लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
विभाषा ङिश्यो (२४८) से अन् के अकार का विकल्प से लोप हो जाता है—
अह्नी, अहनी।
अहन् + जस् = अहन् + शि। यहां सर्वनामस्थाने० (१७७) से उपधादीर्घ हो
कर—अहानि। भसञ्ज्ञा न होने से अन् के अकार का लोप न होगा।
अहन् + आ (टा)। भसञ्ज्ञा होकर अल्लोपोऽन (२४७) से अन् के अकार
का नित्य लोप हो जाता है—अह्ना।
अहन् + भ्याम्। यहां अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३६३) अहन् ।८।२।६८॥
अहन् इत्यस्य रुँ पदान्ते। अहोभ्याम्॥
अर्थ—पदान्त में 'अहन्' के नकार के स्थान पर रुँ आदेश हो जाता है।
व्याख्या—अहन् ।६।१। (यहां षष्ठी का लुक् हुआ है)। रुँ ।१।१। (ससजुषो
रुँ से)। पदस्य ।६।१। (अधिकृत है)। अन्ते ।७।१। (स्को० से) अथ—(पदस्य)
पद के (अन्त) अन्त में (अहन्) अहन् शब्द के स्थान पर (रुँ) रुँ आदेश हो जाता है।
अलोऽन्त्यविधि से यह आदेश अन्त्य अल्—नकार के स्थान पर होता है।
अहन् + भ्याम्। यहां प्रकृतसूत्र से नकार को रुँ आदेश होकर हशि च (१०७)
से उत्व तथा आद् गुण (२७) से गुण करने पर—अहोभ्याम्। इसी प्रकार—
अहोभि, अहोभ्यः।
अहन् + ङि (डि)। भसञ्ज्ञा होकर विभाषा ङिश्यो (२४८) से विकल्प कर
के अन् के अकार का लोप हो जाता है—अह्नि, अहनि।
अहन् + सुप्। रुँत्व विसर्ग होकर—अहःसु। वा शरि (१०४) से विकल्प
कर के विसर्ग तथा पक्ष में विसर्जनीयस्य सः (६६) से विसर्ग के स्थान पर सकार
आदेश होकर—अहःसु अहस्सु। रूपमाला यथा—
प्रथमा अहः अह्नी, अहनी अहानि
द्वितीया ,, ,, ,,
तृतीया अह्ना अहोभ्याम् अहोभि
चतुर्थी अह्ने ,, अहोभ्य
पञ्चमी अह्नः ,, ,,
षष्ठी ,, अह्नोः अह्नाम्
सप्तमी अह्नि, अहनि ,, अहःसु, अहस्सु
सम्बोधन हे अहः ! हे अह्नी, अहनी ! हे अहानि !
[लघु०] दण्डि॥
व्याख्या—दण्डोऽस्यास्तीति—दण्डी (कुलम्)। अत इनिठनौ (११८४)।
दण्डिन् + सुं। यहां स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सु का लुक् होकर—न लोप०
(१८०) से नकार का भी लोप हो जाता है—दण्डि।
हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ४६६
हे दण्डिन् + सुं । सुं का लुक् होकर नकारलोप प्राप्त होता है । इस पर अग्रिम-
वार्त्तिक से विकल्प होता है—
[लघु०] वा०—(३०) सम्बुद्धौ नपुंसकानां नलोपो वा वाच्यः ॥
हे दण्डिन् !, हे दण्ड ! । दण्डिनी । दण्डीनि । दण्डिना । दण्डिभ्याम् ॥
अर्थ:—सम्बुद्धि परे होने पर नपुंसकों के नकार का विकल्प से लोप हो ।
व्याख्या—'हे दण्डिन्' यहां प्रत्ययलक्षण द्वारा सम्बुद्धि के परे होने से नकार
का विकल्प कर के लोप हो जाता है । लोपपक्ष में—हे दण्ड !, लोपाभावपक्ष में—
हे दण्डिन् ! ।
दण्डिन् + औ = दण्डिन् + शी = दण्डिनी ।
दण्डिन् + अस् (जस्) = दण्डिन् + शि । सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७)
से उपधादीर्घ होकर—दण्डीनि¹ ।
दण्डिन् (दण्ड वाला कुल आदि) शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० दण्डि दण्डिनी दण्डीनि । प० दण्डिनः दण्डिभ्याम् दण्डिभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, । ष० ,, दण्डिनोः दण्डिनाम्
तृ० दण्डिना दण्डिभ्याम् दण्डिभिः । स० दण्डिनि ,, दण्डिषु
च० दण्डिने ,, दण्डिभ्यः सं० हे दण्डि,-न्! दण्डिनी दण्डीनि!
[लघु०] सुपथि । टेर्लोपः—सुपथी । सुपन्थानि ॥
व्याख्या—सुन्दराः पन्थानो यस्मिन् तत् सुपथि नगरम् । बहुव्रीहिसमासः ।
सुपथिन् + सुं । यहां 'दण्डिन्' के समान सुंलुक् तथा नकारलोप होकर—
सुपथि ।
सुपथिन् + औ = सुपथिन् + ई (शी) । भसञ्ज्ञा होकर भस्य टेर्लोपः (२६६)
से 'इन्' भाग का लोप हो जाता है—सुपथी ।
सुपथिन् + जस् = सुपथिन् + शि । यहां 'शि' की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा होकर
इतोऽत्सर्वनामस्थाने (२६४) से इकार को अकार तथा थो न्थः (२६५) सूत्र से थकार
को न्थ् आदेश हो जाता है । अत्र सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ
करने पर—सुपन्थानि ।
सुपथिन् (सुन्दर मार्गों वाला नगर आदि) शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० सुपथि सुपथी सुपन्थानि । प० सुपथः सुपथिभ्याम् सुपथिभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, । ष० ,, सुपथोः सुपथाम्
तृ० सुपथा सुपथिभ्याम् सुपथिभिः । स० सुपथि ,, सुपथिषु
च० सुपथे ,, सुपथिभ्यः सं० हे सुपथि,-न् ! सुपथी! सुपन्थानि !
(यहां नकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
――:०:――
१. यहां इन्हन्पूषार्यम्णां शौ (२८४) के नियम के कारण दीर्घनिषेध नहीं होता ।
५०० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
[लघु०] ऊर्क्, ऊर्ग् । ऊर्जी । ऊर्न्जि । नरजाना संयोगः ॥
व्याख्या—ऊर्ज् (बल वा तेज) । ऊर्ज बलप्राणनयोः (चु० उभ०) धातु से
क्विप् प्रत्यय करने पर उस का सर्वापहार लोप हो 'ऊर्ज्' शब्द निष्पन्न होता है ।
ऊर्ज् + सुँ । सुँ का लुक् होकर चोः कुः (३०६) द्वारा जकार को गकार तथा
वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक चत्त्व करने पर—ऊर्क्, ऊर्ग् ।
ऊर्ज् + औ = ऊर्ज् + शी = ऊर्जी ।
ऊर्ज् + जस् = ऊर्ज् + शि । यहां नपुंसकस्य झलचः (२३६) द्वारा अच् से
परे नुँम् आगम होकर—'ऊर्न्जि'¹ सिद्ध होता है । समग्र रूपमाला यथा—
प्र० ऊर्क्, ग् ऊर्जी ऊर्न्जि | पं० ऊर्जः ऊर्भ्याम् ऊर्भ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | ष० ,, ऊर्जोः ऊर्जाम्
तृ० ऊर्जा ऊर्भ्याम् ऊर्ग्भिः | स० ऊर्जि ,, ऊर्क्षु
च० ऊर्जे ,, ऊर्ग्यः | सं० हे ऊर्क्,-ग् । ऊर्जी । ऊर्न्जि ।
(यहाँ जकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
[लघु०] तत् । ते । तानि । यत् । ये । यानि । एतत् । एते । एतानि ॥
व्याख्या—तद् + सुँ । सुँ का लुक् हो वैकल्पिक चत्त्व करने से—तत्, तद् ।
ध्यान रहे कि यहां सुँ का लुक् हो जाने से तदोः सः सौ (३१०) द्वारा तकार को सकारा-
देश नहीं होता । इसी प्रकार एतद् शब्द में भी समझ लेना चाहिये ।
तद् + औ । त्यदाद्यत्व, पररूप, 'औ' को शी कर गुण करने से—ते ।
तद् + जस् । त्यदाद्यत्व, पररूप, जस् को शि आदेश, नुँम् आगम और उपधा-
दीर्घ होकर—तानि । द्वितीया में भी इसी प्रकार होता है । शेष पूर्ववत् जानें ।
'तद्' (वह) शब्द की नपुंसकलिंग में रूपमाला यथा—
प्र० तत्, तद् ते तानि | पं० तस्मात्, द् ताभ्याम् तेभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | ष० तस्य तयोः तेषाम्
तृ० तेन ताभ्याम् तैः | स० तस्मिन् ,, तेषु
च० तस्मै ,, तेभ्यः | सम्बोधन नहीं होता ।
इसी प्रकार नपुंसकलिंग में यद् (जो) शब्द की रूपमाला यथा—
१ 'ऊर्ज्नि' लिखने वाले सावधान रहें । क्योंकि वैसा लिखने से रेफ सब से पहले पढ़ा
जायेगा, जैसे—'कार्त्स्न्य' आदि में होता है । परन्तु हमें नकार (नुँम्) का पाठ
रेफ से पूर्व करना इष्ट है । अतः 'ऊर्न्जि' इस ढंग से ही लिखना चाहिये । ग्रन्थ-
कार ने भी लेखकों की इस भ्रान्ति की ओर ध्यान देते हुए—नरजानां संयोग
(नकार, रेफ और जकार का संयोग है) ऐसा स्पष्ट लिख दिया है । अत एव
रेफ का बीच में व्यवधान पड़ने से नकार को णत्व नहीं होता ।
हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ५०१
प्र० यत्-द् ये यानि | प० यस्मात्-द् याभ्याम् येभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | ष० यस्य ययोः येषाम्
तृ० येन याभ्याम् यैः | स० यस्मिन् ,, येषु
च० यस्मै ,, येभ्यः सम्बोधन नहीं होता।
इसी प्रकार नपुंसकलिङ्ग में 'एतद्' (यह) शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० एतत्-द् एते एतानि | प० एतस्मात्-द् एताभ्याम् एतेभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | ष० एतस्य एतयोः एतेषाम्
तृ० एतेन एताभ्याम् एतैः | स० एतस्मिन् ,, एतेषु
च० एतस्मै ,, एतेभ्यः सम्बोधन नहीं होता।
(यहां दकारान्त नपुंसक-शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
—:: o ::—
[लघु०] गवाक्। गोची। गवाञ्चि। पुनस्तद्वत्। गोचा। गवाग्भ्याम्॥
व्याख्या—गो अञ्च् (गो के पीछे चलने वाला कुल आदि)।
गामञ्चतीति—गवाक्। 'गो' कर्म उपपद होने पर गत्यर्थक अञ्चुं (भ्वा० प०)
धातु से ऋत्विग्दधृक्० (३०१) सूत्र से क्विन्-प्रत्यय, उस का सर्वापहारलोप, अनिदि-
ताम्० (३३४) से उपधा के नकार का लोप होकर—गो अच्। अब इस से स्वादि
प्रत्यय उत्पन्न होते हैं—
'सुं' में—गो अच् + सु्। स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुं का लुक्, क्विन्-प्रत्य-
यस्य कुः (८.२.६२) के असिद्ध होने से चोः कुः (८.२.३०) द्वारा चकार को ककार
होकर जश्त्व-चर्त्व प्रक्रिया करने से—'गो अक्, गो अग्'। अब 'गो' शब्द के ओकार
तथा 'अक्' शब्द के अकार के मध्य तीन प्रकार की सन्धि [अवङ् स्फोटायनस्य (४७)
से वैकल्पिक अवङ् हो कर सवर्णदीर्घ, अवङ्-अभाव में सर्वत्र विभाषा गोः (४४) से
वैकल्पिक प्रकृतिभाव, प्रकृतिभाव के अभाव में एङः पदान्तादति (४३) से पूर्वरूप]
होने से छः रूप सिद्ध होते हैं। यथा— (अवङ्पक्ष में) १. गवाक्, २. गवाग् । (प्रकृति-
भावपक्ष में) ३. गोअक्, ४. गोअग्। (पूर्वरूपपक्ष में) ५. गोऽक्, ६. गोऽग्।
'औ' में—गो अच् + औ। यहां नपुंसकाच्च (२३५) से 'औ' को शी, अनुबन्ध-
लोप, यचि भम् (१६५) से भसञ्ज्ञा तथा अचः (३३५) सूत्र से अकार का लोप
होकर—'गोची' यह एक ही रूप सिद्ध होता है। इस प्रकार गति अर्थ में भसञ्ज्ञा के
सब स्थलों में यही बात समझनी चाहिये।
'जस्' में—गो अच् + जस्। जश्शसोः शिः (२३७) से जस् को शि आदेश,
उस की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा होकर उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः (२८६) सूत्र से नुँम्
आगम, नश्चापदान्तस्य झलि (७८) से नकार को अनुस्वार, अनुस्वारस्य ययि पर-
सवर्णः (७६) से परसवर्ण ञकार तथा उपर्युक्त तीनों प्रकार की सन्धि करने से—
गवाञ्चि, गोअञ्चि, गोऽञ्चि ये तीन रूप सिद्ध होते हैं।
द्वितीया विभक्ति में भी प्रथमावत् प्रक्रिया होती है।
५०२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
'टा' मे—गो अच् + आ (टा)। भसञ्ज्ञा होकर अच.(३३५) से अकार का
लोप हो जाता है—गोचा।
भ्याम्' मे—गो अच् + भ्याम्। यहा भसञ्ज्ञा न होने से अकारलोप नही
होता। पदान्त म चोः कु (३०६) द्वारा कुत्व-ककार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से
उसे गकार करने पर तीन प्रकार की सन्धि हो जाती है—१. गवाग्भ्याम्, २. गो-
अग्भ्याम्, ३. गोऽग्भ्याम्। इसी प्रकार—भिस्, भ्यस् और सुप् मे तीन २ रूप बना
लेने चाहिये। सुप् मे खरि च (७४) से चर्त्व विशेष है।
गतिपक्ष मे 'गोअञ्च्' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० गवाक्,-ग्⎫ ㅤㅤ ⎧ गवाञ्चि ⎹ प० गोच ㅤ गवाग्भ्याम् ㅤ गवाग्भ्य
ㅤㅤगोअक्,-ग्⎬ गोची ⎨ गोअञ्चि ⎹ ㅤㅤㅤ ㅤ गोअग्भ्याम् ㅤ गोअग्भ्य
ㅤㅤगोऽक्,-ग्⎭ ㅤㅤ ⎩ गोऽञ्चि ⎹ ㅤㅤㅤ ㅤ गोऽग्भ्याम् ㅤ गोऽग्भ्यः
द्वि० गवाक्,-ग्⎫ ㅤㅤ ⎧ गवाञ्चि ⎹ ष० गोच ㅤㅤ गोचो ㅤㅤㅤगोचाम्
ㅤㅤगोअक्,-ग्⎬ गोची ⎨ गोअञ्चि ⎹ स० गोचि⎫ ㅤㅤㅤㅤ ⎧ गवाक्षु†
ㅤㅤगोऽक्,-ग्⎭ ㅤㅤ ⎩ गोऽञ्चि ⎹ ㅤㅤ ㅤ ⎬ ㅤ ㅤ " ㅤㅤ⎨ गोअक्षु
ㅤㅤ ㅤㅤㅤ ㅤㅤ ㅤㅤㅤ ㅤ ⎹ ㅤㅤ ㅤ ⎭ ㅤㅤㅤㅤ ⎩ गोऽक्षु
तृ० गोचा⎫ ㅤगवाग्भ्याम् ㅤ ⎧ गवाग्भि ⎹ स० हे गवाक्,-ग् ! ⎫ ㅤहे ㅤ ⎧ हे गवाञ्चि
ㅤㅤ ㅤ ⎬ ㅤगोअग्भ्याम् ㅤ ⎨ गोअग्भिः ⎹ ㅤ हे गोअक्,-ग् ! ⎬ गोची ! ⎨ हे गोअञ्चि
ㅤㅤ ㅤ ⎭ ㅤगोऽग्भ्याम् ㅤ ⎩ गोऽग्भि ⎹ ㅤ हे गोऽक्,-ग् ! ⎭ ㅤ ㅤ ⎩ हे गोऽञ्चि !
ㅤㅤ ㅤ ㅤㅤ ㅤ ㅤㅤ ㅤ ㅤ ⎹ † यहा खरि च (७४) से हुआ चर्त्व
च० गोचे ⎫ ㅤगवाग्भ्याम् ⎧ गवाग्भ्य ⎹ झयो द्वितीया० (वा० १४) की दृष्टि मे
ㅤㅤ ㅤ ⎬ ㅤगोअग्भ्याम् ⎨ गोअग्भ्यः ⎹ असिद्ध है अतः चय् न होने से गकार
ㅤㅤ ㅤ ⎭ ㅤगोऽग्भ्याम् ⎩ गोऽग्भ्य ⎹ आदेश नही होता।
ये सब रूप गत्यर्थक 'अञ्चु' धातु के हैं। यदि 'अञ्चु' धातु पूजार्थक होगी तो
निम्नप्रकारेण प्रक्रिया होगी—
गो अञ्च् (गाय की पूजा करने वाला)। 'गो' कर्मोपपद 'अञ्चु' धातु मे
क्विन्, उस का सर्वापहारलोप, नाञ्चेः पूजायाम् (३४१) से नकार के लोप का निषेध
हो जाता है। अब प्रातिपदिकसञ्ज्ञा होकर स्वादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं—
'सु' मे—गो अञ्च् + सुं। स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुं का लुक्, संयोगा-
न्तस्य लोप (२०) सूत्र से संयोगान्त चकार का लोप; निमित्तापाये नैमित्तिकस्या-
प्यपायः के न्यायानुसार ञकार को पुनः नकार तथा उसे क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४)
सूत्र से ङकार करने पर—'गो अङ्'। अब तीन प्रकार की सन्धि करने मे—'१.
गवाङ्, २ गोअङ्, ३ गोऽङ्' ये तीन रूप सिद्ध होते हैं।
'औ' मे—गो अञ्च् + औ। नपुंसकाच्च (२६५) सूत्र से 'औ' को शी आदेश
होकर तीन प्रकार की सन्धि करने से—'१. गवाञ्ची, २. गोअञ्ची, ३. गोऽञ्ची' ये
हल्न्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ५०३
तीन रूप सिद्ध होते हैं। ध्यान रहे कि लुप्तनकार अञ्चु न होने से अचः (३३५) से
अकार का लोप न होगा। इसी प्रकार भत्व में सर्वत्र जानना चाहिये।
'जस्' में—गो अञ्च्+जस्। जस् को शि आदेश होकर नकारलोप न होने
के कारण सर्वनामस्थान परे होने पर भी उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः (२८६) से
नुँम् आगम नहीं होता। नपुंसकस्य झलचः (२३६) से भी नुँम् न होगा, क्योंकि वहां
पर 'अचः परस्यैव झलो नुम्विधानम्' यह व्यवस्था की गई है। अब तीन प्रकार की
सन्धि करने से—१. गवाञ्चि, २. गोअञ्चि, ३. गोऽञ्चि—ये तीन रूप सिद्ध
होते हैं।
द्वितीया विभक्ति में भी प्रथमावत् प्रक्रिया होती है।
'टा' में—गो अञ्च्+आ (टा)। नकार का लोप न होने के कारण अचः
(३३५) सूत्र प्रवृत्त नहीं होता। केवल तीन प्रकार की सन्धि करने से—१. गवाञ्चा,
२. गोअञ्चा, ३. गोऽञ्चा—ये तीन रूप सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार—ङे, ङसिँ, ङस्,
ओस्, आम् और ङि में प्रक्रिया होती है।
'भ्याम्' में—गो अञ्च्+भ्याम्। संयोगान्तस्य लोपः (२०) सूत्र से चकार-
लोप, निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः के न्यायानुसार ञकार को नकार तथा क्विं-
न्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से उसे ङकार होकर तीन प्रकार की सन्धि करने से—१.
गवाङ्भ्याम्, २. गोअङ्भ्याम्, ३. गोऽङ्भ्याम्—ये तीन रूप सिद्ध होते हैं। इसी
प्रकार—भिस् और भ्यस् में भी प्रक्रिया होती है।
'सुप्' में - गो अञ्च्+सुप्। संयोगान्तलोप, ञकार को नकार तथा क्विन्प्रत्य-
यस्य कुः(३०४)से नकार को ङकार होकर—गोअङ्+सु। आदेश-प्रत्यययोः (१५०)
से षत्व, इणोः कुँक् टुँक् शरि (८६) सूत्र से वैकल्पिक कुँक् आगम करने पर तीनों
प्रकार की सन्धि हो जाती है—
अवङ्पक्ष में —— { गवाङ्क्षु, गवाङ्षु। }
प्रकृतिभावपक्ष में— { गोअङ्क्षु गोअङ्षु। }
पूर्वरूपपक्ष में—— { गोऽङ्क्षु, गोऽङ्षु। }
पूजापक्ष में 'गोअञ्च्' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० गवाङ् ⎬ गवाञ्ची ⎧ गवाञ्चि | तृ० गवाञ्चा ⎬ गवाङ्भ्याम् ⎧ गवाङ्गिः
गोअङ् ⎨ गोअञ्ची ⎨ गोअञ्चि | गोअञ्चा ⎨ गोअङ्भ्याम् ⎨ गोअङ्गिः
गोऽङ् ⎭ गोऽञ्ची ⎩ गोऽञ्चि | गोऽञ्चा ⎭ गोऽङ्भ्याम् ⎩ गोऽङ्गिः
द्वि० गवाङ् ⎬ गवाञ्ची ⎧ गवाञ्चि | च० गवाञ्चे ⎬ गवाङ्भ्याम् ⎧ गवाङ्ग्यः
गोअङ् ⎨ गोअञ्ची ⎨ गोअञ्चि | गोअञ्चे ⎨ गोअङ्भ्याम् ⎨ गोअङ्ग्यः
गोऽङ् ⎭ गोऽञ्ची ⎩ गोऽञ्चि | गोऽञ्चे ⎭ गोऽङ्भ्याम् ⎩ गोऽङ्ग्यः
१. यहाँ पक्ष में चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम् (वा० १४) से षकार
को वर्गद्वितीय—खकार हो जाता है। इस से सुप् में तीन रूप और बढ़ कर नौ
रूप हो जाते हैं।
५०४ · भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
५० गवाङ्च \ } गवाङ्भ्याम् \ } गवाङ्भ्य \ | ष० गवाङ्च \ } गवाङ्चो \ } गवाञ्चाम्
\ \ \ गोअञ्च \ } गोअड्भ्याम् \ } गोअड्भ्यः \ | \ \ \ गोअञ्च \ } गोअञ्चो \ } गोअञ्चाम्
\ \ \ गोऽञ्च \ } गोऽड्भ्याम् \ } गोऽड्भ्य \ | \ \ \ गोऽञ्च \ } गोऽञ्चो \ } गोऽञ्चाम्
\ \ \ \ \ स० गवाङ्चि \ } गवाङ्चो \ } { गवाङ्ख्पु, गवाङ्क्षु, गवाङ्पु
\ \ \ \ \ \ \ \ गोअञ्चि \ } गोअञ्चो \ } { गोअड्ख्पु, गोअड्क्षु, गोअड्पु
\ \ \ \ \ \ \ \ गोऽञ्चि \ } गोऽञ्चो . \ } { गोऽट्पु, गोऽड्क्षु, गोऽट्पु
स० सम्बोधन मे प्रथमावत् रूप बनते हैं ।
तो इस प्रकार गतिपक्ष मे ४६ रूप तथा पूजापक्ष मे ६६ रूप अर्थात् कुल
मिलाकर ४६ + ६६ = ११५ रूप बनते हैं। जस् और शस् मे पूजा और गति दोनो
पक्षो मे एक समान रूप बनते हैं, अतः एक सौ पन्द्रह रूपो मे छ रूप घटा देने पर —
११५ - ६ = १०६ रूप अवशिष्ट रहते हैं¹ । यद्यपि पूजापक्ष मे सुप् मे चयो द्वितीयाः०
वार्त्तिक से वर्गद्वितीय आदेश होने से तीन रूप और बढ कर एक सौ बारह रूप होते
हैं, तथापि यहा सूत्रकार के मतानुसार एक सौ नौ (१०६) रूपो का परिगणन सम-
झना चाहिये । इस शब्द पर एक रोचक प्रश्नोत्तर बहुत प्रसिद्ध है । तथाहि—
प्रश्न —
$$
जायन्ते नव सौ, तथाऽमि च नव, भ्याम्भिर्भ्यसा सङ्गमे
षट्सङ्ख्यानि, नवेव सुप्यथ जसि त्रीण्येव तद्वच्छसि ।
चत्वार्यन्यवचस्सु कस्य विबुधा ! शब्दस्य रूपाणि तज्-
ज्ञानन्तु प्रतिभास्ति चेन्निगदितुं षाण्मासिकोऽत्रावधिः ॥
$$
$\begin{aligned} &शार्दूलविक्री-
&डितम् \end{aligned}$
भावार्थ.— हे बुधजनो ! यदि आप मे बुद्धि है तो हम आपको छ मास का
अवसर प्रदान करते हैं आप उस शब्द को जानने का प्रयत्न करे जिस के सुं अम् और
सुप् मे नौ नौ, भ्याम्, भ्यस् और भिस् मे छ छ, जस् और शस् मे तीन-तीन तथा
अन्यवचनो मे चार-चार रूप बनते हैं ।
उत्तर — गवाञ्चशब्दस्य रूपाणि क्लीबेऽर्चागतिमभेदतः ।
\ \ \ \ \ \ \ असन्ध्यवड्पूर्वरूपैर्नवाधिकशतं (१०६) मतम् ॥१॥
भावार्थ.—नपुंसकलिङ्ग मे गति और पूजा के भेद से तथा प्रकृतिभाव, अवङ्
और पूर्वरूप के कारण गोपूर्वक क्विबन्त अञ्चु के एक सौ नौ रूप होते हैं। तथाहि—
\ \ \ \ \ \ \ स्वम्सुप्सु नव षड् भावौ षट्के स्युस्त्रीणि जदशसोः ।
\ \ \ \ \ \ \ चत्वारि शेषे दशके रूपाणीति विभावय ॥२॥
¹ यद्यपि तीन भ्याम् प्रत्ययो, दो भ्यस् प्रत्ययो एव पञ्चमी षष्ठी तथा इतर विभ-
क्तियों मे भी रूपो के एक जैसा होने से एक सौ नौ (१०६) रूप युक्त नही कहे
जा सकते, तथापि यहा—उसी एक विभक्ति मे यदि रूपो की समानता पाई जाये
तो उसे एक रूप मानना चाहिये, इतरेतर विभक्तियों मे नही—यह अभिप्राय
इष्ट होने मे कोई दोष नही आता । किञ्च यहा सम्बोधन के रूपो के परिगणन
का प्रश्न नही उठाना चाहिये, क्योकि सम्बोधन विभक्ति तो विशेष प्रकार की
प्रथमा ही होती है [सम्बोधने च (८८६)] ।
हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ५०५
भावार्थः—इस शब्द के सुं, अम् तथा सुप् में नौ नौ, भ्याम् भिस् आदि छः
भकारादियों में छः छः, जस् शस् में तीन-तीन तथा शेष दसों में चार-चार रूप
होते हैं।
(यहां चकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन होता है।)
—:: o ::—
[लघु०] शकृत् । शकृती । शकृन्ति ॥
व्याख्या- शकृत् (विष्ठा) । उच्चारावस्करौ शमलं शकृत् इत्यमरः ।
शकृत् + सुं । स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुं का लुक् होकर जश्त्व-चर्त्व
प्रक्रिया करने से—शकृत्, शकृद् ।
शकृत् + औ = शकृत् + शी = शकृती । -
शकृत् + जस् = शकृत् + शि । झलन्त होने से नपुंसकस्य झलचः (२३६) से
नुँम् आगम, अनुस्वार और परसवर्ण करने पर—शकृन्ति । रूपमाला यथा—
प्र० शकृत्-द् शकृती शकृन्ति | प० शकृतः शकृद्भ्याम् शकृद्भ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | ष० ,, शकृतोः शकृताम्
तृ० शकृता शकृद्भ्याम् शकृद्भिः | स० शकृति ,, शकृत्सु
च० शकृते ,, शकृद्भ्यः | सं० हे शकृत्-द्! हे शकृती! हे शकृन्ति!
इसी प्रकार—यकृत् (जिगर) प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं।¹
[लघु०] ददत् । ददती ॥
व्याख्या- ददत् (देता हुआ कुल आदि) । शत्रन्तोऽयम् ।
ददत् + सुं । सुं का लुक् होकर जश्त्व-चर्त्व-प्रक्रिया से—ददत्, ददद् ।
ददत् + औ = ददत् + शी = ददती ।
ददत् + जस् = ददत् + शि = ददत् + इ । यहां उगिदचां० (२८६) सूत्र
द्वारा अथवा नपुंसकस्य झलचः (२३६) सूत्र द्वारा नित्य नुँम् का आगम प्राप्त
होता है, परन्तु उसे अभ्यस्तम् (३४४) से अभ्यस्तसञ्ज्ञा होकर नाभ्यस्ताच्छतुः
(३४५) द्वारा उस का निषेध हो जाता है। अब वैकल्पिक नुँम् करने के लिये अग्रिम-
सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम् —(३६४) वा नपुंसकस्य ।७।१।७६॥
अभ्यस्तात् परो यः शता तदन्तस्य क्लीबस्य वा नुँम् सर्वनामस्थाने ।
ददन्ति, ददति ॥
अर्थः—अभ्यस्तसञ्ज्ञक से परे जो शतृँ प्रत्यय तदन्त नपुंसकलिङ्ग को सर्व-
नामस्थान परे होने पर विकल्प से नुँम् का आगम हो जाता है ।
१. पद्-दन्-नो-मास्-हृत्-निश्र्-असन्-यूषन्-दोषन्-यकन्-शकन्-उदन्-आसन् शस्प्रभृ-
तिषु (६.१.६१) सूत्रद्वारा शस् आदि विभक्तियों में यकृत् को यकन् तथा शकृत्
को शकन् ये वैकल्पिक आदेश भी हो जाते हैं। इन का विवेचन सिद्धान्त-कौमुदी
में देखें ।
व्याख्या—अभ्यस्तात् ।५।१। शतुः ।६।१। (नाभ्यस्ताच्छतुः से)। नपुंसकस्य
।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (अधिकृत है)। वा इत्यव्ययपदम्। नुँम् ।१।१। (इदितो नुम्
धातोः से)। सर्वनामस्थाने ।७।१। (उगिदचां सर्वनामस्थाने० से)। अर्थ—(अभ्य-
स्तात्) अभ्यस्तसञ्ज्ञक से परे (शतुः) जो शतृँ प्रत्यय, तदन्त (नपुंसकस्य) नपुंसक
(अङ्गस्य) अङ्ग का अवयव (वा) विकल्प कर के (नुँम्) नुँम् हो जाता है (सर्वनाम-
स्थाने) सर्वनामस्थान परे हो तो।
ददत् + इ। यहां 'शि' यह सर्वनामस्थान परे है, अभ्यस्त होने से'नाभ्यस्ताच्छतुः
(३४५) से नुँम्निषेध प्राप्त था, पर नपुंसकत्व में प्रवृत्तसूत्र से विकल्प से नुँम् का
आगम होकर अनुस्वार-परसवर्ण करने से—'ददन्ति, ददति' ये दो रूप बनते हैं। नपुं-
सक में 'ददत्' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० ददत्,-द् ददती ददन्ति,ददति पं० ददतः ददद्भ्याम् ददद्भ्यः
द्वि० ,, ,, ,, ष० ,, ददतोः ददताम्
तृ० ददता ददद्भ्याम् ददद्भिः स० ददति ,, ददत्सु
च० ददते ,, ददद्भ्यः सं० सम्बोधन प्रथमावत् होता है।
[लघु०] तुदन् ॥
व्याख्या—तुदत् (दुःख देता हुआ कुल आदि)। शत्रन्त।
तुदँ व्यथने (तुदा० उभं०) धातु से शतृँ प्रत्यय, उस की सार्वधातुकसञ्ज्ञा,
तुदादिभ्यः शः (६५१) से श प्रत्यय, अनुबन्धलोप और अतो गुणे (२७४) से पररूप
एकादेश करने से—'तुदत्' शब्द निष्पन्न होता है।
तुदत्+सुँ। स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुँ का लुक् होकर जश्त्व-चर्त्व करने
से—तुदत्, तुदद्।
तुदत्+औ=तुदत्+ई (शी)। यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधिसूत्रम्—(३६५) आच्छीनद्योर्नुम् ।७।१।८०॥
अवर्णान्तादङ्गात्परो यः शतुरवयवस्तदन्तस्य नुँम् वा शीनद्योः।
तुदन्ती, तुदती। तुदन्ति॥
अर्थः—अवर्णान्त अङ्ग से परे जो शतृँ प्रत्यय का अवयव तदन्त अङ्ग को
विकल्प करके नुँम् का आगम हो जाता है शी या नदी परे हो तो।
व्याख्या—आत् ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य इस अधिकृत का विभक्ति-
विपरिणाम हो जाता है)। शतुः ।६।१। (नाभ्यस्ताच्छतुः से)। अङ्गस्य ।६।१। (अधि-
कृत है)। वा इत्यव्ययपदम्। (वा नपुंसकस्य से)। नुँम् ।१।१। शीनद्योः ।७।२। 'आत्'
यह 'अङ्गात्' का विशेषण है अतः इस से तदन्तविधि हो कर 'अवर्णान्तात्' बन जाता
है। अर्थः—(आत्=अवर्णान्तात्) अवर्णान्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (शतुः) जो शतृँ-
प्रत्यय का अवयव, तदन्त (अङ्गस्य) अङ्ग का अवयव (वा) विकल्प करके (नुँम्) नुँम्
हो जाता है (शीनद्योः) शी और नदी परे हो तो। 'नदी' से यहां ङीप् आदि इष्ट हैं।
हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ५०७
तुदत् + ई । यहां 'तुद्' यह अवर्णान्त अङ्ग है, इस से परे 'त्' यह शतृँ का
अवयव है । तदन्त अङ्ग 'तुदत्' है । इस से परे शी के रहने से विकल्प कर के नुँम् का
आगम हो जाता है । नुँम्-पक्ष में अनुस्वार परसवर्ण प्रक्रिया करने पर—तुदन्ती । नुँम्
के अभाव में—तुदती ।
तुदत् + जस् = तुदत् + शि । सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा होकर झलन्त होने से नपुंस-
कस्य झलचः (२३६) ने नुँम् का आगम हो कर अनुस्वार-परसवर्ण-प्रक्रिया करने
से—'तुदन्ति' प्रयोग सिद्ध होता है । सम्पूर्ण रूपमाला यथा—
प्र० तुदत्-द् तुदन्ती,तुदती तुदन्ति | प० तुदतः तुदद्भ्याम् तुदद्भ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | प० ,, तुदतोः तुदताम्
तृ० तुदता तुदद्भ्याम् तुदद्भिः | स० तुदति ,, तुदत्सु
च० तुदते ,, तुदद्भ्यः | सं० सम्बोधन प्रथमावत् होता है ।
प्रकृतसूत्र से भ्वादि, दिवादि, तुदादि, चुरादि शत्रन्त तथा अदादिगण की 'या,
पा' आदि आकारान्त शत्रन्त धातुओं से तथा स्य के आगे शतृँ प्रत्यय होने पर नपुं-
सक के द्विवचन शी में अङ्ग को वैकल्पिक नुँम् का आगम प्राप्त होता है । इस पर
भ्वादि, चुरादि तथा दिवादिगणीय शत्रन्त धातुओं को अग्रिमसूत्र द्वारा नित्य नुँम् का
विधान करते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३६६) शप्श्यनोर्नित्यम् ७।१।८१॥
शप्श्यनोरात् परो यः शतुरवयवस्तदन्तस्य नित्यं नुँम् शीनद्योः ।
पचन्ती । पचन्ति । दीव्यत् । दीव्यन्ती । दीव्यन्ति ॥
अर्थः– शप् वा श्यन् के अवर्ण से परे जो शतृँप्रत्यय का अवयव (त्), तदन्त
अङ्ग को नित्य नुँम् का आगम हो जाता है शी अथवा नदी¹ परे हो तो ।
व्याख्या—शप्श्यनोः ।६।२। आत् ।५।१। (आच्छीनद्योर्नुम् से) । शतुः ।६।१।
(नाभ्यस्ताच्छतुः से) । अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । नित्यम् ।२।१। (क्रिया-
विशेषणम्) । नुँम् ।१।१। (आच्छीनद्योर्नुम् से) । अर्थः–(शप्श्यनोः) शप् वा श्यन्
के (आत्) अवर्ण से परे (शतुः) जो शतृँ का अवयव, तदन्त (अङ्गस्य) अङ्ग का
अवयव (नित्यम्) नित्य (नुँम्) नुँम् हो जाता है (शीनद्योः) शी अथवा नदी परे
हो तो ।
भ्वादि और चुरादिगण में शप् तथा दिवादिगण में श्यन् विकरण हुआ करता
है। भ्वादि, चुरादि तथा दिवादिगणीय शत्रन्तों की इस सूत्र से शी या नदी (ङीप् आदि)
परे होने पर नित्य नुँम् का आगम हो जाता है ।
पचत् (पकाता हुआ कुल आदि) । पच् (डुपचँष् पाके) यह भ्वादिगणीय
उभयपदी धातु है । इस से परे लँट् को शतृँप्रत्यय तथा शप् विकरण हो कर—पच् शप्
१. नदी के उदाहरण 'भवन्ती, दीव्यन्ती' आदि हैं ।
५०८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
शतृँ = पच् अ अत् । अब यहां यस्मात्प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम् (१३३) सूत्र
द्वारा पच् + अ = 'पच' की अङ्गसञ्ज्ञा होकर अतो गुणे (२७४) से पररूप एकादेश
करने से 'पचत्' शब्द निष्पन्न होता है ।
पचत् + औ = पचत् + ई (शी) । यहां अन्तादिवच्च (४१) की सहायता से
'पच' की अङ्गसञ्ज्ञा हो जाती है । इस से परे 'त्' यह शतृँ-प्रत्यय का अवयव है,
तदन्त अङ्ग 'पचत्' है । इस से परे 'शी' के रहने से प्रकृतसूत्र द्वारा नित्य नुँम् का
आगम होकर अनुस्वारपरसवर्णप्रक्रिया हो जाती है—पचन्ती ।
पचत् + जस् = पचत् + शि । झलन्त होने से नुँम् का आगम और पूर्ववत्
अनुस्वारपरसवर्णप्रक्रिया करने से—'पचन्ति' प्रयोग सिद्ध होता है ।
'पचत्' शब्द की नपुंसक में रूपमाला यथा—
प्र० पचत्-द् पचन्ती पचन्ति । प० पचतः पचद्भ्याम् पचद्भ्यः
द्वि० „ „ „ । ष० „ पचतोः पचताम्
तृ० पचता पचद्भ्याम् पचद्भिः । स० पचति „ पचत्सु
घ० पचते „ पचद्भ्यः । सं० हे पचत्-द् ! पचन्ती ! पचन्ति !
इसी प्रकार—गच्छत् (जाता हुआ), चलत् (चलता हुआ), भवत् (होता
हुआ), नयत् (ले जाता हुआ), नमत् (नमस्कार करता हुआ), वदत् (बोलता हुआ)
इत्यादि भ्वादिगणीय तथा चोरयत् (चुराता हुआ) प्रभृति चुरादिगणीय धातुओं के
रूप भी समझ लेने चाहियें ।
दीव्यत् (खेलता हुआ वा चमकता हुआ कुल आदि) दिवुँ क्रीडाविजिगीषा०
(दिवा० प०) धातु से लँट्, शतृँ प्रत्यय तथा श्यन् विकरण होकर—दिव् + श्यन् +
शतृँ = दिव् य अत् । अब हलि च (६१२) से उपधादीर्घ तथा अतो गुणे (२७४) से
पररूप एकादेश करने पर 'दीव्यत्' शब्द निष्पन्न होता है ।
दीव्यत् + औ = दीव्यत् + ई (शी) । यहां श्यन् के यकारोत्तर अवर्ण से परे
शतृँ का अवयव तकार विद्यमान है, अतः तदन्त 'दीव्यत्' को शी परे होने पर नित्य
नुँम् का आगम होकर अनुस्वारपरसवर्णप्रक्रिया करने से—दीव्यन्ती ।
जस् में पूर्ववत्—दीव्यन्ति । 'दीव्यत्' की नपुंसक में रूपमाला यथा--
प्र० दीव्यत्-द् दीव्यन्ती दीव्यन्ति । प० दीव्यतः दीव्यद्भ्याम् दीव्यद्भ्यः
द्वि० „ „ „ । ष० „ दीव्यतोः दीव्यताम्
तृ० दीव्यता दीव्यद्भ्याम् दीव्यद्भिः । स० दीव्यति „ दीव्यत्सु
च० दीव्यते „ दीव्यद्भ्यः । सं० हे दीव्यत्-द् ! दीव्यन्ती ! दीव्यन्ति !
इसी प्रकार—सीव्यत् (सीता हुआ), अस्यत् (फेंकता हुआ), कुप्यत् (क्रोध
करता हुआ), शुष्यत् (शुद्ध होता हुआ) इत्यादि दिवादिगणीय शत्रन्तों के रूप होते हैं ।
शत्नन्तों पर विशेष स्मरणीय—
(१) अभ्यस्तसञ्ज्ञक शब्द। इस श्रेणी में ददत्, दधत्, जुह्वत्, बिभ्यत्,
हलन्त-नपुंसकालिङ्ग-प्रकरणम् ५०६
जाग्रत्, जक्षत्, दरिद्रत् प्रभृति शब्द आते हैं। इन शब्दों को 'शी' में नुम् का आगम
प्राप्त नहीं होता । 'शि' में वा नपुंसकस्य (३६४) से विकल्प कर के नुम् हो जाता है।
(२) शप् वा श्यन् विकरण के शत्रन्त । भ्वादि और चुरादिगणीय धातुओं से
शप्-विकरण तथा दिवादिगणीय धातुओं से श्यन्विकरण हुआ करता है। इन के शत्रन्तों
को शी तथा शि दोनों में नित्य नुम् का आगम हो जाता है। यथा - भवत्, भवन्ती,
भवन्ति । चोरयत्, चोरयन्ती, चोरयन्ति । दीव्यत्, दीव्यन्ती, दीव्यन्ति ।
(३) तुदादि, आकारान्त अदादि तथा लुटः सद्वा (८३५) के शत्रन्त । इन
से शी में आच्छीनद्योर्नुम् (३६५) द्वारा वैकल्पिक तथा शि में नपुंसकस्य झलचः
(३६६) से नित्य नुम् का आगम हो जाता है। यथा - तुदत्, तुदन्ती-तुदती, तुदन्ति ।
यान्ती-याती, यान्ति । भविष्यत्, भविष्यन्ती-भविष्यती, भविष्यन्ति ।
(४) उपर्युक्त गणों से भिन्नगणीय धातुओं के शत्रन्त । इस श्रेणी में 'शी' परे
नुम् आगम बिलकुल नहीं होता । 'शि' में झलन्तत्वात् नित्य नुम् होता है।
(स्वादिगणीय) मुष्णत्, मुष्णती, मुष्णन्ति । (तनादिगणीय) कुर्वत्, कुर्वती,
कुर्वन्ति ।
श्यन्त शप्तन्त शब्द उगित् हुआ करते हैं; अतः स्त्रीत्व की विवक्षा में उगितश्च
(१०५) सूत्र से ङीप् प्रत्यय होता है। ङीप् के अनुबन्धों का लोप होकर 'ई'
अवशिष्ट रह जाता है। यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से 'ई' की नदीसञ्ज्ञा है। तब
'शी' में जैसे २ नित्य वा वैकल्पिक नुम् होता है। वैसे २ नित्य वा वैकल्पिक नुम्
'ई' परे होने पर भी हो आता है। यथा-शप् और श्यन् विकरणीय धातुओं से
शी में नित्य नुम् होता है, तो नदीसञ्ज्ञक 'ई' में भी नित्य नुम् हो जायेगा।
तथाहि—
(नपुंसक 'शी' (औ) में) (नदीसञ्ज्ञक 'ई' अर्थात् स्त्रीलिङ्ग में)
श्यन्विकरणीय वा शब्विकरणीय { १ भवन्ती भवन्ती, भवन्त्यौ, भवन्त्यः । नदीवत्
२ नमन्ती नमन्ती, नमन्त्यौ, नमन्त्यः । "
३ पतन्ती पतन्ती, पतन्त्यौ, पतन्त्यः । "
४ चोरयन्ती चोरयन्ती, चोरयन्त्यौ, चोरयन्त्यः । "
५ गणयन्ती गणयन्ती, गणयन्त्यौ, गणयन्त्यः । "
६ दीव्यन्ती दीव्यन्ती, दीव्यन्त्यौ, दीव्यन्त्यः । "
७ अस्यन्ती अस्यन्ती, अस्यन्त्यौ, अस्यन्त्यः । "
८ श्राम्यन्ती श्राम्यन्ती, श्राम्यन्त्यौ, श्राम्यन्त्यः । "
तुदादिगणीय, आकारान्त अदादिगणीय तथा लुटः सद्वा (८३५) वाले शत्रन्तों
से 'शी' में वैकल्पिक नुम् होता है तो 'ई' में भी वैकल्पिक नुम् होगा । तथाहि —
तुदादि० { १. तुदन्ती, तुदती { तुदन्ती, तुदन्त्यौ, तुदन्त्यः । नदीवत्
{ तुदती, तुदत्यौ, तुदत्यः । "
{ २. लिखन्ती, लिखती { लिखन्ती, लिखन्त्यौ, लिखन्त्यः । "
{ लिखती, लिखत्यौ, लिखत्यः । "
५१० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
अब बालकों के अभ्यासार्थ नीचे कुछ शतृन्त अपने श्रेणीबोधक अङ्कसहित लिखे
जाते हैं—
१ चलत् (२), २ बिन्दत् (३), ३ जाग्रत् (१), ४ पठन् (२), ५ विशत्
(३) ६ शासत् (१), ७ लिखत् (३), ८ विश्राम्यत् (२), ६ विध्यत् (१), १०
ध्रुवत् (४), ११ दण्डयत् (२), १२ सृजत् (३), १३ दधत् (१), १४ मुञ्चत् (३),
१५ कुर्वत् (४), १६ कथयत (२) १७ नृत्यत् (२), १८ जुह्वत् (१), १६ सिञ्चत
(३), २० यात् (३) २१ करिष्यन् (३) ॥
(यहाँ तकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
[लघु०] धनुः । धनुषी । मान्त० (३४२) इति दीर्घ । नुम्विसर्जनी०
(३५२) इति ष । धनूंषि । धनुषा । धनुर्भ्याम् । एवम्—चक्षुर्हविरादयः। पचताम्
व्याख्या— धन धान्ये (जुहो० प०) अथवा धन शब्दे (भ्वा० पचतुम्
अपठित) धातु से अति-पॄ-वपि यजि तनि धनि-तपिभ्यो नित् (उणा० पचन्ती ! पचन्ति !
औणादिक उस प्रत्यय होकर आदेशप्रत्यययोः (१५०) से प्रत्यय षे [L14_right] १, भवत् (होना
करने से 'धनुष्' (कमान) शब्द निष्पन्न होता है। [L15_right] (बोलता हुआ)
आकारान्त अदा० { ३ यान्ती, याती { यान्ती, यान्त्यौ, यान्त्य । [L16_right] धातुओं के
[L17_left] { ४ पान्ती, पाती { पान्ती, पान्त्यौ, पान्त्य । [L17_right] शीपा०
[L18_left] { पाती, पात्यौ, पात्य । [L18_right] "
लुट्. सङ्घा { ५ करिष्यन्ती, करिष्यन्ती { करिष्यन्ती, करिष्यन्त्यौ, करिष्यन्त्य } "
उपयुक्त गणों से भिन्नगणीय शतृन्त धातुओं के 'शी' में नुम् नहीं होता अत
नदीसञ्ज्ञक 'ई' मे भी नुंम् न होगा । तथाहि—
क्रया० { १ अश्नती । अश्नती, अश्नत्यौ, अश्नत्य । } नदीवत्
{ २ मुष्णती । मुष्णती, मुष्णत्यौ, मुष्णत्य । } "
अदा० { ३ अदती । अदती, अदत्यौ, अदत्य । } "
{ ४ घ्नती । घ्नती, घ्नत्यौ, घ्नत्य । } "
जुहो० { ५ जुह्वती । जुह्वती, जुह्वत्यौ, जुह्वत्य । } "
{ ६ ददती । ददती, ददत्यौ, ददत्य । } "
स्वा० { ७ प्राप्नुवती । प्राप्नुवती, प्राप्नुवत्यौ, प्राप्नुवत्य । } "
{ ८ शृण्वती । शृण्वती, शृण्वत्यौ, शृण्वत्य । } "
तना० { ९ कुर्वती । कुर्वती, कुर्वत्यौ, कुर्वत्य । } "
{ १० तन्वती । तन्वती, तन्वत्यौ, तन्वत्य । } "
रुधा० { ११ जानती । जानती, जानत्यौ, जानत्य. । } "
{ १२ रुन्धती । रुन्धती, रुन्धत्यौ, रुन्धत्य । } "
हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ५११
धनुष् + स् (सुँ) । स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुँ का लुक् हो कर आदेश-
प्रत्यययोः (८.३.५६) द्वारा किये गये षत्व के असिद्ध होने से उसे सकार समझ कर
ससजुषो रुः (८.२.६६) से रुँ तथा रेफ को विसर्ग आदेश करने से—'धनुः' प्रयोग
सिद्ध होता है ।
धनुष् + औ । नपुंसकाच्च (२३५) से औ को शी आदेश हो कर अनुबन्धलोप
करने से—धनुष् + ई = धनुषी ।
धनुष् + जस् = धनुष् + इ (शि) । नपुंसकस्य झलचः (२३६) द्वारा नुँम् का
आगम और सान्तमहतः संयोगस्य (३४२) से सान्त संयोग के नकार की उपधा को
दीर्घ कर निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः से षकार को सकार हो कर—धनून्स्
- इ । अब नश्चाऽपदान्तस्य झलि (७८) से नकार को अनुस्वार तथा उनके व्यवधान
में नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि (३५२) द्वारा सकार को पुनः षत्व हो कर 'धनूंषि'
प्रयोग सिद्ध होता है ।
भ्याम्, भिस्, भ्यस् में षत्व के असिद्ध होने से ससजुषो रुः (१०५ से रुँत्व हो
कर रेफ का ऊर्ध्वगमन करने पर—धनुर्भ्याम्, धनुर्भिः, धनुर्भ्यः ।
धनुष् + सु (सुप्) । यहां षत्व के असिद्ध होने से उसे सकार समझ कर ससजुषो
रुः (१०५) से रुँत्व हो जाता है । अब रेफ को विसर्ग आदेश हो कर वा शरि (१०४)
से एक पक्ष में वैकल्पिक विसर्ग आदेश और दूसरे पक्ष में विसर्जनीयस्य सः (१०३)
से सकार आदेश हो जाता है—'धनुः सु, धनुस् सु' । अब प्रथम रूप में विसर्ग के
व्यवधान में तथा दूसरे रूप में शर्-सकार के व्यवधान में नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि
(३५२) सूत्र द्वारा प्रत्यय के सकार को षकार हो कर—धनुःषु, धनुस्सु । अब सकार-
पक्ष में ष्टुना ष्टुः (६४) से ष्टुत्वद्वारा प्रथम सकार को भी षकार करने से—'धनुःषु,
धनुष्षु' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं । 'धनुष्' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० धनुः धनुषी धनूंषि | प० धनुषः धनुर्भ्याम् धनुर्भ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | प० ,, धनुषोः धनुषाम्
तृ० धनुषा धनुर्भ्याम् धनुर्भिः | स० धनुषि ,, धनुःषु,-ष्षु
च० धनुषे ,, धनुर्भ्यः | सं० हे धनुः ! हे धनुषी ! हे धनूंषि !
इसी प्रकार—१. वपुष् = शरीर । २. हविष् = होम में प्रक्षेप्य घृतादि । ३.
चक्षुष् = नेत्र । ४. जनुष् = जन्म । ५. यजुष् = यजुर्वेद । ६. ज्योतिष् = नक्षत्र । ७.
आयुष् = आयु । ८. अरुष् = मर्म । ६. अर्चिष् = प्रकाश । १०. सर्पिष् = घृत । ११.
तनुष् = शरीर । इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं ।¹
१. कई वैयाकरण इन धनुष् आदि शब्दों को सकारान्त मान कर ही स्वादिप्रत्यय लाते
हैं और बाद में जहां-जहां सूत्रप्रवृत्ति हो सके षत्व कर लेते हैं । उन का कथन है
कि यदि इन को षकारान्त मान कर स्वादि प्रत्ययों की उत्पत्ति मानेंगे तो उणा-
दयोऽव्युत्पन्नानि प्रातिपदिकानि (परिभाषा)—इस अव्युत्पत्तिपक्ष में ससजुषो रुः
५१२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
[लघु०] पयः। पयसी। पयांसि। पयसा। पयोभ्याम् ॥
व्याख्या—पयस् (जल वा दूध)। पयः क्षीरं पयोऽम्बु च इत्यमरः।
पयस् + सुँ। सुंलुक् होकर रुत्व विसर्ग करने से—पयः।
पयस् + औ—पयस् + शी = पयस् + ई = पयसी।
पयस् + जस् - पयस् + इ (शि)। नपुंसकस्य झलचः (२३६) से नुँम् का
आगम, सान्तमहतः संयोगस्य (३४२) से उपधादीर्घ तथा नश्चापदान्तस्य झलि (७८)
से अनुस्वार होकर — पयांसि।
पयस् + भ्याम्। यहां ससजुषो रुः (१०५) से रुँत्व, हशि च (१०७) से उत्व
तथा आद् गुणः (२७) से गुण होकर—पयोभ्याम्। रूपमाला यथा—
प्र० पयः पयसी पयांसि पं० पयसः पयोभ्याम् पयोभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, ष० ,, पयसोः पयसाम्
तृ० पयसा पयोभ्याम् पयोभिः स० पयसि ,, पयस्सु,-स्सु
च० पयसे ,, पयोभ्यः सं० हे पयः ! हे पयसी ! हे पयांसि ! ।
इसी प्रकार निम्नलिखित शब्दों के रूप होते हैं—
शब्द—अर्थ शब्द—अर्थ शब्द—अर्थ
अनस् = छकड़ा छन्दस् = छन्द रहस् = एकान्त
अम्भस् = जल तपस् = तप रहस् = वेग
अयस् = लोहा तमस् = अन्धकार रेतस् = वीर्य
अर्णस् = जल तरस् = वेग रोधस् = तट
अर्शस् = बवासीर तेजस् = तेज वक्षस् = छाती
आगस् = अपराध नभस् = आकाश वचस् = वचन
उरस् = छाती पाथस् = जल वर्चस् = तेज
ऋक्षस् = चहूँटा मनस् = मन वयस् = आयु, पक्षी
एधस् = ईंधन महस् = तेज वासस् = कपड़ा
एनस् = पाप मदस् = चर्बी शिरस् = सिर
ओकस् १ = घर यशस् = यश श्रवस् = कान
ओजस् = बल, तेज यादस् = जलजन्तु सरस् = तालाब
अहस् = पाप रक्षस् = राक्षस स्रोतस् = झरना
चेतस् = चित्त रजस् = धूल सहस् = बल
(१०५) की प्रवृत्ति न हो सकेगी क्योंकि वहां सकार तो होगा नहीं षकार होगा।
अन्य लोगों का कथन है कि उणादयो बहुलम् (८४८) में 'बहुलम्' ग्रहण के
कारण सर्वप्रकार के व्यभिचारों की निवृत्ति हो जाती है कोई दोष नहीं आता।
अन्यथा षकारान्त मान कर भी अव्युत्पत्तिपक्ष में 'धनुषा, यजुषा' आदि में प्रत्यय
का अवयव न होने से आदेशप्रत्यययोः (१५०) से षत्व न हो सकेगा।
१ इसी का कूट प्रश्न पूछा जाता है—कदापुरोकसो भवन्तः ? । 'कदा-अगुः, ओकसो
भवन्' यह छेद है (आप घर में कब गये ?)।
ये ही शब्द जब बहुव्रीहि में किसी के विशेषण बन जायें, तब नपुंसकलिङ्ग में
तो उच्चारण इसी प्रकार होगा। परन्तु पुंल्लिङ्ग तथा स्त्रीलिङ्ग में 'वेधस्' के समान
उच्चारण होगा— प्रसन्नमनाः पुरुषः, प्रसन्नमनाः स्त्री। प्रसन्नमनसः पुमांसः स्त्रियो
वा। प्रसन्नमनसं पुमांसं स्त्रियं वा।
[लघु०] सुपुम्। सुपुंसी। सुपुमांसि ॥
व्याख्या—शोभनाः पुमांसो यस्मिन् तत् सुपुम् (कुलम्)। जिस कुल या नगर
आदि में सुन्दर या अच्छे पुरुष हों उस कुल या नगर आदि को 'सुपुंस्' कहते हैं।
सुपुंस्+सुँ। यहां सुँ का लुक् होकर संयोगान्तस्य लोपः (२०) द्वारा सकार
का भी लोप हो जाता है। अब निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः द्वारा अनुस्वार अपने
पूर्व वाले रूप मकार में परिणत हो जाता है—सुपुम्।
सुपुंस्+औ = सुपुंस्+शी = सुपुंस्+ई = सुपुंसी।
सुपुंस्+जस्। यहां जस् के स्थान पर भावी 'शि' सर्वनामस्थान की विवक्षा
में पुंसोऽसुङ् (३५४) द्वारा असुङ् आदेश हो कर—सुपुमस्+जस्। पुनः 'शि' आदेश,
झलन्तलक्षण नुँम्, सान्तमहतः० (३४२) से दीर्घ तथा नश्चापदान्तस्य झलि (७८)
से अनुस्वार होकर—सुपुमांसि। 'सुपुंस्' शब्द की नपुंसक में रूपमाला यथा—
प्र० सुपुम् सुपुंसी सुपुमांसि | प० सुपुंसः सुपुम्भ्याम् सुपुम्भ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | ष० ,, सुपुंसोः सुपुंसाम्
तृ० सुपुंसा सुपुम्भ्याम् सुपुम्भिः | स० सुपुंसि ,, सुपुंसु
च० सुपुंसे ,, सुपुम्भ्यः | सं० हे सुपुम्! हे सुपुंसी! हे सुपुमांसि !
नोट—वस्वन्त नपुंसकों का उच्चारण—विद्वत्-द्, विदुषी, विद्वांसि। उपे-
यिवत्, उपेयुषी, उपेयिवांसि। उपेयिवद्भ्याम्। उपेयिवत्सु। इस प्रकार होगा। अन्य
सकारान्तों का नपुंसक में—ज्यायः, ज्यायसी, ज्यायांसि आदि।
[लघु०] अदः। विभक्तिकार्यम्। उत्व-मत्वे। अमू। अमूनि। शेषं पुंवत् ॥
व्याख्या—अब 'अदस्' शब्द के नपुंसक में रूप सिद्ध किये जाते हैं—
अदस्+सुँ। सुँलुक् होकर रुँत्व विसर्ग करने से—अदः¹।
अदस्+औ=अदस्+ई (शी)। उत्व-मत्व के असिद्ध होने से प्रथम त्यदा-
द्यत्व, पररूप, और गुण एकादेश होकर—'अदे'। अब अदसोऽसेर्दादु दो मः (३५६)
सूत्र से एकार को ऊकार तथा दकार को मकार होकर—अमू।
अदस्+जस्=अदस्+शि। त्यदाद्यत्व, पररूप, नुँम् आगम तथा उपधादीर्घ
(१७७) होकर—अदानि। अब अदसोऽसेर्दादु दो मः(३५६) सूत्र से उत्व-मत्व करने
से—अमूनि।
१. यहां अदस् शब्द के सान्त होने से अदसोऽसेर्दादु दो मः (३५६) द्वारा उत्व-मत्व
नहीं होता। विभक्ति परे न होने के कारण त्यदादीनामः (१६३) सूत्र से अत्व
भी नहीं हो सकता।
ल० प्र० (३३)
५१४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
द्वितीया में भी इसी तरह प्रयोग बनते हैं। शेष प्रक्रिया पुंवत् होती है।
नपुंसक में 'अदस्' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० अद अमू अमूनि | प० अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | ष० अमुष्य अमुयोः अमीषाम्
तृ० अमुना अमूभ्याम् अमीभिः | स० अमुष्मिन् ,, अमीषु
च० अमुष्मै ,, अमीभ्यः | सम्बोधन नहीं होता।
(यहाँ सकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
अभ्यास (४८)
(१) 'ऊर्जि' पर नश्छान्तां संयोग लिखने की क्या आवश्यकता थी ?
(२) नपुंसक में भसञ्ज्ञा और सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा कहाँ २ होती है ?
(३) हलन्तनपुंसक में ऐसा कौन सा शब्द है जिसके सुँ और अम् के रूपों में
भेद होता है ? (उत्तर—अन्वादेश में 'इदम्' शब्द) ।
(४) गविपक्ष के 'गवाक्षु' में चयो द्वितीया० क्या प्रवृत्त नहीं होता ?
(५) धनुस् को सान्त मानें या षान्त ? विवेचन करें।
(६) 'अद' प्रयोग में त्यदाद्यत्व तथा उत्व-मत्व क्यों नहीं होते ?
(७) 'इदम्' के नपुंसक के अन्वादेश में 'एनत्' क्यों विधान किया गया है,
क्या 'एन' आदेश से काम नहीं चल सकता था ?
(८) नपुंसक में शवन्त शब्द चार प्रकार के होते हैं—स्पष्ट करें।
(६) वारि, ददति, तुदति, पचति, दीव्यति, दीव्यन्ति, ये, इमे, ते, ये, एते—
प्रयोग क्या अन्यशब्द वा धातु की वा अन्य विभक्ति की भ्रान्ति तो
उत्पन्न नहीं कराते ? स्पष्ट करें।
(१०) 'गो शब्द्' शब्द के १०६ रूपों की सङ्क्षिप्तरीत्या सिद्धि करें।
(११) गवाक्शब्द के १०६ रूपों की सङ्ख्या पर आपत्ति उठाते हुए उन का
समाधान करें।
(१२) तत्, यत्, एनत्—में तदोः सः० द्वारा सकारादेश क्यों न हो ?
(१३) 'वार्षु' में शर् परे होने पर रेफ को विसर्ग आदेश क्यों नहीं होता ?
(१४) ऊर्जि, चत्वारि, सुपुमांसि, धनूंषि, पयोभिः, धनुष्षु, तपांसि, हे दण्डि,
सुपन्थानि, अह्री, इमे, श्वनडुत्, अमूनि—इन प्रयोगों की सूत्रनिर्देश-
पूर्वक सिद्धि करें।
[लघु०] इति हलन्ता नपुंसकलिङ्गा [शब्दा ] ॥
अर्थ.—यहाँ हलन्त नपुंसकलिङ्ग शब्दों का प्रकरण समाप्त होता है।
व्याख्या—षड्लिङ्गप्रकरण भी यहाँ समाप्त समझना चाहिये।
-: ० :-
इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त-
कौमुद्यां हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-
प्रकरणं समाप्तम् ॥
[समाप्ता चात्र षड्लिङ्गी बोध्या ॥]
अथाऽव्यय-प्रकरणम्
संस्कृतसाहित्य में दो प्रकार के शब्द पाये जाते हैं। १. विकारी, २. अवि-
कारी। जो शब्द विभक्तिवचनवशात् विकार को प्राप्त होते हैं वे 'विकारी' कहाते
हैं। इस कोटि में सुंबन्त¹ और तिङन्त शब्द आते हैं। जो शब्द सदा सब विभक्तियों
में विकाररहित अर्थात् एकसमान रहते हैं वे 'अविकारी' कहाते हैं। यथा—च, न,
यदि, अपि, नाना, विना आदि । व्याकरण में अविकारी शब्दों को 'अव्यय' कहते हैं।
अब यहां उन अव्ययों का प्रकरण आरम्भ किया जाता है।
[लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(३६७) स्वरादिनिपातमव्ययम् । १।१।३६॥
स्वरादयो निपाताश्चाव्ययसञ्ज्ञाः स्युः ॥
अर्थः—स्वर् आदि शब्द तथा निपात अव्ययसञ्ज्ञक हों।
व्याख्या —स्वरादिनिपातम् ।१।१। अव्ययम् ।१।१। समासः—'स्वर्' शब्द
आदिर्येषान्ते स्वरादयः । स्वरादयश्च निपाताश्च = स्वरादिनिपातम् । समाहारद्वन्द्वः ।
अर्थः—(स्वरादिनिपातम्) स्वर् आदि शब्द तथा निपात (अव्ययम्) अव्ययसञ्ज्ञक
होते हैं। स्वरादि शब्द पाणिनिमुनिविरचित 'गणपाठ' में पढ़े गये हैं। निपात— अष्टा-
ध्यायी के प्रथमाध्याय के चतुर्थपादान्तर्गत प्राग्रीश्वरान्निपाताः (१.४.५६) के अधि-
कार में पढ़े गये हैं। अव्ययसञ्ज्ञा का प्रयोजन सुंल्लुक् आदि आगे मूल में ही स्पष्ट
हो जायेगा ।
अब मूलगत स्वरादिगण—अर्थ, उदाहरण तथा विस्तृत टिप्पण सहित नीचे
दिया जा रहा है। इस गण में बालोपयोगी अत्यन्त प्रसिद्ध शब्दों पर चिह्न () कर
दिया गया है।
स्वरादि-गण
[१] स्वर् ॥
स्वर्गे परे च लोके स्वः—इत्यमरः । १. स्वर्ग-लोक—पुण्यकर्माणः स्वर्गच्छन्ति ।
देवाः स्वस्तिष्ठन्ति । २. परलोक—स्वर्गतस्य क्रिया कार्या पुत्रैः परमभक्तितः (उद्धृत)।
३. सुखविशेष—यन्न दुःखेन सम्भिन्नं न च ग्रस्तमनन्तरम् । अभिलाषोपनीतं च
तत्सुखं स्वःपदास्पदम् (तन्त्रवार्त्तिक) ।
[२] अन्तर्* ॥
१. में, अन्दर, भीतर, मध्य आदि—अप्स्र्वन्तरमृतम् अप्सु भेषजम् (ऋ० १.
२३.१६), जल में अमृत है जल में औषध है। अप्रकटीकृतशक्तिः शक्तोऽपि जनस्ति-
रस्क्रियां लभते । निवसन्नन्तर्दहने लङ्घ्यो वह्निर्न तु ज्वलितः (पञ्च० १. ३२) ।
अन्तर्यश्च मुमुक्षुभिर्नियमितप्राणादिभिर्मृग्यते (विक्रमो०), निरुद्धप्राण मुमुक्षुओं से वह
१. यहां सुंवन्त से तात्पर्य अव्ययभिन्न सुंवन्तों से है।
५१६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
भगवान् अन्दर अर्थात् अपने हृदय में खोजा जाता है। इन अर्थों में इस अव्यय के
साथ प्रायः सप्तम्यन्त पद का प्रयोग होता है पर कहीं-कहीं षष्ठ्यन्त वा द्वितीयान्त
का भी प्रयोग देखा जाता है। यथा—त्वमग्ने सर्वभूतानामन्तश्चरसि साक्षिवत् (याज्ञ०
७।१०४)। अन्तर्देवान् मर्त्यांश्च (ऋ० ८।२।४), देवों और मर्त्यो के बीच में। २
पकड़ना—अन्तर्हत्वा मूषिकां श्येनो गतः (काशिका १।४।६५), बाज चुहिया को मार
कर पकड़ ले गया।
[३] प्रातर्* ॥
१ प्रातःकाल, सुबह, सवेरे—प्रातर्द्यूतप्रसङ्गेन मध्याह्ने स्त्रीप्रसङ्गतः। रात्रौ
चौरप्रसङ्गेन कालो गच्छति धीमताम् (सुभाषित)। द्यूतप्रसङ्ग =महाभारतम्, स्त्री-
प्रसङ्ग =रामायणम्, चौरप्रसङ्ग =भागवतम्।
[४] पुनर्* ॥
१ फिर, दोबारा—न पुनरेव प्रवर्त्तितव्यम् (शाकुन्तल० ६)। भस्मीभूतस्य
देहस्य पुनरागमनं कुतः ?। गच्छतु भवान् पुनर्दर्शनाय (स्वप्न० १)। २ 'तु' के अर्थ
में—पदं सहेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीषपुष्पं न पुनः पतत्रिणः (कुमार० ५।४)। पुनः-
पुनः—वार-वार—विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजना न परित्य-
जन्ति (मुद्रा० २।१७)। किं पुनः = कहना ही क्या—मेघालोके भवति सुखिनोप्यन्य-
थावृत्ति चेतः। कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने किं पुनर्दूरसंस्थे (मेघ० १।३)। पुनरपि =
पुनः पुनः =वार-वार—पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम्।
इह संसारे खलु दुस्तारे कृपया पारे पाहि मुरारे (चर्पट० ८)।
[५] सनुतर् ॥
१ छिपना—सनुतश्चोरो गच्छति (गणरत्न०)। इस अव्यय का प्रयोग लोक
में नहीं पाया जाता। अमरकोष आदि लौकिक कोषों में इस का कहीं उल्लेख नहीं।
वेद में इस के प्रयोग मिलते हैं।१
नोट—उपर्युक्त पांचों अव्यय रेफान्त हैं अतः रुँ का रेफ़ न होने से हशि च
(१०७) आदि द्वारा उत्व आदि कार्य नहीं होते। यथा—स्वर्गतः, प्रातर्गच्छ, पुनरथ,
१ निघण्टु में यह 'निर्णीतान्तर्हित' अर्थ में पढ़ा गया है। निर्णीतं च तद् अन्तर्हितं
चेति कर्मधारयः (स्कन्दमाहेश्वरकृत निरुक्तभाष्यटीका)। जो छिपा हुआ पर
निर्णीत हो उसे 'सनुतर्' कहते हैं। श्रीसायण अपने वेदभाष्य में सर्वत्र इस का
अर्थ 'छिपा हुआ' करते हैं—सनुतश्चरन्तम्—निगूढं चरन्तम् (ऋ० ५।२।४
सायणभाष्य)। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने अष्टाध्यायीभाष्य तथा वेदा-
ङ्गप्रकाश के 'अव्ययार्थ' में 'सनुत' का 'सदा' अर्थ लिखा है। सनुतः पुरुषार्थे
प्रयतेरन्—यह उन्होंने उदाहरण भी दिया है। इस प्रकार आरे द्वेषांसि सनुतर्व्य-
धाम (ऋ० ५।४५।५) इस ऋचा का अर्थ होगा—हम सदा शत्रुओं को दूर रखें।
यह अर्थ भी सुसङ्गत प्रतीत होता है।
अव्यय-प्रकरणम् ५२७
अन्तर्गृहे, सनुतर्घे हि तं ततः (ऋ० ८.६७.३)। प्रातोऽत्र, पुनरोऽपि लिखने वाले विद्यार्थी
सावधान रहें।
[६] उच्चैस्* ॥
१. महान्—किं पुनर्यस्तयोच्चैः (मेघ० १.१७) । २. ऊँचे पर, ऊँचे में—
पश्चादुच्चैर्भुजतरुवन० (मेघ० १.३६) । विपद्युच्चैः धैर्यम् (नीति० ५६) । उच्चैरु-
दात्तः (१.२.२६) । ३. जोरदार आवाज में—उच्चैर्विहस्य (रघु० २.१२) । ४.
अत्यधिक—विदधति भयमुच्चैर्वीक्ष्यमाणा वनान्ताः (ऋतु० १.२२) ।
[७] नीचैस्* ॥
१. मन्द आवाज से (प्रायः क्रियाविशेषण)—नीचैः शंस हृदि स्थितो ननु स मे
प्राणेश्वरः श्रोष्यति (अमरु० ६८) । २. नीचे, नीचे की ओर—नीचैर्गच्छत्युपरि च
दशा चक्रनेमिक्रमेण (मेघ० २.४६) । ३. धीरे से, मन्दगति से—नीचैर्वाति समीरणः
(व्या० च०) । ४. विनीत, नम्र—तयापि नीचैर्विनयाददृश्यत (रघु० ३.३४) ।
[८] शनैस्* ॥
१. धीरे से (क्रियाविशेषण)—शनैर्यति पिपीलिका (व्या० च०) । धर्मं शनैः
सञ्चिनुयाद्वल्मीकमिव पुत्तिकाः (मनु० ४.२३८) । कुरु पदानि घनोह! शनैः शनैः
(वेणी० २.२१) । शनैश्चरः । शनैः पन्थाः शनैः कन्था शनैः पर्वतलङ्घनम् (सुभा-
षित०) ।
[९] ऋधक् ॥
१. सत्य—ऋधग्वदन्ति विद्वांसः (गणरत्न०) । गणरत्नमहोदधि में इस के
कुछ अन्य अर्थ भी लिखे हैं—वियोग-शीघ्र-सामीप्य-लाघवेष्वित्यन्ये । लौकिककोषों में
इस का प्रायः उल्लेख नहीं मिलता पर वेद में इस के प्रचुर प्रयोग हैं—किं स ऋधक्
कृणवद् (ऋ० ४.१८.४) ।
[१०] ऋते* ॥
१. विना, वगैर—ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः (सुप्रसिद्ध), ज्ञान के विना मुक्ति नहीं।
ऋते रवेः क्षालयितुं क्षमेत कः क्षपा-तमस्काण्ड-मलीमसं नभः (माघ० १.३८), सूर्य के
विना रात्रि के अन्धकार से मलिन आकाश को कौन धो कर निर्मल बना सकता है ?
नोट—‘ऋते’ के योग में अन्यारादितरर्तेदिक्शब्दाञ्चूत्तरपदाजाहियुक्ते (२.
३.२६) सूत्र से पञ्चमी विभक्ति का विधान किया गया है। जैसा कि उपर्युक्त उदा-
हरणों में स्पष्ट है। लोक में इस के योग में कहीं कहीं द्वितीया का प्रयोग भी देखा
जाता है। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे (गीता० ११.३२)। चान्द्रव्याकरण में इस
के योग में द्वितीया का विधायकसूत्र भी पढ़ा गया है—ऋते द्वितीया च (चान्द्र०
२.१.८४)। पाणिनीय वैयाकरण इस का समाधान—ततोऽन्यत्रापि दृश्यते इस वार्ति-
कांश से करते हैं।