महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१८०-
अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीष्म और परशुरामका घोर युद्ध
भीष्म उवाच
आत्मनस्तु ततः सूतो हयानां च विशाम्पते।
मम चापनयामास शल्यान् कुशलसम्मतः॥ १॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर अपने कार्यमें कुशल एवं सम्मानित सारथिने अपने घोड़ोंके तथा मेरे भी शरीरमें चुभे हुए बाणोंको निकाला॥ १॥
स्नातापवृत्तैस्तुरगैर्लब्धतोयैर्विह्वलैः।
प्रभाते चोदिते सूर्ये ततो युद्धमवर्तत॥ २॥
घोड़े टहलाये गये और लोट-पोट कर लेनेपर नहलाये गये; फिर उन्हें पानी पिलाया गया, इस प्रकार जब वे स्वस्थ और शान्त हुए, तब प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर पुनः युद्ध आरम्भ हुआ॥ २॥
दृष्ट्वा मां तूर्णमायान्तं दंशितं स्यन्दने स्थितम्।
अकरोद् रथमत्यर्थं रामः सज्जं प्रतापवान्॥ ३॥
मुझे रथपर बैठकर कवच धारण किये शीघ्रता-पूर्वक आते देख प्रतापी परशुरामजीने अपने रथको अत्यन्त सुसज्जित किया॥ ३॥
ततोऽहं राममायान्तं दृष्ट्वा समरकाङ्क्षिणम्।
धनुः श्रेष्ठं समुत्सृज्य सहसावतरं रथात्॥ ४॥
तदनन्तर युद्धकी इच्छावाले परशुरामजीको आते देख मैं अपना श्रेष्ठ धनुष छोड़कर सहसा रथसे उतर पड़ा॥ ४॥
अभिवाद्य तथैवाहं रथमारुह्य भारत।
युयुत्सुर्जामदग्न्यस्य प्रमुखे वीतभीः स्थितः॥ ५॥
भारत! पूर्ववत् गुरुको प्रणाम करके अपने रथपर आरूढ़ हो युद्धकी इच्छासे परशुरामजीके सामने मैं निर्भय होकर डट गया॥ ५॥
ततोऽहं शरवर्षेण महता समवाकिरम्।
स च मां शरवर्षेण वर्षन्तं समवाकिरत्॥ ६॥
तदनन्तर मैंने उनपर बाणोंकी भारी वर्षा की। फिर उन्होंने भी बाणोंकी वर्षा करनेवाले मुझ भीष्मपर बहुत-से बाण बरसाये॥ ६॥
संक्रुद्धो जामदग्न्यस्तु पुनरेव सुतेजितान्।
सम्प्रेषिन्मे शरान् घोरान् दीप्तास्यानुरगानिव॥ ७॥
तत्पश्चात् जमदग्निकुमारने पुनः अत्यन्त क्रुद्ध होकर मुझपर प्रज्वलित मुखवाले सर्पोंकी भाँति तेज किये हुए भयानक बाण चलाये ॥ ७ ॥
ततोऽहं निशितैर्भल्लैः शतशोऽथ सहस्रशः ।
अच्छिदं सहसा राजन्नन्तरिक्षे पुनः पुनः ॥ ८ ॥
राजन्! तब मैंने सहसा तीखी धारवाले भल्ल नामक बाणोंसे आकाशमें ही उन सबके सैकड़ों और हजारों टुकड़े कर दिये। यह क्रिया बारंबार चलती रही ॥ ८ ॥
ततस्त्वस्त्राणि दिव्यानि जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
मयि प्रयोजयामास तान्यहं प्रत्यषेधयम् ॥ ९ ॥
अस्त्रैरेव महाबाहो चिकीर्षन्नधिकां क्रियाम् ।
इसके पश्चात् प्रतापी परशुरामजीने मेरे ऊपर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग आरम्भ किया; परंतु महाबाहो! मैंने उनसे भी अधिक पराक्रम प्रकट करनेकी इच्छा रखकर उन सब अस्त्रोंका दिव्यास्त्रोंद्वारा ही निवारण कर दिया ॥ ९ १/२ ॥
ततो दिवि महान् नादः प्रादुरासीत् समन्ततः ॥ १० ॥
ततोऽहमस्त्रं वायव्यं जामदग्न्ये प्रयुक्तवान् ।
प्रत्याजघ्ने च तद् रामो गुह्यकास्त्रेण भारत ॥ ११ ॥
उस समय आकाशमें चारों ओर बड़ा कोलाहल होने लगा। इसी समय मैंने जमदग्निकुमारपर वायव्यास्त्रका प्रयोग किया। भारत! परशुरामजीने गुह्यकास्त्रद्वारा मेरे उस अस्त्रको शान्त कर दिया ॥ १०-११ ॥
ततोऽहमस्त्रमाग्नेयमनुमन्त्र्य प्रयुक्तवान् ।
वारुणेनैव तद् रामो वारयामास मे विभुः ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् मैंने मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया; किंतु भगवान् परशुरामने वारुणास्त्र चलाकर उसका निवारण कर दिया ॥ १२ ॥
एवमस्त्राणि दिव्यानि रामस्याहमवारयम् ।
रामश्च मम तेजस्वी दिव्यास्त्रविदरिंदमः ॥ १३ ॥
इस प्रकार मैं परशुरामजीके दिव्यास्त्रोंका निवारण करता और शत्रुओंका दमन करनेवाले दिव्यास्त्रवेत्ता तेजस्वी परशुराम भी मेरे अस्त्रोंका निवारण कर देते थे ॥ १३ ॥
ततो मां सव्यतो राजन् रामः कुर्वन् द्विजोत्तमः ।
उरस्यविध्यत् संक्रुद्धो जामदग्न्यः प्रतापवान् ॥ १४ ॥
राजन्! तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए प्रतापी विप्रवर परशुरामने मुझे बायें लेकर मेरे वक्षःस्थलको बाणद्वारा बींध दिया ॥ १४ ॥
ततोऽहं भरतश्रेष्ठ संन्यषीदं रथोत्तमे ।
ततो मां कश्मलाविष्टं सूतस्तूर्णमुदावहत् ॥ १५ ॥
भरतश्रेष्ठ! उससे घायल होकर मैं उस श्रेष्ठ रथपर बैठ गया, उस समय मुझे मूर्च्छित अवस्थामें देखकर सारथि शीघ्र ही अन्यत्र हटा ले गया ।। १५ ।।
ग्लायन्तं भरतश्रेष्ठ रामबाणप्रपीडितम् ।
ततो मामपयातं वै भृशं विद्धमचेतसम् ।। १६ ।।
रामस्यानुचरा हृष्टाः सर्वे दृष्ट्वा विचुक्रुशुः ।
अकृतव्रणप्रभृतयः काशिकन्या च भारत ।। १७ ।।
भरतश्रेष्ठ! परशुरामजीके बाणसे अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण मुझे बड़ी व्याकुलता हो रही थी। मैं अत्यन्त घायल और अचेत होकर रणभूमिसे दूर हट गया था। भारत! इस अवस्थामें मुझे देखकर परशुरामजीके अकृतव्रण आदि सेवक तथा काशिराजकी कन्या अम्बा ये सब-के-सब अत्यन्त प्रसन्न हो कोलाहल करने लगे ।। १६-१७ ।।
ततस्तु लब्धसंज्ञोऽहं ज्ञात्वा सूतमथाब्रुवम् ।
याहि सूत यतो रामः सज्जोऽहं गतवेदनः ।। १८ ।।
इतनेहीमें मुझे चेत हो गया और सब कुछ जानकर मैंने सारथिसे कहा—‘सूत! जहाँ परशुरामजी हैं, वहीं चलो। मेरी पीड़ा दूर हो गयी है और अब मैं युद्धके लिये सुसज्जित हूँ’ ।। १८ ।।
ततो मामवहत् सूतो हयैः परमशोभितैः ।
नृत्यद्भिरिव कौरव्य मारुतप्रतिमैर्गतौ ।। १९ ।।
कुरुनन्दन! तब सारथिने अत्यन्त शोभाशाली अश्वोंद्वारा, जो वायुके समान वेगसे चलनेके कारण नृत्य करते-से जान पड़ते थे, मुझे युद्धभूमिमें पहुँचाया ।। १९ ।।
ततोऽहं राममासाद्य बाणवर्षैश्च कौरव ।
अवाकिरं सुसंरब्धः संरब्धं च जिगीषया ।। २० ।।
कौरव! तब मैंने क्रोधमें भरे हुए परशुरामजीके पास पहुँचकर उन्हें जीतनेकी इच्छासे स्वयं भी कुपित होकर उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ।। २० ।।
तानापतत एवासौ रामो बाणानजिह्मगान् ।
बाणैरेवाच्छिनत् तूर्णमेकैकं त्रिभिराहवे ।। २१ ।।
किंतु परशुरामजीने सीधे लक्ष्यकी ओर जानेवाले उन बाणोंके आते ही एक-एकको तीन-तीन बाणोंसे तुरंत काट दिया ।। २१ ।।
ततस्ते सूदिताः सर्वे मम बाणाः सुसंशिताः ।
रामबाणैर्द्विधा छिन्नाः शतशोऽथ सहस्रशः ।। २२ ।।
इस प्रकार मेरे चलाये हुए वे सब सैकड़ों और हजारों तीखे बाण परशुरामजीके सायकोंसे कटकर दो-दो टूक हो नष्ट हो गये ।। २२ ।।
ततः पुनः शरं दीप्तं सुप्रभं कालसम्मितम् ।
असृजं जामदग्न्याय रामायाहं जिघांसया ।। २३ ।।
तब मैंने पुनः जमदग्निनन्दन परशुरामकी ओर उन्हें मार डालनेकी इच्छासे एक कालाग्निके समान प्रज्वलित तथा तेजस्वी बाण छोड़ा ॥ २३ ॥
तेन त्वभिहतो गाढं बाणवेगवशं गतः ।
मुमोह समरे रामो भूमौ च निपपात ह ॥ २४ ॥
उसकी गहरी चोट खाकर परशुरामजी उस बाणके वेगके अधीन हो समरभूमिमें मूर्च्छित हो गये और धरतीपर गिर पड़े ॥ २४ ॥
ततो हाहाकृतं सर्वं रामे भूतलाश्रिते ।
जगद् भारत संविग्नं यथार्कपतने भवेत् ॥ २५ ॥
परशुरामके पृथ्वीपर गिरते ही मानो आकाशसे सूर्य टूटकर गिरे हों, ऐसा समझकर सारा जगत् भयभीत हो हाहाकार करने लगा ॥ २५ ॥
तत एनं समुद्विग्नाः सर्व एवाभिदुद्रुवुः ।
तपोधनास्ते सहसा काश्या च कुरुनन्दन ॥ २६ ॥
तत एनं परिष्वज्य शनैराश्वासयंस्तदा ।
पाणिभिर्जलशीतैश्च जयाशीर्भिश्च कौरव ॥ २७ ॥
कुरुनन्दन! उस समय वे तपोधन और काशिराजकी कन्या सब-के-सब अत्यन्त उद्विग्न हो सहसा उनके पास दौड़े गये और उन्हें हृदयसे लगा हाथ फेरकर तथा शीतल जल छिड़ककर विजयसूचक आशीर्वाद देते हुए सान्त्वना देने लगे ॥ २६-२७ ॥
ततः स विह्वलं वाक्यं राम उत्थाय चाब्रवीत् ।
तिष्ठ भीष्म हतोऽसीति बाणं संधाय कार्मुके ॥ २८ ॥
तदनन्तर कुछ स्वस्थ होनेपर परशुरामजी उठ गये और धनुषपर बाण चढ़ाकर विह्वल स्वरमें बोले—'भीष्म! खड़े रहो, अब तुम मारे गये' ॥ २८ ॥
स मुक्तो न्यपतत् तूर्णं सव्ये पार्श्वे महाहवे ।
येनाहं भृशमुद्विग्नो व्याघूर्णित इव द्रुमः ॥ २९ ॥
उस महान् युद्धमें उनके धनुषसे छूटा हुआ वह बाण तुरंत मेरी बायीं पसलीपर पड़ा, जिससे मैं अत्यन्त उद्विग्न होकर वृक्षकी भाँति झूमने लगा ॥ २९ ॥
हत्वा हयांस्ततो रामः शीघ्रास्त्रेण महाहवे ।
अवाकिरन्मां विस्रब्धो बाणैस्तैर्लोमवाहिभिः ॥ ३० ॥
फिर तो परशुरामजी उस महासमरमें शीघ्र छोड़े हुए अस्त्रद्वारा मेरे घोड़ोंको मारकर निर्भय हो मेरे ऊपर पाँखसे उड़नेवाले बाणोंसे वर्षा करने लगे ॥ ३० ॥
ततोऽहमपि शीघ्रास्त्रं समरप्रतिवारणम् ।
अवासृजं महाबाहो तेऽन्तराधिष्ठिताः शत: ॥ ३१ ॥
रामस्य मम चैवाशु व्योमावृत्य समन्ततः ।
महाबाहो! तत्पश्चात् मैंने भी शीघ्रतापूर्वक ऐसे अस्त्रोंका प्रयोग आरम्भ किया, जो युद्धभूमिमें विपक्षीकी गतिको रोक देनेवाले थे। मेरे तथा परशुरामजीके बाण आकाशमें सब ओर फैलकर मध्यभागमें ही ठहर गये ।। ३१ १/२ ।।
न स्म सूर्यः प्रतपति शरजालसमावृतः ।। ३२ ।।
मातरिश्वा ततस्तस्मिन् मेघरुद्ध इवाभवत् ।
उस समय बाणोंके समूहसे आच्छादित होनेके कारण सूर्य नहीं तपता था और वायुकी गति इस प्रकार कुण्ठित हो गयी थी, मानो मेघोंसे अवरुद्ध हो गयी हो ।। ३२ १/२ ।।
ततो वायोः प्रकम्पाच्च सूर्यस्य च गभस्तिभिः ।। ३३ ।।
अभिघातप्रभावाच्च पावकः समजायत ।
उस समय वायुके कम्पन और सूर्यकी किरणोंसे समस्त बाण परस्पर टकराने लगे। उनकी रगड़से वहाँ आग प्रकट हो गयी ।। ३३ १/२ ।।
ते शराः स्वसमुत्थेन प्रदीप्ताश्चित्रभानुना ।। ३४ ।।
भूमौ सर्वे तदा राजन् भस्मभूताः प्रपेदिरे ।
राजन्! वे सभी बाण अपने ही संघर्षसे उत्पन्न हुई अग्निसे जलकर भस्म हो गये और भूमिपर गिर पड़े ।। ३४ १/२ ।।
तदा शतसहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ।। ३५ ।।
अयुतान्यथ खर्वाणि निखर्वाणि च कौरव ।
रामः शराणां संक्रुद्धो मयि तूर्णं न्यपातयत् ।। ३६ ।।
कौरवनरेश! उस समय परशुरामजीने अत्यन्त क्रुद्ध होकर मेरे ऊपर तुरंत ही दस हजार, लाख, दस लाख, अर्बुद, खर्ब और निखर्ब बाणोंका प्रहार किया ।।
ततोऽहं तानपि रणे शरैराशीविषोपमैः ।
संछिद्य भूमौ नृपते पातयेयं नगानिव ।। ३७ ।।
नरेश्वर! तब मैंने रणभूमिमें विषधर सर्पके समान भयंकर सायकोंद्वारा उन सब बाणोंको वृक्षोंकी भाँति भूमिपर काट गिराया ।। ३७ ।।
एवं तदभवद् युद्धं तदा भरतसत्तम ।
संध्याकाले व्यतीते तु व्यपायात् स च मे गुरुः ।। ३८ ।।
भरतभूषण! इस प्रकार वह युद्ध चलता रहा। संध्याकाल बीतनेपर मेरे गुरु रणभूमिसे हट गये ।। ३८ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि रामभीष्मयुद्धे
अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परशुराम-भीष्मयुद्धविषयक एक सौ असीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८० ।।
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