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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 532

अव्यय-प्रकरणम् ५२७
अन्तर्गृहे, सनुतर्घे हि तं ततः (ऋ० ८.६७.३)। प्रातोऽत्र, पुनरोऽपि लिखने वाले विद्यार्थी
सावधान रहें।
[६] उच्चैस्* ॥
१. महान्—किं पुनर्यस्तयोच्चैः (मेघ० १.१७) । २. ऊँचे पर, ऊँचे में—
पश्चादुच्चैर्भुजतरुवन० (मेघ० १.३६) । विपद्युच्चैः धैर्यम् (नीति० ५६) । उच्चैरु-
दात्तः (१.२.२६) । ३. जोरदार आवाज में—उच्चैर्विहस्य (रघु० २.१२) । ४.
अत्यधिक—विदधति भयमुच्चैर्वीक्ष्यमाणा वनान्ताः (ऋतु० १.२२) ।
[७] नीचैस्* ॥
१. मन्द आवाज से (प्रायः क्रियाविशेषण)—नीचैः शंस हृदि स्थितो ननु स मे
प्राणेश्वरः श्रोष्यति (अमरु० ६८) । २. नीचे, नीचे की ओर—नीचैर्गच्छत्युपरि च
दशा चक्रनेमिक्रमेण (मेघ० २.४६) । ३. धीरे से, मन्दगति से—नीचैर्वाति समीरणः
(व्या० च०) । ४. विनीत, नम्र—तयापि नीचैर्विनयाददृश्यत (रघु० ३.३४) ।
[८] शनैस्* ॥
१. धीरे से (क्रियाविशेषण)—शनैर्यति पिपीलिका (व्या० च०) । धर्मं शनैः
सञ्चिनुयाद्वल्मीकमिव पुत्तिकाः (मनु० ४.२३८) । कुरु पदानि घनोह! शनैः शनैः
(वेणी० २.२१) । शनैश्चरः । शनैः पन्थाः शनैः कन्था शनैः पर्वतलङ्घनम् (सुभा-
षित०) ।
[९] ऋधक् ॥
१. सत्य—ऋधग्वदन्ति विद्वांसः (गणरत्न०) । गणरत्नमहोदधि में इस के
कुछ अन्य अर्थ भी लिखे हैं—वियोग-शीघ्र-सामीप्य-लाघवेष्वित्यन्ये । लौकिककोषों में
इस का प्रायः उल्लेख नहीं मिलता पर वेद में इस के प्रचुर प्रयोग हैं—किं स ऋधक्
कृणवद् (ऋ० ४.१८.४) ।
[१०] ऋते* ॥
१. विना, वगैर—ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः (सुप्रसिद्ध), ज्ञान के विना मुक्ति नहीं।
ऋते रवेः क्षालयितुं क्षमेत कः क्षपा-तमस्काण्ड-मलीमसं नभः (माघ० १.३८), सूर्य के
विना रात्रि के अन्धकार से मलिन आकाश को कौन धो कर निर्मल बना सकता है ?
नोट—‘ऋते’ के योग में अन्यारादितरर्तेदिक्शब्दाञ्चूत्तरपदाजाहियुक्ते (२.
३.२६) सूत्र से पञ्चमी विभक्ति का विधान किया गया है। जैसा कि उपर्युक्त उदा-
हरणों में स्पष्ट है। लोक में इस के योग में कहीं कहीं द्वितीया का प्रयोग भी देखा
जाता है। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे (गीता० ११.३२)। चान्द्रव्याकरण में इस
के योग में द्वितीया का विधायकसूत्र भी पढ़ा गया है—ऋते द्वितीया च (चान्द्र०
२.१.८४)। पाणिनीय वैयाकरण इस का समाधान—ततोऽन्यत्रापि दृश्यते इस वार्ति-
कांश से करते हैं।