लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 512, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ४६७
है। भाष्यकार ने भी यही स्वीकार किया है—एनदिति नपुंसक एकवचने वक्तव्यम्,
कुण्डमानय, प्रक्षालयैनत् ।
इदम् + अम् । यहां स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से अम् का लुक् होकर प्रत्यय-
लक्षण का निषेध होने पर भी एनद्विधानसामर्थ्य से अम् को मानकर प्रकृतवार्त्तिक से
'एनत्' आदेश हो जाता है । पुनः जश्त्व-चर्त्व करने पर—'एनत्, एनद्' ये दो रूप
सिद्ध होते हैं ।
इदम् + औट् = इदम् + शी = एनत् + ई । त्यदाद्यत्व, पररूप, तथा गुण एका-
देश होकर—एने ।
इदम् + शस् = इदम् + शि = एनत् + इ । त्यदाद्यत्व, पररूप, नपुंसकस्य
झलचः (२३६) से नुँम् आगम तथा सर्वनामस्थाने चाऽसंबुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ
होकर—एनानि ।
इदम् + टा = एनत् + आ । त्यदाद्यत्व, पररूप तथा टाङसिङसामिनात्स्याः
(१४०) से टा को इन आदेश और गुण एकादेश करने पर—एनेन् ।
इदम् + ओस् = एनत् + ओस् = एन + ओस् । ओसि च (१४७) से अकार
को एकार होकर अय् आदेश करने से—एनयोः ।
नोट—वस्तुतः अम् से भिन्न अन्य विभक्तियों में उपर्युक्त भाष्य के वचन से
द्वितीयाटौस्स्वेनः (२८०) द्वारा 'एन' आदेश ही होता है, एनत् नहीं । हम ने यह सब
मतान्तर के आश्रय से ही लिखा है ।
नपुंसकलिङ्ग के अन्वादेश में 'इदम्' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० इदम् इमे इमानि | प० अस्मात् आभ्याम् एभ्यः
द्वि० एनत्-द् एने एनानि | ष० अस्य एनयोः एषाम्
तृ० एनेन आभ्याम् एभिः | स० अस्मिन् " एषु
च० अस्मै " एभ्यः | सम्बोधन में प्रयोग नहीं होता ।
(यहां मकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।)
—: : ० : :—
[लघु०] अहः । विभाषा ङिःश्योः (२४८)—अह्नी, अहनी । अहानि ॥
व्याख्या—अहन् (दिन) । घस्रो दिनाहनी वा तु क्लीवे दिवसवासरौ—इत्य-
मरः ।
अहन् + सुँ । स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुँ का लुक्, रोऽसुपि (११०)¹ से
नकार को रेफ आदेश और खरवसानयोः० (६३) से उसे विसर्ग करने पर 'अहः'²
प्रयोग सिद्ध होता है ।
अहन् + औ । यहां यचि भम् (१६५) सूत्र द्वारा भसञ्ज्ञा होने के कारण
१. यहाँ अहन् (३६३) से रुँत्व न होकर 'असुंपि' के सामर्थ्य से रत्व होगा ।
२. 'अहः + इदम्' की सन्धि 'अहरिदम्' । इसी प्रकार 'अहर्भाति' । देखें (११०) ।
ल० प्र० (३२)