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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 505, कुल 633 में से

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पृष्ठ 505

४६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
हुआ किन्तु 'तादृश्' शब्द में त्यदादिषु० (३८७) सूत्र द्वारा देखा जाता है अत यहाँ
क्विन् के अभाव में भी कुत्व हो जायेगा।
दृश् + भ्याम् । षत्व, डत्व और कुत्व होकर — दृग्भ्याम् । दृग्भिः । दृग्भ्यः ।
'दृश्¹' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० दृक्-ग् दृशौ दृशः | प० दृशः दृग्भ्याम् दृग्भ्यः
द्वि० दृशम् ,, ,, | ष० ,, दृशोः दृशाम्
तृ० दृशा दृग्भ्याम् दृग्भिः | स० दृशि ,, दृक्षु
च० दृशे ,, दृग्भ्यः | सं० हे दृक्-ग् ! हे दृशौ ! हे दृशः !
इसी प्रकार —तादृश, एतादृश, यादृश् आदि के स्त्रीलिङ्ग में रूप समझने
चाहियें² ।
(यहाँ शकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
—•—
[लघु०] त्विट्, त्विड्। त्विड्भ्याम्॥
व्याख्या—त्विष् (कान्ति)। त्विषेँ दीप्तौ (भ्वा० उभ०) धातु से क्विप्
प्रत्यय करने पर 'त्विष्' शब्द निष्पन्न होता है। 'त्विष्' शब्द की सम्पूर्ण प्रक्रिया
पुँल्लिङ्ग के 'रत्नमुष्' शब्द के समान होती है। रूपमाला यथा—
प्र० त्विट्-ड्* त्विषौ त्विषः | प० त्विषः त्विड्भ्याम् त्विड्भ्यः
द्वि० त्विषम् ,, ,, | ष० ,, त्विषोः त्विषाम्
तृ० त्विषा त्विड्भ्याम्† त्विड्भिः | स० त्विषि ,, त्विट्त्सु-ट्सु‡
च० त्विषे ,, त्विड्भ्यः | सं० हे त्विट्-ड् ! हे त्विषौ ! हे त्विषः !
*झलां जशोऽन्ते (६७), वाऽवसाने (१४६) । †झलां जशोऽन्ते (६७) ।
‡जश्त्व करने पर धुँट् प्रक्रिया ।
इसी प्रकार—प्रावृष्, (वर्षा ऋतु), रुष् (क्रोध) प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं।
[लघु०] ससजुषो रुँ (१०५) इति रुँत्वम् । सजूः । सजुषौ । सजूभ्याम् ।
आशीः । आशिषौ । आशीर्भ्याम् ॥
व्याख्या—सजुष् (मित्र) । सह जुषते=सेवते इति सजूः । जुषीँ प्रीतिसेवनयोः
(तुदा० आ०) इति धातोः क्विप् । सहस्य सः संज्ञायाम् (६/३/७७) इति सूत्रेण,
ससजुषो रुँ (१०५) इति निपातनाद्वा सहस्य स भावः ।
'सजुष्+सुँ' । सुँलोप होकर ससजुषो रुँ (१०५) सूत्र में विशेष उल्लेख के
कारण सजुष् के षकार को रुँ आदेश, वोरोपधाया दीर्घ इकः (३५१) से उपधादीर्घ
तथा रेफ को विसर्ग करने से 'सजूः' प्रयोग सिद्ध होता है।
१ 'तादृश्' शब्द के रूपों में 'ता' हटा दिया जाये तो 'दृश्' शब्द के रूप हो जाते हैं।
२ तादृशी, एतादृशी, यादृशी आदि रूप क्वबन्त 'तादृश्' आदि शब्दों से टिड्ढाणञ्०
(१२४७) द्वारा ङीप् कर भसंज्ञक अकार का लोप करने से बनते हैं। इन के
उच्चारण नदीवत् होते हैं !