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सर्वकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 139 में से

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पृष्ठ 85

नवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार । ७५
अर्थात् हे पुत्र ! तुमको प्रजापति के लिए, सविता के लिए, वरुण के लिए, पृथिवी के लिए, विश्वदेवों के
लिए, सब देवों के लिए समर्पित करता हूँ। वे सब तुम्हारी निरन्तर रक्षा करें (२०३)।
इसके बाद माणवक (ब्रह्मचारी) दक्षिणावर्त्त-क्रम से अग्नि की ओर गुरु की प्रदक्षिणा कर पुनः अपने
आसन पर बैठे (२०४)। हे प्रिये ! तब गुरु शिष्य द्वारा स्पृष्ट होकर 'समुद्भव' नामक अग्नि में पञ्च-देवों को
पाँच आहुतियाँ प्रदान करे (२०५)। पञ्च-देव हैं—१. प्रजापति, २. शक्र, ३. विष्णु, ४. ब्रह्मा, ५. शिव
(२०६) । पञ्च-देवों में से प्रत्येक के नाम के आदि में माया अर्थात् 'ह्रीं' और अन्त में वह्नि-जाया अर्थात्
'स्वाहा' लगाकर आहुति दे । यथा—
ह्रीं प्रजापतये स्वाहा, ह्रीं शक्राये स्वाहा, ह्रीं विष्णवे स्वाहा, ह्रीं ब्रह्मणे स्वाहा, ह्रीं शिवाय स्वाहा
इसी प्रकार, जिस मन्त्र की कोई विधि न कही हो, उसके आदि में 'ह्रीं' और अन्त में स्वाहा कहे।
(२०७) । इसके बाद दुर्गा, महालक्ष्मी, सुन्दरी, भुवनेश्वरी, इन्द्रादि दश दिक्-पाल, सूर्यादि नव-ग्रह—इनमें से
प्रत्येक का नामोल्लेख कर आहुति दे। फिर बालक को वस्त्र से आच्छादित कर गुरु ब्रह्मचर्याभिमानी उस माण-
वक से पूछे—
'को वाश्रमस्ते तनय ! ब्रूहि किं ते मनोगतम् ?'
अर्थात् हे पुत्र ! तुम्हारा आश्रम क्या है ? तुम्हारा मनोगत भाव क्या है ? बोलो (२०८-२०६)।
इस पर शिष्य सावधान होकर गुरु के दोनों चरणों को पकड़ कर कहे—
'करोतु मामा श्रमणं ब्रह्म-विद्योपदेशतः ।'
अर्थात् ब्रह्म-विद्या का उपदेश देकर मुझे आश्रमी बनाइए ।
हे शिवे ! इस प्रकार प्रार्थना करनेवाले शिष्य के दाएँ कान में गुरु सर्व-मन्त्र-मय प्रणव (ॐ) को तीन बार
सुनाकर 'भूर्भुवः स्वः' इन तीन व्याहृतियों का उच्चारण कर गायत्री को सुनाए (२१०-२११)। यथा—
सदाशिव इस सावित्री के ऋषि कहे गए हैं। त्रिष्टुप् छन्द है। सावित्री अधिष्ठात्री देवी कही गई हैं।
मोक्षार्थ विनियोग है (२१२)। पहले 'तत् सवितुः,' फिर 'वरेण्यं' इस पद का उच्चारण करे। तब 'भर्ग' इस पद
के बाद 'देवस्य धीमहि' इस पद का पाठ करे (२१३)। हे परमेश्वरि ! उसके बाद 'धियो योनः प्रचोदयात्'
और पुनः प्रणव (ॐ) का उच्चारण कर गुरु शिष्य को गायत्री का अर्थ बताए (२१४)। यथा—
त्र्यक्षरात्मक 'प्रणव' (ॐ) द्वारा परमेश्वर का प्रतिपादन होता है। सृष्टि-स्थिति-प्रलय-कर्त्ता जो देव प्रकृति
से भी श्रेष्ठ है (२१५), वही देव त्रिलोक की आत्मा है। वह त्रिगुण अर्थात् सत्व, रज और तम को व्याप्त करके
वर्तमान है, अतः 'भूर्भुवः स्वः' इन तीन व्याहृतियों का वाच्य ब्रह्म है (२१६)। जो प्रणव और व्याहृति का
वाच्य है, सावित्री द्वारा उसी ज्ञेय सविता अर्थात् जगद्-रूप वस्तु के सृष्टि-कर्त्ता, दीप्त्यादि क्रियाओं के आश्रय
विभु के अन्तर्गत योगियों के वरणीय, सर्व-व्यापी और सनातन उसी महाज्योति का ध्यान करता हूँ (२१७-
२१८) । यह महा-ज्योति सबकी साक्षी और ईश्वर है। हम सबकी मन, बुद्धि, सभी इन्द्रियों को धर्म-अर्थ-काम-
मोक्ष में प्रेरित करो अर्थात् नियोजित करो (२१६)।
हे देवि ! सद्गुरु इसी प्रकार अर्थ-सहित ब्रह्म-विद्या का उपदेश कर शिष्य को गृहस्थाश्रम के कर्म में
नियुक्त करे (२२०) । यथा—
ब्रह्मचर्योचितं वेषं वत्सेदानीं परित्यज । शाम्भवोदित-मार्गेण देवान् पितॄन् समर्चय ।
ब्रह्म-विद्योपदेशेन पवित्रं ते कलेवरम् । प्राप्तां गृहस्थाश्रमिता तदुक्तं कर्म कल्पय ॥