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सर्वकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 139 में से

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पृष्ठ 79

नवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार | ६५
फिर विष्णु का ध्यान करते हुए निम्न मन्त्र से आहुति दे (१०१)—
यथेयं पृथिवी देवी ह्युत्ताना गर्भमादधे । तथा त्वं गर्भमाधेहि दशमे मासि सूतये ।। स्वाहा
अर्थात् यह उत्ताना पृथ्वी देवी जिस प्रकार गर्भ धारण करे, उसी प्रकार दसवें मास में प्रसव होने के लिए
तुम गर्भ धारण करो।
पुनः आज्य (घृत) लेकर परात्पर विष्णु का ध्यान करते हुए निम्न मन्त्र से आहुति छोड़े (१०२)—
विष्णो ! ज्येष्ठेन रूपेण नार्यामस्यां वरीयसम् । सुतमाधेहि स्वाहा ॥
अर्थात् हे विष्णो ! तुम श्रेष्ठ रूप द्वारा इस नारी में श्रेष्ठ सन्तान का आधान करो।
इसके बाद काम-बीज-पुटित माया अर्थात् 'क्लीं ह्रीं क्लीं' और माया-पुटित वधू अर्थात् 'ह्रीं स्त्रीं ह्रीं'
तथा पुनः काम 'क्लीं', माया-बीज 'ह्रीं' का पाठ कर भार्या के मस्तक को छुये (१०३)। इसके बाद पति-पुत्र-
वती स्त्रियों से घिरकर पति अपने दोनों हाथों से पत्नी के मस्तक को छूते हुए विष्णु, दुर्गा, ब्रह्मा और सूर्य का
ध्यान कर उसके क्रोडाञ्चल में तीन फल देकर स्विष्टकृत्-होम कर प्रायश्चित्त-होम द्वारा कर्म को समाप्त करे
(१०४-१०५)। अथवा सायंकाल में गौरी-शङ्कर की पूजा कर सूर्यार्घ्य देकर दम्पति का शोधन करे (१०६)।
यह तुमसे 'ऋतु-शोधन' का कर्म कहा, अब 'गर्भाधान' बताता हूँ, सुनो (१०७)। उसी ऋतु-संस्कार की रात्रि
में अथवा किसी अन्य युग्म रात्रि में घर के भीतर जाकर प्रजापति देव का ध्यान कर पत्नी को छूते हुए पति
माया-बीज 'ह्रीं' का उच्चारण कर निम्न मन्त्र पढ़े (१०८-१०६)—
ह्रीं आवयोः सुप्रजाये त्वं शय्ये शुभकरी भव ।
अर्थात् हे शय्ये ! हम दोनों की उत्तम सन्तान के लिए तुम शुभ करनेवाली बनो।
तब पत्नी के साथ शय्या पर चढ़कर पूर्व-मुख या उत्तर-मुख होकर बैठे और पत्नी को देखते हुए उसके
मस्तक पर हाथ रखकर बाएँ हाथ से आलिङ्गन करने के बाद स्थान-स्थान पर मन्त्र का जप करे (११०)—
मस्तक पर काम-बीज 'क्लीं' का १०० बार, चिबुक पर वाग्भव 'ऐं' का १०० बार, कण्ठ पर रमा 'श्रीं'
का २० बार, दोनों स्तनों पर भी 'श्रीं' बीज का सौ-सौ बार, हृदय पर माया-बीज 'ह्रीं' का १० बार, नाभि
पर भी 'ह्रीं' बीज का २५ बार जप कर योनि पर हाथ रखकर काम-बीज-सहित वाग्भव अर्थात् 'क्लीं ऐं' का
१०८ बार जप कर लिङ्ग पर भी इसी 'क्लीं ऐं' मन्त्र का जप करे। तब 'ह्रीं' मन्त्र जप कर योनि को विकसित
कर सन्तान की कामना से पत्नी-गमन करे (१११-१३)। वीर्य-पात के समय प्रजापति का ध्यान कर पति नाभि
के नीचे चित्त-कुण्ड में रक्तिका नाड़ी में बीज का निक्षेप करे (११४)। वीर्य-त्याग के समय निम्न मन्त्र पढ़े—
यथाऽग्निना सगर्भा भूद्यौर्यथा वज्र-धारिणा । वायुना दिग् गर्भवती तथा गर्भवती भव ॥
अर्थात् जिस प्रकार पृथ्वी अग्नि द्वारा गर्भवती होती है, अमरावती इन्द्र द्वारा गर्भवती होती है, दिशा
जिस प्रकार वायु द्वारा गर्भवती होती है, उसी प्रकार तुम गर्भवती हो (११५-१६)।
हेममहेश्वरि ! उसी ऋतु में अथवा अन्य ऋतु में गर्भ रहने पर—गर्भाधान के तीसरे महीने में 'पुंसवन'
संस्कार करे (११७)। पति नित्यकर्म समाप्त कर पञ्च-देवताओं की पूजा करे। फिर गौरी आदि सोलह मातृकाओं
की पूजा कर वसु-धारा प्रदान करे (११८)। तब वृद्धि श्राद्ध कर पूर्वोक्त विधि से धारा-होम तक कर्म सम्पन्न कर
'पुंसवन'-क्रिया करे (११६)। उसमें 'प्राजापत्य' नामक चरु और 'चन्द्र' नामक अग्नि होते हैं (१२०)। पति
गव्य दही में एक यव (जौ) और दो माष (उड़द) छोड़कर पत्नी से तीन बार पूछे—