जानु को पकड़कर विष्णु को स्मरण करते हुए 'तत् सत्' इस वाक्य का उच्चारण कर मास, पक्ष, और तिथि
का उल्लेख कर वर के प्रपितामह से पिता तक के प्रत्येक के गोत्र-प्रवर-सहित षष्ठ्यन्त नाम का उच्चारण और
इसी प्रकार गोत्र-प्रवरादि-सहित द्वितीयान्त वर के नाम का उल्लेख कर उत्तम वर का वरण करे (२४०) । फिर
इसी प्रकार कन्या के प्रपितामह से पिता तक के तीन पुरुषों के षष्ठ्यन्त नाम, गोत्र और प्रवर के सहित उच्चा-
रण कर इसी प्रकार गोत्र-प्रवर-सहित द्वितीयान्त कन्या-नाम का उल्लेख कर कन्या-दाता कहे (२४१-४२)—
'ब्राह्मोद्वाहेन दातुं भवन्तं वृणेऽहम् ।'
अर्थात् ब्राह्म विवाह द्वारा कन्या-दान करने के लिए मैं तुम्हारा वरण करता हूँ (२४३) ।
नवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार | ७७
इसके बाद वर कहे—
'वृतोऽस्मि ।'
अर्थात् 'मैं वृत होता हूँ।' फिर कन्या-दाता वर से कहे—
'यथा-विहितं विवाह-कर्म कुरु ।'
अर्थात् 'विधि के अनुसार विवाह का कर्म करो।' उत्तर में वर कहे—
'यथा-ज्ञानं करवाणि ।'
अर्थात् मुझे जैसा ज्ञान है, उसी के अनुसार करता हूँ (२४४)।
तत्र वस्त्र और अलङ्कार से विभूषित कन्या को लाकर अन्य वस्त्र द्वारा आच्छादित करे। उसे वर के
सम्मुख बैठाए (२४५)। फिर कन्या-दाता पुनः वस्त्र और अलंकार आदि द्वारा वर की पूजा कर वर के दाएँ
हाथ में कन्या का हाथ रखे (२४६)। उसी हाथ के मध्य में फल, ताम्बूल और पञ्च-रत्न देकर पूजाकर वर
को कन्या समर्पित करे (२४७)। समर्पण करते समय पहले अपनी कामना का उल्लेख कर तीन पुरुषों के नामो-
ल्लेख-पूर्वक कारण का वर्णन कर चतुर्थी-विभक्ति वर के नाम के अन्त में लगाकर उसका उच्चारण करे (२४८)।
तब तीन पुरुषों के नामोल्लेख पूर्वक कन्या के द्वितीयान्त नाम के बाद निम्न पद का उच्चारण करे—
'अर्चितां समलंकृतां साच्छादनां प्रजापति-देवताकां तुभ्यमहं सम्प्रददे ।'
और कन्या-दान करे। वर उत्तर में 'स्वस्ति' कह कर कन्या को ग्रहण करे। कन्या-दाता वर से
कहे (२४६)—
'धर्मे चार्थे च कामे च भवता भार्यया सह वर्त्तितव्यं ।'
अर्थात् तुम धर्म, अर्थ और काम के विषयों में भार्या के साथ मिलकर कार्य करना ।
वर उत्तर दे—'वाढं वर्त्तितव्यम्' अर्थात् मैं ऐसा ही करूँगा । फिर काम-स्तुति का पाठ करे (२५०-५१)—
दाता कामो गृहीताऽपि कामायाऽदाच्च कामिनीम् ।
कामेन त्वां प्रगृह्णामि कामः पूर्णोऽस्तु चावयोः ॥
अर्थात् काम सम्प्रदान करता है ; काम ही प्रतिग्रह करता है, काम ही काम-हेतु कामिनी को ग्रहण करता
है। हे भार्ये ! मैं काम-जन्य तुम्हे ग्रहण करता हूँ हम दोनों के काम पूर्ण हों (२५२)।
अब कन्या-दाता कन्या और जामाता से कहे—
प्रजापति-प्रसादेन युवयोरभि-वाञ्छितम् । पूर्णमस्तु शिवं चास्तु धर्मं पालयतां युवाम् ॥
अर्थात् प्रजापति के प्रसाद से तुम दोनों का अभीष्ट पूरा हो और तुम दोनों का कल्याण हो; तुम दोनों
एकत्र होकर धर्म का पालन करो (२५३) ।
इसके बाद दाता मङ्गल गीत, वाद्य, शंख आदि की ध्वनि करते हुए कन्या और वर को वस्त्र से आच्छा-
दित कर परस्पर शुभ-दृष्टि कराए (२५४)। फिर जामाता को यथा-शक्ति स्वर्ण और रत्न की दक्षिणा देकर
अच्छिद्रावधारण करे (२५५) । तब उसी रात्रि में या अगले दिन वर को भार्या के साथ कर कुशण्डिकोक्त विधि
से अग्नि-स्थापन करे (२५६) । इस स्थल में 'योजक' नाम वह्नि और 'प्राजापत्य' नामक चरु निर्दिष्ट है। वर
धारा-होम तक सारा कार्य कर पाँच आहुतियाँ प्रदान करे (२५७) । शिव, दुर्गा, विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र—इन
पंच-देवताओं का ध्यान कर प्रत्येक के लिए एक-एक आहुति संस्कृत अग्नि में दे (२५८) । फिर निम्न मन्त्र पढ़ेते
७८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
हुए वर भार्या के दोनों हाथों को पकड़े—
पाणिं गृह्णामि सुभगे ! गुरु-देव-रता भव । गार्हस्थ्यं कर्म धर्मेण यथावदनुशीलय ॥
अर्थात् हे सुभगे ! मैं तुम्हारा पाणिग्रहण करता हूँ । तुम गुरु और देवता की भक्त होकर धर्मानुसार यथा-
विधि गृहस्थी के कार्य करो (२५९) ।
हे शिवे ! तब वधू स्वामी द्वारा दिए घृत और भाई द्वारा दिए लाज (लावा) से प्रजापति के लिए चार
बार आहुति प्रदान करे (२६०) । फिर वर भार्या के साथ खड़े होकर अग्नि की प्रदक्षिणा करे और दुर्गा-शिव,
लक्ष्मी-विष्णु तथा ब्राह्मी-ब्रह्मा—इन दम्पतियों में से प्रत्येक दम्पति के लिए तीन-तीन आहुतियाँ प्रदान करे
(२६१) । इसके बाद शिलारोहण और सप्त पद-गमन करे। यदि विवाह की रात्रि में ही कुशाण्डिका हो, तो वर-
वधू स्त्रियों के साथ होकर अरुन्धती का दर्शन करें (२६२)। फिर लौटकर वर आसन पर यथाविधि बैठकर
स्विष्टकृत होम से लेकर पूर्णाहुति तक समस्त कार्य समाप्त करे (२६३) ।
भिन्न-गोत्रा, असपिण्डा, सवर्णा के साथ कुल-धर्म के अनुसार ब्राह्म-विवाह करना निर्दोष है (२६४) । जो
भार्या ब्राह्म-विवाह द्वारा परिणीता है, वही गृहेश्वरी होती है। इस पत्नी की अनुमति के बिना कोई व्यक्ति
पुनः ब्राह्म-विवाह नहीं कर सकता (२६५) । हे कुलेश्वरि ! ब्राह्म-विवाह से विवाहिता पत्नी के गर्भ से उत्पन्न
सन्तान या उसके वंश का कोई विद्यमान हो, तो शैव विवाह से विवाहिता भार्या के गर्भ से उत्पन्न सन्तान धन
की अधिकारी नहीं हो सकती (२६६) । हे परमेश्वरि ! शैव विवाह द्वारा विवाहिता स्त्री के गर्भ से उत्पन्न
सन्तान या उसके वंश की सन्तानें धनाधिकारी व्यक्ति की सम्पत्ति के अनुसार उससे भोजन-वस्त्र पा सकती
हैं (२६७) ।
शैव विवाह के दो प्रकार हैं। 'कुल-चक्र' में यह विवाह हो सकता है। चक्र के नियमानुसार एक प्रकार
है और यावज्जीवन स्थायी विवाह दूसरा प्रकार है (२६८) । चक्रानुष्ठान के समय वीराचारी एकाग्र-चित्त हो
शक्ति-साधकों और स्वजनों के बीच परस्पर इच्छा से विवाह करें (२६९) । इसके लिए भैरवियों और वीराचारी
साधकों से अपना मनोरथ निवेदन करे। यथा—
'आवयोः शाम्भवोद्वाहे भवद्भिरनुमन्यताम् ।'
अर्थात् हम दोनों के शैव विवाह के सम्बन्ध में आप लोग अनुमति दें (२७०) । इस प्रकार उनकी अनुमति
लेकर सप्ताक्षर मन्त्र अर्थात् 'परमेश्वरि स्वाहा' का एक सौ आठ बार जप कर परमा कालिका को प्रणाम करे
(२७१) । हे शिवे ! तब कौल-वर्ग के समक्ष उस रमणी से कहे—
'अकैतवेन चित्तेन पति-भावेन मां वृणु ।'
अर्थात् चित्त में कोई कपट न रखकर पति-भाव से मुझे वरण करो (२७२) । हे देवेशि ! तब वह कौल
कामिनी बड़ी श्रद्धा के साथ गन्ध-पुष्प-अक्षत द्वारा प्रियतम पति का वरण कर उसके हाथ में अपना हाथ प्रदान
करे (२७३) । तदनन्तर चक्रेश्वर निम्न मन्त्र द्वारा उस दम्पति का अभिषेक करे। उस समय चक्र में उपस्थित
सभी वीर लोग आदर के साथ 'स्वस्ति' कहें (२७४)—
राज-राजेश्वरी काली तारिणी भुवनेश्वरी । वगला कमला नित्या युवां रक्षन्तु भैरवी ॥
अर्थात् राज-राजेश्वरी, काली, तारिणी, भुवनेश्वरी, वगला, कमला, नित्या और भैरवी—ये तुम दोनों
की रक्षा करें (२७५) ।
यह मन्त्र पढ़ते हुए मद्य अथवा अर्घ्य-जल द्वारा बारह बार दोनों का अभिषेक करे। फिर वह दम्पति
दसवाँ उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन | ७६
प्रणाम करे और ज्ञानी चक्रेश्वर उन्हें वाग्भव-रमा अर्थात् 'ऐं श्रीं' ये दो बीज सुनाए (२७६)। हे कुलेश्वरि !
वह कुलीन दम्पति उस शैव विवाह-स्थल में जो-जो स्वीकार किया जाय, उसका पालन शिवोक्त विधानानुसार
उन्हें यत्न-पूर्वक करना होगा (२७७)। इस शैव-विवाह में आयु और वर्ण का विचार नहीं है। शम्भु के आदेशा-
नुसार पति-हीना और असपिण्डा से ही विवाह करे (२७८)। जो स्त्री शैव धर्म-चक्र के नियमानुसार विवाहिता
है, सन्तानार्थी वीर उसके नियमित ऋतु-काल को देखकर चक्र के निवृत्ति-काल में उसका परित्याग कर सकता
है (२७६)। अनुलोम-क्रम में अर्थात् वर उच्चजाति का हो, कन्या निम्न जाति की, तो इस कन्या की सन्तान मातृ-
जाति के अनुरूप ही व्यवहार में मानी जायगी। विलोम-क्रम में अर्थात् वर निम्न जाति का हो और कन्या उच्च
जाति की, तो उसके गर्भ से उत्पन्न सन्तान को सामान्य जाति को समझा जायगा (२८०)। इन सभी सङ्कर
जातिवालों के पितृ-श्राद्धादि में कौल व्यक्तियों को भोज्य द्रव्य देना और भोजन कराना होगा (२८१)। हे देवि !
भोजन और मैथुन मनुष्यों को स्वभाव से ही प्रिय हैं। अतएव उनके संक्षेप के लिए और हित-साधन के लिए
शैव धर्म में उनकी सीमा निर्दिष्ट की गई है (२८२)। हे महेश्वरि ! इसीलिए शिव-प्रवर्तित धर्म का सेवन करने
से मनुष्य धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष का पूर्ण अधिकारी होता है, इसमें सन्देह नहीं (२८३-८४)।
• × •
दसवाँ उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन
देवी ने कहा-हे नाथ ! आपसे दस प्रकार के संस्कारों और कुशण्डिका की विधि सुनी। अब कृपा करके
मुझे 'वृद्धि-श्राद्ध' का विधान बताइए (१)। हे शंकर ! किस संस्कार में अथवा किस प्रतिष्ठा-कर्म में 'कुशण्डिका'
और 'वृद्धि-श्राद्ध' करना है और कहाँ नहीं करना है, वह सब मेरी प्रसन्नता के लिए तथा जीवों के कल्याण के
लिए ठीक-ठीक बताइए (२-३)।
श्री सदाशिव ने कहा-हे भद्रे ! गर्भाधान से विवाह तक दस संस्कारों में जो कार्य जिसमें विहित हैं,
वह सब मैं विशेषकर कहता हूँ (४)। हे वरानने ! मैंने उक्त प्रकार से जिस स्थल पर जैसी विधि बताई है,
कल्याण-कामी तत्त्वज्ञ लोग उसी प्रकार अनुष्ठान करें। उससे भिन्न अन्य स्थलों पर जैसी विधि है, वह कहता
हूँ, सुनो (५)।
हे प्रिये ! वापी, कूप, तड़ाग, देव-प्रतिमा, गृह, उद्यान, व्रत आदि सभी प्रतिष्ठा-कार्यों में पञ्च-देव-पूजा,
मातृकाओं की पूजा, वसुधारा, वृद्धि-श्राद्ध और कुशण्डिका करना चाहिए (७)। जो कर्म स्त्रियों द्वारा होते हैं,
उनमें वृद्धि-श्राद्ध नहीं होता, केवल देवताओं और पितरों की तृप्ति के लिए एक भोज करना चाहिए (८)।
स्त्रियाँ पुरोहित द्वारा भक्ति-पूर्वक देव-पूजन, षोडश-मातृका-पूजन, वसुधारा-दान और कुशण्डिका करावें (६)।
हे शिवे ! दैव और पितृ-कर्मों में पुत्र, पौत्र, दौहित्र, भागिनेय, जामाता और पुरोहित को प्रतिनिधि बनाना
प्रशस्त है (१०)।
हे कालिके ! 'वृद्धि-श्राद्ध' को बताता हूँ, सुनो (११)। नित्य-कर्म समाप्त कर अत्यन्त एकाग्र होकर
गङ्गा, यज्ञेश्वर विष्णु, वास्तुदेव और भू-स्वामी की पूजा करे (१२)। फिर 'प्रणव' (ॐ) का स्मरण करते हुए
दर्भ (कुश) का ब्राह्मण बनाये। पाँच, नौ, सात या तीन कुश-पत्र लेकर उन्हें दक्षिणावर्त ढाई बार लपेट कर
८० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
बटने से उक्त दर्भ-मय ब्राह्मण की रचना होती है (१३-१४) । हे शिवे ! ‘वृद्धि-श्राद्ध’ में और ‘पार्वणादि श्राद्धों’
में छः ब्राह्मणों की विधि है किन्तु ‘एकोद्दिष्ट श्राद्ध’ में केवल एक ही ब्राह्मण बताया है (१५) । उक्त कुश-मय
ब्राह्मणों को एक पात्र में उत्तर-मुख रखे और निम्न मन्त्र से उन्हें स्नान कराए (१६)—
ह्रीं शन्नो देवीरभीष्टये शन्नो भवन्तु पीतये शंयोरभिस्रवन्तु नः ।
अर्थात् जल-देवता हमारे अभीष्ट की सिद्धि के लिए मंगल करें; हमारे पीने के लिए मङ्गल करें; हम
पर सब प्रकार कल्याण की वर्षा करें (१७) ।
इसके बाद गन्ध-पुष्प से कुश-मय ब्राह्मणों की पूजा करे (१८) । फिर पश्चिम और दक्षिण दिशा में
तिल सहित दो-दो तुलसी-पत्र लेकर दर्भ-युक्त छः पात्र स्थापित करे (१६) । पश्चिम में स्थापित दो पात्रों में और
दक्षिण में स्थापित चार पात्रों में क्रमशः पूर्व-मुख और उत्तर-मुख करके छः ब्राह्मणों को बिठाये (२०) । हे
पार्वति ! पश्चिम में ‘देव-पक्ष’, दक्षिण में बाईं ओर ‘पितृ-पक्ष’ और दक्षिण में दाईं ओर ‘मातामह का पक्ष’
जाने (२१) । हे वरानने ! आभ्युदयिक श्राद्ध में पितरों को ‘नान्दीमुख’ और माताओं को ‘नान्दीमुखी’ पद से
विभूषित कर उनका उल्लेख करे । मातामह और मातामही आदि का भी उल्लेख इसी प्रकार करे (२२) ।
‘देव कर्म’ उत्तर-मुख होकर दक्षिणावर्त-क्रम से और ‘पितृ-कर्म’ दक्षिण-मुख होकर वामावर्त-क्रम से
करे (२३) । हे शिवे ! माता को माता, पितादि का लंघन करके श्राद्ध करने से वह निष्फल होता है। तात्पर्य यह
है कि पितृ-कर्म में दक्षिणावर्त-क्रम से दक्षिण-मुख न होवे (२४) । ‘देव-कर्म’ के समय उत्तर-मुख होकर अनुज्ञा-
वाक्य का पाठ करे और ‘पितृ तथा मातामहादि के कर्म’ के समय दक्षिण-मुख होकर । हे शुचि-स्मिते ! पहले
‘देव पक्ष’ के अनुज्ञा-वाक्य का सुनो (२५)—
अद्यैतस्य.........तत्तत्-कर्माभ्युदयार्थं अमुक-गोत्रामुक-शर्मणः पितुः, अमुक-गोत्रामुक-शर्मणः पिता-
महस्य, अमुक-गोत्रामुक शर्मणः प्रपितामहस्य; अमुक-गोत्रामुकी-देवी मातुः, अमुक-गोत्रामुकी-देवी पिता-
मह्याः, अमुक-गोत्रामुकी-देवी प्रपितामह्याः; अमुक-गोत्रामुक-शर्मणः मातामहस्य, अमुक-गोत्रामुक-शर्मणः
प्रमातामहस्य, अमुक-गोत्रामुक-शर्मणः वृद्ध-प्रमातामहस्य; अमुक-गोत्रामुकी-देवी मातामह्याः, अमुक-गोत्रा-
मुकी-देवी प्रमातामह्याः, अमुक-गोत्रामुकी-देवी वृद्ध-प्रमातामह्याः विश्वेषां देवानां श्राद्धं कुश-निर्मितयोः
ब्राह्मणयोरहं करिष्ये ।
यही अनुज्ञा-वाक्य' है (२६-२६) । हे पार्वति ! पितृ-त्रय और मातामह-त्रय के नामों के साथ ‘विश्वेषां
देवानां’ पद का उच्चारण न करे (३०) । इसके बाद दस बार ब्रह्म-विद्या गायत्री का जप करे (३१) । फिर
निम्न मन्त्र को तीन बार पढ़े—
देवताभ्यः पितृभ्यश्च महा-योगिभ्य एव च । नमोऽस्तु पुष्ट्यै स्वाहायै नित्यमेव भवन्तु ॥
अर्थात् देवताओं, पितरों और महा-योगियों को, पुष्टि को और स्वाहा को नमस्कार ।
और हाथ में जल लेकर ‘वं हुं फट्’ इस मन्त्र द्वारा श्राद्ध के सभी पदार्थों का शोधन करे (३२) । अर्थात्
उक्त मन्त्र-पूत जल को पदार्थों पर छिड़के (३३) । तब अग्नि-कोण में एक पात्र स्थापित कर कहे कि—
रक्षोधनममृतं, मम यज्ञ-रक्षां कुरुष्व ।
फिर उस पात्र में तुलसी-दल से युक्त जल डाले और देव-पक्ष से आरम्भ कर कुश-मय ब्राह्मणों को देवादि-
क्रम से जल-गण्डूष देकर कुशासन प्रदान करे (३४-३५) । तब विश्व-देव-गण का, पितृ-त्रय का, मातृ-त्रय का,
मातामह-त्रय का और मातामही-त्रय का आवाहन करे (३६) । फिर पहले विश्व-देव-गण की पूजा करे, तब
दसवां उल्लास : वृद्धि-श्राद्धादि का कथन । ८१
पितृ-त्रय, मातृ-त्रय, मातामह-त्रय और मातामही-त्रय को पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, धूप, दीप, वस्त्रादि द्वारा
पूजा करे । पूजा कर देव-पक्ष से आरम्भ कर पात्र-पातन हेतु पूछे (३७-३८) ।
इसके बाद माया-बीज 'ह्रीं' का उच्चारण कर देव-पक्ष के लिए एक चतुष्कोण-मण्डल बनाए । फिर इसी
प्रकार पितृ-पक्ष और मातामह-पक्ष के लिए भी 'ह्रीं' से दो-दो मण्डल बनाए (३६) । वरुण-बीज 'वं' से इन
मण्डलों का प्रोक्षण कर इन पर क्रमशः पात्र स्थापित कर समस्त सामग्री-सहित पात्र को बीज से प्रक्षालित कर
पीने के लिए जल-सहित क्रमशः अन्न रखे (४०) । फिर सभी अन्न पर मधु एवं यव प्रदान कर 'ह्रां हूँ फट्' इस
मन्त्र से उस समस्त अन्न को जल द्वारा प्रोक्षित कर क्रमशः विश्वदेव-गण को, पितृ-गण को, मातृ-गण को, माता-
मह-गण को और मातामही-गण को उनका उल्लेख करते हुए उस अन्न को उन्हें निवेदित करे । फिर गायत्री
और 'देवताभ्यः' आदि मन्त्र का तीन बार पाठ करे (४१-४२) । हे आद्ये ! तब शेषान्न-प्रश्न और पिण्ड-प्रश्न
करे (४३) । ब्राह्मणों से प्रश्न का उत्तर मिलने पर देने से बचे अक्षतादि द्वारा विल्व के समान बारह पिण्ड
बनाए (४४) । उसी प्रकार का एक दूसरा पिण्ड बनाए । तब नैऋत-कोण में मण्डल के ऊपर यव-सहित दर्भ
(कुश) बिछाए (४५) और निम्न दो मन्त्रों का पाठ करते हुए अपिण्डों को पिण्ड-दान करे—
ये मे कुले लुप्त-पिण्डाः पुत्र-दार-विवर्जिताः । अग्नि-दग्धाश्च ये केऽपि व्याल-व्याघ्र-हताश्च ये ॥
ये बान्धवाबान्धवा वा येऽन्य-जन्मनि बान्धवाः । मद्-दत्त-पिण्ड-तोयाभ्यां ते यान्तु तृप्तिमक्षयां ॥
अर्थात् मेरे वंश में जो लुप्त-पिण्ड हैं; जो स्त्री-पुत्र से रहित हैं ; जो अग्नि से जले हैं ; जो सर्प, व्याघ्रादि
द्वारा मरे हैं; जो मेरे बान्धव अबान्धव हैं या जो अन्य जन्म के मेरे बान्धव हैं, वे सब मेरे द्वारा दिए इस पिण्ड
और जल द्वारा अक्षय तृप्ति को प्राप्त करें (४६-४७) ।
फिर हाथ धोकर आचमन करे और गायत्री तथा 'देवताभ्यः' इत्यादि मन्त्र का तीन बार जप कर मण्डल
बनाए (४८) । हे देवि ! पितृ-पक्ष से आरम्भ कर उच्छिष्ट पात्र के सम्मुख पूर्वोक्त विधि से दो-दो मण्डल बनाए
(४६) । 'वं' बीज से इन सभी मण्डलों को प्रोक्षित कर इन पर कुश बिछाये । फिर वायु-बीज 'यं' से सभी कुशों
को प्रोक्षित कर पितृ-दर्भ से आरम्भ कर दर्भ के मूल, मध्य और ऊर्ध्व भाग में क्रमशः १ पितृ-त्रय, २ मातृ-त्रय,
३ मातामह-त्रय और ४ मातामही-त्रय को तीन-तीन पिण्ड प्रदान करे (५०) । हे महेश्वरि ! प्रत्येक का सम्बो-
धनान्त-नाम उच्चारण कर 'स्वधा' कहते हुए प्रत्येक को यव और मधु-सहित पिण्ड प्रदान करे (५१) । पिण्ड-
दान करने के बाद 'कर-लेप' द्वारा अर्थात् अन्न-युक्त हाथ को कुश में रगड़ कर 'लेप-भोजी' अर्थात् चौथे से
सातवें पुरुष को प्रसन्न करे । एकोद्दिष्ट श्राद्ध में यह 'लेप-भोजि-पितृ-गण-प्रीणन विधि' नहीं है (५२) ।
देवताओं और पितृ-गण की तृप्ति के लिए दश बार गायत्री-जप और तीन बार 'देवताभ्यः पितृभ्यश्च'
इस मन्त्र का पाठ कर पिण्ड-पूजा करे । तब धूप-दीप को जलाकर दोनों आँखें बन्दकर यह भावना करे कि
'दिव्य देह-धारी पितृ-गण यज्ञ-स्थल में कव्य अर्थात् उनके लिए दिए गए द्रव्य का भोजन कर रहे हैं।'
फिर निम्न मन्त्र से पितृ-गण को प्रणाम करे—
पिता मे परमो धर्मः पिता मे परमं तपः । स्वर्गः पिता मे तत्-तृप्तौ तृप्तमस्त्यखिलं जगत् ॥
अर्थात् पिता ही मेरे परम धर्म हैं, पिता ही मेरे परम तप हैं, पिता ही मेरे स्वर्ग हैं। उनके तृप्त होने से
सारा जगत् तृप्त होता है (५३-५५) ।
फिर निर्माल्य लेकर पितृ-गण से आशीर्वाद हेतु प्रार्थना करे (५६)—
आशिषो मे प्रदीयन्तां पितरः करुणा-मयाः । वेदाः सन्ततयो नित्यं वर्द्धन्तां बान्धवा मम ॥
फा०—११