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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 515, कुल 633 में से

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पृष्ठ 515

५०० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
[लघु०] ऊर्क्, ऊर्ग् । ऊर्जी । ऊर्न्जि । नरजाना संयोगः ॥
व्याख्या—ऊर्ज् (बल वा तेज) । ऊर्ज बलप्राणनयोः (चु० उभ०) धातु से
क्विप् प्रत्यय करने पर उस का सर्वापहार लोप हो 'ऊर्ज्' शब्द निष्पन्न होता है ।
ऊर्ज् + सुँ । सुँ का लुक् होकर चोः कुः (३०६) द्वारा जकार को गकार तथा
वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक चत्त्व करने पर—ऊर्क्, ऊर्ग् ।
ऊर्ज् + औ = ऊर्ज् + शी = ऊर्जी ।
ऊर्ज् + जस् = ऊर्ज् + शि । यहां नपुंसकस्य झलचः (२३६) द्वारा अच् से
परे नुँम् आगम होकर—'ऊर्न्जि'¹ सिद्ध होता है । समग्र रूपमाला यथा—
प्र० ऊर्क्, ग् ऊर्जी ऊर्न्जि | पं० ऊर्जः ऊर्भ्याम् ऊर्भ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | ष० ,, ऊर्जोः ऊर्जाम्
तृ० ऊर्जा ऊर्भ्याम् ऊर्ग्भिः | स० ऊर्जि ,, ऊर्क्षु
च० ऊर्जे ,, ऊर्ग्यः | सं० हे ऊर्क्,-ग् । ऊर्जी । ऊर्न्जि ।
(यहाँ जकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
[लघु०] तत् । ते । तानि । यत् । ये । यानि । एतत् । एते । एतानि ॥
व्याख्या—तद् + सुँ । सुँ का लुक् हो वैकल्पिक चत्त्व करने से—तत्, तद् ।
ध्यान रहे कि यहां सुँ का लुक् हो जाने से तदोः सः सौ (३१०) द्वारा तकार को सकारा-
देश नहीं होता । इसी प्रकार एतद् शब्द में भी समझ लेना चाहिये ।
तद् + औ । त्यदाद्यत्व, पररूप, 'औ' को शी कर गुण करने से—ते ।
तद् + जस् । त्यदाद्यत्व, पररूप, जस् को शि आदेश, नुँम् आगम और उपधा-
दीर्घ होकर—तानि । द्वितीया में भी इसी प्रकार होता है । शेष पूर्ववत् जानें ।
'तद्' (वह) शब्द की नपुंसकलिंग में रूपमाला यथा—
प्र० तत्, तद् ते तानि | पं० तस्मात्, द् ताभ्याम् तेभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | ष० तस्य तयोः तेषाम्
तृ० तेन ताभ्याम् तैः | स० तस्मिन् ,, तेषु
च० तस्मै ,, तेभ्यः | सम्बोधन नहीं होता ।
इसी प्रकार नपुंसकलिंग में यद् (जो) शब्द की रूपमाला यथा—
१ 'ऊर्ज्नि' लिखने वाले सावधान रहें । क्योंकि वैसा लिखने से रेफ सब से पहले पढ़ा
जायेगा, जैसे—'कार्त्स्न्य' आदि में होता है । परन्तु हमें नकार (नुँम्) का पाठ
रेफ से पूर्व करना इष्ट है । अतः 'ऊर्न्जि' इस ढंग से ही लिखना चाहिये । ग्रन्थ-
कार ने भी लेखकों की इस भ्रान्ति की ओर ध्यान देते हुए—नरजानां संयोग
(नकार, रेफ और जकार का संयोग है) ऐसा स्पष्ट लिख दिया है । अत एव
रेफ का बीच में व्यवधान पड़ने से नकार को णत्व नहीं होता ।