काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
१८६ काव्यादर्श [३।१५५
तथापि कटु कर्णानां कवयो न प्रयुञ्जते ।
‘ध्वजिनी तस्य राज्ञः केतूदस्तजलदे’त्यदः ॥ १५५ ॥
तब भी कानोंको कडुवा लगने वाला प्रयोग कवि लोग नहीं किया करते ।
जैसे ‘ध्वजिनी तस्य राज्ञः केतूदस्त-जलदा’१ यह प्रयोग है ॥ १५५ ॥
कर्णकटु पदमध्यविराम वर्जनीय है — आचार्य दण्डीने पदमध्यमें ग्रहणीय
यति बतानेके बाद प्रकृत (१५५वें) पद्यमें वर्ज्य पदमध्य यति बताई है ।२
पदमध्यमें भी कवि लोग कानोंको अप्रिय लगे, ऐसी यतिका प्रयोग नहीं
करते । ‘कर्णोंको कटु’ कहनेका आशय यतिकी वर्ज्यताका निमित्त श्रुतिकटुत्व-
जन्य उद्वेग बताना है । उत्तरार्धमें प्रदत्त उदाहरणके दो पादोंके मध्य अपेक्षित
यति द्वितीय (श्लोकके चतुर्थ) पादके आदिम द्वक्षर ‘केतू’ पदके मध्यमें ‘के’
पर पड़ती है । यह सुननेमें अच्छी नहीं लगती । अतः यह यतिदोष है । यह
कर्णकटुत्व यहाँ और यतिशेष पदभागके एकवर्णात्मक होनेसे है ।३
भरतने ‘यतिभ्रष्ट’ दोषको पृथक् न मानकर इसे कदाचिद् ‘विषम’ वृत्त-
दोष में ही समाहित किया है ।४ छन्दःशास्त्रके पिङ्गल आदि आचार्य यति एवं
गणव्यवस्था दोनोंको वृत्तके स्वरूपमें समाहित मानते हैं, यह (क) वृत्ताधिकार
में यतिका लक्षण देनेसे तथा (ख) वृत्तोंके लक्षणमें विराम और गणव्यवस्था
दोनोंको देनेसे सिद्ध होता है ।
१. उस राजाकी सेना ध्वजोंसे उत्क्षिप्त मेघों वाली (ऊँचे हाथियों पर लगे
होनेसे गगनचुम्बी ध्वजों वाली) है ।
२. रत्नश्रीज्ञान, वादी जी और तरुणवाचस्पतिने इस श्लोकको सन्धि-
विकारान्त पदके भङ्गमें यतिकी वर्जनीयताका उदाहरण बताया है । पर
‘केतु + उदस्त = केतूदस्त’ स्थिति न होनेपर ‘केतुक्षिप्त’ पाठ यदि
होता, तो ‘के’ पर यति होती, तो क्या यह यति वर्जनीय न होती ?
सन्धिविकारसे निष्पन्न दो पदोंके अन्तवद्भाव और आदिवद्भावसे यदि
यति निष्पन्न होती, तो उसे ‘सन्धिविकारान्त श्रवणोद्वेजक यति’ कहा जा
सकता था । अतः यहाँ पदमध्यमें वर्ज्य यतिका विवरण मानना ही
उचित है ।
३. पृष्ठ १८२ में हलायुधका द्वितीय यतिनियम देखें ।
४. वृत्तदोषो भवेद् यत्र ‘विषमं’ नाम तद् भवेत् । नाट्यशास्त्र १६।६३
वृत्तरत्नाकर १।१२ ‘यतिर्विच्छेदसञ्ज्ञितः’ पर नारायणभट्ट : भरता-
दयस्तु यतिमेव नेच्छन्ति ।
३।१५५] कर्ण-कटु पदमध्य विराम वर्जनीय है १८७
पिङ्गलने विरामके स्थानोंका तो निर्देश किया है, किन्तु उस स्थानमें भी
विच्छेद करनेसे कहीं लय टूटनेसे छन्द दूषित होगा, यह स्पष्टतः नहीं कहा
है । प्राचीन छन्दःशास्त्रियोंकी तो यह दृष्टि थी कि एकाधिक अक्षर कम
या अधिक होनेसे छन्दस्त्व व्याहत नहीं होता । १ परवर्ती आचार्योंकी यह
मान्यता है कि प्राचीन छन्दःशास्त्रमें यतिभङ्ग जैसा कोई दोष नहीं था;
यदि था, तो केवल इस रूपमें कि प्रदत्त स्थानपर यति न करके अन्य स्थान
पर कर दी जाये, तब यतिभङ्ग होता है । इसलिये अर्वाचीन आचार्योंने
यतिके स्थानातिरिक्त नियमोंको वृत्तका अङ्ग नहीं माना । गुरुलघुव्यवस्थाको
ही वृत्त माना । २ इस प्रकार यतिके नियम और गुरुलघुव्यवस्था दोनों भिन्न-
भिन्न पदार्थ हैं । और इनमें दोष होनेसे क्रमशः यतिदोष और वृत्तदोष होते
हैं । यह भरतोत्तरवर्ती आचार्योंकी दृष्टि है । यों, इस दृष्टिका मूल भरतमें
उपलब्ध है : उन्होंने अभिनयके समय काव्यके पाठमें जहाँ भिन्नवृत्तका
निषेध किया है, वहीं बिना विराम (यति) के विश्राम करनेका भी निषेध
किया है । ३ यह स्पष्ट ही यतिभ्रंशका निषेध है । भरतने अपने शास्त्रके
प्रयोगप्रधान होनेके कारण उसके अनुकूल उसकी वर्जनीयता अभिनय
(वाचिक) में बताई है; जबकि दण्डी आदि काव्यशास्त्रियोंने काव्यके प्रणयन
१. शतपथब्राह्मण १२।२।३।३ : नाक्षराच्छन्दो व्येत्येकस्मान्न द्वाभ्याम् ।
कौषीतकिब्रा० २७।१ : न ह्येकेनाक्षरेणान्यच्छन्दो भवति; नो द्वाभ्याम् ।
२. छन्दःशास्त्र ५।१ पर मृतसञ्जीवनी : तथा चोक्तम्- एकदेशस्थिता
जातिर्वृत्तं गुरु-लघु-स्थितम् । वृत्तरत्नाकर १।१२ पर नारायणभट्ट :
यतिर्वृत्तस्वरूपाद् भिन्नाऽपि गुणालङ्काराद्यपेक्षयाऽन्तरङ्गाङ्गत्वात् सूत्र-
कारादिभिर्लक्षणमध्ये निबद्धा, न तु वृत्तस्वरूपतया । मात्रागुरुलघु-
नियमनं हि वृत्तलक्षणम्, विरामात्मकत्वं च यतेः । काव्यालङ्कारसूत्र
२।२।५ : न वृत्तदोषात् पृथग् यतिदोषो, वृत्तस्य यत्यात्मकत्वात् । ६ : न,
लक्ष्मणः पृथक्त्वात् । वृत्ति : गुरुलघुनियमात्मकं वृत्तम् । विरामात्मिका
च यतिरिति ।
३. (क) नापशब्दं पठेत् तज्ज्ञो (ख) भिन्नवृत्तं तथैव हि ।
(ग) विश्रमेन्नाविरामेषु (घ) दैन्ये काकुं न दीपयेत् ।। १७।१४६
(क) 'अपशब्द' को १६।८६ में 'शब्दच्युत' और ६५ में 'शब्दहीन' कहा
है । (ख-ग) १६।६४ में प्रोक्त 'वृत्तदोष' अपरनाम 'विषम' का विवरण
है । (घ) 'काकु' का सम्बन्ध वाचिक अभिनयसे है, छन्दसे नहीं । यह
गद्य पद्य दोनोंमें हो सकती है ।
१८८ काव्यादर्श [३।१५६
(८) वर्णानां न्यूनताऽऽधिक्ये गुरु-लघ्वयथास्थितिः ।
यत्र, तद् भिन्नवृत्तं स्यादेष दोषः सुनिन्दितः ॥ १५६ ॥
(८) जहाँ अक्षरोंकी (क) कमी या बेशी हो, (ख) गुरु और लघुका
उसके विपरीत विन्यास हो, वह 'भिन्नवृत्त' होवै । यह दोष बहुत निन्दित
दोष होता है ॥ १५६ ॥
में ही यतिभ्रंशको दोष (वर्ज्य) बताया है । इसी दृष्टिके तहत दण्डी या
उनसे पूर्वके आचार्योंने भरतके 'विषम' नामक वृत्तदोषको ही 'यतिभ्रष्ट'
और 'भिन्नवृत्त' नामक दो दोषोंमें विभाजित कर दिया ।
भामहका 'यतिभ्रष्ट'का विवेचन दण्डीसे कुछ भिन्न है : छन्दमें प्रयुक्त
शब्दोंकी वि-चारणा यति होती है। उससे भ्रष्ट 'यतिभ्रष्ट' कहलाता है ।¹
भामहने पिङ्गलके 'विच्छेद' और दण्डीके 'पदच्छेद' जैसे स्पष्टार्थक शब्दोंके
स्थानपर 'शब्दोंकी विचारणा' जैसी अस्पष्ट अभिव्यक्ति दी है । उनके
उदाहरणमें तो और भी गड़बड़ है : तमाल + असित = 'तमालासित' में दीर्घ
एकादेश सन्धिके अन्तवद्भावके कारण 'तमाला' के शब्दत्व या पदत्वमें न
छन्दःशास्त्रियोंके अनुसार यतिभ्रंश दोष है, और न कविपरम्परामें ।
महाकवियोंने इस प्रकारकी सन्धियोंपर यतिके असङ्ख्य प्रयोग किये हैं ।
यदि कविसम्प्रदायमें इन्हें दोष माना जाता, तो वे ऐसे प्रयोग क्यों करते ?
अतः भामहका न लक्षण निर्दोष है, और न उदाहरण ही ठीक है ।
निष्कर्ष : यतिभङ्ग दोषके बारेमें दण्डीका विवेचन समस्त आचार्यपरम्परा
में सर्वाधिक युक्तिसङ्गत एवं यथार्थपरक है । यतिका उद्देश्य श्रुतिसुख है ।
श्रुतिकटु यतिका परिहार कविको करना चाहिये । कविकल्पलताके आचार्य
का यह कथन दण्डीके मतकी ही पुष्टि करता है : यति मधुरताका हेतु है ।
उसे इस रूपमें करना चाहिये कि वह उद्वेजक न बने² ॥ १५५ ॥
(८) भिन्नवृत्त दोष—छन्दमें तीन बातें होती हैं : (क) अक्षरोंकी
नियत सङ्ख्या; इसमें भेदसे छन्दोंकी जाति बदल जाती है; (ख) गुरु लघुके
१. यतिश्छन्दोऽधिरूढानां शब्दानां या विचारणा ।
तदपेतं यतिभ्रष्टमिति निर्दिश्यते, यथा ॥ काव्याल० ४।२४
विद्युत्वन्तस्तमाला, सितवपुष मे वारिवाहा ध्वनन्ति ॥ २५
२. वृत्तरत्नाकर १।१२ पर नारायणभट्ट : तदुक्तं कविकल्पलतायाम्
एवं यथा यथोद्वेगः सुधियां नोपजायते ।
तथा तथा मधुरतानिमित्तं यतिरिष्यते ॥
३।१५६] ५. दोष : (८) भिन्न-वृत्त १८६
नियत क्रमसे अक्षरोंका विन्यास; मात्रिक छन्दोंमें मात्राओंका तथा वर्णिक
छन्दोंमें अक्षरों (केवल स्वरों या व्यञ्जनारूढ स्वरों) का क्रमविशेषमें
व्यवस्थित विन्यास; (ग) नियत सङ्ख्यापर विराम अर्थात् यति । यतिदोष
का निरूपण पीछे (१५२-१५५ श्लोकोंमें) विस्तरेण किया जा चुका है ।
अब छन्दकी शेष दो विशेषताओंमें दोष आनेसे होने वाले वृत्तदोषका निरूपण
१५६-१५८ श्लोकोंमें आचार्यने किया है ।
(क) शतपथ और कौषीतकि ब्राह्मणोंके प्रमाणसे पीछे देख चुके हैं कि
एक दो अक्षरोंकी कमीसे 'छन्दोभङ्ग नहीं माना जाता था । किन्तु वहाँ भी
दो स्थितियाँ शास्त्रकारोंने बताई हैं : (i) यदि अक्षरोंकी न्यूनता एकादेश
अथवा यणादि सन्धिके कारण है, तो उसे सन्धिच्छेद (व्यूह¹) के द्वारा पूरा
किया जाता है ।² ये सन्धिज छन्दोभङ्ग कविकृत नहीं थे, अपितु भाषामें
सन्धियोंका स्वरूप बदलनेपर संहिताकारोंने भाषाके नवविकसित स्वरूपके
१. व्यूहकी आवश्यकताके बारेमें वेङ्कटमाधवका ऋग्वेदके छठे अष्टकके
सातवें अध्यायकी व्याख्याके प्रारम्भमें दिया वक्तव्य द्रष्टव्य है :
समीचीना यदा वृत्तिर्न व्यूहेऽपि भवेदिह ।
न तदा व्यूहमिच्छन्ति; तत्रैतल्लिङ्गदर्शनम् ।। ७ ।।
'अक्षरे पादकॢप्तिः स्यान्न च हल् केवलोऽक्षरम् ।
संयोगानामतो व्यूहो न कार्य' इति बह्वृचाः ।। १० ।।
भवतो द्वौ यणादेशौ यद्येकस्मिन् पदे, तदा ।
तथा व्यूहेद् यणादेशं यथा वृत्तिर्न दुष्यति ।। ११ ।।
व्यूहे च वृत्तिसिद्धिश्चेद्, व्यूहं नेच्छन्ति केचन ।
व्यूहेनाक्षरसङ्ख्या च कार्येवेत्याह माधवः ।। १२ ।। श्लोकौ भवतः
'चत्वारि सन्धिजातानि यैश्छन्दो हसते न च ।
प्रश्लिष्टमभिनिहितं क्षिप्रसन्धिरभिद्रुतम् ।। १ ।।
एतानि सन्धिजातानि मिमानश्छन्दसोऽक्षरैः ।
द्वैधं कुर्यादसम्पूर्णे, न पूर्णे किञ्चनेङ्गयेत्' ।। २ ।। इति ।
२. व्यूहेदेकाक्षरीभावान् पादेषूनेषु सम्पदे ।। ऋक्प्रातिशाख्य १७।२२
क्षैप्रवर्णांश्च संयोगान् व्यवेयात् सदृशैः पदैः ।। २३
छन्दःशास्त्र ३।२ : इयादिपूरणः । ऋक्सर्वानुक्रमणी १।३ : पादपूरणार्थं
तु क्षैप्रसंयोगैकाक्षरीभावान् व्यूहेत् ।
प्रथम परिच्छेदकी भूमिका, पृष्ठ ३-४ भी देखें ।
१६० काव्यादर्श [३।१५७
(क i) 'इन्दुपादाः शिशिरा स्पृशन्तोत्यूनवर्णता ।
(ii) 'सहकारस्य किसलयान्यार्द्राणीत्यधिकाक्षरम् ॥ १५७ ॥
(क i) 'इन्दुपादाः शिशिरा' (शीतल चन्द्रकिरण छूती हैं) में पादमें
एक वर्ण (अक्षर) की कमी है । (ii) 'सहकारस्य किसलयान्यार्द्राणि' (आम
की गीली कोंपलोंको) यह काव्य अधिक अक्षर वाला है ॥ १५७ ॥
अनुरूप करनेको कविके प्रयत्नके विपरीत जाकर नवीन सन्धियोंका प्रयोग कर
के छन्दोभङ्ग कर दिया था । व्यूहन (सन्धिच्छेद) से उसे पुनः यथापूर्व लाया
जाता है । (ii) यदि कविकी अशक्तिवश हो गया है, या कविने वैचित्र्यार्थ
स्वेच्छासे किया है, तब व्यूहसे काम नहीं चलता है, तो उसे कविके प्रति
श्रद्धावश न बदलकर निचृत् भुरिक् या विराट् और स्वराट् नामसे व्यवस्थित
कर दिया जाता था ।१ काव्यशास्त्रियोंने इस प्रकारके औदार्यकी छूट नहीं
दी ।२ अक्षरसङ्ख्या यदि अपेक्षितसे कम या अधिक है, तो उसे दोष ही
कहा है । इसका उदाहरण आचार्यने १५७वें श्लोकमें दिया है ।
(ख) छन्दमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वस्तु है गुरु लघु का व्यवस्थित क्रममें
विन्यास । उसका भङ्ग छन्दमें सदा दोष समझा जाता रहा है । छन्दकी लयके
भङ्गका सर्वाधिक उद्वेजक हेतु गणभङ्ग (गुरुलघुविन्यासका भङ्ग) है ।
(ग) यतिभङ्गपर विचार १५२-१५५ श्लोकोंमें किया ही जा चुका है ।
छन्दोभङ्ग दोष हर स्थितिमें वैरस्यकारक ही होता है । अतः यह नित्य दोष
है ॥ १५६ ॥
(क i) पादमें अक्षरकी न्यूनतासे भिन्नवृत्तताका उदाहरण—१५७वें
श्लोकके पूर्वार्धमें आचार्यने अक्षरन्यूनताजन्य भिन्नवृत्त दोषकी व्याख्या
उदाहरण दे कर की है : इस अर्धालीके अनुष्टुप् छन्दोबद्ध प्रथम पादमें आठ
अक्षरोंकी बजाय सात अक्षर हैं । अतः यह पाद सम्पूर्ण श्लोकमें प्रयुक्त लयको
भङ्ग करनेके कारण उद्वेजक होनेसे दोष है ।
१. छन्दःशास्त्र ३।५६-६२ : ऊनाधिकेनैकेन निचूद्भुरिजौ । द्वाभ्यां विराट्-
स्वराजौ । आदितः सन्दिग्धे । देवताऽऽदितश्च । छन्दोंसे देवताओंके
सम्बन्धके आदिम उल्लेखके लिये ऋ० १०।१३०।४-६ देखें ।
२. हलायुधवृत्ति ३।६३ : वैदिकेष्वेवच्छन्दस्सु निचृद्भुरिजौ तथा विराट्-
स्वराजौ च दृश्येते । न लौकिकेषु ।
३।१५८] ५. दोष : (८) भिन्नवृत्त १६१
(ख i) कामेन बाणा निशाता' विमुक्ता, मृगेक्षणाष्वित्ययथागुरुत्वम् ।
(ii) मदनबाणा निशिताः पतन्ति वामेक्षणास्वित्ययथालघुत्वम् । १५८।
(ख i) 'कामेन बाणा निशाता विमुक्ता' (मृगनयनियोंपर कामदेवने
तीखे छोड़े बाण) में गुरु अनुचित है । (ii) 'मदनबाणा निशिताः पतन्ति'
'(कामदेवके तीखे बाण तिरछी चितवन वालियों पर पड़ते हैं) में लघु वर्ण
अनुचित है ।। १५८ ।।
(ii) अक्षरकी अधिकतासे भिन्नवृत्तताका उदाहरण—श्लोकके उत्तरार्ध
में यण्सन्धिके परादिवद्भावकी स्थितिमें 'किसलया' पर यति होती है । तब
इस पादमें आठकी बजाय नौ, एक अक्षर अधिक होनेसे छन्दकी लय टूटती
है । इससे यह पाद श्रुतिविरस हो जाता है ।। १५७ ।।
(ख i) लघुके स्थानमें गुरुके प्रयोगसे भिन्नवृत्तताका उदाहरण—१५८वें
श्लोकके प्रथमपादमें कविने एकादशाक्षर त्रिष्टुप् जातिके इन्द्रवज्राछन्दका
प्रयोग किया है । इस छन्दमें सातवां अक्षर दीर्घ नहीं, अपितु लघु अपेक्षित
होता है ।१ किन्तु यहाँ यह 'निशाता' में 'शा' के रूपमें दीर्घ है । अतः गुरुका
अयथावत् (अनुचित रूपसे) प्रयोग छन्दोभङ्गकारक है । 'निशिता' पाठसे
दोषनिवारण हो जाता है ।
(ii) गुरुके स्थानमें लघुके प्रयोगसे भिन्नवृत्तताका उदाहरण—तृतीय
पादके द्वितीय अक्षरमें लघु वर्ण 'द'का प्रयोग करनेसे उपजातिमें इस स्थानपर
गुरु प्रयोगका उल्लङ्घन हुआ है । अतः यहाँ लघु वर्ण अयथावत् (अनुचित
रूपसे) प्रयुक्त हुआ है । इस लिये छन्दोभङ्गके कारण भिन्नवृत्त दोष है ।
'मदनबाणाः'के स्थानपर 'अनङ्गबाणाः' पाठसे इस दोषका निवारण हो
जाता है ।
रत्नश्री और वादीटीकामें 'निशिताः' पाठ माना है । रत्नश्रीज्ञानने इस
पादको उपेन्द्रवज्राका२ पाद समझकर प्रथम अक्षरमें लघुके स्थानपर दीर्घ
'का'के प्रयोगसे छन्दोभङ्ग बताया है । उन्होंने ऐसा सम्भवतः द्वितीय और
तृतीय पादोंमें उपेन्द्रवज्राके शुद्ध और खण्डित प्रयोगको देखकर किया
होगा । पर प्रथम और चतुर्थ पादोंमें इन्द्रवज्रा और बीचके दो पादोंमें
उपेन्द्रवज्राके मिश्रणसे उपजातिका संभव होते प्रथम और चतुर्थ पादोंमें भी
१. रत्नश्री, वादीटीका : निशिता, तरुणवाचस्पति : निशाता ।
२. छन्दः शास्त्र ६।१५ : इन्द्रवज्रा तौ जगौ ग् ।
३, उपेन्द्रवज्रा ज्तौ जगौ ग् । ४. आद्यन्तावृपजातयः ।
१६२ काव्यादर्श [३।१५८
दण्डीको उपेन्द्रवज्रा ही इष्ट है, और दोनों पादोंमें प्रथम अक्षरमें लघुके
स्थानमें दीर्घका अयथावत् प्रयोग है, यह माना जाये, इसमें कोई युक्ति नहीं
है। अतः यहाँ प्रथम पादमें इन्द्रवज्रामें ही गुरुका अयथावत् प्रयोग बताने
वाला ‘निशाता’ (मध्यगुरु) पाठ ही ठीक है।
वादिजङ्घालदेवने उपजातिवाले इस श्लोकमें अनुष्टुप्की लघु-गुरु
व्यवस्थाका उल्लङ्घन बताया है।¹ इसपर क्या टिप्पणी की जाये ?
भरतने इस दोषका निरूपण 'विषम' नामसे किया है। यह 'यतिभ्रष्ट'के
प्रसङ्गमें कहा जा चुका है। इसकी व्याख्या उन्होंने 'वृत्तका दोष विषम होता
है।' कहकर की है। वृत्तके तीन अवयव पीछे श्लोक १५६ पृष्ठ १८८में
बताये जा चुके हैं। अतः भरतके अनुसार इन तीनोंमेंसे किसी भी एक अवयव
के लक्षणविरुद्ध होनेसे वृत्तमें दोष निष्पन्न हो जानेसे 'विषम' नामक छन्दो-
भङ्ग दोष होगा। आचार्य दण्डीने भरतके कथनको व्याख्यानसे लभ्य इस
विशेषप्रतिपत्तिका विस्पष्ट रूपसे 'यतिभ्रष्ट' और 'भिन्नवृत्त' दो दोषोंके रूपमें
प्रतिपादित किया है। भामहने भी शब्दान्तरसे इसी प्रकार इन दोषोंका
निरूपण किया है।² उन्होंने मालिनी³ छन्दका उदाहरण दिया है। इसके द्वितीय
पादमें नवम अक्षर गुरुके स्थानपर लघु दिया है और बारहवां अक्षर दीर्घके
स्थानमें लघु दिया है। इसके अतिरिक्त पूरे पादमें १४ अक्षर होनेसे एक
अक्षरकी न्यूनता है। आठवें अक्षर ‘को’ पर एकादेश सन्धिके अन्तवद्भावसे
यति की गई है⁴ ॥ १५८ ॥
१. वादिटीका ४।३५ : पञ्चमं लघु सर्वत्रानुष्टुपूछन्दस्यषष्ठं द्विचतुर्थयोः
पादयोः, षष्ठं गुरु चतुर्ष्वपि भवत्यक्षरमिति नियमः । इह तु 'कामेन
बाणा' इति पञ्चमं गुरु । 'निशिता' इत्यषष्ठं लघु । 'द्विचतुर्थयोः' इति
विशेषणात् प्रथम-तृतीययोः सप्तमं गुरु भवति । अत्र च प्रथमपादे सप्त-
माक्षरस्य लघुत्वादयथागुरुत्वम् ।...अयथालघुत्वमाह—'मदनबाणा
निशिताः पतन्ति'। 'शि' स्थाने गुरुणा भवितव्यम् । पञ्चमेन च लघुना
सप्तमं द्विचतुर्थयोः पादयोर्लघु, प्रथमतृतीययोश्च गुरु भवतीति लघु
प्रयुक्तम् । इत्ययथालघुत्वम् । इति 'नि', 'शि' शब्दौ दोषः ।
२. गुरोलंघोश्च वर्णस्य योऽस्थाने रचनाविधिः ।
तन्न्यूनताऽधिकता वाऽपि भिन्नवृत्तमिदं यथा ।। काव्याल० ४।२६
३. ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः । वृत्तरत्नाकर
४. भ्रमति भ्रमरमाला काननेषून्मदाऽसौ ।
विरहितरमणीकोऽहंति त्वद्य गन्तुम् ।। काव्याल० ४।२७
३।१५६-१६०] ५. दोष : (६) विसन्धि १६३
(६) न संहितां विवक्षामीत्यसन्धानं पदेषु यत् ।
तद् विसन्धीति निर्दिष्टं न प्रगृह्यादिहेतुकम् १ ॥ १५६ ॥
(क) मन्दानिलेन चरता अङ्गनागण्डमण्डले ।
(६) पदोंमें सन्धि नहीं करनेकी इच्छासे जो सन्धिका अभाव होता है,
उसे 'विसन्धि' नामसे कहा है। प्रगृह्य आदिके कारण होने वाला सन्धिका
अभाव विसन्धि नहीं होता ॥ १५६ ॥
(क) रमणीके गोल-गोल कपोलपर उमगा पसीना आकाशमें और हमारे
(६) विसन्धि दोष—'विसन्धि' विगत-सन्धिके अर्थमें है । 'सन्धि' का
अर्थ है योग, जुड़ाव, सन्धान, संहिता । (i) पदोंके अवयवोंमें आन्तरिक तथा
(ii) पदोंमें परस्पर बाह्य सन्धि होती है । (१) प्रथम और द्वितीय पादोंमें
एवम् (२) तृतीय तथा चतुर्थ पादोंमें सन्धि होनी चाहिये । इस प्रकार श्लोकार्ध
के घटक दो पादोंमें (i) आन्तरिक और (ii) बाह्य सन्धि व्याकरणमें बताये
नियमोंके अनुसार अनिवार्य बताई गई है । व्याकरणके अनुसार सन्धिके
तीन रूप हैं : (१) कुछ स्थितियोंमें यह नित्य होती है, तो (२) कहीं विकल्प
से । इसी प्रकार (३) कुछ स्थितियोंमें सन्धिका अभाव भी शास्त्रोंमें विहित
है । इसे पाणिनीय व्याकरणमें 'प्रकृतिभाव' कहा जाता है और प्रातिशाख्यों
तथा तदनुसारी शिक्षावेदाङ्गमें 'विवृत्ति' कहा जाता है ।२ इसके अतिरिक्त,
अयादि आदेशोंके पदान्तीय 'य्' और 'व्'का स्वरके पूर्व शाकटायनाभिमत
लोप होनेपर अकार और परवर्ती स्वरकी वृद्धि आदि सन्धियाँ नहीं होती ।३
यह सन्ध्यभाव भी नित्य है । (क) शास्त्रके अनुसार सन्धि नित्य
विहित है, वहाँ यदि प्रयोक्ता सन्धि नहीं करता तब वह शास्त्रविरुद्ध विवृत्ति
सन्धिके जानकारोंको उद्वेजक होनेसे दोष है । किन्तु जहाँ (ख) सन्धिके
अभावकी शास्त्रीय विकल्पके कारण प्राप्ति है, अथवा (ii) प्रकृतिभावके
कारण, वहाँ वह दोष नहीं होगी ॥ १५६ ॥
(क) विसन्धि दोषका उदाहरण—प्रकृत १६०वें श्लोकमें प्रथमपादान्त-
स्थ 'आ' ('ता') की द्वितीयपादादिस्थ 'अ' से दीर्घ एकादेश सन्धि छन्दः-
१. यह श्लोक त्रिपुरहरभूपालने काव्यालङ्कारसूत्रकामधेनु २।२।८में 'यदवादि
दण्डिना' कहकर उद्धृत किया है ।
२. अष्टा० ६।१।११५-१२८; विशेषकर 'प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् ।
ऋक्प्रा० २।३-४ : स्वरान्तरं तु विवृत्तिः । सा वा स्वरभक्तिकाला ।
३. अष्टा० ८।३।१६ : लोपः शाकल्यस्य । ८।२।१ : पूर्वत्रासिद्धम् ।
१६४ काव्यादर्श [३।१६०-१६१
लुप्तमुद्भूदि घर्माम्भो नभस्यस्मन्मनस्यपि१ ॥ १६० ॥
(ख i) 'मानेष्ये इह शीर्यन्ते स्त्रीणां (ii) हिमऋतौ प्रिये ।
मनमें चलते हुए मन्द पवनके द्वारा लुप्त हो गया ॥ १६० ॥
(ख) हे प्रिये, इस ठण्डीके मौसममें इन रातोंमें स्त्रियोंके पतिके प्रति
मान और जिन्हें मानकी आवश्यकता नहीं पड़ती, उन स्वाधीनपतिका
शास्त्रके अनुसार आवश्यक (नित्य प्राप्त) है । पर यहाँ यह जानकर नहीं की
है । अतः विसन्धि दोष है ।
तरुण वाचस्पतिने यहाँ 'मन्दानिलेन के स्थानपर 'मेघानिलेन' पाठ मान
कर 'नभसि' का अर्थ नभोमास (श्रावण) किया है । मन्दानिल या मेघानिल
का नभस (आकाश या श्रावण मास) से आधाराधेयभाव सम्बन्ध है । मनसे
इन दोनोंका सम्बन्ध मनोहरताके कारण मनमें घूमनेका है । इससे सुन्दरीके
प्रति रतिका व्यभिचारी भाव औत्सुक्य व्यक्त होता हैं ।
वादिजङ्घाल देवने 'एक और विशिष्ट उदाहरणका ऊह यहाँ किया जा
सकता है', कहा है । उसे तरुणवाचस्पतिने दण्डिकृतके रूपमें समझा है ।२
रत्नश्री में यह उपलब्ध नहीं है । अतः प्रतीत होता है कि वादिजीके परामर्शके
बाद यहाँ भ्रमसे समझ लिया गया है । तिरुपतिसंस्करणके संस्कर्ताने बिना
विचार किये उसे मूलके रूपमें रख दिया है ॥ १६० ॥
(ख) निर्दोष विच्छेदके दो उदाहरण—व्याकरणमें 'प्रकृतिभाव सन्धि'के
नामसे विदित सन्धिके अभावकी स्थितिके दो उदाहरण उपलक्षणार्थ दिये हैं :
(i) प्रथम उदाहरण नित्य सन्ध्यभावका है : 'मानेष्ये' एकारान्त द्विवचनान्त
होनेके कारण प्रगृह्य पद है और इसकी परवर्ती स्वरसे सन्धिका प्रकृतिभावके
१. प्रथम पादका पाठ तरुणवाचस्पतिने सम्भवतः काव्यालङ्कारसूत्र २।२।८
और सरस्वती० १।२७के प्रभावमें 'मेघानिलेन अमुना' माना है । या
वामन और भोजका उदाहरण दण्डीके उदाहरणसे बिल्कुल भिन्न है ।
लगता है किसी ने अन्य समान उदाहरणके प्रतीकके रूपमें हाशियेपर
लिख दिया और कालान्तरमें भ्रमसे दण्डीके श्लोकका पाठ समझ लिया
गया ।
२. वादिटीका : 'आधिव्याधिपरीताय अद्य श्वो वा विनाशिने' इत्यादिकमपि
विशिष्टमुदाहरणमूह्यम् । तरुणटीका : 'पादान्ते सन्धेरकरणं न दोषाय'
इति केचित् । तदुदाहरति 'आधिव्याधी'ति । तिरुपतिसं० में उत्तरार्ध
यों दिया है : को हि नाम शरीराय धर्मापेतं समाचरेत् ॥
३।१६१ ] ५. दोष : (६) विसन्धि अन्योंके मतमें १६५
आसु रात्रिष्विति प्राज्ञैर्ज्ञातन्यङ्गमीदृशम् ॥ १६१ ॥
रमणियोंके प्रति ईर्ष्या क्षीण हो जाते हैं। इस प्रकारका (सन्धिरहित प्रयोग)
प्राज्ञोंको दोषरहित प्रतीत होता है ॥ १६१ ॥
रूपमें नित्य निषेध है। (ii) द्वितीय उदाहरण सन्धिविकल्पका है : 'हिमऋतौ'
समस्त पद है। इसमें गुण सन्धि प्राप्त है। उसका प्रतिषेध प्रकृतिभावके
विकल्पसे होता है। अर्थात् गुण एकादेश सन्धि भी उचित है, उसका अभाव
भी। यहाँ गुणका अभाव किया गया है ।^२ वह बुद्धिमानोंको न्यङ्ग=अङ्गहीन,
दोषयुक्तके रूपमें ज्ञात नहीं है। अर्थात् वे इसे निर्दोष समझते हैं।
भरतने उपश्लेषण=सन्धानसे रहित शब्दवाला होना 'विसन्धि' दोष
बताया है।^३ अभिनवगुप्तने सन्धिके तीन प्रकार बताये हैं : (क) दो वर्णोंमें
निरन्तरता, (ख) विचारका योग (भामहने इसे 'विचारणा' कहा है), (ग)
१. रत्नश्री और वादीटीकामें इस श्लोकका पूर्वार्ध धृत, व्याख्यात नहीं है।
अपितु उत्तरार्धको १६०वें श्लोकसे मिलाकर व्याख्या की गई है कि
इस प्रकारका श्लोकार्धोंके अन्त और आदिमें सन्धिका अभाव शिष्टोंको
दोषके रूपमें विदित नहीं है। इससे प्रतीत होता है कि रत्नश्रीज्ञान यहाँ
पूर्वार्ध और उत्तरार्धमें विसन्धिको निर्दोष मानते हैं। अर्थात् 'आसु
रात्रिषु०' आदि अर्ध उत्तरार्ध है और इसके पूर्व एक पूर्वार्ध है जो किसी
कारणसे रत्नश्रीमें विच्छिन्न हो गया है। अन्यथा (१) दो श्लोकोंके
अन्तादिकी सन्धि तो कहीं भी विहित नहीं है। उसके अभावमें दोषत्व
वा अदोषत्वका प्रश्न ही नहीं उठता। (२) यदि 'मानेष्ये' आदि पूर्वार्ध
यहाँ नहीं है, तो यह श्लोकार्ध परिच्छेदमें लटकता रहेगा, जो कोई भी
ग्रन्थकार नहीं करेगा। (३) जब श्लोकोंके अन्तादिमें सन्धि होती ही नहीं
है, तब इसे 'प्राज्ञैर्ज्ञातन्यङ्ग' कहनेका क्या अभिप्राय है। जबकि इसे पूरा
श्लोक माननेपर प्रकृतिभाव सन्धिके कारण यहाँ सन्धिके अभावकी
निर्दोषताका उदाहरण होनेसे यह कथन बिल्कुल प्रासङ्गिक है। अतः
भोटपाठ, रत्नश्री और वादीटीकामें उपलब्ध न होते हुए भी 'मानेष्ये०'
आदि पूर्वार्ध यहाँ मौलिक ही है।
२. अष्टा० १।१।११ : ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् । ६।१।१२५ : प्लुतप्रगृह्या
अचि नित्यम् । १२८ : ऋत्यकः ।
३. अनुपश्लिष्टशब्दं यत्, तद् 'विसन्धी'ति कीर्तितम् । नाट्यशास्त्र १६।६४
आपसमें मिल जाना (एकादेश) । १ भामहने विसन्धिका निरूपण केवल उदा-
हरण देकर चलता किया है। इसमें सन्धिभङ्गके तीनों स्थल कान्ते + इन्दु
शिरोरत्ने + आधाने + उदंशनी एदन्त द्विवचन होनेके कारण प्राप्त नित्य
प्रकृतिभावसे सन्ध्यभावके उदाहरण हैं ।२ शास्त्रविहित प्रकृतिभावजन्य सन्ध्य-
भावको दोष माननेकी महती मति भामहमें ही है । भामहके अनुकरणमें वामनने
भी इस प्रकारके प्रगृह्यहेतुक विश्लेषको दोष ही माना है ।३ परवर्ती लोगोंने
भामहके उदाहरणमें लगातार तीन विवृत्तियोंको देखकर, उससे संकेत पाकर,
भामहादिकी इस अतिवादी दृष्टिमें कुछ नरमी लाकर समन्वयका प्रयास किया
है कि पुनः पुनः इस प्रकारके प्रकृतिभावके प्रयोग करना दोष है, एकाध बार
करनेपर दोष नहीं है ।४
वामनने विसन्धिको एक और आयाम भी दिया : शब्दोंके सन्धानके
कारण यदि कोई अश्लील शब्दका प्रतिभास हो जाता है, तो उन्होंने उस
अग्राम्यताको भी 'विसन्धि' ही बताया है ।५ परवर्तीरुद्रट, अग्निपुराणकार
तथा भोज आदि सभी आचार्योंने वामनकी दृष्टि ही अपनाई है ।। १६१ ।।
१. अभिनवभारती १६।६४ : सन्धानं द्वयोर्नैरन्तर्यं, विचारयोगः, अन्योन्य-
लयोवेति त्रिधा । तदनुपारूढमयुक्तं पारुष्याद्युत्पादकं वा यत्रापशब्दः
स्मृतो मुनित्रयेणादृतः ।
२. कान्ते इन्दुशिरोरत्ने आधाने उदंशनी ।
पातां वः शम्भुशर्वाण्याविति प्राहुर्विसन्ध्यदः ।। काव्याल० ४।२८
३. काव्यालङ्कारसूत्र २।२।८ : पदसन्धिवैरूप्यं (i) विश्लेषो (ii) ऽश्लीलत्वं
(iii) कष्टत्वं च । (i) वृत्तिविश्लेषो यथा—
मेघानिलेन अमुना एतस्मिन्नद्रिकानने ।
कमले इव लोचने इमे अनुबध्नाति विलासपद्धतिः ।।
लोलालकानुबद्धानि आननानि चकासति ।
४. काव्यप्रकाश ७ उ०, २१२ : 'संहितां न करोमी'ति (तु० काव्यादर्श
३।१५६) स्वेच्छया सकृदपि दोषः । प्रगृह्यादिहेतुकत्वे त्वसकृत् । काव्या-
लङ्कारकामधेनु २।२।८ : यदवादि दण्डिना, 'न संहितां...न प्रगृह्यादि-
हेतुकम् ।।' (काव्यादर्श ३।१५६) इति । अत्र प्रगृह्यादिहेतुकं विसन्धि न
भवतीति सकृत्प्रयोगविषयमिदं द्रष्टव्यम् । असकृत्प्रयोगे तु दुष्टमेव ।
५. काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति २।२।८ : (ii) अश्लीलत्वं यथा—
विरेचकमिदं नृत्तमाचार्याभासयोजितम् ।
चकासे पनसप्रायैः पुरी षण्डमहाद्रुमैः ।।
३।१६२] ५. दोष : (१०) देशादि-विरोध १६७
(१० क) देशोऽद्रि-वन-राष्ट्रादिः, (ख) कालो रात्रिन्दिवर्तवः ।
(ग) १नृत्य-गीत-प्रभृतयः कलाः कामार्थ-संश्रयाः ॥१६२॥
(१०. क. अ) पर्वत, (आ) वन तथा (इ) राष्ट्र आदि 'देश' होता है ।
(ख. अ) रात, (आ) दिन, (इ) मौसम 'काल' होता है । (ग) काम, (ii)
अर्थ पुरुषार्थोंपर आश्रित (अ) नृत्य (आ) गीत आदि कला होती हैं ॥१६२॥
(१०) दशम देशादि-विरोध दोषके आधार देशादिके लक्षण—अगले दो
श्लोकों (१६२-१६३) में दशम दोष देशादिविरोधके देश आदि छह आधारोंका
परिगणन करके उसका लक्षण १६४वें श्लोकमें किया गया है । देश आदि छह
पदार्थोंके विषयमें कविके प्रमाद (असावधानी) के कारण यदि कोई ऐसी बात
कह दी जाती है, जो उन-उन आधारोंमें प्रसिद्धिके विपरीत हो, तो वह
क्रमशः (क) देश-विरोधी, (ख) कालविरोधी, (ग) कलाविरोधी, (घ)
लोकविरोधी, (ङ) न्यायविरोधी और (च) आगमविरोधी दोष कहलाता है ।
ये छह दशम दोषके अवान्तर भेद हैं ।
इस दोषका मूल भरतके 'न्यायादपेत' दोषमें निहित है : प्रमाणों (लोक,
वेद तथा अध्यात्म) से रहित कथन न्यायसे रहित होनेसे न्यायापेत (न्याय-
विरोधी) दोष होता है । २ प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणोंसे पदार्थके स्वरूपकी
परीक्षा 'न्याय' कहलाता है । भरतोक्त या दर्शनशास्त्रोक्त प्रमाणोंके द्वारा
परीक्ष्य पदार्थों (प्रमेयों)को काव्यमें इस रूपमें प्रयुक्त करना कि वे प्रमाणोंसे
परीक्षा करनेपर सही न उतर सकें, न्यायापेत दोष होता है । काव्यके वर्ण्य
प्रमेयोंका वर्गीकरण दार्शनिक वर्गीकरणके समान तो नहीं हो सकता । अतः
दण्डीने देश आदि छह प्रमेय बताकर इनके विषयमें प्रमाणविरुद्ध कथनको
विनाशपथदानाभ्यां पदवादसमुत्सकम् ।
कामधेनु : विरेचक-याभ-पुरीष-विनाश-पदविन्यासैर्विरेचन-मिथुनीभाव-
पुरीष-विनाश-प्रतीतेस्त्रिविधान्यश्लीलानि द्रष्टव्यानि ।
१. इसका उदाहरण १७०वें श्लोकमें नाट्यसे सम्बद्ध दिया है । अतः उचित
पाठ तो 'नाट्य' प्रतीत होता है । नृत्य नाट्य (प्रेक्षणीयक्र)का ही अङ्ग
है, यह समझकर कदाचित् 'नृत्य' कहा है ।
२. न्यायादपेतं विज्ञेयं प्रमाणपरिवर्जितम् । नाट्यशास्त्र १६।६३
लोको वेदस्तथाऽध्यात्मं प्रमाणं त्रिविधं स्मृतम् ।। २५।१३२
१६८ काव्यादर्श [३।१६२
देशादिविरुद्ध दोषके रूपमें निरूपित किया है ।
काव्यके छह प्रमेयोंका स्वरूप आचार्यने निम्नोक्त प्रकारसे बताया है :
(क) देश—प्रत्यक्ष प्रमाणसे ज्ञेय विषयोंमें सर्वप्रथम पदार्थ है सबका
अधिष्ठान देश । काव्यमें देशका वर्णन (अ) पर्वत, (आ) जंगल, नदी, समुद्र,
मरुस्थल, (इ) राष्ट्र (प्रशासनिक इकाई), नगर, ग्राम, घर, बाहर आदिके
रूपमें किया जाता है । अर्थात् भौगोलिक वर्णन देशका विषय है ।
(ख) काल—समयका वर्णन सूर्य या चन्द्रकी गतिके आधारपर कल्पित
लघुतम इकाई 'त्रुटि' अथवा 'क्षण'से लेकर उनके योगसे निष्पन्न प्रातः,
सायम्, रात, दिन, सन्ध्या, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वर्ष, युग, कल्प आदि
बड़ी मात्राओंके रूपमें किया जाता है । इतिहासभी कालका विषय है ।
(ग) कला—मनुष्यके चार पुरुषार्थों (i) धर्म, (ii) अर्थ, (iii) काम
और (iv) मोक्षमें (iv) मोक्ष निवृत्तिमार्ग होनेसे काव्यका प्रमेय कम ही
होता है । प्रवृत्तिमार्गी तीन पुरुषार्थोंमें (क) धर्म अर्थका साधन है और (ख)
अर्थ कामका है।¹ इन सबका साध्य सुख (आनन्द) है। आनन्दका ही
साधन चौंसठ कलाएँ और १०४ उपकलाएँ हैं । इनमेंसे नाट्य कला आँख
और कान, दो, इन्द्रियोंसे रञ्जनके कारण सर्वाधिक मधुर होती है । नाट्यका
ही अङ्ग है गान्धर्व कला । वह अन्य कलाओंकी प्रतिनिधि है । नाट्याचार्यों
भरत और विशाखिलके अनुसार गान्धर्व विद्याके तीन आश्रय हैं : (i) स्वर
(कण्ठ vocal, तन्त्री instrumental music), (ii) ताल (कर-चरणनिक्षेप)
और (iii) पद (i. शब्दविधान, ii. छन्दोविधान )।² दण्डीने (i, iii) प्रकारके
१. दो पुरुषार्थ धर्म और अर्थ साधन हैं और दो काम और मोक्ष क्रमशः
प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्गके साध्य हैं । कामका साधन अर्थ है और अर्थ-
का साधन धर्म है : कामैर्हं स्म वै पुरुषैयः सत्रमासते—'असौ नः कामः ।
स नः समृध्यताम् ।' इति (श० ब्रा० ४।६।६।२३) । निष्काम भावसे
साधित धर्म चित्तशुद्धिकारक होनेसे ज्ञानकी योग्यता उत्पन्न करता है ।
अतः निष्काम धर्म मोक्षका साधन है । द्रष्टव्य गीता-भाष्य-नवाम्बरा,
पृष्ठ ३६ ।
२. गान्धवं त्रिविधं विद्यात् स्वर-ताल-पदात्मकम् । नाटच० २८।११
स्वरा ग्रामावलङ्कारा वर्णाः स्थानानि जातयः ।
साधारणे च शारीर्यां वीणायामेष सङ्ग्रहः ॥ १५
व्यञ्जनानि, स्वरा वर्णाः सन्धयोऽथ विभक्तयः ।
३।१६३] ५ दोष : (१०) देशादि-विरोध १६६
(घ) चराचराणां भूतानां प्रवृत्तिर्लोकसञ्ज्ञिता ।
(ङ) हेतुविद्याऽऽत्मको न्यायः, (च) सस्मृतिः श्रुतिरागमः ॥१६३॥
(घ) स्थावर-जङ्गमात्मक पदार्थोंकी प्रवृत्ति (व्यवहार) 'लोक' है ।
(ङ) कारणविद्या (तर्कशास्त्र) के रूपमें 'न्याय' होता है । (च i) स्मृतियों
सहित (ii) श्रुति (मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद) 'आगम' है ।। १६३ ।।
गान्धर्वका प्रतिनिधित्व करने वाली गीत कलाका और (ii) ताल विधाकी
उपलक्षक नृत्य कलाका कथन किया है । ये कलाएँ (१) पेशेवर प्रयोक्ताके
लिए अर्थ-संश्रय हैं और (२ अ) आत्मतोषके लिए प्रयोग करने वालेके लिए
तथा (आ) श्रोताके लिए काम-संश्रय हैं ।
ये तीनों प्रमेय भरतके 'लोक' नामक प्रमाणमें समाहित हैं । दण्डीने इन्हें
पृथक् कर दिया है ।। १६२ ।।
(घ) लोक—देश और कालरूप अधिष्ठान तथा कलाओंकी निष्पत्ति
उनके आधेय तथा अनुष्ठाता स्थावर जङ्गम भोग्य और भोक्ता पदार्थोंके बिना
निष्प्रयोजन है । इसलिये आचार्यने देश, काल और कलाके बाद स्थावरजङ्ग-
मात्मक पदार्थोंको 'लोक'के नामसे बताया है । (i) स्थावर वृक्ष, लता, आदि
उद्दीपन विभावके रूपमें और (ii) चेतन पदार्थ आलम्बन विभावके रूपमें
काव्यमें अपने व्यवहारके माध्यमसे उपयोगी होते हैं । अतः चराचर अव्यक्त,
अल्पव्यक्त और सुव्यक्त चैतन्य वाले पदार्थोंके अस्तित्वमात्रका नाम 'लोक'
नहीं है । अपितु इनकी भोक्तृ-भोग्यके रूपमें प्रवृत्ति, व्यवहार ही लोकसे इष्ट
है । वस्तुके स्वरूपावस्थानके बिना कोई भी व्यवहार सम्भव नहीं होता, अतः
देशादिमें आधेय वस्तुओंका स्वरूप 'लोक'में पहले ही समाहित है । काव्यका
विषय यही लोक है । समस्त आलम्बन, उद्दीपन विभाव, उनकी चेष्टाओंके
रूपमें अनुभाव तथा उनके समस्त मनोजगत्में सञ्चरण करनेवाले संचारी
भाव आदि इस लोकप्रवृत्तिका ही अङ्ग है । अतः लोकका ही अङ्ग हैं ।
नामाख्यातोपसर्गाश्च निपातास्तद्धिताः कृतः ।। १६
छन्दो-विधिरलङ्कारा ज्ञेयः पद-गतो विधिः ।
निबद्धं चानिबद्धं च द्विविधं तत्पदं स्मृतम् ।। १७
ध्रुवस्तवावापनिष्कामौ...पाद-मार्गाः स-पाणयः ।। १८-१६
इत्येकविंशतिविधं ज्ञेयं तालगतं बुधैः । २०
अभिनवभारती २८।११ : "आश्रित-वाची 'विधा'-शब्द" इति चिरं-
तनाः ।... तथा च विशाखिलाचार्यः— 'स्वर-पद-ताल-समवाये तु गान्धर्वम्'
इति ।
२०० काव्यादर्श [३।१६४
तेषु तेष्वयथारूढं यदि किञ्चित् प्रवर्तते ।
कवेः प्रमादाद् देशादिविरोधीत्येतदुच्यते ॥ १६४ ॥
उन-उन (देशादि) विषयोंमें कविके प्रमादसे यदि प्रसिद्धिके विपरीत कुछ
(काव्यमें) होता है, तो वह (१०) देशादिविरोधी कहा जाता है ॥ १६४ ॥
(ङ) न्याय — 'हेतुविद्या' शब्द 'आन्वीक्षिकी'का पर्याय है, जो स्वयं
'दर्शनशास्त्र'का पर्याय है । कार्य-कारण सम्बन्धके विवेचनसे समस्त जगत्का
अन्वीक्षण करनेसे यह विद्या 'कारणविद्या', 'हेतुविद्या', 'तर्कशास्त्र', 'अन्वी-
क्षण', 'दर्शन' आदि शब्दोंसे अभिहित होती है ।¹ लोककी प्रवृत्ति तथा उसके
प्रयोजनको सूक्ष्मतासे समझनेके लिये हेतुविद्याकी परम उपयोगिता है । अतः
आचार्यने (घ) लोकके बाद तथा उससे पृथक् इसका निरूपण किया है । यह
अन्य इसी प्रकारकी विद्याओंका उपलक्षक है ।
(च) आगम — विद्यास्वरूप होते हुए भी श्रुति और उसकी अविरोधी या
विरोधी परम्परा (स्मृति) सदासे हेतुविद्यासे पृथक् एक प्रमाणके रूपमें मान्य
रही है । यह उपलक्षक है इतिहास, पुराण तथा विभिन्न देशों, कालोंमें
विभिन्न समाजोंमें विकसित सामाजिक शास्त्रोंका ॥ १६३ ॥
काव्यके इस षड्विध वर्ण्य विषयके यथार्थ, प्रमाणसिद्ध स्वरूपके विरुद्ध
जो कुछ अपनी अशक्तिसे, या प्रमादसे कवि प्रतिपादित करता है, वह सब
जिस-जिस विषयका विरोध उसमें होता है, उस-उसका विरोधी कहलाता है ।
सहृदय जनको उद्वेजक होनेसे यह दोष है ।
भामहने दण्डी जैसा विस्तार तो नहीं किया है, पर छहों भेदोंका निरूपण
प्रायः दण्डीकी दिशामें ही किया है । वामनने सम्भवतः भरतके अधिक अनु-
कूल होनेकी चेष्टामें (क) देश, काल और स्वभावसे विरोधीको देशविरोधी
दोष बताया है । और (ख i) कलाशास्त्रों, तथा (ii) चतुर्वर्ग (धर्मार्थकाम-
मोक्ष सम्बन्धी) शास्त्रोंसे विरोधीको 'विद्याविरुद्ध' नामक दोष बताया है ।²
इस वर्णनमें वामनके (क) देश, काल एवं स्वभाव दण्डीके देश, काल एवं
लोकप्रवृत्ति हैं ! (ख i) कलाशास्त्र दण्डीकी कला है । (ii) चतुर्वर्गशास्त्रमें
दण्डीके न्याय और आगम समाहित हैं । १६४ ॥
१. तर्कसङ्ग्रह तारोदय, भूमिका, पृष्ठ चार देखें ।
२. काव्याल० सूत्र २।२।२३-२४ : (क) देशकालस्वभावविरुद्धार्थानि लोक-
विरुद्धानि । (ख) कला-चतुर्वर्गशास्त्र-विरुद्धार्थानि विद्याविरुद्धानि ।
३।१६५] ५. दोष : (१० क. अ) अद्रि-देशविरोध २०१
(१० क. अ) 'कर्पूर पादपामर्श-सुरभिर्मलयानिलः' ।
(आ) 'कलिङ्ग-वन-सम्भूता मृग-प्राया मतङ्गजाः' ।। १६५ ।।
(१०. क. अ) 'मलयानिल कपूरके पेड़ोंको छूनेसे सुगन्धित है' ।
(आ) कलिङ्ग देशके वनोंमें उत्पन्न हाथी प्रायः मृग जातिके, अथवा
मृगों जैसे छोटे, होते हैं' ।। १६५ ।।
(१० क.) देशविरोध--(अ) अद्रिविरोध : 'मलय' शब्द दक्षिणमें
(तमिलमें) 'पर्वत' का वाचक है । उत्तर भारतमें (संस्कृतमें) यह शब्द दक्षिण
के एक पर्वतविशेषके लिये रूढ हो गया है, जिसकी प्रसिद्धि यह है कि वहाँ
चन्दनके वृक्ष होते हैं । दक्षिणसे आनेवाली हवा उन्हें छूकर आती है, इसलिये
सुगन्धित होती है । प्रकृत १६५वें श्लोकके पूर्वार्धमें मलयानिलकी सुरभिता
चन्दनसे न बताकर कपूरके पेड़ोंके स्पर्शसे बताई है । यह यथार्थ नहीं है ।
क्योंकि (१) कपूरके पेड़ नहीं होते । (२) मलयाद्रिकी कर्पूरपादपके
अधिष्ठानके रूपमें प्रसिद्धि भी नहीं है । अतः यहाँ अद्रिरूप देशका अयथार्थ
(प्रत्यक्षप्रमाणविरुद्ध) वर्णन करनेके कारण देशविरोधिता दोष है ।
(आ) वन-विरोधी : श्लोकके उत्तरार्धमें दक्षिणापथके दण्डकारण्य जैसे
कलिङ्गवन, अपरनाम 'महाकान्तार', के दक्षिणपूर्वी भागके एक प्रदेशको बहुत
प्राचीन कालसे 'कलिङ्ग' कहा जाता था । इसके जङ्गलोंमें पाये जानेवाले हाथी
श्रेष्ठ जातिके माने जाते थे ।१ हाथियोंकी आठ जातियोंमें से श्रेष्ठ जातिका
नाम 'भद्र' है । उनका डीलडौल विशाल होता है ।२ उन्हें कविने 'मृगप्राय'
कहा है । इसके दो अर्थ हो सकते हैं : कलिङ्गवनोंमें उत्पन्न हाथी (१)
विशालकाय होनेके बजाय मृगोके समान ह्रस्वाकार होते हैं; (२) वे 'भद्र'
जातिके होनेके बजाय गजोंकी तृतीय 'मृग' जातिके होते हैं । रत्नश्रीज्ञानने
हाथियोंकी 'भद्र'के समान 'मृग' भी एक जाति बताई है ।३ जिस प्रकार पुरुषों
के बलाबल, आकार, स्वभाव आदिके आधारपर शश, मृग, वाजी आदि भेद
१. कालिङ्गाङ्गगजाः श्रेष्ठाः प्राच्याश्चेति करूषजाः । अर्थशास्त्र २।२
२. भद्रात्मनो दुरधिरोहतनोर्विशालवंशोन्नतेः....। काव्यप्रकाश २।१२
वामनझळकीकरटीका : 'भद्रो, मन्दो, मृगश्च' इत्युक्त्वा 'एतेऽष्टौ
गजयोनयः ।' इत्युक्तेः ।
३. रत्नश्री ३।१६५ : मृगप्रायाः--'मृग'-लक्षणा हस्तिजातिः प्राया भूयसी
येषां, तया वा प्रायाः समधिका मृगप्रायाः । ...कलिङ्गवनजन्मनां
हस्तिनां भद्रजातिप्रायत्वात् ।
२०२ काव्यादर्श [३।१६६
(इ) 'चोलाः कालागुरुश्यामाः कावेरीतीरभूमयः ।'
इति देशविरोधिन्या वाचः प्रस्थानमीदृशम् ॥ १६६ ॥
(इ) 'कावेरी नदीके किनारोंकी धरती वाला 'चोल' नामक जनपद काले
अगरसे श्याम है ।'
देशके विरोधवाली उक्तिका स्वरूप ऐसा होता है ॥ १६६ ॥
बताये गये हैं, इसी प्रकार गजोंके भद्र, मृग आदि आठ भेद गजशास्त्रमें प्रोक्त
हैं । दोनों ही अर्थोंमें यहाँ वनरूप देशका विरोध है : कलिङ्गवनोंमें जब छोटे
आकार वाले या मृग जातिके दन्तावल होते ही नहीं, तब वहाँ उन्हें बताना
देशविरोध है ॥ १६५ ॥
(इ) राष्ट्रविरोधी कथन : प्रकृत उदाहरण (१६६वें श्लोक)में दण्डीने
(क) देशके तृतीय भेद राष्ट्रके विरोधका उदाहरण दिया है ।
(१) कालागुरु वृक्षों (Aquilaria Agallocha, अपरनाम Aloe Wood,
Eagle Wood)की उत्पत्ति भारतवर्षमें उत्तरापथमें भूटानमें, पूर्वमें बंगालमें
तथा असमके पहाड़ी क्षेत्रों खसिया, गारो, नाग, कछार और सिल्हटमें ही
होती है ।¹ दक्षिणापथमें नहीं । सफेद अगरसे काला अगर उत्तम होता है ।²
यह सिल्हटमें सर्वोत्तम होता है । अतः उत्तरापथमें होनेवाली वस्तुको दक्षिणा-
पथके एक जनपद चोलमें बताना राष्ट्रविरोध दोष है ।
(२) दण्डीको यदि इतना ही कहना अभीष्ट होता, तो वे दक्षिणापथको
सामान्य रूपसे ही कहते । इससे प्रतीत होता है कि 'चोल जनपदमें' कहनेसे
उन्हें कुछ विशेष अभिप्रेत है । वह विशेष यह है कि दक्षिणापथमें चेर और
चोल जातिके राजाओंका उच्छेद करके बादामी (वातापी) में चालुक्यों,
काञ्चीमें पल्लवों और मदुरामें पाण्ड्योंका राज्य लगभग तीन (छठीसे नौवीं)
शती तक रहा । इनमेंसे पूर्वकालमें चोलाधीन कावेरीतीर-भूमि उरैयुर तकका
प्रदेश पल्लवसाम्राज्यका भाग था । दण्डीके समय यह परमप्रतापी नरसिंहवर्मा
द्वितीय, अपरनाम राजसिंह, के अधीन था ।³ अतः पल्लवाधीन कावेरीतीर-
भूमिको चोलाधीन देश कहनेसे भी राष्ट्रविरोध दोष है । चोलोंका अभ्युदय
१. काउंसिल आफ साइण्टिफिक एण्ड इण्डस्ट्रियल रिसर्च, दिल्ली, १९४८ :
दी वैल्थ आफ इण्डिया, भाग १, पृष्ठ ८६ ।
२. कृष्णं गुणाधिकं तत्तु लोहवद् वारि मज्जति । भावप्रकाश १।६।२३
३. श्रीनीलकण्ठ शास्त्री, ए हिस्ट्री आफ साउथ इण्डिया, अध्याय ७-६ ।
३।१६७] ५ दोष : (१० ख) काल-विरोध २०३
(ख. अ) पद्मिनी नक्तमुन्निद्रा, (आ) स्फुटत्यह्नि कुमुद्वती ।
(ख. अ) पद्मिनी रातको खिली है । (आ) कुमुदिनी दिनमें चटकती है ।
या तो पल्लवाभ्युदयसे पूर्व था, या नवीं शती ई० में हुआ है । कावेरी-तीर-
भूमिको 'चोल' कहनेसे दण्डीके समय कोई छोटी-मोटी चोल नामलेवा
रियासत बची भी हो, तो उसका उपहास आचार्यने किया है । क्षेमेन्द्र द्वारा
कावेरीको चोल देशमें कहना¹ तो उचित है । किन्तु दण्डीके समय नहीं ।
इस प्रकार उक्तिमें (अ) पर्वतविरोध, (आ) वनविरोध और (इ) राष्ट्र-
विरोधके प्रदर्शनके माध्यमसे (क) देशविरोधी उक्तिका स्वरूप आचार्यने
स्पष्ट किया है । देशके 'आदि'-शब्द-परिगृहीत अन्य अङ्गोंका विरोध इसी
प्रकार स्वयं समझ लेना चाहिये ।
भामहने देशविरोधका स्वरूप यों प्रस्तुत किया है : किसी स्थानमें जो
द्रव्यका होना या नहीं होना कहा जाता है, उसकी विरोधी उक्ति स्वभावके
अनुसार 'देशविरोधी' है । जैसे—गुफाओंके निकट उगे हुए कालागरु वाले
मलय पर्वतपर सुगन्धित फूलोंसे झुके हुए देवदारु वृक्ष शोभा पाते हैं ।² यहाँ
(१) मलयपर चन्दनकी प्रसिद्धिके विपरीत कालागरुवृक्ष कविने बताये हैं ।
(२) देवदार वृक्ष हिमालयमें काफी ऊँचाई पर होते हैं तथा उनके फूल नहीं
होता अपितु ठीठा (cone) होता है । उन्हें कविने धुर दक्षिणमें स्थित
मलयपर्वतपर तथा (३) फूलोंसे झुके बताया है । अतः देशविरोधी होनेसे
यह उक्ति दोषयुक्त है । दक्षिणके निवासी दण्डीने देशविरोधके तीनों
उदाहरणोंमें दक्षिण भारतमें ही नहीं होनेवाले पदार्थोंका वर्णन किया है ।
उत्तर भारतके भी धुर उत्तरमें कश्मीरके निवासी भामहने देवदारका
उदाहरण उचित ही दिया है । मलय पर्वतका वर्णन तो उन्होंने सम्भवतः
दण्डीके उदाहरणकी नकलपर दिया है ॥ १६६ ॥
(ख) कालविरोध—अगले अढ़ाई (१६७-१६८।।) श्लोकोंमें आचार्य
ने कालके उपलक्षणार्थ प्रस्तुत तीनों पदार्थोंके विरोधके उदाहरण प्रस्तुत किये
हैं । प्रथम श्लोकके पूर्वार्धके दो पादोंमें क्रमशः (अ) रात्रि काल और (आ)
दिनके विरोधके उदाहरण दिये हैं । इसके बाद डेढ़ श्लोकमें (इ) ऋतुविरोधके
१. उल्लङ्घ्यमाना कावेरी तेन सम्मर्दकारिणा ।
चोलकेश्वरकीर्तिश्च कालुष्यं ययतुः समम् ।। कथासरित्सागर १६।६५
२. या देशे द्रव्यसम्भूतिरपि वा नोपदिश्यते ।
तत् तद्विरोधि विज्ञेयं स्वभावात् तद् यथोच्यते ।। काव्याल० ४।२६
मलये कन्दरोपान्तरूढकालागरुद्रुमे ।
सुगन्धिकुसुमानम्रा राजन्ते देवदारवः ।। ३०
२०४ काव्यादर्श [३।१६७-१६६
(इ १) मधुरोत्फुल्लनिचुलो, (२) निदाघो मेघदुर्दिनः ॥ १६७ ॥
(३) श्रव्यहंसगिरो वर्षाः, (४) शरदामत्तबर्हिणी ।
(५) हेमन्तो निर्मलादित्यः, (६) शिशिरः श्लाघ्यचन्दनः' ॥ १६८ ॥
इति कालविरोधस्य दर्शिता गतिरीदृशी ।
(इ १) वसन्त फूल आए हुए निचुल (स्थलवेतस) वाला है । (२) ग्रीष्म
मेघोंसे ढंके आकाश वाला है (३) सुनने योग्य हंसोंकी वाणियों वाला बारिस
का मौसम है । (४) मदमस्त मयूरों वाली शरद् है । (५) हेमन्तमें निर्मल
है सूरज । (६) शिशिरमें लगता है चन्दन अच्छा ॥ १६८ ॥
इस प्रकार कालविरोधकी ऐसी स्थिति दिखाई ।
छह उदाहरण छह पादोंमें प्रस्तुत करके १६६वें श्लोकके पूर्वार्धमें कालविरोध
का उपसंहार किया है ।
(अ) रात्रिविरोध : पद्मिनी (कमलिनी) रातमें नहीं खिलती, अपितु
दिनमें खिलती है । कुमुदिनी रातको खिलती है । यहाँ कुमुदिनीको रातमें
खिलती न बताकर पद्मिनीको बताया है । इसलिये रात्रिकालका विरोध
किया है । अतः प्रत्यक्षविरुद्ध यह सहृदयके लिये उद्वेजक होनेसे दोष है ।
(आ) दिनविरोध-कुमुदिनीको रातमें खिलती न बताकर दिनमें
खिलती बतानेसे यहाँ दिनकालविरोध प्रत्यक्षविरुद्ध होनेसे दोष है ।
(इ) ऋतुविरुद्ध : (१) वसन्तमें निचुल (स्थलवेतस)¹ नहीं खिलता;
(२) ग्रीष्म ऋतुमें आकाश मेघच्छन्न नहीं होता; (३) वर्षाकालमें हंसोंका
कलरव नहीं सुनाई देता; वे तो शरदारम्भमें जलाशयोंमें आते हैं; (४) बर्हिगण
(मयूर) शरद् ऋतुमें मदमस्त नहीं होते, अपितु वर्षाकालमें मेघमालाको देखकर
पांखें फैलाकर नाचकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हैं; (५) हेमन्त ऋतुमें
आदित्य शीतजन्य कोहरेसे धुँधला और दक्षिणायनके कारण मन्दद्युति हो
जाता है; (६) शिशिर (टाढे पाले वाली सर्दी) में चन्दन शीतल होनेके
कारण मनको नहीं भाता; वह तो गर्मीमें अच्छा लगता है । इस प्रकार इन
छहों उक्तियोंमें तत्तद् ऋतुओंके विपरीत अनुभव (प्रत्यक्ष) का निरूपण होनेसे
यहाँ ऋतुविरोध स्पष्ट है ॥ १६७-१६८ ॥
कालके उक्त तीनों अङ्गोंके विरोधका स्वरूप इस प्रकार दिखलाया है ।
कालके अन्य अवयवों युगादिका विरोध भी इसी प्रकार समझें । जैसे सत्ययुग
१. वानीरे कविभेदे स्यान्निचुलः स्थलवेतसे । शब्दार्णवकोष
३।१६६-१७० ] ५ दोष : (१० ग) कला-विरोध २०५
(ग) मार्गः कलाविरोधस्य मनागुद्दिश्यते यथा ॥ १६६ ॥
(i) 'वीर-शृङ्गारयोर्भावौ स्थायिनौ क्रोध-विस्मयौ' ।
(ii) 'पूर्णसप्तस्वरः सोऽयं भिन्नमार्गः१ प्रवर्तते' ॥ १७० ॥
(ग) 'कलाविरोध' दोषके मार्ग (प्रकार, स्वरूप) का कथन कुछ (नाम-
मात्र देकर) किया जा रहा है । जैसे—॥ १६६ ॥
(i) 'वीर, शृङ्गार (रसों) के स्थायी भाव क्रोध और विस्मय हैं' ।
(ii) 'वह यह पूरे सातों स्वरों वाला भिन्नमार्ग चल रहा है' ॥ १७० ॥
में कलिकी प्रवृत्तियोंका या कलियुगमें सत्ययुगकी प्रवृत्तियोंका वर्णन काल-
विरोध होगा । ऐसे ही मन्वन्तर विरोधादि भी समझें । युगादिविरोधमें शब्द-
प्रमाण (पुराणादिप्रतिपादित स्वरूप) का उल्लङ्घन होगा । इतिहासविरोध
भी 'कालविरोध' है ।
निर्दोषता : देश-काल-विरोध यदि काव्यमें युक्तियुक्त रूपमें प्रस्तुत किया
जाता है, तो दोष नहीं होगा । जैसे तपोवनमें आश्रमवासी ऋषिकी तपस्याके
प्रभावको निरूपित करनेके लिए कवि यदि सिंह-मृग, अहि-नकुल, गो-व्याघ्रमें
परस्पर प्रीति दिखाता है, या अन्य देश और कालमें स्थित वस्तुकी भी वहाँ
उपस्थितिका वर्णन करता है, तो वह देशविरोध और कालविरोध दोष नहीं
होगा । अतः यह दोष अनित्य है । आगे १८०-१८१ श्लोक देखें ।
(ग) कलाविरोध दोष—त्रिपुरहरभूपालद्वारा उद्धृत भामहके अनुसार
मुख्य कलाएँ चौंसठ हैं और उपकलाएँ ५०४ हैं ।२ सब कलाओंका तो दूर
किसी एक कलामें भी दोषोंका निरूपण क्लिष्ट कार्य है । इस लिये आचार्यने
स्वकृत विरोधप्रदर्शनको 'मनाक्' कहा है ॥ १६६ ॥
(i) नाट्यकलाविरोधका उदाहरण : वीर एवं शृङ्गार क्रमशः अर्थाश्रय
एवं कामाश्नय रस हैं । रसकी अनुभूति सर्वाधिक उत्कृष्ट रूपमें प्रेक्षणीयक
(नाट्य) में होती है । अतः तत्सम्बन्धी उदाहरण दिया है । वीर एवं शृङ्गार
रसोंके स्थायी भाव क्रमशः उत्साह और रति होते हैं । उनकी जगह क्रोध
और विस्मयको उनका स्थायी भाव कहना नाट्यकलाके विरुद्ध है । क्रोध रौद्र
रसका और विस्मय अद्भुतका स्थायी होता है । क्रोध और विस्मय वीर और
१. सरस्वतीकण्ठाभरण १।७४में धृत 'भिन्नग्रामः' पाठ उचित है । टीका
देखें ।
२. कामधेनु १।३।७ : कला नृत्यगीताऽऽदयश्चतुःषष्टिः । उपकलाश्चतुःशतम्;
अत्र कलानामुद्देशः कृतो भामहेन ।