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सर्वकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1191, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 1191

रानीने कहा— महाराज! भगवान् शिवका दिया हुआ वर किसी तरह मिथ्या नहीं होगा। भला, तीनों लोकोंकी सृष्टि करनेवाले भगवान् झूठी बात कैसे कह सकते हैं? राजन्! यदि आपको अच्छा लगे तो कहूँ। मेरी बात सुनिये। पृषतनन्दन! इसे सुनकर अपनी बुद्धिके अनुसार ग्रहण करें॥ ५-६॥

क्रियतामस्य यत्नेन विधिवद् दारसंग्रहः।
भविता तद्वचः सत्यमिति मे निश्चिता मतिः॥ ७॥
मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि भगवान्‌का वचन सत्य होगा। अतः आप प्रयत्नपूर्वक शास्त्रीय विधिके अनुसार इसका कन्याके साथ विवाह कर दें॥ ७॥

ततस्तौ निश्चयं कृत्वा तस्मिन् कार्येऽथ दम्पती।
वरयांचक्रतुः कन्यां दशार्णाधिपतेः सुताम्॥ ८॥
इस प्रकार विवाहका निश्चय करके दोनों पति-पत्नीने दशार्णराजकी पुत्रीका अपने पुत्रके लिये वरण किया॥ ८॥

ततो राजा द्रुपदो राजसिंहः
सर्वान् राज्ञ कुलतः संनिशाम्य।
दाशार्णकस्य नृपतेस्तनूजां
शिखण्डिने वरयामास दारान्॥ ९॥
तदनन्तर राजाओंमें श्रेष्ठ द्रुपदने समस्त राजाओंके कुल आदिका परिचय सुनकर दशार्णराजकी ही पुत्रीका शिखण्डीके लिये वरण किया॥ ९॥

हिरण्यवर्मेति नृपो योऽसौ दाशार्णकः स्मृतः।
स च प्रदान्महीपालः कन्यां तस्मै शिखण्डिने॥ १०॥
दशार्णदेशके राजाका नाम हिरण्यवर्मा था। भूपाल हिरण्यवर्माने शिखण्डीको अपनी कन्या दे दी॥ १०॥

स च राजा दशार्णेषु महानासीत् सुदुर्जयः।
हिरण्यवर्मा दुर्धर्षो महासेनो महामनाः॥ ११॥
दशार्णदेशका वह राजा हिरण्यवर्मा महान् दुर्जय और दुर्धर्ष वीर था। उसके पास विशाल सेना थी। साथ ही उसका हृदय भी विशाल था॥ ११॥

कृते विवाहे तु तदा सा कन्या राजसत्तम।
यौवनं समनुप्राप्ता सा च कन्या शिखण्डिनी॥ १२॥
कृतदारः शिखण्डी च काम्पिल्यं पुनरागमत्।
ततः सा वेद तां कन्यां कञ्चित् कालं स्त्रियं किल॥ १३॥
नृपश्रेष्ठ! हिरण्यवर्माकी पुत्री भी युवावस्थाको प्राप्त थी। इधर द्रुपदकी कन्या शिखण्डिनी भी पूर्ण युवती हो गयी थी। विवाहकार्य सम्पन्न हो जानेपर पत्नीसहित