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सर्वकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 139 में से

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पृष्ठ 73

६४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र
प्रज्वलित करे और इसी अग्नि में दो घृताक्त समिधाओं को आहुति देकर क्रमानुसार अग्नि का विहित नामकरण
करके अग्नि का ध्यान करे (१६-२०)। यथा--
बालार्कारुण-सङ्काशं सप्त-जिह्वं द्वि-मस्तकम् । अजारूढं शक्ति-धरं जटा-मुकुट-मण्डितम् ॥
अर्थात् बाल-सूर्य के समान अरुण वर्ण, सात जिह्वाओं वाले, दो मस्तकों से युक्त, छाग पर सवार, शक्ति
लिए हुए, जटा और मुकुट से शोभायमान अग्नि-देव हैं (२१) ।
इस प्रकार ध्यान कर हाथ जोड़कर अग्नि का आवाहन करे (२२) । आवाहन का मन्त्र यह है—
ह्रीं एह्येहि सर्व्वामर-हव्य-वाह ! मुनिभिः स्व-गणैः सह अध्वरं रक्ष रक्ष नमः स्वाहा ।
इस प्रकार अग्नि का आवाहन कर कहे कि—
अयं ते योनिः ।
फिर जो उपचार सुलभ हों, उनसे अग्निदेव की पूजाकर उनकी सप्त जिह्वाओं का पूजन करे (२३-२४) ।
सात जिह्वायें ये हैं—१ काली, २ कराली, ३ मनोजवा, ४ सुलोहिता, ५ सुधूम्र-वर्णा, ६ स्फुलिङ्गिनी, ७ विश्व-
निरूपिणी । ये सभी लोलायमाना अर्थात् लपलपाती हुई उज्ज्वल हैं (२५) । हे महेश्वरि ! अग्नि को पूर्व-दिशा से
आरम्भ कर उत्तर दिशा तक तीन बार प्रोक्षण करे । फिर यज्ञीय वस्तुओं पर भी तीन बार प्रोक्षण करे (२६-
२७)। तब मण्डल को पूर्व-दिशा से आरम्भ कर उत्तर दिशा तक कुश द्वारा आच्छादन करे । उत्तर दिशा में
स्थित कुशों को उत्तर-मुख और अन्य दिशाओं के कुशों को पूर्व-मुख रखे (२८)। अग्नि को दाएँ रखते हुए
अर्थात् अग्नि को बाईं ओर ब्रह्मासन के पास जाकर बाएँ हाथ की अंगुष्ठ-कनिष्ठा अंगुलियों से ब्रह्मा के कल्पित
आसन से एक कुश-पत्र लेकर निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए अग्नि को दक्षिण दिशा में फेंक दे (२६)—
ह्रीं निरस्तः परावसुः । सीद यज्ञ-पते ब्रह्मन् ! इदं ते कल्पितासनम् ।
अर्थात् हे यज्ञ-पते, हे ब्रह्मन् ! यह आसन तुम्हारे लिए प्रस्तुत है, इस पर बैठिए ।
ब्रह्मा कहे (ब्रह्मा के प्रतिनिधि-रूप कोई न हो, तो स्वयं कहे)—
सीदामि ।
अर्थात् 'मैं बैठता हूँ।' यह कहकर ब्रह्मा उत्तर-मुख होकर उक्त आसन पर बैठे (३०-३१) । गन्ध-पुष्पादि
से ब्रह्मा की पूजा कर उनसे प्रार्थना करे (३२) । यथा—
गोपाय यज्ञं यज्ञेश ! यज्ञं पाहि बृहस्पते ! मां च यज्ञ-पतिं पाहि कर्म-साक्षिन् नमोऽस्तु ते ॥
अर्थात् हे यज्ञेश्वर ! यज्ञ को रक्षा करो । हे बृहस्पते ! यज्ञ की रक्षा करो । मैं यज्ञ-पति हूँ, मेरी भी रक्षा
करो । हे कर्म-साक्षिन् ! तुम्हें नमस्कार है (३३) ।
उत्तर में ब्रह्मा कहें—
गोपयामि ।
अर्थात् 'मैं रक्षा करता हूँ।' ब्रह्मा के न होने पर स्वयं यह वचन कहे । यज्ञ की सिद्धि हेतु वहां दर्भ-मय
विप्र की कल्पना कर ले । फिर कहे—
ब्रह्मन् ! इहागच्छागच्छ ।
अर्थात् 'इस स्थान पर आइए, इस स्थान पर आइए।' इस प्रकारँ आवाहन कर पाद्यादि द्वारा उनकी
पूजा कर उनसे प्रार्थना करे—