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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 506, कुल 633 में से

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पृष्ठ 506

हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ४६१
'सजुष्+भ्याम्'। पदान्त में रुँत्व और पूर्वोक्तरीत्या उपधादीर्घ होकर—
सजूभ्र्याम्। इसी प्रकार—सजूभिः। सजूभ्यः।
सजुष्+सुप्। रुँत्व और उपधादीर्घ होकर—सजूर्+सु। अब षत्व (१५०)
के असिद्ध होने से प्रथम खरवसानयोः० (६३) से विसर्ग आदेश हो जाता है—सजूः
+सु। पुनः वा शरि (१०४) से विकल्प कर के विसर्ग को विसर्ग और पक्ष में
विसर्जनीयस्य सः (१०३) से सकार आदेश होकर नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि (३५२)
सूत्र से दोनों पक्षों में सकार को मूर्धन्य षकार करने से—१. सजूःषु, २. सजूस्षु। अब
सकार वाले पक्ष में ष्टुत्व (६४) हो जाता है। इस प्रकार—१. सजूःषु, २. सजूष्षु
—ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। 'सजुष्' शब्द की रूपमाला यथा—
प्र० सजूः सजुषौ सजुषः | प० सजुषः सजूभ्याम् सजूभ्यः
द्वि० सजुषम् ,, ,, | ष० ,, सजुषोः सजुषाम्
तृ० सजुषा सजूभ्याम् सजूभिः | स० सजुषि ,, सजूःषु,-ष्षु
च० सजुषे ,, सजूभ्यः | सं० हे सजूः! सजुषौ! सजुषः!
इसी प्रकार—आशिष् (आशीर्वाद)। आङ् पूर्वक 'शास्' (अदा० आ०)
धातु से क्विँप् प्रत्यय, आशासः क्वावुपसङ्ख्यानम् वार्त्तिक से इत्व तथा शासि-
वसिघसीनाञ्च (५५४) द्वारा मूर्धन्य षकार करने पर 'आशिष्' शब्द निष्पन्न होता
है। यहां का षत्व (८.३.६०) ससजुषो रुः (८.२.६६) की दृष्टि में असिद्ध है; अतः
पदान्त में सकार समझ कर सर्वत्र ससजुषो रुः (१०५) से रुँत्व हो जाता है। शेष
सम्पूर्ण प्रक्रिया पूर्ववत् होती है। रूपमाला यथा—
प्र० आशीः आशिषौ आशिषः | प० आशिषः आशीर्भ्याम् आशीर्भ्यः
द्वि० आशिषम् ,, ,, | ष० ,, आशिषोः आशिषाम्
तृ० आशिषा आशीर्भ्याम् आशीर्भिः | स० आशिषि ,, आशीःषु,-ष्षु
च० आशिषे ,, आशीर्भ्यः | सं० हे आशीः! आशिषौ! आशिषः!
(यहां षकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।)
—:०:—
[लघु०] असौ । उत्व-मत्वे—अमू । अमूः । अमुया । अमूभिः । अमुष्यै ।
अमूभ्यः । अमुष्याः । अमुयोः । अमूषाम् । अमुष्याम् । अमूषु ॥
व्याख्या—'अदस्' शब्द की पुंल्लिङ्ग में प्रक्रिया लिख चुके हैं, अब स्त्रीलिङ्ग
में लिखते हैं।
अदस्+सुँ। यहां पुंल्लिङ्ग के समान ही अदस औ सुँ-लोपश्च (३५५) द्वारा
सकार को औकार और सुँ का लोप, तदोः सः० (३१०) से दकार को सकार तथा
अन्त में वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि होकर—'असौ' प्रयोग सिद्ध होता है।
१. कई लोग शस् में—परमात्मा जनेभ्य आशीर्ददाति—इस प्रकार भ्रम से अशुद्ध
लिखते हैं; आशिषो ददाति—लिखना चाहिये।