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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 526, कुल 633 में से

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पृष्ठ 526

हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ५११
धनुष् + स् (सुँ) । स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुँ का लुक् हो कर आदेश-
प्रत्यययोः (८.३.५६) द्वारा किये गये षत्व के असिद्ध होने से उसे सकार समझ कर
ससजुषो रुः (८.२.६६) से रुँ तथा रेफ को विसर्ग आदेश करने से—'धनुः' प्रयोग
सिद्ध होता है ।
धनुष् + औ । नपुंसकाच्च (२३५) से औ को शी आदेश हो कर अनुबन्धलोप
करने से—धनुष् + ई = धनुषी ।
धनुष् + जस् = धनुष् + इ (शि) । नपुंसकस्य झलचः (२३६) द्वारा नुँम् का
आगम और सान्तमहतः संयोगस्य (३४२) से सान्त संयोग के नकार की उपधा को
दीर्घ कर निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः से षकार को सकार हो कर—धनून्स्

  • इ । अब नश्चाऽपदान्तस्य झलि (७८) से नकार को अनुस्वार तथा उनके व्यवधान
    में नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि (३५२) द्वारा सकार को पुनः षत्व हो कर 'धनूंषि'
    प्रयोग सिद्ध होता है ।
    भ्याम्, भिस्, भ्यस् में षत्व के असिद्ध होने से ससजुषो रुः (१०५ से रुँत्व हो
    कर रेफ का ऊर्ध्वगमन करने पर—धनुर्भ्याम्, धनुर्भिः, धनुर्भ्यः ।
    धनुष् + सु (सुप्) । यहां षत्व के असिद्ध होने से उसे सकार समझ कर ससजुषो
    रुः (१०५) से रुँत्व हो जाता है । अब रेफ को विसर्ग आदेश हो कर वा शरि (१०४)
    से एक पक्ष में वैकल्पिक विसर्ग आदेश और दूसरे पक्ष में विसर्जनीयस्य सः (१०३)
    से सकार आदेश हो जाता है—'धनुः सु, धनुस् सु' । अब प्रथम रूप में विसर्ग के
    व्यवधान में तथा दूसरे रूप में शर्-सकार के व्यवधान में नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि
    (३५२) सूत्र द्वारा प्रत्यय के सकार को षकार हो कर—धनुःषु, धनुस्सु । अब सकार-
    पक्ष में ष्टुना ष्टुः (६४) से ष्टुत्वद्वारा प्रथम सकार को भी षकार करने से—'धनुःषु,
    धनुष्षु' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं । 'धनुष्' शब्द की रूपमाला यथा—
    प्र० धनुः धनुषी धनूंषि | प० धनुषः धनुर्भ्याम् धनुर्भ्यः
    द्वि० ,, ,, ,, | प० ,, धनुषोः धनुषाम्
    तृ० धनुषा धनुर्भ्याम् धनुर्भिः | स० धनुषि ,, धनुःषु,-ष्षु
    च० धनुषे ,, धनुर्भ्यः | सं० हे धनुः ! हे धनुषी ! हे धनूंषि !
    इसी प्रकार—१. वपुष् = शरीर । २. हविष् = होम में प्रक्षेप्य घृतादि । ३.
    चक्षुष् = नेत्र । ४. जनुष् = जन्म । ५. यजुष् = यजुर्वेद । ६. ज्योतिष् = नक्षत्र । ७.
    आयुष् = आयु । ८. अरुष् = मर्म । ६. अर्चिष् = प्रकाश । १०. सर्पिष् = घृत । ११.
    तनुष् = शरीर । इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं ।¹
    १. कई वैयाकरण इन धनुष् आदि शब्दों को सकारान्त मान कर ही स्वादिप्रत्यय लाते
    हैं और बाद में जहां-जहां सूत्रप्रवृत्ति हो सके षत्व कर लेते हैं । उन का कथन है
    कि यदि इन को षकारान्त मान कर स्वादि प्रत्ययों की उत्पत्ति मानेंगे तो उणा-
    दयोऽव्युत्पन्नानि प्रातिपदिकानि (परिभाषा)—इस अव्युत्पत्तिपक्ष में ससजुषो रुः