महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१८९-
एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः
शिखण्डीका विवाह तथा उसके स्त्री होनेका समाचार पाकर उसके श्वशुर दशार्णराजका महान् कोप
भीष्म उवाच
चकार यत्नं द्रुपदः सुतायाः सर्वकर्मसु ।
ततो लेख्यादिषु तथा शिल्popular शिल्पेपु -> शिल्popular text: शिल्पेपु/शिल्पेषु -> शिल्पेपु च -> शिल्पेपु च परंतप ।। १ ।। -> शिल्पेपु/शिल्पेषु (looks like शिल्पेपु or शिल्पेपु च परंतप? It's शिल्पेपु/शिल्पेषु च परंतप ।। १ ।। -> शिल्पेपु च परंतप / शिल्पेपु च) Let me read carefully: 'ततो लेख्यादिषु तथा शिल्पेपु च परंतप ।। १ ।।' -> wait, 'शिल्पेषु': श, ि, ल, ्, प, े, ष, ु -> शिल्पेपु/शिल्पेषु. It's 'शिल्पेषु'.
चकार यत्नं द्रुपदः सुतायाः सर्वकर्मसु ।
ततो लेख्यादिषु तथा शिल्पेषु च परंतप ।। १ ।।
**भीष्म कहते हैं—**तदनन्तर द्रुपदने अपनी पुत्रीको लेखनशिक्षा और शिल्पशिक्षा आदि सभी कार्योंकी योग्यता प्राप्त करानेके लिये विशेष प्रयत्न किया ।। १ ।।
इष्वस्त्रै चैव राजेन्द्र द्रोणशिष्यो बभूव ह ।
तस्य माता महाराज राजानं वरवर्णिनी ।। २ ।।
चोदयामास भार्यार्थं कन्यायाः पुत्रवत् तदा ।
ततस्तां पार्षदो दृष्ट्वा कन्यां सम्प्राप्तयौवनाम् ।
स्त्रियं मत्वा ततश्चिन्तां प्रपेदे सह भार्यया ।। ३ ।।
राजेन्द्र! धनुर्विद्याके लिये शिखण्डी द्रोणाचार्यका शिष्य हुआ। महाराज! शिखण्डीकी सुन्दरी माताने राजा द्रुपदको प्रेरित किया कि वे उसके पुत्रके लिये बहू ला दें। वह अपनी कन्याका पुत्रके समान ब्याह करना चाहती थी। द्रुपदने देखा, मेरी बेटी जवान हो गयी तो भी अबतक स्त्री ही बनी हुई है (वरदानके अनुसार पुरुष नहीं हो सकी), इससे पत्नीसहित उनके मनमें बड़ी चिन्ता हुई ।। २-३ ।।
द्रुपद उवाच
कन्या ममेयं सम्प्राप्ता यौवनं शोकवर्धिनी ।
मया प्रच्छादिता चेयं वचनाच्छूलपाणिनः ।। ४ ।।
**द्रुपद बोले—**देवि! मेरी यह कन्या युवावस्थाको प्राप्त होकर मेरा शोक बढ़ा रही है। मैंने भगवान् शंकरके कथनपर विश्वास करके अबतक इसके कन्याभावको छिपा रखा था ।। ४ ।।
भार्योवाच
न तन्मिथ्या महाराज भविष्यति कथंचन ।
त्रैलोक्यकर्ता कस्माद्धि वृथा वक्तुमिहार्हति ।। ५ ।।
यदि ते रोचते राजन् वक्ष्यामि शृणु मे वचः ।
श्रुत्वेदानीं प्रपद्येथाः स्वां मतिं पृषतात्मज ।। ६ ।।
रानीने कहा— महाराज! भगवान् शिवका दिया हुआ वर किसी तरह मिथ्या नहीं होगा। भला, तीनों लोकोंकी सृष्टि करनेवाले भगवान् झूठी बात कैसे कह सकते हैं? राजन्! यदि आपको अच्छा लगे तो कहूँ। मेरी बात सुनिये। पृषतनन्दन! इसे सुनकर अपनी बुद्धिके अनुसार ग्रहण करें॥ ५-६॥
क्रियतामस्य यत्नेन विधिवद् दारसंग्रहः।
भविता तद्वचः सत्यमिति मे निश्चिता मतिः॥ ७॥
मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि भगवान्का वचन सत्य होगा। अतः आप प्रयत्नपूर्वक शास्त्रीय विधिके अनुसार इसका कन्याके साथ विवाह कर दें॥ ७॥
ततस्तौ निश्चयं कृत्वा तस्मिन् कार्येऽथ दम्पती।
वरयांचक्रतुः कन्यां दशार्णाधिपतेः सुताम्॥ ८॥
इस प्रकार विवाहका निश्चय करके दोनों पति-पत्नीने दशार्णराजकी पुत्रीका अपने पुत्रके लिये वरण किया॥ ८॥
ततो राजा द्रुपदो राजसिंहः
सर्वान् राज्ञ कुलतः संनिशाम्य।
दाशार्णकस्य नृपतेस्तनूजां
शिखण्डिने वरयामास दारान्॥ ९॥
तदनन्तर राजाओंमें श्रेष्ठ द्रुपदने समस्त राजाओंके कुल आदिका परिचय सुनकर दशार्णराजकी ही पुत्रीका शिखण्डीके लिये वरण किया॥ ९॥
हिरण्यवर्मेति नृपो योऽसौ दाशार्णकः स्मृतः।
स च प्रदान्महीपालः कन्यां तस्मै शिखण्डिने॥ १०॥
दशार्णदेशके राजाका नाम हिरण्यवर्मा था। भूपाल हिरण्यवर्माने शिखण्डीको अपनी कन्या दे दी॥ १०॥
स च राजा दशार्णेषु महानासीत् सुदुर्जयः।
हिरण्यवर्मा दुर्धर्षो महासेनो महामनाः॥ ११॥
दशार्णदेशका वह राजा हिरण्यवर्मा महान् दुर्जय और दुर्धर्ष वीर था। उसके पास विशाल सेना थी। साथ ही उसका हृदय भी विशाल था॥ ११॥
कृते विवाहे तु तदा सा कन्या राजसत्तम।
यौवनं समनुप्राप्ता सा च कन्या शिखण्डिनी॥ १२॥
कृतदारः शिखण्डी च काम्पिल्यं पुनरागमत्।
ततः सा वेद तां कन्यां कञ्चित् कालं स्त्रियं किल॥ १३॥
नृपश्रेष्ठ! हिरण्यवर्माकी पुत्री भी युवावस्थाको प्राप्त थी। इधर द्रुपदकी कन्या शिखण्डिनी भी पूर्ण युवती हो गयी थी। विवाहकार्य सम्पन्न हो जानेपर पत्नीसहित
शिखण्डी पुनः काम्पिल्य नगरमें आया। दशार्णराजकी कन्याने कुछ ही दिनोंमें यह समझ लिया कि शिखण्डी तो स्त्री है ।। १२-१३ ।।
हिरण्यवर्मणः कन्या ज्ञात्वा तां तु शिखण्डिनीम् ।
धात्रीणां च सखीनां च व्रीडमाना न्यवेदयत् ।
कन्यां पञ्चालराजस्य सुतां तां वै शिखण्डिनीम् ॥ १४ ॥
हिरण्यवर्माकी पुत्रीने शिखण्डीके यथार्थ स्वरूपको जानकर अपनी धाय तथा सखियोंसे लजाते-लजाते यह गुप्त बात कह दी कि पांचालराजके पुत्र शिखण्डी वास्तवमें पुरुष नहीं, स्त्री हैं ।। १४ ।।
ततस्ता राजशार्दूल धात्र्यो दाशार्णिकास्तदा ।
जग्मुरार्तिं परां प्रेष्याः प्रेषयामासुरेव च ॥ १५ ॥
नृपश्रेष्ठ! यह सुनकर दशार्णदेशकी धायोंको बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने यह समाचार सूचित करनेके लिये बहुत-सी दासियोंको दशार्णराजके यहाँ भेजा ।। १५ ।।
ततो दशार्णाधिपतेः प्रेष्याः सर्वा न्यवेदयन् ।
विप्रलम्भं यथावृत्तं स च चुक्रोध पार्थिवः ॥ १६ ॥
वे सब दासियाँ दशार्णराजसे सब बातें ठीक-ठीक बताती हुई बोलीं कि 'राजा द्रुपदने बहुत बड़ा धोखा दिया है'। यह सुनकर दशार्णराज अत्यन्त कुपित हो उठे ।। १६ ।।
शिखण्ड्यपि महाराज पुंवद् राजकुले तदा ।
विजहार मुदा युक्तः स्त्रीत्वं नैवातिरोचयन् ॥ १७ ॥
महाराज! शिखण्डी भी उस राजपरिवारमें पुरुषकी ही भाँति आनन्दपूर्वक घूमता-फिरता था। उसे अपना स्त्रीत्व अच्छा नहीं लगता था ।। १७ ।।
ततः कतिपयाहस्य तच्छ्रुत्वा भरतर्षभ ।
हिरण्यवर्मा राजेन्द्र रोषादार्तिं जगाम ह ॥ १८ ॥
भरतश्रेष्ठ! राजेन्द्र! तदनन्तर कुछ दिनोंमें उसके स्त्री होनेका समाचार सुनकर हिरण्यवर्मा क्रोधसे पीड़ित हो गया ।। १८ ।।
ततो दाशार्णको राजा तीव्रकोपसमन्वितः ।
दूतं प्रस्थापयामास द्रुपदस्य निवेशनम् ॥ १९ ॥
तदनन्तर दशार्णराजने दुःसह क्रोधसे युक्त हो राजा द्रुपदके दरबारमें दूत भेजा ।। १९ ।।
ततो द्रुपदमासाद्य दूतः काञ्चनवर्मणः ।
एक एकान्तमुत्सार्य रहो वचनमब्रवीत् ॥ २० ॥
हिरण्यवर्माका वह दूत द्रुपदके पास पहुँचकर अकेला एकान्तमें सबको हटाकर केवल राजासे इस प्रकार बोला— ।। २० ।।
दाशार्णराजो राजंस्त्वामिदं वचनमब्रवीत् ।
अभिषङ्गात् प्रकुपितो विप्रलब्धस्त्वयानघ ।। २१ ।।
‘निष्पाप नरेश! आपने दशार्णराजको धोखा दिया है। आपके द्वारा किये गये अपमानसे उनका क्रोध बहुत बढ़ गया है। उन्होंने आपसे कहनेके लिये यह संदेश भेजा है ।। २१ ।।
अवमन्यसे मां नृपते नूनं दुर्मन्त्रितं तव ।
यन्मे कन्यां स्वकन्यार्थे मोहाद् याचितवानसि ।। २२ ।।
तस्याद्य विप्रलम्भस्य फलं प्राप्नुहि दुर्मते ।
एष त्वां सजनामात्यमुद्धरामि स्थिरो भव ।। २३ ।।
‘नरेश्वर! तुमने जो मेरा अपमान किया है, वह निश्चय ही तुम्हारे खोटे विचारका परिचय है। तुमने मोहवश अपनी पुत्रीके लिये मेरी पुत्रीका वरण किया था। दुर्मते! उस ठगी और वंचनाका फल अब तुम्हें शीघ्र ही प्राप्त होगा, धीरज रखो। मैं अभी सेवकों और मन्त्रियोंसहित तुम्हें जड़मूलसहित उखाड़ फेंकता हूँ’ ।। २२-२३ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि हिरण्यवर्मदूतागमने एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें हिरण्यवर्मके दूतका आगमनविषयक एक सौ नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८९ ।।