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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

२० केनोपनिषद् खण्ड १

२० केनोपनिषद् खण्ड १
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आत्माका सर्वनियन्तृत्व
श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचं स उ
प्राणस्य प्राणश्चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्मा-
ल्लोकादमृता भवन्ति ॥ २ ॥
जो श्रोत्रका श्रोत्र, मनका मन और वाणीका भी वाणी है वही
प्राणका प्राण और चक्षुका चक्षु है [-ऐसा जानकर] धीर पुरुष संसारसे
मुक्त होकर इस लोकसे जाकर अमर हो जाते हैं ॥ २ ॥
पद-भाष्य
श्रोत्रस्य श्रोत्रं शृणोत्यनेनेति | श्रोत्रस्य श्रोत्रम्—जिससे श्रवण
श्रोत्रम्, शब्दस्य श्रवणं प्रति | करते हैं वह 'श्रोत्र' है अर्थात्
करणं शब्दाभिव्यञ्जकं श्रोत्र- | शब्दके श्रवणमें साधन यानी
मिन्द्रियम्, तस्य श्रोत्रं सः | शब्दका अभिव्यञ्जक श्रोत्रेन्द्रिय है।
यस्त्वया पृष्टः 'चक्षुः श्रोत्रं क | उसका भी श्रोत्र वह है जिसके
उ देवो युनक्ति' इति । | विषयमें तूने पूछा है कि 'चक्षु और श्रोत्रको कौन देव नियुक्त करता है?'
वाक्य-भाष्य
श्रोत्रस्य श्रोत्रम् इत्यादिप्रति- | 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' इत्यादि उत्तर
वचनं निर्विशेषस्य निमित्तत्वार्थम्। | देना निर्विशेष आत्माका निमित्तत्व बतलानेके लिये है । इस 'श्रोत्रस्य
विक्रियादिविशेषरहितस्यात्मनो | श्रोत्रम्' इत्यादि रूपसे उत्तर देनेका
मनआदिप्रवृत्तौ निमित्तत्वम् | यही तात्पर्य है कि विक्रिया आदि समस्त
इत्येतच्छ्रोत्रस्य श्रोत्रमित्यादिप्रति- | विशेषोंसे रहित आत्माका मन आदि-
वचनस्यार्थः; अनुगमात् । तदनु- | की प्रवृत्तिमें कारणत्व है१ यही इससे जाना जाता है, क्योंकि इस श्रुतिके अक्षर
गतानि ह्यत्रास्मिन्नर्थेऽक्षराणि। | भी इसी अर्थमें अनुगत हैं।
१—अर्थात् वह सर्वथा निर्विकार और निर्विशेष होनेपर भी मन आदिको प्रेरित करनेवाला है ।

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१
पद-भाष्य

असावेवंविशिष्टः श्रोत्रादीनि | शङ्का—प्रश्नके उत्तरमें तो यह
नियुङ्क्त इति वक्तव्ये, नन्वेत- | बतलाना चाहिये था कि इस
दननुरूपं प्रतिवचनं श्रोत्रस्य | प्रकारके गुणोंवाला व्यक्ति श्रोत्रादि-
श्रोत्रमिति। | को प्रेरित करता है; उसमें यह
| कहना कि वह श्रोत्रका श्रोत्र है—
| ठीक उत्तर नहीं है।
नैष दोषः, तस्यान्यथाविशेषा- | समाधान—यह कोई दोष नहीं
नवगमात्। यदि हि श्रोत्रादि- | है, क्योंकि उस प्रेरकका और
व्यापारव्यतिरिक्तेन स्वव्यापा- | किसी प्रकार कोई विशेषरूप नहीं
रेण विशिष्टः श्रोत्रादिनियोक्ता | जाना जा सकता। यदि दराँती
अवगम्येत दात्रादिप्रयोक्तृवत्, | आदिका प्रयोग करनेवालेके समान
तदेदमननुरूपं प्रतिवचनं स्यात्। | श्रोत्रादि व्यापारसे अतिरिक्त किसी
न त्विह श्रोत्रादीनां प्रयोक्ता | अपने व्यापारसे विशिष्ट कोई
स्वव्यापारविशिष्टो लवित्रादि- | श्रोत्रादिका नियोक्ता ज्ञात होता तो
वदधिगम्यते। श्रोत्रादीनामेव तु | यह उत्तर अनुचित होता। किन्तु
संहतानां व्यापारेणालोचन- | यहाँ खेत काटनेवालेके समान कोई
सङ्कल्पाध्यवसायलक्षणेन फलाव- | श्रोत्रादिका स्वव्यापारविशिष्ट प्रयोक्ता
| ज्ञात नहीं है। अवयव-सहयोगसे
| उत्पन्न हुए श्रोत्रादिका जो चिदा-
| भासकी फलव्याप्तिका लिङ्गरूप
| आलोचना, सङ्कल्प एवं निश्चय
| आदिरूप व्यापार है उसीसे यह

वाक्य-भाष्य

कथम्? शृणोत्यनेनेति श्रोत्रम्; | कैसे ? [सो इस प्रकार कि] जिससे
तस्य शब्दावभासकत्वं श्रोत्रत्वम्। | प्राणी सुनते हैं उसे 'श्रोत्र' कहते हैं।
शब्दोपलब्धिरूपतयावभासकत्वं न | उसका जो शब्दको प्रकाशित करना है
स्वतः, श्रोत्रस्याचिद्रूपत्वात्, | वह 'श्रोत्रत्व' है। श्रोत्रका जो शब्द-
आत्मनश्च चिद्रूपत्वात्। | के उपलब्धिरूपसे प्रकाशकत्व है वह
| स्वतः नहीं है; क्योंकि वह अचेतन
| है और आत्मा चेतनरूप है।