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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुनका दिव्य जल प्रकट करके भीष्मजीकी प्यास बुझाना तथा भीष्मजीका अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए दुर्योधनको संधिके लिये समझाना

संजय उवाच

व्युष्टायां तु महाराज शर्वर्यां सर्वपार्थिवाः ।
पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च उपातिष्ठन् पितामहम् ॥ १ ॥
तं वीरशयने वीरं शयानं कुरुसत्तम ।
अभिवाद्योपतस्थुर्वै क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभम् ॥ २ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! जब रात बीती और सबेरा हुआ, उस समय सब राजा, पाण्डव तथा आपके पुत्र पुनः वीर-शय्यापर सोये हुए वीर पितामह भीष्मकी सेवामें उपस्थित हुए। कुरुश्रेष्ठ! वे सब क्षत्रिय क्षत्रियशिरोमणि भीष्मजीको प्रणाम करके उनके समीप खड़े हो गये ॥ १-२ ॥

कन्याश्चन्दनचूर्णैश्च लाजैर्माल्यैश्च सर्वशः ।
अवाकिरञ्छान्तनवं तत्र गत्वा सहस्रशः ॥ ३ ॥
सहस्रों कन्याएँ वहाँ जाकर चन्दन-चूर्ण, लाजा (खील) और माला-फूल आदि सब प्रकारकी शुभ सामग्री शान्तनुनन्दन भीष्मके ऊपर बिखेरने लगीं ॥ ३ ॥

स्त्रियो वृद्धास्तथा बालाः प्रेक्षकाश्च पृथग्जनाः ।
समभ्ययुः शान्तनवं भूतानीव तमोमुदम् ॥ ४ ॥
स्त्रियाँ, बूढ़े, बालक तथा अन्य साधारण जन शान्तनुकुमार भीष्मजीका दर्शन करनेके लिये वहाँ आये, मानो समस्त प्रजा अन्धकारनाशक भगवान् सूर्यकी उपासनाके लिये उपस्थित हुई हो ॥ ४ ॥

तूर्याणि शतसंख्यानि तथैव नटनर्तकाः ।
शिल्पिनश्च तथाऽऽजग्मुः कुरुवृद्धं पितामहम् ॥ ५ ॥
सैकड़ों बाजे और बजानेवाले, नट, नर्तक और बहुत-से शिल्पी कुरुवंशके वृद्ध पुरुष पितामह भीष्मके पास आये ॥ ५ ॥

उपारम्य च युद्धेभ्यः संनाहान् विप्रमुच्य ते ।
आयुधानि च निक्षिप्य सहिताः कुरुपाण्डवाः ॥ ६ ॥
अन्वासन्त दुराधर्षं देवव्रतमरिंदमम् ।
अन्योन्यं प्रीतिमन्तस्ते यथापूर्वं यथावयः ॥ ७ ॥

कौरव तथा पाण्डव युद्धसे निवृत्त हो कवच खोलकर अस्त्र-शस्त्र नीचे डालकर पहलेकी भाँति परस्पर प्रेमभाव रखते हुए अवस्थाकी छोटाई-बड़ाईके अनुसार यथोचित क्रमसे शत्रुदमन दुर्जय वीर देवव्रत भीष्मके समीप एक साथ बैठ गये ।। ६-७ ।।

सा पार्थिवशताकीर्णा समितिर्भीष्मशोभिता ।
शुशुभे भारती दीप्ता दीवीवादित्यमण्डलम् ॥ ८ ॥
सैकड़ों राजाओंसे भरी और भीष्मसे सुशोभित हुई वह भरतवंशियोंकी दीप्तिशालिनी सभा आकाशमें सूर्यमण्डलकी भाँति उस रणभूमिमें शोभा पाने लगी ।। ८ ।।

विबभौ च नृपाणां सा गंगासुतमुपासताम् ।
देवानांमिव देवेशं पितामहमुपासताम् ॥ ९ ॥
गंगानन्दन भीष्मके पास बैठी हुई राजाओंकी वह मण्डली देवेश्वर ब्रह्माजीकी उपासना करनेवाले देवताओंके समान सुशोभित हो रही थी ।। ९ ।।

भीष्मस्तु वेदनां धैर्यान्निगृह्य भरतर्षभ ।
अभितप्तः शरैश्चैव निःश्वसन्नुरगो यथा ॥ १० ॥
शराभितप्तकायोऽपि शस्त्रसम्पातमूर्च्छितः ।
पानीयमिति सम्प्रेक्ष्य राजंस्तान् प्रत्यभाषत ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! भीष्मजी बाणोंसे संतप्त होकर सर्पके समान लम्बी साँस खींच रहे थे। वे अपनी वेदनाको धैर्यपूर्वक सह रहे थे। बाणोंकी जलनसे उनका सारा शरीर जल रहा था। वे शस्त्रोंके आघातसे मूर्च्छित-से हो रहे थे। उस समय उन्होंने राजाओंकी ओर देखकर केवल इतना ही कहा 'पानी' ।। १०-११ ।।

ततस्ते क्षत्रिया राजन्नुपाजहुः समन्ततः ।
भक्ष्यानुच्चावचान् राजन् वारिकुम्भांश्च शीतलान् ॥ १२ ॥
राजन्! तब वे क्षत्रियनरेश चारों ओरसे भोजनकी उत्तमोत्तम सामग्री और शीतल जलसे भरे हुए घड़े ले आये ।। १२ ।।

उपानीतं तु पानीयं दृष्ट्वा शान्तनवोऽब्रवीत् ।
नाद्यातीता मया शक्या भोगाः केचन मानुषाः ॥ १३ ॥
अपक्रान्तो मनुष्येभ्यः शरशय्यां गतो ह्यहम् ।
प्रतीक्षमाणस्तिष्ठामि निवृत्तिं शशिसूर्ययोः ॥ १४ ॥
उनके द्वारा लाये हुए उस जलको देखकर शान्तनुनन्दन भीष्मने कहा—'अब मैं मनुष्यलोकके कोई भी भोग अपने उपयोगमें नहीं ला सकता, मैं उन्हें छोड़ चुका हूँ। यद्यपि यहाँ बाणशय्यापर सो रहा हूँ, तथापि मनुष्यलोकसे ऊपर उठ चुका हूँ। केवल सूर्य-चन्द्रमाके उत्तरपथपर आनेकी प्रतीक्षांमें यहाँ रुका हुआ हूँ' ।। १३-१४ ।।

एवमुक्त्वा शान्तनवो निन्दन् वाक्येन पार्थिवान् ।
अर्जुनं द्रष्टुमिच्छामीत्यभ्यभाषत भारत ॥ १५ ॥

भारत! ऐसा कहकर शान्तनुनन्दन भीष्मने अपनी वाणीद्वारा अन्य राजाओंकी निन्दा करते हुए कहा—'अब मैं अर्जुनको देखना चाहता हूँ' ।। १५ ।।
अथोपेत्य महाबाहुरभिवाद्य पितामहम् ।
अतिष्ठत् प्राञ्जलिः प्रह्वः किं करोमीति चाब्रवीत् ।। १६ ।।
तब महाबाहु अर्जुन पितामह भीष्मके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़े खड़े हो गये और विनयपूर्वक बोले—'मेरे लिये क्या आज्ञा है, मैं कौन-सी सेवा करूँ?' ।। १६ ।।
तं दृष्ट्वा पाण्डवं राजन्नभिवाद्याग्रतः स्थितम् ।
अभ्यभाषत धर्मात्मा भीष्मः प्रीतो धनंजयम् ।। १७ ।।
राजन्! प्रणाम करके आगे खड़े हुए पाण्डुपुत्र अर्जुनको देखकर धर्मात्मा भीष्म बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले— ।। १७ ।।
दह्यतीव शरीरं मे संवृतस्य तवेषुभिः ।
मर्माणि परिदूयन्ते मुखं च परिशुष्यति ।। १८ ।।
'अर्जुन! तुम्हारे बाणोंसे मेरे सम्पूर्ण अंग बिंधे हुए हैं; अतः मेरा यह शरीर दग्ध-सा हो रहा है। सारे मर्मस्थानोंमें अत्यन्त पीड़ा हो रही है। मुँह सूखता जा रहा है ।। १८ ।।
वेदनार्तशरीरस्य प्रयच्छापो ममार्जुन् ।
त्वं हि शक्तो महेष्वास दातुमापो यथाविधि ।। १९ ।।
'महाधनुर्धर अर्जुन! वेदनासे पीड़ित शरीरवाले मुझ वृद्धको तुम पानी लाकर दो। तुम्हीं विधिपूर्वक मेरे लिये दिव्य जल प्रस्तुत करनेमें समर्थ हो' ।। १९ ।।
अर्जुनस्तु तथेत्युक्त्वा रथमारुह्य वीर्यवान् ।
अधिज्यं बलवत् कृत्वा गाण्डीवं व्याक्षिपद् धनुः ।। २० ।।
तब 'बहुत अच्छा' कहकर पराक्रमी अर्जुन रथपर आरूढ़ हो गये और गाण्डीव धनुषपर बलपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ाकर उसे खींचने लगे ।। २० ।।
तस्य ज्यातलनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः ।
वित्रसुः सर्वभूतानि सर्वे श्रुत्वा च पार्थिवाः ।। २१ ।।
उनके धनुषकी टंकारध्वनि वज्रकी गड़गड़ाहटके समान जान पड़ती थी। उसे सुनकर सभी प्राणी और समस्त भूपाल डर गये ।। २१ ।।
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा रथेन रथिनां वरः ।
शयानं भरतश्रेष्ठं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ।। २२ ।।
संधाय च शरं दीप्तमभिमन्त्र्य स पाण्डवः
पर्जन्यास्त्रेण संयोज्य सर्वलोकस्य पश्यतः ।। २३ ।।
अविध्यत् पृथिवीं पार्थः पार्श्वे भीष्मस्य दक्षिणे ।