लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्त्रीलिङ्ग में प्रयुक्त होता है। आपः स्त्री भूम्नि वार्वारि—इत्यमरः । लिङ्गानुशासन के
स्त्रीप्रकरण में भी अप्-सुमनस्-समा-सिकता-वर्षाणां बहुत्वं च (सूत्र २६) । आप्नुवन्ति
शरीरमिति आपः । 'आप्नॢँ व्याप्तौ (स्वा० प०) धातु से 'आप्नोतेर्ह्रस्वश्च (उणा०
२।१६) सूत्र द्वारा क्विप् प्रत्यय तथा धातु के आकार को ह्रस्व करने पर जलवाचक
'अप्' शब्द निष्पन्न होता है ।
अप् + अस् (जस्) । 'जस्' प्रत्यय सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक होता है अतः उसके
: परे होने पर अप्तृन्० (२०६) सूत्र द्वारा 'अप्' की उपधा को दीर्घ होकर—आपस्
: = 'आपः' प्रयोग बनता है ।
अप् + अस् (शस्) । शस् सर्वनामस्थान नहीं अतः इस के परे उपधादीर्घ नहीं
होता । स्वर-व्यञ्जन का संयोग हो रुत्व-विसर्ग करने से—अपः ।
अप् + भिस् । यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(३६२) अपो भि ।७।४।४८॥
अपस्तकारो भादौ प्रत्यये । अद्भिः । अद्भ्यः २ । अपाम् । अप्सु ॥
अर्थः—भकारादि प्रत्यय परे हो तो 'अप्' को तकार आदेश हो ।
व्याख्या—अपः ।६।१। तः ।१।१। (अच उपसर्गात्तः से । तकारादकार उच्चार-
णार्थः) । भि ।७।१। (अङ्गस्य का अधिकार होने से 'प्रत्यये' उपलब्ध हो जाता है ।
'प्रत्यये' विशेष्य और 'भि' विशेषण है । विशेषण के अल् होने से तदादिविधि होकर
—'भादौ प्रत्यये' बन जाता है) । अर्थ —(भादौ प्रत्यये) भकारादि प्रत्यय परे होने
पर (अपः) 'अप्' शब्द के स्थान पर (तः) त् आदेश हो जाता है । अलोऽन्त्यविधि
से यह आदेश अन्त्य अल् पकार के स्थान पर होगा । सुपो में भकारादि प्रत्यय भ्याम्
और भिस् के अतिरिक्त कोई नहीं है ।
'अप् + भिस्' यहां पकार को तकार होकर जश्त्व करने से—अद्भिः । इसी
प्रकार—अद्भ्यः । अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति—(मनु० ५ ।१०६) ।
अप् + आम् = अपाम् । अप् + सुप् = अप्सु । यहां भकारादि प्रत्यय परे न होने
से तकार आदेश न होगा । अप् (जल) शब्द की समग्र रूपमाला यथा —
माना गया हो कि पूर्वकाल में एक पुरुष की अनेक स्त्रियां होती थीं । किञ्च
दृ विदारणे धातु भी शायद इस में कारण हो जिस के अन्यत्र भार्या आदि में न होने
के कारण वे नित्य-बहुवचनान्त न बन सके हों । सिकता और वर्षा शब्द तो
सिकताकणों और जलकणों के समूह के कारण ही बहुवचनान्त माने गये प्रतीत
होते हैं; जहां एक कण की विवक्षा होती है वहां एकवचन का भी प्रयोग देखा
जाता है । यथा महाभाष्य में – एका च सिकता तैलदानेऽसमर्था । संस्कृत में लिङ्ग
और वचनों का विषय पर्याप्त अनुसन्धेय है ।