केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
६० केनोपनिषद् [ खण्ड २
६० केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य
धर्मो न भवति, तथा श्रोत्रादी- | समस्त पदार्थोंमेंसे किसीका धर्म नहीं
नामन्तःकरणस्य च धर्मो न | है और न वह श्रोत्रादि इन्द्रिय अथवा
भवतीति ब्रह्मणो रूपमिति ब्रह्म | अन्तःकरणका ही धर्म है, अतएव
रूप्यते चैतन्येन । तथा चोक्तम् । | वह ब्रह्मका रूप है, इसीलिये
“विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृ० उ० | ब्रह्मका चैतन्यरूपसे निरूपण किया
३।९।२८) “विज्ञानघन एव” | जाता है। ऐसा ही कहा भी है—
(बृ० उ० २।४।१२) “सत्यं | “ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है”
ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तै० उ० | “वह विज्ञानघन ही है” “ब्रह्म सत्य
२।१।१) “प्रज्ञानं ब्रह्म” | ज्ञान और अनन्तस्वरूप है” “प्रज्ञान
(ऐ० उ० ५ । ३) इति च | ब्रह्म है” इस प्रकार श्रुतियोंमें भी
ब्रह्मणो रूपं निर्दिष्टं श्रुतिषु । | ब्रह्मके रूपका निरूपण किया
गया है ।
सत्यमेवम्; तथापि तदन्तः- | सिद्धान्ती—यह ठीक है, तथापि
करणदेहेन्द्रियोपाधिद्वारेणैव वि- | वह अन्तःकरण, शरीर और इन्द्रिय-
रूप उपाधिके द्वारा ही विज्ञानादि
ज्ञानादिशब्दैर्निर्दिश्यते, तदनु- | शब्दोंसे निरूपण किया जाता है,
कारित्वाद् देहादिवृद्धिसङ्कोच- | क्योंकि देहादिके वृद्धि, संकोच,
वाक्य-भाष्य
तादित्युक्तत्वात्। सुवेदेति च मन्य- | और तू यह मानता ही है कि मैं उसे अच्छी
सेऽतोऽल्पमेव वेत्थ त्वं ब्रह्मणो | तरह जानता हूँ। इसलिये तू ब्रह्मके अल्प
स्वरूपको ही जानता है। क्योंकि ऐसी
रूपं यत्साद्य नु तत्सान्मीमांस्यम् | बात है, इसलिये जबतक तुझे विदित
और अविदितका प्रतिषेध करनेवाले
एवाद्यापि ते तव ब्रह्म विचार्यमेव | शास्त्रवचनका अनुभव न हो तबतक
तो अब भी मैं तेरे लिये ब्रह्मको मीमांसा
यावद्विदिताविदितप्रतिषेधागमा- | यानी विचारके योग्य ही समझता हूँ;
र्थानुभव इत्यर्थः । | यह इसका तात्पर्य है ।