लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ४८३
गिर्+सुप्। यहां पदान्त में उपधादीर्घ होकर इण्—रेफ से परे प्रत्यय के
अवयव सकार को षकार (१५०) हो जाता है—गीर्षु। ध्यान रहे कि यहां रोः सुपि
(२६८) के नियमानुसार रेफ को विसर्ग आदेश नहीं होता। समग्र रूपमाला यथा—
प्र० गीः गिरौ गिरः | प० गिरः गीर्भ्याम् गीर्भ्यः
द्वि० गिरम् ,, ,, | ष० ,, गिरोः गिराम्
तृ० गिरा गीर्भ्याम् गीर्भिः | स० गिरि ,, गीर्षु
च० गिरे ,, गीर्भ्यः | सं० हे गीः ! हे गिरौ ! हे गिरः!
इसी प्रकार—पुर्=(नगर)। पृ पालनपूरणयोः (जुहो० प०) धातु से
क्विँप्, उसका सर्वापहारलोप, उदोष्ठ्यपूर्वस्य (६११) से उत्व तथा उरण्रपरः (२६)
से रपर करने पर 'पुर्' शब्द निष्पन्न होता है। इस की भी सम्पूर्ण प्रक्रिया 'गिर्'
शब्द की तरह होती है। रूपमाला यथा—
प्र० पूः¹ पुरौ पुरः | प० पुरः पूर्भ्याम् पूर्भ्यः
द्वि० पुरम् ,, ,, | ष० ,, पुरोः पुराम्
तृ० पुरा पूर्भ्याम् पूर्भिः | स० पुरि ,, पूर्षु
च० पुरे ,, पूर्भ्यः | सं० हे पूः ! हे पुरौ ! हे पुरः !
इसी प्रकार—धुर् (गाड़ी का अग्रिम भाग) प्रभृति शब्दों के रूप बनते हैं।
[लघु०] चतस्रः। चतसृणाम्॥
व्याख्या—चतुर्=(चार)। स्त्रीलिङ्ग में विभक्ति परे होने पर चतुर् शब्द
को त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतसृ (२२४) सूत्र से 'चतसृ' आदेश हो जाता है।²
चतसृ+अस् (जस्)। ऋतो ङि० (२०४) से गुण प्राप्त होने पर उस के अपवाद
अचि र ऋतः (२२५) से रेफ आदेश करने पर—'चतस्रः' प्रयोग सिद्ध होता है।
चतसृ+अस् (शस्)। यहां सर्वनामस्थान परे न होने से पूर्वोक्त गुण प्राप्त
नहीं होता। प्रथमयोः० (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर उस के अपवाद अचि
र ऋतः (२२५) द्वारा रेफ आदेश हो जाता है—चतस्रः।
चतसृ+आम्। अचि र ऋतः (२२५) का बाध कर नुमचिर० (वा० १६)
की सहायता से पूर्वविप्रतिषेध से ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) द्वारा नुट् का आगम हो
जाता है—चतसृ+नाम्। अब नामि (१४६) से प्राप्त दीर्घ का न तिसृ-चतसृ
(२२६) से निषेध हो जाता है, पुनः ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम् (वा० २१) से
णत्व होकर 'चतसृणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है।
चतसृ (स्त्रीलिङ्ग में चतुर्) शब्द की रूपमाला यथा—
१. इसका भ्रामक रूप इस उक्ति में प्रसिद्ध है—का पूर्वः (का, पूः=नगरी, वः=
युष्माकम् । तुम्हारी कौन-सी नगरी है ?)।
२. यहां यह नहीं भूलना चाहिये कि चतसृशब्द से ऋन्नेभ्यो ङीप् (२३२) से प्राप्त
ङीप् का न षट्स्वस्रादिभ्यः (२३३) से निषेध हो जाता है।
४८४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन | विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्र० * * चतस्रः | प० * * चतसृभ्यः
द्वि० * * " | ष० * * चतसृणाम्
तृ० * * चतसृभिः | स० * * चतसृषु
च० * * चतसृभ्यः | —— ० ——
(यहां रेफान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
[लघु०] का। के। काः। सर्वावत्॥
व्याख्या किम्(कौन)। 'किम्' शब्द के पुँल्लिङ्ग में रूप कह चुके हैं। अब
स्त्रीलिङ्ग में रूप सिद्ध किये जाते हैं।
विभक्ति परे होने पर सर्वत्र किमः कः (२७१) द्वारा 'किम्' को 'क' सर्वादेश
हो जाता है। पुनः स्त्रीत्व की विवक्षा में अजाद्यतष्टाप् (१२४५) से टाप् (आ)
प्रत्यय होकर सवर्णदीर्घ करने से 'का' शब्द निष्पन्न होता है सर्वादीनि सर्वनामानि
(१५१) से इस की सर्वनामसंज्ञा होने से सम्पूर्ण प्रक्रिया 'सर्वा'शब्दवत् होती है। 'का'
(स्त्रीलिङ्ग में किम् शब्द) की रूपमाला यथा —
प्र० का के काः | प० कस्याः काभ्याम् काभ्यः
द्वि० काम् " " | ष० ,,† कयोः* कासाम्‡
तृ० कया* काभ्याम् काभिः | स० कस्याम्† ,,* कासु
च० कस्यै† " काभ्यः | सम्बोधन प्राय नहीं होता।
*आङि चापः (२१८)। † सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च (२२०)। ‡ आमि
सर्वनाम्नः सुट् (१५५)।
[लघु०] विधि सूत्रम्—(३६१) यः सौ ॥७।२।११०॥
इदमो दस्य यः। इयम्। त्यदाद्यत्वम्। पररूपत्वम्। टाप्। दश्च
(२७५) इति मः। इमे। इमाः। इमाम्। अनया। हलि लोपः (२७७)
आभ्याम्। आभिः। अस्यै। अस्याः। अनयोः। आसाम्। अस्याम्। आसु॥
अर्थ—सुँ परे होने पर इदम् के दकार को यकार आदेश हो जाता है।
व्याख्या—इदमः ६।१। (इदमो मः से)। दः ६।१। (दश्च से)। यः १।१।
सौ ७।१। अर्थ—(इदमः) इदम् शब्द के (दः) द् के स्थान पर (यः) य् आदेश
हो जाता है (सौ) सुँ परे होने पर।
यह सूत्र केवल स्त्रीलिङ्ग में ही प्रवृत्त होता है। क्योंकि पुँल्लिङ्ग में सुँ परे
होने पर इदोऽय् पुंसि (२७३) सूत्र से इदम् को अय् आदेश हो जाने से दकार नहीं
मिल सकता। नपुंसक में भी सुँ का लुक् हो जाने से प्रत्ययलक्षण न होने से इस अव-
काश नहीं मिलता।
'इदम्' शब्द के पुँल्लिङ्ग में रूप सिद्ध किये जा चुके हैं, अब स्त्रीलिङ्ग में रूप
सिद्ध करते हैं—
हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ४८५
इदम् + स् (सुँ) । यहां प्रकृतसूत्र से दकार को यकार हो कर हल्ङ्याब्भ्यः०
.(१७६) से सुँ का लोप हो जाता है—इयम्। ध्यान रहे कि यहां इदमो मः (२७२)
के निषेध के कारण त्यदाद्यत्व नहीं होता।
इदम् + औ। त्यदाद्यत्व, पररूप, अजाद्यतष्टाप् (१२४५) से टाप्, अनुबन्ध-
लोप कर सवर्णदीर्घ करने से—इदा+औ। अब दश्च (२७५) सूत्र से दकार को
मकार, औङ आपः (२१६) से औकार को शी, अनुबन्धलोप तथा गुण करने पर—
इमे ।
इदम् + अस् (जस्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप्, सवर्णदीर्घ तथा दश्च (२७५)
से दकार को मकार होकर—इमा + अस् । अब दीर्घाज्जसि च (१६२) से पूर्वसवर्ण-
दीर्घ का निषेध होकर अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ तथा सकार को रुँत्व
विसर्ग करने से—इमाः।
इदम् + अम् । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप्, सवर्णदीर्घ, दश्च (२७५) सूत्र से
दकार को मकार तथा अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप होकर—इमाम्।
इदम् + अस् (शस्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप्, सवर्णदीर्घ तथा दकार को
मकार होकर पूर्वसवर्णदीर्घ करने से—इमास् = इमाः।
नोट—जस् में सवर्णदीर्घ और शस् में पूर्वसवर्णदीर्घ यह ज्ञातव्य है।
इदम् + आ (टा) = इद + आ = इदा + आ । अब यहां अनाप्यकः (२७६)
सूत्र से इद् भाग को अन् आदेश, आङि चापः (२१८) से प्रकृति के आकार को
एकार तथा एचोऽयवायावः (२२) से अय् आदेश करने पर—अनया ।
इदम् + भ्याम् = इद + भ्याम् = इदा + भ्याम् । हलि लोपः (२७७) से इद्
भाग का लोप होकर—आभ्याम् । इसी प्रकार—आभिः।
इदम् + ए (ङे) = इद + ए = इदा + ए । अब सर्वनामसञ्ज्ञा होकर प्रथम
नित्य होने से सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च (२२०) सूत्र से स्याट् आगम और आप् को
ह्रस्व हो जाता है—इद + स्या ए। अब वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि और हलि लोपः
(२७७) से इद् भाग का लोप करने से—अस्यै।
इदम् + अस् (ङसिँ वा ङस्) = इद + अस् = इदा + अस्। यहां भी पूर्ववत्
सर्वनामसञ्ज्ञा, स्याट् आगम तथा आप् को ह्रस्व होकर—इद + स्या अस् । अब अकः
सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ तथा हलि लोपः (२७७) से इद् का लोप होकर—
अस्यास् = अस्याः ।
इदम् + ओस् = इद + ओस् = इदा + ओस् । अनाप्यकः (२७६) से इद् को
अन् आदेश, आङि चापः (२१८) से आप् की एकार तथा एकार को अय् आदेश करने
पर—अनयोः।
इदम् + आम् = इद + आम् = इदा + आम् । सर्वनामसञ्ज्ञा होकर आमि
सर्वनाम्नः सुँट् (१५५) से सुँट् का आगम तथा हलि लोपः (२७७) से इद् का लोप
हो जाता है—आसाम् ।
४८६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
इदम् + ङि (डि) = इद + ङि = इदा + ङि । यहां डेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८)
से ङि को आम्, सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च (२२०) से स्याट् आगम और आप् को
ह्रस्व, हलि लोपः (२७७) से इद् का लोप तथा सवर्णदीर्घ करने पर— अस्याम् ।
इदम् + सुप् = इद + सु = इदा + सु = आसु [ हलि लोपः (२७७) ] ।
'इदम्' (यह) शब्द की स्त्रीलिङ्ग में रूपमाला यथा —
प्र० इयम् इमे इमा | प० अस्या आभ्याम् आभ्यः
द्वि० इमाम् " " | ष० " अनयोः आसाम्
तृ० अनया आभ्याम् आभिः | स० अस्याम् " आसु
च० अस्यै " आभ्यः सम्बोधन प्रायः नहीं होता ।
नोट—अन्वादेश में द्वितीया, टा और ओस् विभक्तियों के परे होने पर द्वितीया-
टौस्स्वेनः (२८०) से इदम् को एन आदेश हो जाता है । तब टाप् प्रत्यय होकर
विभक्ति कार्य करने से—एनाम्, एने, एनाः, एनया, एनयोः—रूप बन जाते हैं।
(यहां मकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
[लघु०] त्यदाद्यत्वम् । टाप्—स्या, त्ये, त्याः । एव तद्, एतद् ॥
व्याख्या—त्यद् (वह) । 'त्यद्' शब्द के पुंल्लिङ्ग में रूप दर्शाए जा चुके हैं।
अब स्त्रीलिङ्ग में रूप दर्शाए जाते हैं—
त्यद् + स् (सुँ) । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप्, सवर्णदीर्घ, तदोः सः सावनन्त्ययोः
(३१०) से तकार को सकार तथा हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से अपृक्त सकार का लोप
होकर—स्या ।
त्यद् + औ = त्य + औ = त्या + औ । औङ आपः (२१६) से शी आदेश तथा
अनुबन्धलोप कर गुण करने से—त्ये ।
आगे सर्वत्र त्यदाद्यत्व पररूप और टाप् होकर 'त्या' रूप बन जाता है । तब
इस की प्रक्रिया 'सर्वा'शब्दवत् होती है । रूपमाला यथा—
प्र० स्या त्ये त्याः | प० त्यस्याः त्याभ्याम् त्याभ्यः
द्वि० त्याम् " " | ष० " त्ययोः त्यासाम्
तृ० त्यया त्याभ्याम् त्याभिः | स० त्यस्याम् " त्यासु
च० त्यस्यै " त्याभ्यः सम्बोधन प्रायः नहीं होता ।
तद् (वह) । 'तद्' शब्द की भी प्रक्रिया 'त्यद्' शब्द के समान होती है।
तद् + सुँ । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप्, सवर्णदीर्घ होकर—'ता + स्' । अब तदोः
सः सावनन्त्ययोः (३१०) से तकार को सकार तथा हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से सुँ
का लोप होकर— सा । 'तद्' शब्द की स्त्रीलिङ्ग में रूपमाला यथा—
प्र० सा ते ताः | प० तस्याः ताभ्याम् ताभ्यः
द्वि० ताम् " " | ष० " तयोः तासाम्
तृ० तया ताभ्याम् ताभिः | स० तस्याम् " तासु
च० तस्यै " ताभ्यः | सम्बोधन प्रायः नहीं होता ।
हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ४८७
एतद् (यह)। 'एतद्' शब्द की भी स्त्रीलिङ्ग में समग्र प्रक्रिया 'त्यद्, तद्'
शब्दों की तरह होती है। रूपमाला यथा—
प्र० एषा एते एताः | प० एतस्याः एताभ्याम् एताभ्यः
द्वि० एताम् " " | प० " एतयोः एतासाम्
तृ० एतया एताभ्याम् एताभिः | स० एतस्याम् " एतासु
च० एतस्यै " एताभ्यः | सम्बोधन प्रायः नहीं होता।
(यहां दकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
—:०:—
[लघु०] वाक्, वाग्। वाचौ। वाग्भ्याम्। वाक्षु॥
व्याख्या—वाच् (वाणी)। वच परिभाषणे (अदा० प०) धातु से विवँद्वचि०
(वा० ४८) द्वारा क्विन्, दीर्घ और सम्प्रसारण का अभाव करने पर 'वाच्' शब्द
निष्पन्न होता है। पदान्त में इसे चोः कुः (३०६) द्वारा सर्वत्र कव drop/र्गादेश हो जाता है।
'वाच्' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० वाक्,-ग्* वाचौ वाचः | प० वाचः वाग्भ्याम् वाग्भ्यः
द्वि० वाचम् " " | प० " वाचोः वाचाम्
तृ० वाचा वाग्भ्याम्‡ वाग्भिः | स० वाचि " वाक्षु†
च० वाचे " वाग्भ्यः | सं० हे वाक्,-ग्! हे वाचौ! हे वाचः!
*सुंलोप, चोः कुः (३०६) से चकार को ककार, तथा जश्त्व-चर्त्व (६७, १४६)।
‡चोः कुः (३०६) से कुत्व हो कर झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व हो
जाता है।
†चोः कुः, झलां जशोऽन्ते, आदेशप्रत्यययोः (१५०), खरि च (७४)।
इसी प्रकार—शुच् (शोक), त्वच् (त्वगिन्द्रिय) प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं।
[लघु०] अप्शब्दो नित्यं बहुवचनान्तः। अप्तृन्तृच्० (२०६) इति दीर्घः।
आपः। अपः॥
व्याख्या—अप् (जल)। 'अप्' शब्द संस्कृतसाहित्य में नित्यबहुवचनान्त¹ तथा
१. त्रि, चतुर्, पञ्चन् आदि शब्दों का बहुवचन में प्रयोग तो समझ में आ सकता
है; परन्तु जब अप्, दार आदि शब्दों का बहुवचन में प्रयोग सामने आता है तो
वैसा कोई कारण प्रतीत नहीं होता। आधुनिक कई वैज्ञानिक दो गैसों के संयोग
को ही जलतत्त्व नाम देते हैं, शायद सूक्ष्म अनुसन्धान से किन्हीं अन्य गैसों का
भी मिश्रण प्रतीत हो और उन सब के संयोगात्मक तत्त्व 'अप्' को प्राचीन आर्यों
ने नित्यबहुवचनान्त माना हो अथवा जल के अनेक सूक्ष्म बिन्दुओं के कारण यह
बहुवचनान्त माना गया हो। किञ्च जल, वारि आदि को बहुवचन न मानकर
'अप्' को ही बहुवचनान्त मानने का कारण शायद आपॢँ व्याप्तौ धातु भी हो
जिस से अप् शब्द की निष्पत्ति होती है। 'दार' शब्द शायद इसलिये बहुवचनान्त
स्त्रीलिङ्ग में प्रयुक्त होता है। आपः स्त्री भूम्नि वार्वारि—इत्यमरः । लिङ्गानुशासन के
स्त्रीप्रकरण में भी अप्-सुमनस्-समा-सिकता-वर्षाणां बहुत्वं च (सूत्र २६) । आप्नुवन्ति
शरीरमिति आपः । 'आप्नॢँ व्याप्तौ (स्वा० प०) धातु से 'आप्नोतेर्ह्रस्वश्च (उणा०
२।१६) सूत्र द्वारा क्विप् प्रत्यय तथा धातु के आकार को ह्रस्व करने पर जलवाचक
'अप्' शब्द निष्पन्न होता है ।
अप् + अस् (जस्) । 'जस्' प्रत्यय सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक होता है अतः उसके
: परे होने पर अप्तृन्० (२०६) सूत्र द्वारा 'अप्' की उपधा को दीर्घ होकर—आपस्
: = 'आपः' प्रयोग बनता है ।
अप् + अस् (शस्) । शस् सर्वनामस्थान नहीं अतः इस के परे उपधादीर्घ नहीं
होता । स्वर-व्यञ्जन का संयोग हो रुत्व-विसर्ग करने से—अपः ।
अप् + भिस् । यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३६२) अपो भि ।७।४।४८॥
अपस्तकारो भादौ प्रत्यये । अद्भिः । अद्भ्यः २ । अपाम् । अप्सु ॥
अर्थः—भकारादि प्रत्यय परे हो तो 'अप्' को तकार आदेश हो ।
व्याख्या—अपः ।६।१। तः ।१।१। (अच उपसर्गात्तः से । तकारादकार उच्चार-
णार्थः) । भि ।७।१। (अङ्गस्य का अधिकार होने से 'प्रत्यये' उपलब्ध हो जाता है ।
'प्रत्यये' विशेष्य और 'भि' विशेषण है । विशेषण के अल् होने से तदादिविधि होकर
—'भादौ प्रत्यये' बन जाता है) । अर्थ —(भादौ प्रत्यये) भकारादि प्रत्यय परे होने
पर (अपः) 'अप्' शब्द के स्थान पर (तः) त् आदेश हो जाता है । अलोऽन्त्यविधि
से यह आदेश अन्त्य अल् पकार के स्थान पर होगा । सुपो में भकारादि प्रत्यय भ्याम्
और भिस् के अतिरिक्त कोई नहीं है ।
'अप् + भिस्' यहां पकार को तकार होकर जश्त्व करने से—अद्भिः । इसी
प्रकार—अद्भ्यः । अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति—(मनु० ५ ।१०६) ।
अप् + आम् = अपाम् । अप् + सुप् = अप्सु । यहां भकारादि प्रत्यय परे न होने
से तकार आदेश न होगा । अप् (जल) शब्द की समग्र रूपमाला यथा —
माना गया हो कि पूर्वकाल में एक पुरुष की अनेक स्त्रियां होती थीं । किञ्च
दृ विदारणे धातु भी शायद इस में कारण हो जिस के अन्यत्र भार्या आदि में न होने
के कारण वे नित्य-बहुवचनान्त न बन सके हों । सिकता और वर्षा शब्द तो
सिकताकणों और जलकणों के समूह के कारण ही बहुवचनान्त माने गये प्रतीत
होते हैं; जहां एक कण की विवक्षा होती है वहां एकवचन का भी प्रयोग देखा
जाता है । यथा महाभाष्य में – एका च सिकता तैलदानेऽसमर्था । संस्कृत में लिङ्ग
और वचनों का विषय पर्याप्त अनुसन्धेय है ।
हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ४८१
विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्र० ॰ ॰ आपः प० ॰ ॰ अद्द्भ्यः
द्वि० ॰ ॰ अपः ष० ॰ ॰ अपाम्
तृ० ॰ ॰ अद्भिः स० ॰ ॰ अप्सु
च० ॰ ॰ अद्द्भ्यः सं० ॰ ॰ हे आपः!
(यहां पकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
—:०:—
[लघु०] दिक्, दिग्। दिशः। दिग्भ्याम्॥
व्याख्या—दिक् (दिशा)। यह शब्द ऋत्विग्वद्धृक्० (३०१) सूत्र से क्विन्नन्त
निपातन किया गया है।
दिश्+सुं। सुंलोप, व्रश्चभ्रस्ज० (३०७) से षत्व, झलां जशोऽन्ते (६७) से
डत्व, क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से गकार तथा वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक
चर्त्व=ककार करने से—‘दिक्, दिग्’ ये दो रूप सिद्ध होते हैं।
दिश्+भ्याम्। पदान्त में षत्व, डत्व और कुत्व होकर—दिग्भ्याम्।
‘दिक्’ शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० दिक्-ग् दिशौ दिशः प० दिशः दिग्भ्याम् दिग्भ्यः
द्वि० दिशम् ,, ,, ष० ,, दिशोः दिशाम्
तृ० दिशा दिग्भ्याम् दिग्भिः स० दिशि ,, दिक्षु
च० दिशे ,, दिग्भ्यः सं० हे दिक्-ग्! दिशौ! दिशः!
इसी शब्द का आपं चैव हलन्तानाम् से आप् करने पर ‘दिशा’ शब्द बन जाता
है, तब ‘रमा’ की तरह रूप चलते हैं। इसे अव्ययप्रकरण के अन्त में देखें।
[लघु०] त्यदादिषु० (३४७) इति दृशेः क्विग्विधानादन्यत्रापि कुत्वम्।
दृक्, दृग्। दृशौ। दृग्भ्याम्॥
व्याख्या—दृश् (आंख, दृष्टि)। दृश्यन्तेऽर्था अनयेति विग्रहे सम्पदादित्वाद्
दृशेः क्विप्ँ। ‘दृश्’ शब्द क्विबन्त है क्विन्नन्त नहीं।
दृश्+सुँ। यहां अपृक्त सकार का लोप होकर पदान्त में व्रश्चभ्रस्ज० (३०७)
सूत्र से शकार को षकार, झलां जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार, क्विन्प्रत्ययस्य
कुः (३०४) से डकार को कुत्व-गकार तथा वाऽवसाने (१४६) सूत्र से वैकल्पिक
चर्त्व-ककार करने से—‘दृक्, दृग्’ ये दो रूप बनते हैं।
वक्तव्य—यद्यपि यहां क्विन् प्रत्यय न होने से क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४)
द्वारा कुत्व न होना चाहिये था; तथापि ‘क्विन्प्रत्ययो यस्मात्’ ऐसा विग्रह कर बहु-
व्रीहिसमास स्वीकार करने से कुत्व हो जाता है कोई दोष प्रसक्त नहीं होता। तात्पर्य
यह है कि जिस धातु से कहीं भी क्विन्प्रत्यय देखा गया हो चाहे अब उस से वह
किया गया हो या न हो उसे कुत्व हो जायेगा। ‘दृश्’ धातु से यहां तो क्विन् नहीं
४६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
हुआ किन्तु 'तादृश्' शब्द में त्यदादिषु० (३८७) सूत्र द्वारा देखा जाता है अत यहाँ
क्विन् के अभाव में भी कुत्व हो जायेगा।
दृश् + भ्याम् । षत्व, डत्व और कुत्व होकर — दृग्भ्याम् । दृग्भिः । दृग्भ्यः ।
'दृश्¹' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० दृक्-ग् दृशौ दृशः | प० दृशः दृग्भ्याम् दृग्भ्यः
द्वि० दृशम् ,, ,, | ष० ,, दृशोः दृशाम्
तृ० दृशा दृग्भ्याम् दृग्भिः | स० दृशि ,, दृक्षु
च० दृशे ,, दृग्भ्यः | सं० हे दृक्-ग् ! हे दृशौ ! हे दृशः !
इसी प्रकार —तादृश, एतादृश, यादृश् आदि के स्त्रीलिङ्ग में रूप समझने
चाहियें² ।
(यहाँ शकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
—•—
[लघु०] त्विट्, त्विड्। त्विड्भ्याम्॥
व्याख्या—त्विष् (कान्ति)। त्विषेँ दीप्तौ (भ्वा० उभ०) धातु से क्विप्
प्रत्यय करने पर 'त्विष्' शब्द निष्पन्न होता है। 'त्विष्' शब्द की सम्पूर्ण प्रक्रिया
पुँल्लिङ्ग के 'रत्नमुष्' शब्द के समान होती है। रूपमाला यथा—
प्र० त्विट्-ड्* त्विषौ त्विषः | प० त्विषः त्विड्भ्याम् त्विड्भ्यः
द्वि० त्विषम् ,, ,, | ष० ,, त्विषोः त्विषाम्
तृ० त्विषा त्विड्भ्याम्† त्विड्भिः | स० त्विषि ,, त्विट्त्सु-ट्सु‡
च० त्विषे ,, त्विड्भ्यः | सं० हे त्विट्-ड् ! हे त्विषौ ! हे त्विषः !
*झलां जशोऽन्ते (६७), वाऽवसाने (१४६) । †झलां जशोऽन्ते (६७) ।
‡जश्त्व करने पर धुँट् प्रक्रिया ।
इसी प्रकार—प्रावृष्, (वर्षा ऋतु), रुष् (क्रोध) प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं।
[लघु०] ससजुषो रुँ (१०५) इति रुँत्वम् । सजूः । सजुषौ । सजूभ्याम् ।
आशीः । आशिषौ । आशीर्भ्याम् ॥
व्याख्या—सजुष् (मित्र) । सह जुषते=सेवते इति सजूः । जुषीँ प्रीतिसेवनयोः
(तुदा० आ०) इति धातोः क्विप् । सहस्य सः संज्ञायाम् (६/३/७७) इति सूत्रेण,
ससजुषो रुँ (१०५) इति निपातनाद्वा सहस्य स भावः ।
'सजुष्+सुँ' । सुँलोप होकर ससजुषो रुँ (१०५) सूत्र में विशेष उल्लेख के
कारण सजुष् के षकार को रुँ आदेश, वोरोपधाया दीर्घ इकः (३५१) से उपधादीर्घ
तथा रेफ को विसर्ग करने से 'सजूः' प्रयोग सिद्ध होता है।
१ 'तादृश्' शब्द के रूपों में 'ता' हटा दिया जाये तो 'दृश्' शब्द के रूप हो जाते हैं।
२ तादृशी, एतादृशी, यादृशी आदि रूप क्वबन्त 'तादृश्' आदि शब्दों से टिड्ढाणञ्०
(१२४७) द्वारा ङीप् कर भसंज्ञक अकार का लोप करने से बनते हैं। इन के
उच्चारण नदीवत् होते हैं !
हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ४६१
'सजुष्+भ्याम्'। पदान्त में रुँत्व और पूर्वोक्तरीत्या उपधादीर्घ होकर—
सजूभ्र्याम्। इसी प्रकार—सजूभिः। सजूभ्यः।
सजुष्+सुप्। रुँत्व और उपधादीर्घ होकर—सजूर्+सु। अब षत्व (१५०)
के असिद्ध होने से प्रथम खरवसानयोः० (६३) से विसर्ग आदेश हो जाता है—सजूः
+सु। पुनः वा शरि (१०४) से विकल्प कर के विसर्ग को विसर्ग और पक्ष में
विसर्जनीयस्य सः (१०३) से सकार आदेश होकर नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि (३५२)
सूत्र से दोनों पक्षों में सकार को मूर्धन्य षकार करने से—१. सजूःषु, २. सजूस्षु। अब
सकार वाले पक्ष में ष्टुत्व (६४) हो जाता है। इस प्रकार—१. सजूःषु, २. सजूष्षु
—ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। 'सजुष्' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० सजूः सजुषौ सजुषः | प० सजुषः सजूभ्याम् सजूभ्यः
द्वि० सजुषम् ,, ,, | ष० ,, सजुषोः सजुषाम्
तृ० सजुषा सजूभ्याम् सजूभिः | स० सजुषि ,, सजूःषु,-ष्षु
च० सजुषे ,, सजूभ्यः | सं० हे सजूः! सजुषौ! सजुषः!
इसी प्रकार—आशिष् (आशीर्वाद)। आङ् पूर्वक 'शास्' (अदा० आ०)
धातु से क्विँप् प्रत्यय, आशासः क्वावुपसङ्ख्यानम् वार्त्तिक से इत्व तथा शासि-
वसिघसीनाञ्च (५५४) द्वारा मूर्धन्य षकार करने पर 'आशिष्' शब्द निष्पन्न होता
है। यहां का षत्व (८.३.६०) ससजुषो रुः (८.२.६६) की दृष्टि में असिद्ध है; अतः
पदान्त में सकार समझ कर सर्वत्र ससजुषो रुः (१०५) से रुँत्व हो जाता है। शेष
सम्पूर्ण प्रक्रिया पूर्ववत् होती है। रूपमाला यथा—
प्र० आशीः आशिषौ आशिषः | प० आशिषः आशीर्भ्याम् आशीर्भ्यः
द्वि० आशिषम् ,, ,, | ष० ,, आशिषोः आशिषाम्
तृ० आशिषा आशीर्भ्याम् आशीर्भिः | स० आशिषि ,, आशीःषु,-ष्षु
च० आशिषे ,, आशीर्भ्यः | सं० हे आशीः! आशिषौ! आशिषः!
(यहां षकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
—:०:—
[लघु०] असौ । उत्व-मत्वे—अमू । अमूः । अमुया । अमूभिः । अमुष्यै ।
अमूभ्यः । अमुष्याः । अमुयोः । अमूषाम् । अमुष्याम् । अमूषु ॥
व्याख्या—'अदस्' शब्द की पुंल्लिङ्ग में प्रक्रिया लिख चुके हैं, अब स्त्रीलिङ्ग
में लिखते हैं।
अदस्+सुँ। यहां पुंल्लिङ्ग के समान ही अदस औ सुँ-लोपश्च (३५५) द्वारा
सकार को औकार और सुँ का लोप, तदोः सः० (३१०) से दकार को सकार तथा
अन्त में वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि होकर—'असौ' प्रयोग सिद्ध होता है।
१. कई लोग शस् में—परमात्मा जनेभ्य आशीर्ददाति—इस प्रकार भ्रम से अशुद्ध
लिखते हैं; आशिषो ददाति—लिखना चाहिये।
४६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
अदस् + औ। त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप् और सवर्णदीर्घ होकर—अदा+औ।
औङ आप् (२१६) से औ को शी हो गुण एकादेश करने से—'अदे'। अब अदसोऽसे-
र्दादु दो म (३५६) से एकार को ऊकार तथा दकार को मकार करने पर—अमू।
अदस् + अस् (जस्) = अदा + अस्। दीर्घाज्जसि च (१६२) सूत्र से पूर्व-
सवर्णदीर्घ का निषेध होकर सवर्णदीर्घ हो जाता है—अदा। अब ऊत्व मत्व करने से
—'अमू' सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यहा अदन्त सर्वनाम न होने से जस् को शी
आदेश तथा एकार न होने के कारण एत ईद्० (१२७) सूत्र प्रवृत्त नही होता।
अदस् + अम् = अदा + अम्। पूर्वरूप कर ऊत्व मत्व करने से—अमूम्।
अदस् + अस् (शस्) = अदा + अस्। पूर्वसवर्णदीर्घ होकर ऊत्व मत्व हो जाते
हैं—अमू।
अदस् + आ (टा) = अदा + आ। आङि चाप (२१८) से एकार होकर अय्
आदेश करने से—अदया। अब उत्व मत्व करने से—अमुया।
अदस् + भ्याम् = अदा + भ्याम्। ऊत्व मत्व करने से—अमूभ्याम्।
अदस् + ए (ङे) = अदा + ए। सर्वनामसञ्ज्ञा हो कर सर्वनाम्न स्याड्ढ्रस्व-
श्च (२२०) से स्याट् आगम और आप् को ह्रस्व हो —अद + स्या ए। पुन वृद्धि कर
के उत्व, मत्व और षत्व करने से—अमुष्यै।
अदस् + अस् (ङसिं वा ङस्) = अदा + अस् = अदस्या। अब उत्व, मत्व
और षत्व करने पर—अमुष्या।
अदस् + ओस् = अदा + ओस्। आङि चाप (२१८) से एकार तथा एचोऽय-
वायाव (२२) से अय् आदेश हो—अदयो। उत्व मत्व करने पर—अमुयो।
अदस् + आम् = अदा + आम्। सर्वनाम होने से आमि सर्वनाम्न सुट् (१५५)
द्वारा सुँट् आगम कर ऊत्व मत्व और षत्व हो जाता है—अमूषाम्।
अदस् + इ (ङि) = अदा + इ। डेराम्नद्याम्नीभ्य (१६८) से ङि को आम्
हो स्याट् आगम और आप् को ह्रस्व करने से—अदस्याम्। अब उत्व मत्व और षत्व
करने पर—अमुष्याम्।
अदस् + सुप् = अदा + सु। ऊत्व मत्व और षत्व होकर—अमूषु।
'अदस्' शब्द की स्त्रीलिङ्ग मे रूपमाला यथा—
प्र० असौ अमू अमू | प० अमुष्या अमूभ्याम् अमूभ्य
द्वि० अमूम् " " | ष० " अमुयो अमूषाम्
तृ० अमुया अमूभ्याम् अमूभि | स० अमुष्याम् , अमूषु
च० अमुष्यै " अमूभ्य | सम्बोधन प्राय नही होता।
नोट—स्त्रीलिङ्ग मे अदस् शब्द की सिद्धि करते समय मुं को छोड़ अन्य सब
विभक्तियो मे सर्वप्रथम 'अदा' रूप बना लेना चाहिये। तब 'सर्वा' शब्द के समान
प्रक्रिया कर के अदसोऽसेर्दादु दो म (३५६) सूत्र प्रवृत्त करना चाहिये। ऐसा करने
से प्रक्रिया मे अशुद्धि नहीं हो सकेगी।
हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ४६३
विशेष—अप्सरस्, उपस्, सुमनस् (पुष्प) प्रभृति सकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों
के रूप 'वेधस्' शब्द के तुल्य होते हैं कुछ विशेष नहीं होता । हां ! इन में पुष्पवाचक
'सुमनस्' प्रायः बहुवचन में प्रयुक्त होता है ।
(यहां सकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
[लघु०] इति हलन्ताः स्त्रीलिङ्गाः [ शब्दाः ] ॥
अर्थः—यहां हलन्त-स्त्रीलिङ्ग शब्दों का प्रकरण समाप्त होता है ।
अभ्यास (४७)
(१) निम्नलिखित शब्दों के सब विभक्तियों में रूप लिखें—
सुमनस्, त्विष्, उपानह्, दिव्, अप्, सजूष्, इदम् (स्त्रीलिङ्ग के अन्वा-
देश में), एतद् (स्त्रीलिङ्ग), चतुर् (स्त्रीलिङ्ग), किम् (स्त्रीलिङ्ग),
अदस् (पुंलिङ्ग स्त्रीलिङ्ग दोनों) ।
(२) दृश्, उष्णिक्, दिग् आदि चाहे पुंलिङ्ग हों या स्त्रीलिङ्ग एक समान
रूप बनते हैं पुनः इन्हें स्त्रीलिङ्गी क्यों माना जाता है ?
(३) 'उपानह्+भ्याम्' में हो ढः सूत्र क्यों प्रवृत्त नहीं होता ?
(४) अप्शब्दो नित्यं बहुवचनान्तः—इस पर यथाधीत नोट लिखें ।
(५) विव्वंन्नन्त न होने पर भी 'दृश्' में कुत्व कैसे हो जाता है ?
(६) निम्नलिखित सूत्रों की सोदाहरण व्याख्या करें—
१. अपो भि । २. यः सौ । ३. नहो धः । ४. नहिवृतिवृषि० ।
(७) सूत्रोपन्यासपूर्वक निम्नलिखित रूपों की सिद्धि करें—
१ अद्भिः । २ अनया । ३ उपानत् । ४ अमूषाम् । ५ चतस्रः । ६ आपः ।
७ पूः । ८ द्यौः । ६ एनया । १० अमूः । ११ सजूष्षु । १२ इयम् ।
१३ गीर्षु । १४ चतसृणाम् । १५ कस्याम् । १६ उष्णिक् । १७ द्युषु ।
१८ अमुष्यै । १६ तस्याः । २० दिक् ।
—:०:—
इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त-
कौमुद्यां हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-
प्रकरणं समाप्तम् ॥
अथ हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम्
[लघु०] स्वमोर्लुक्। दत्वम्। स्वनडुत्, स्वनडुद्। स्वनडुही। चतुरनडुहो ०
(२५६) इत्याम्। स्वनड्वांहि। पुनस्तद्वत्¹। शेषं पुंवत् ॥
व्याख्या—स्वनडुह् (अच्छे बैलों वाला कुल वा क्षेत्र आदि)। सु—शोभना,
अनड्वाह = वृषभा यस्य तत् स्वनडुत्। यहां 'सु' और 'अनडुह्' का बहुव्रीहिसमास
होता है। समाससञ्ज्ञा होने के कारण कृत्तद्धितसमासाश्च (११७) द्वारा प्रातिपदिक-
सञ्ज्ञा होकर स्वादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं।
स्वनडुह् + सु (सुं) : यहां हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) द्वारा सुं लोप प्राप्त होता
है। परन्तु अपवाद होने के कारण उस का बाध कर स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) द्वारा सुं
का लुक् हो जाता है। पुनः प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् (१६०) द्वारा पदसञ्ज्ञा² हो
जाने से वसुस्रंसु० (२६२) सूत्र से हकार को दकार³ तथा वाऽवसाने (१४६) से
वैकल्पिक चर्त्व-दकार होकर—'स्वनडुत्, स्वनडुद्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं।
स्वनडुह् + औ। यहां नपुंसकाच्च (२३५) सूत्र से 'औ' को 'शी' आदेश
हो कर अनुबन्धलोप करने से—स्वनडुही।
स्वनडुह् + जस्। यहां जश्शसोः शि (२३७) से जस् को शि आदेश, शि
सर्वनामस्थानम् (२३८) से उस की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा, चतुरनडुहोरामुदात्तः (२५६)
से आम् का आगम तथा नपुंसकस्य झलच (२३६) से नुम् का आगम होकर—'स्व-
नडु आन् ह् + इ'। अब इको यणचि (१५) से यण् और नश्चापदान्तस्य झलि (७८)
से नकार को अनुस्वार करने से—'स्वनड्वांहि' प्रयोग सिद्ध होता है।
स्वनडुह् + अम्। यहां भी स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से अम् का लुक्, पदान्त
में हकार को दकार तथा वैकल्पिक चर्त्व करने से—स्वनडुत्, स्वनडुद्।
औट् में औ की तरह तथा शस् में जस् की तरह रूप बनते हैं। शेष विभक्तियों
में पुंवत् (पुंल्लिङ्ग की तरह) रूप होते हैं। 'स्वनडुह्' की रूपमाला यथा—
१ पुनः उसी प्रकार अर्थात् द्वितीया विभक्ति के रूप भी प्रथमाविभक्ति के समान होते
हैं। क्योंकि नपुंसक में सुं के समान अम् का भी लुक् हो जाता है। 'औ' तथा
'औट्' में तो कोई अन्तर ही नहीं, और शस् को भी जस् के समान 'शि' आदेश
होता है। यह नियम प्रायः सर्वत्र नपुंसक में प्रयुक्त होता है।
२ ध्यान रहे कि पदसञ्ज्ञा अङ्गकार्य नहीं क्योंकि यह अङ्ग (प्रकृति) और प्रत्यय
दोनों की समुदाय संज्ञा है। अतः पदसञ्ज्ञा करने से न लुमताङ्गस्य (१६१)
द्वारा प्रत्ययलक्षण का निषेध नहीं होता।
३. वसुस्रंसु० (२६२) यह अङ्गाधिकारस्थ कार्य है, अतः यह तदन्त में भी प्रवृत्त होता
है। देखें पदाङ्गाधिकारे तस्य च तदन्तस्य च (५०)।
हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ४६५
प्र० स्वनडुत्,-द् स्वनडुही स्वनड्वांहि | प० स्वनडुहः स्वनडुद्भ्याम् स्वनडुद्भ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | ष० ,, स्वनडुहोः स्वनडुहाम्
तृ० स्वनडुहा स्वनडुद्भ्याम् स्वनडुद्भिः | स० स्वनडुहि ,, स्वनडुत्सु
च० स्वनडुहे ,, स्वनडुद्भ्यः | सं० हे स्वनडुत्-द्! स्वनडुही! स्वनड्वांहि!
भ्याम्, भिस्, भ्यस् और सुप् में वसुंस्रंसुं० (२६२) से दत्व हो जाता है।
(यहां हकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
—::o::—
[लघु०] वाः । वारी । वारि । वार्भ्याम् ॥
व्याख्या—वार् (जल) । आपः स्त्री भूम्नि वार्वारि—इत्यमरः ।
वार् + सुं । स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुं का लुक् होकर अवसान में रेफ
को विसर्ग हो जाता है—वाः ।
वार् + औ । नपुंसकाच्च (२३५) से औ को शी हो—वार् + शी = वारी ।
वार् + जस् । जश्शसोः शिः (२३७) से जस् को शि हो—वार् + शि = वारि ।
रेफ का झलों में पाठ न होने से यहां नपुंसकस्य झलचः (२३६) से नुँम् का आगम
नहीं होता । 'वार्' (जल) शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० वाः वारी वारि | प० वारः वार्भ्याम् वार्भ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | ष० ,, वारोः वाराम्
तृ० वारा वार्भ्याम् वार्भिः | स० वारि ,, वार्षु†
च० वारे ,, वार्भ्यः | सं० हे वाः ! हे वारी ! हे वारि !
† यहां रुँ का रेफ न होने से विसर्ग आदेश नहीं होता—रोः सुपि (२६८) ।
[लघु०] चत्वारि ॥
व्याख्या—'चतुर' शब्द त्रिलिङ्गी तथा नित्य बहुवचनान्त होता है । यहां
नपुंसक में इस की प्रक्रिया दर्शाई जाती है—
चतुर् + जस् = चतुर् + शि । शि सर्वनामस्थानम् (२३८) द्वारा 'शि' की सर्व-
नामस्थानसञ्ज्ञा होकर चतुरनडुहोः० (२५६) से आम् का आगम तथा इको यणचि
(१५) सूत्र से यण् आदेश होकर—चत्वारि । इसी प्रकार शस् में । शेष विभक्तियों
में पुंवत् प्रक्रिया जाननी चाहिये । रूपमाला यथा—
विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन | विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्र० ० ० चत्वारि | प० ० ० चतुर्भ्यः
द्वि० ० ० ,, | ष० ० ० चतुर्णाम्
तृ० ० ० चतुर्भिः | स० ० ० चतुर्षु
च० ० ० चतुर्भ्यः | सम्बोधन नहीं होता ।
(यहां रेफान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
—::o::—
६. कृदन्त, तद्धित, स्त्रीप्रत्यय प्रकरण एवं ग्रन्थ उपसंहार
४६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
[लघु०] किम् । के । कानि ॥
व्याख्या—किम्+सुं। स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुं का लुक् होकर—किम्।
अत्र विभक्ति परे न होने से किमः कः (२७१) से 'क' आदेश नहीं हो सकता, प्रत्यय-
लक्षण भी न लुमताङ्गस्य (१६१) के निषेध के कारण नहीं हो पाता।
किम्+औ। यहां विभक्ति परे होने के कारण किमः कः (२७१) से क आदेश
होकर औ को शी और गुण करने से—के।
किम्+जस्। क आदेश होकर ज्ञानशब्दवत्—कानि। रूपमाला यथा—
प्र० किम् के कानि प० कस्मात्* काभ्याम् केभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, प० कस्य कयोः केषाम्‡
तृ० केन काभ्याम् कैः स० कस्मिन्* ,, केषु
च० कस्मै† ,, केभ्यः सम्बोधन नहीं होता।
¶ सर्वनाम्नः स्मै (१५३)। * ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ (१५४)।
† आमि सर्वनाम्नः सुट् (१५५), बहुवचने० (१४५), आदेशप्रत्यययोः (१५०)।
[लघु०] इदम् । इमे । इमानि ॥
व्याख्या—नपुंसकलिङ्ग में 'इदम्' शब्द की प्रक्रिया यथा—
इदम् + सुं। स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुं का लुक् होकर—इदम्। विभक्ति
का लुक् होने से इदमो मः (२७२) तथा त्यदाद्यत्व आदि नहीं होते।
इदम् + औ। त्यदाद्यत्व, पररूप, शी आदेश, गुण और दश्च (२७५) द्वारा
दकार को मकार होकर—इमे।
इदम् + जस्। त्यदाद्यत्व, पररूप, शि आदेश, उस की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा,
अवर्णान्त होने से नुम् आगम, उपधादीर्घ और दकार को मकार करने पर—इमानि।
द्वितीया में भी इसी तरह रूप बनते हैं। शेष पुंवत् जानें। रूपमाला यथा—
प्र० इदम् इमे इमानि प० अस्मात् आभ्याम् एभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, प० अस्य अनयोः एषाम्
तृ० अनेन आभ्याम् एभिः स० अस्मिन् ,, एषु
च० अस्मै ,, एभ्यः सम्बोधन नहीं होता।
[लघु०] वा०—(२६) अन्वादेशे नपुंसके एनद्वक्तव्यः ॥
एनत्, एनद् । एने । एनानि । एनेन । एनयोः २ ॥
अर्थ—द्वितीया, टा और ओस् विभक्ति परे होने पर नपुंसकलिङ्ग में अन्वा-
देश में इदम् और एतद् शब्द के स्थान पर 'एनत्' आदेश हो जाता है।
व्याख्या—यह वार्तिक द्वितीयाटौस्स्वेनः (२८०) सूत्र पर भाष्य में पढ़ा गया
है, अतः यह तद्विषयक ही है।
यह 'एनत्' आदेश अम् के लिये ही किया गया है, क्योंकि अन्य विभक्तियों
(औट्, शस्, टा, ओस्) में तो द्वितीयाटौस्स्वेनः (२८०) से भी कार्य निकल सकता
हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ४६७
है। भाष्यकार ने भी यही स्वीकार किया है—एनदिति नपुंसक एकवचने वक्तव्यम्,
कुण्डमानय, प्रक्षालयैनत् ।
इदम् + अम् । यहां स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से अम् का लुक् होकर प्रत्यय-
लक्षण का निषेध होने पर भी एनद्विधानसामर्थ्य से अम् को मानकर प्रकृतवार्त्तिक से
'एनत्' आदेश हो जाता है । पुनः जश्त्व-चर्त्व करने पर—'एनत्, एनद्' ये दो रूप
सिद्ध होते हैं ।
इदम् + औट् = इदम् + शी = एनत् + ई । त्यदाद्यत्व, पररूप, तथा गुण एका-
देश होकर—एने ।
इदम् + शस् = इदम् + शि = एनत् + इ । त्यदाद्यत्व, पररूप, नपुंसकस्य
झलचः (२३६) से नुँम् आगम तथा सर्वनामस्थाने चाऽसंबुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ
होकर—एनानि ।
इदम् + टा = एनत् + आ । त्यदाद्यत्व, पररूप तथा टाङसिङसामिनात्स्याः
(१४०) से टा को इन आदेश और गुण एकादेश करने पर—एनेन् ।
इदम् + ओस् = एनत् + ओस् = एन + ओस् । ओसि च (१४७) से अकार
को एकार होकर अय् आदेश करने से—एनयोः ।
नोट—वस्तुतः अम् से भिन्न अन्य विभक्तियों में उपर्युक्त भाष्य के वचन से
द्वितीयाटौस्स्वेनः (२८०) द्वारा 'एन' आदेश ही होता है, एनत् नहीं । हम ने यह सब
मतान्तर के आश्रय से ही लिखा है ।
नपुंसकलिङ्ग के अन्वादेश में 'इदम्' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० इदम् इमे इमानि | प० अस्मात् आभ्याम् एभ्यः
द्वि० एनत्-द् एने एनानि | ष० अस्य एनयोः एषाम्
तृ० एनेन आभ्याम् एभिः | स० अस्मिन् " एषु
च० अस्मै " एभ्यः | सम्बोधन में प्रयोग नहीं होता ।
(यहां मकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
—: : ० : :—
[लघु०] अहः । विभाषा ङिःश्योः (२४८)—अह्नी, अहनी । अहानि ॥
व्याख्या—अहन् (दिन) । घस्रो दिनाहनी वा तु क्लीवे दिवसवासरौ—इत्य-
मरः ।
अहन् + सुँ । स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुँ का लुक्, रोऽसुपि (११०)¹ से
नकार को रेफ आदेश और खरवसानयोः० (६३) से उसे विसर्ग करने पर 'अहः'²
प्रयोग सिद्ध होता है ।
अहन् + औ । यहां यचि भम् (१६५) सूत्र द्वारा भसञ्ज्ञा होने के कारण
१. यहाँ अहन् (३६३) से रुँत्व न होकर 'असुंपि' के सामर्थ्य से रत्व होगा ।
२. 'अहः + इदम्' की सन्धि 'अहरिदम्' । इसी प्रकार 'अहर्भाति' । देखें (११०) ।
ल० प्र० (३२)
विभाषा ङिश्यो (२४८) से अन् के अकार का विकल्प से लोप हो जाता है—
अह्नी, अहनी।
अहन् + जस् = अहन् + शि। यहां सर्वनामस्थाने० (१७७) से उपधादीर्घ हो
कर—अहानि। भसञ्ज्ञा न होने से अन् के अकार का लोप न होगा।
अहन् + आ (टा)। भसञ्ज्ञा होकर अल्लोपोऽन (२४७) से अन् के अकार
का नित्य लोप हो जाता है—अह्ना।
अहन् + भ्याम्। यहां अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३६३) अहन् ।८।२।६८॥
अहन् इत्यस्य रुँ पदान्ते। अहोभ्याम्॥
अर्थ—पदान्त में 'अहन्' के नकार के स्थान पर रुँ आदेश हो जाता है।
व्याख्या—अहन् ।६।१। (यहां षष्ठी का लुक् हुआ है)। रुँ ।१।१। (ससजुषो
रुँ से)। पदस्य ।६।१। (अधिकृत है)। अन्ते ।७।१। (स्को० से) अथ—(पदस्य)
पद के (अन्त) अन्त में (अहन्) अहन् शब्द के स्थान पर (रुँ) रुँ आदेश हो जाता है।
अलोऽन्त्यविधि से यह आदेश अन्त्य अल्—नकार के स्थान पर होता है।
अहन् + भ्याम्। यहां प्रकृतसूत्र से नकार को रुँ आदेश होकर हशि च (१०७)
से उत्व तथा आद् गुण (२७) से गुण करने पर—अहोभ्याम्। इसी प्रकार—
अहोभि, अहोभ्यः।
अहन् + ङि (डि)। भसञ्ज्ञा होकर विभाषा ङिश्यो (२४८) से विकल्प कर
के अन् के अकार का लोप हो जाता है—अह्नि, अहनि।
अहन् + सुप्। रुँत्व विसर्ग होकर—अहःसु। वा शरि (१०४) से विकल्प
कर के विसर्ग तथा पक्ष में विसर्जनीयस्य सः (६६) से विसर्ग के स्थान पर सकार
आदेश होकर—अहःसु अहस्सु। रूपमाला यथा—
प्रथमा अहः अह्नी, अहनी अहानि
द्वितीया ,, ,, ,,
तृतीया अह्ना अहोभ्याम् अहोभि
चतुर्थी अह्ने ,, अहोभ्य
पञ्चमी अह्नः ,, ,,
षष्ठी ,, अह्नोः अह्नाम्
सप्तमी अह्नि, अहनि ,, अहःसु, अहस्सु
सम्बोधन हे अहः ! हे अह्नी, अहनी ! हे अहानि !
[लघु०] दण्डि॥
व्याख्या—दण्डोऽस्यास्तीति—दण्डी (कुलम्)। अत इनिठनौ (११८४)।
दण्डिन् + सुं। यहां स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सु का लुक् होकर—न लोप०
(१८०) से नकार का भी लोप हो जाता है—दण्डि।
हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ४६६
हे दण्डिन् + सुं । सुं का लुक् होकर नकारलोप प्राप्त होता है । इस पर अग्रिम-
वार्त्तिक से विकल्प होता है—
[लघु०] वा०—(३०) सम्बुद्धौ नपुंसकानां नलोपो वा वाच्यः ॥
हे दण्डिन् !, हे दण्ड ! । दण्डिनी । दण्डीनि । दण्डिना । दण्डिभ्याम् ॥
अर्थ:—सम्बुद्धि परे होने पर नपुंसकों के नकार का विकल्प से लोप हो ।
व्याख्या—'हे दण्डिन्' यहां प्रत्ययलक्षण द्वारा सम्बुद्धि के परे होने से नकार
का विकल्प कर के लोप हो जाता है । लोपपक्ष में—हे दण्ड !, लोपाभावपक्ष में—
हे दण्डिन् ! ।
दण्डिन् + औ = दण्डिन् + शी = दण्डिनी ।
दण्डिन् + अस् (जस्) = दण्डिन् + शि । सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७)
से उपधादीर्घ होकर—दण्डीनि¹ ।
दण्डिन् (दण्ड वाला कुल आदि) शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० दण्डि दण्डिनी दण्डीनि । प० दण्डिनः दण्डिभ्याम् दण्डिभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, । ष० ,, दण्डिनोः दण्डिनाम्
तृ० दण्डिना दण्डिभ्याम् दण्डिभिः । स० दण्डिनि ,, दण्डिषु
च० दण्डिने ,, दण्डिभ्यः सं० हे दण्डि,-न्! दण्डिनी दण्डीनि!
[लघु०] सुपथि । टेर्लोपः—सुपथी । सुपन्थानि ॥
व्याख्या—सुन्दराः पन्थानो यस्मिन् तत् सुपथि नगरम् । बहुव्रीहिसमासः ।
सुपथिन् + सुं । यहां 'दण्डिन्' के समान सुंलुक् तथा नकारलोप होकर—
सुपथि ।
सुपथिन् + औ = सुपथिन् + ई (शी) । भसञ्ज्ञा होकर भस्य टेर्लोपः (२६६)
से 'इन्' भाग का लोप हो जाता है—सुपथी ।
सुपथिन् + जस् = सुपथिन् + शि । यहां 'शि' की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा होकर
इतोऽत्सर्वनामस्थाने (२६४) से इकार को अकार तथा थो न्थः (२६५) सूत्र से थकार
को न्थ् आदेश हो जाता है । अत्र सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ
करने पर—सुपन्थानि ।
सुपथिन् (सुन्दर मार्गों वाला नगर आदि) शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० सुपथि सुपथी सुपन्थानि । प० सुपथः सुपथिभ्याम् सुपथिभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, । ष० ,, सुपथोः सुपथाम्
तृ० सुपथा सुपथिभ्याम् सुपथिभिः । स० सुपथि ,, सुपथिषु
च० सुपथे ,, सुपथिभ्यः सं० हे सुपथि,-न् ! सुपथी! सुपन्थानि !
(यहां नकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
――:०:――
१. यहां इन्हन्पूषार्यम्णां शौ (२८४) के नियम के कारण दीर्घनिषेध नहीं होता ।
५०० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
[लघु०] ऊर्क्, ऊर्ग् । ऊर्जी । ऊर्न्जि । नरजाना संयोगः ॥
व्याख्या—ऊर्ज् (बल वा तेज) । ऊर्ज बलप्राणनयोः (चु० उभ०) धातु से
क्विप् प्रत्यय करने पर उस का सर्वापहार लोप हो 'ऊर्ज्' शब्द निष्पन्न होता है ।
ऊर्ज् + सुँ । सुँ का लुक् होकर चोः कुः (३०६) द्वारा जकार को गकार तथा
वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक चत्त्व करने पर—ऊर्क्, ऊर्ग् ।
ऊर्ज् + औ = ऊर्ज् + शी = ऊर्जी ।
ऊर्ज् + जस् = ऊर्ज् + शि । यहां नपुंसकस्य झलचः (२३६) द्वारा अच् से
परे नुँम् आगम होकर—'ऊर्न्जि'¹ सिद्ध होता है । समग्र रूपमाला यथा—
प्र० ऊर्क्, ग् ऊर्जी ऊर्न्जि | पं० ऊर्जः ऊर्भ्याम् ऊर्भ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | ष० ,, ऊर्जोः ऊर्जाम्
तृ० ऊर्जा ऊर्भ्याम् ऊर्ग्भिः | स० ऊर्जि ,, ऊर्क्षु
च० ऊर्जे ,, ऊर्ग्यः | सं० हे ऊर्क्,-ग् । ऊर्जी । ऊर्न्जि ।
(यहाँ जकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
[लघु०] तत् । ते । तानि । यत् । ये । यानि । एतत् । एते । एतानि ॥
व्याख्या—तद् + सुँ । सुँ का लुक् हो वैकल्पिक चत्त्व करने से—तत्, तद् ।
ध्यान रहे कि यहां सुँ का लुक् हो जाने से तदोः सः सौ (३१०) द्वारा तकार को सकारा-
देश नहीं होता । इसी प्रकार एतद् शब्द में भी समझ लेना चाहिये ।
तद् + औ । त्यदाद्यत्व, पररूप, 'औ' को शी कर गुण करने से—ते ।
तद् + जस् । त्यदाद्यत्व, पररूप, जस् को शि आदेश, नुँम् आगम और उपधा-
दीर्घ होकर—तानि । द्वितीया में भी इसी प्रकार होता है । शेष पूर्ववत् जानें ।
'तद्' (वह) शब्द की नपुंसकलिंग में रूपमाला यथा—
प्र० तत्, तद् ते तानि | पं० तस्मात्, द् ताभ्याम् तेभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | ष० तस्य तयोः तेषाम्
तृ० तेन ताभ्याम् तैः | स० तस्मिन् ,, तेषु
च० तस्मै ,, तेभ्यः | सम्बोधन नहीं होता ।
इसी प्रकार नपुंसकलिंग में यद् (जो) शब्द की रूपमाला यथा—
१ 'ऊर्ज्नि' लिखने वाले सावधान रहें । क्योंकि वैसा लिखने से रेफ सब से पहले पढ़ा
जायेगा, जैसे—'कार्त्स्न्य' आदि में होता है । परन्तु हमें नकार (नुँम्) का पाठ
रेफ से पूर्व करना इष्ट है । अतः 'ऊर्न्जि' इस ढंग से ही लिखना चाहिये । ग्रन्थ-
कार ने भी लेखकों की इस भ्रान्ति की ओर ध्यान देते हुए—नरजानां संयोग
(नकार, रेफ और जकार का संयोग है) ऐसा स्पष्ट लिख दिया है । अत एव
रेफ का बीच में व्यवधान पड़ने से नकार को णत्व नहीं होता ।
हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ५०१
प्र० यत्-द् ये यानि | प० यस्मात्-द् याभ्याम् येभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | ष० यस्य ययोः येषाम्
तृ० येन याभ्याम् यैः | स० यस्मिन् ,, येषु
च० यस्मै ,, येभ्यः सम्बोधन नहीं होता।
इसी प्रकार नपुंसकलिङ्ग में 'एतद्' (यह) शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० एतत्-द् एते एतानि | प० एतस्मात्-द् एताभ्याम् एतेभ्यः
द्वि० ,, ,, ,, | ष० एतस्य एतयोः एतेषाम्
तृ० एतेन एताभ्याम् एतैः | स० एतस्मिन् ,, एतेषु
च० एतस्मै ,, एतेभ्यः सम्बोधन नहीं होता।
(यहां दकारान्त नपुंसक-शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
—:: o ::—
[लघु०] गवाक्। गोची। गवाञ्चि। पुनस्तद्वत्। गोचा। गवाग्भ्याम्॥
व्याख्या—गो अञ्च् (गो के पीछे चलने वाला कुल आदि)।
गामञ्चतीति—गवाक्। 'गो' कर्म उपपद होने पर गत्यर्थक अञ्चुं (भ्वा० प०)
धातु से ऋत्विग्दधृक्० (३०१) सूत्र से क्विन्-प्रत्यय, उस का सर्वापहारलोप, अनिदि-
ताम्० (३३४) से उपधा के नकार का लोप होकर—गो अच्। अब इस से स्वादि
प्रत्यय उत्पन्न होते हैं—
'सुं' में—गो अच् + सु्। स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुं का लुक्, क्विन्-प्रत्य-
यस्य कुः (८.२.६२) के असिद्ध होने से चोः कुः (८.२.३०) द्वारा चकार को ककार
होकर जश्त्व-चर्त्व प्रक्रिया करने से—'गो अक्, गो अग्'। अब 'गो' शब्द के ओकार
तथा 'अक्' शब्द के अकार के मध्य तीन प्रकार की सन्धि [अवङ् स्फोटायनस्य (४७)
से वैकल्पिक अवङ् हो कर सवर्णदीर्घ, अवङ्-अभाव में सर्वत्र विभाषा गोः (४४) से
वैकल्पिक प्रकृतिभाव, प्रकृतिभाव के अभाव में एङः पदान्तादति (४३) से पूर्वरूप]
होने से छः रूप सिद्ध होते हैं। यथा— (अवङ्पक्ष में) १. गवाक्, २. गवाग् । (प्रकृति-
भावपक्ष में) ३. गोअक्, ४. गोअग्। (पूर्वरूपपक्ष में) ५. गोऽक्, ६. गोऽग्।
'औ' में—गो अच् + औ। यहां नपुंसकाच्च (२३५) से 'औ' को शी, अनुबन्ध-
लोप, यचि भम् (१६५) से भसञ्ज्ञा तथा अचः (३३५) सूत्र से अकार का लोप
होकर—'गोची' यह एक ही रूप सिद्ध होता है। इस प्रकार गति अर्थ में भसञ्ज्ञा के
सब स्थलों में यही बात समझनी चाहिये।
'जस्' में—गो अच् + जस्। जश्शसोः शिः (२३७) से जस् को शि आदेश,
उस की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा होकर उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः (२८६) सूत्र से नुँम्
आगम, नश्चापदान्तस्य झलि (७८) से नकार को अनुस्वार, अनुस्वारस्य ययि पर-
सवर्णः (७६) से परसवर्ण ञकार तथा उपर्युक्त तीनों प्रकार की सन्धि करने से—
गवाञ्चि, गोअञ्चि, गोऽञ्चि ये तीन रूप सिद्ध होते हैं।
द्वितीया विभक्ति में भी प्रथमावत् प्रक्रिया होती है।
५०२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
'टा' मे—गो अच् + आ (टा)। भसञ्ज्ञा होकर अच.(३३५) से अकार का
लोप हो जाता है—गोचा।
भ्याम्' मे—गो अच् + भ्याम्। यहा भसञ्ज्ञा न होने से अकारलोप नही
होता। पदान्त म चोः कु (३०६) द्वारा कुत्व-ककार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से
उसे गकार करने पर तीन प्रकार की सन्धि हो जाती है—१. गवाग्भ्याम्, २. गो-
अग्भ्याम्, ३. गोऽग्भ्याम्। इसी प्रकार—भिस्, भ्यस् और सुप् मे तीन २ रूप बना
लेने चाहिये। सुप् मे खरि च (७४) से चर्त्व विशेष है।
गतिपक्ष मे 'गोअञ्च्' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० गवाक्,-ग्⎫ ㅤㅤ ⎧ गवाञ्चि ⎹ प० गोच ㅤ गवाग्भ्याम् ㅤ गवाग्भ्य
ㅤㅤगोअक्,-ग्⎬ गोची ⎨ गोअञ्चि ⎹ ㅤㅤㅤ ㅤ गोअग्भ्याम् ㅤ गोअग्भ्य
ㅤㅤगोऽक्,-ग्⎭ ㅤㅤ ⎩ गोऽञ्चि ⎹ ㅤㅤㅤ ㅤ गोऽग्भ्याम् ㅤ गोऽग्भ्यः
द्वि० गवाक्,-ग्⎫ ㅤㅤ ⎧ गवाञ्चि ⎹ ष० गोच ㅤㅤ गोचो ㅤㅤㅤगोचाम्
ㅤㅤगोअक्,-ग्⎬ गोची ⎨ गोअञ्चि ⎹ स० गोचि⎫ ㅤㅤㅤㅤ ⎧ गवाक्षु†
ㅤㅤगोऽक्,-ग्⎭ ㅤㅤ ⎩ गोऽञ्चि ⎹ ㅤㅤ ㅤ ⎬ ㅤ ㅤ " ㅤㅤ⎨ गोअक्षु
ㅤㅤ ㅤㅤㅤ ㅤㅤ ㅤㅤㅤ ㅤ ⎹ ㅤㅤ ㅤ ⎭ ㅤㅤㅤㅤ ⎩ गोऽक्षु
तृ० गोचा⎫ ㅤगवाग्भ्याम् ㅤ ⎧ गवाग्भि ⎹ स० हे गवाक्,-ग् ! ⎫ ㅤहे ㅤ ⎧ हे गवाञ्चि
ㅤㅤ ㅤ ⎬ ㅤगोअग्भ्याम् ㅤ ⎨ गोअग्भिः ⎹ ㅤ हे गोअक्,-ग् ! ⎬ गोची ! ⎨ हे गोअञ्चि
ㅤㅤ ㅤ ⎭ ㅤगोऽग्भ्याम् ㅤ ⎩ गोऽग्भि ⎹ ㅤ हे गोऽक्,-ग् ! ⎭ ㅤ ㅤ ⎩ हे गोऽञ्चि !
ㅤㅤ ㅤ ㅤㅤ ㅤ ㅤㅤ ㅤ ㅤ ⎹ † यहा खरि च (७४) से हुआ चर्त्व
च० गोचे ⎫ ㅤगवाग्भ्याम् ⎧ गवाग्भ्य ⎹ झयो द्वितीया० (वा० १४) की दृष्टि मे
ㅤㅤ ㅤ ⎬ ㅤगोअग्भ्याम् ⎨ गोअग्भ्यः ⎹ असिद्ध है अतः चय् न होने से गकार
ㅤㅤ ㅤ ⎭ ㅤगोऽग्भ्याम् ⎩ गोऽग्भ्य ⎹ आदेश नही होता।
ये सब रूप गत्यर्थक 'अञ्चु' धातु के हैं। यदि 'अञ्चु' धातु पूजार्थक होगी तो
निम्नप्रकारेण प्रक्रिया होगी—
गो अञ्च् (गाय की पूजा करने वाला)। 'गो' कर्मोपपद 'अञ्चु' धातु मे
क्विन्, उस का सर्वापहारलोप, नाञ्चेः पूजायाम् (३४१) से नकार के लोप का निषेध
हो जाता है। अब प्रातिपदिकसञ्ज्ञा होकर स्वादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं—
'सु' मे—गो अञ्च् + सुं। स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुं का लुक्, संयोगा-
न्तस्य लोप (२०) सूत्र से संयोगान्त चकार का लोप; निमित्तापाये नैमित्तिकस्या-
प्यपायः के न्यायानुसार ञकार को पुनः नकार तथा उसे क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४)
सूत्र से ङकार करने पर—'गो अङ्'। अब तीन प्रकार की सन्धि करने मे—'१.
गवाङ्, २ गोअङ्, ३ गोऽङ्' ये तीन रूप सिद्ध होते हैं।
'औ' मे—गो अञ्च् + औ। नपुंसकाच्च (२६५) सूत्र से 'औ' को शी आदेश
होकर तीन प्रकार की सन्धि करने से—'१. गवाञ्ची, २. गोअञ्ची, ३. गोऽञ्ची' ये