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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

कवितावली ५४
कह्यो लंकपति लंक बरत, बुताओ वेगि
वानरु बहाइ मारौ महावारि बोरि कै॥
‘भलें नाथ ! नाइ माथ चले पाथप्रदनाथ,
वरषैं मुसलधार बार-बार घोरि कै।
जीवनतें जागी आगी, चपरि चौगुनी लागी,
‘तुलसी’ भभरि मेघ भागे मुखु मोरि कै ॥१९॥
तब रावणने क्रोधित होकर प्रलयकालके मेघोंको बुलाया और
वे रावणकी आज्ञासे सब अपना दल बटोरकर दौड़े आये। उनसे
लङ्कापतिने कहा—‘अरे मेघो ! जलती हुई लङ्कापुरीको शीघ्र
बुझाओ और बंदरको बहाकर गम्भीर जलमें डुबाकर मार डालो।’
तब मेघोंके स्वामी ‘महाराज ! बहुत अच्छा’ ऐसा कहकर प्रणाम
करके चल दिये और बार-बार गरज-गरजकर मूसलधार पानी बरसाने
लगे। किन्तु जलसे अग्नि और भी प्रज्वलित हो गयी और चपलता-
पूर्वक चौगुनी बढ़ गयी। तुलसीदासजी कहते हैं—तब सब मेघ
घबड़ाकर मुँह मोड़कर भागे।
इहाँ ज्वाल जरे जात, उहाँ ग्लानि गरे गात,
सूखे सकुचात सब, कहत पुकार हैं।
‘जुग-षट भानु देखे, प्रलयकृसानु देखे,
सेष-मुख-अनल विलोके बार-बार हैं॥
‘तुलसी’ सुन्यो न कान सलिलु सर्पी-समान,
अति अचिरिजु कियो केसरीकुमार है’।
वारिद-बचन सुनि धुने सीस सचिवन्ह,
कहैं ‘दससीस ! ईस-वामता-विकार हैं' ॥२०॥

५५ सुन्दरकाण्ड
बादल इधर तो अग्निकी लपटोंसे जले जाते हैं और उधर
उनके शरीर ग्लानिसे गले जाते हैं। सब मेघ शुष्क हो सकुचाकर
पुकारने लगे—'हमलोगोंने बारहों सूर्य देखे, प्रलयका अग्नि देखा
और कई बार शेषजीके मुखकी ज्वाला देखी। परन्तु कभी जलको
घृतके समान हुआ नहीं सुना। यह महान् आश्चर्य केसरीनन्दन
(हनुमान्जी) ने कर दिखलाया।' मेघोंके वचन सुनकर मन्त्रीगण
सिर धुनने लगे और रावणसे बोले—'यह सब ईश्वरकी प्रतिकूलताका
विकार है।'
'पावकु, पवनु, पानी, भानु, हिमवानु, जमु,
कालु, लोकपाल मेरे डर डावाँडोल हैं।
साहेबु महेसु, सदा संकित रमेसु मोहिं,
महातप साहस विरंचि लीन्हें मोल हैं॥
'तुलसी' तिलोक आजु दूजो न बिराजै राजु,
बाजे-बाजे राजनिके बेटा-बेटी ओल हैं।
को है ईस नामको, जो वाम होत मोहूसे को,
मालवान ! रावरे के बावरे-से बोल हैं' ॥२१॥
तब रावणने कहा—'अग्नि, वायु, जल, सूर्य, हिमाचल, यम,
काल और लोकपाल (इन्द्रादि) मेरे डरसे डाँवाडोल रहते हैं अर्थात्
काँपते रहते हैं। हमारे स्वामी श्रीमहादेवजी हैं, लक्ष्मीपति विष्णु
भी हमसे सदा शङ्कित रहते हैं। मैंने साहसपूर्वक महान् तपस्या
करके ब्रह्माजीको भी मोल ले लिया है अर्थात् वे भी मेरे प्रतिकूल
नहीं जा सकते। तीनों लोकोंमें आज कोई दूसरा राजा विराजमान
नहीं है। और तो क्या, बाजे-बाजे राजाओंके बेटा-बेटीतक हमारे

यहाँ ओल्में ( गिरवीं ) हैं। माल्यवान् ! तुम्हारे वचन पागलोंके-से
हैं। यह 'ईश्वर' नामका व्यक्ति कौन है जो मेरे-जैसे शूरवीरके
प्रतिकूल जा सकता है ?
भूमि भूमिपाल, ब्यालपालक पताल, नाक-
पाल, लोकपाल जेते, सुभट-समाजु है।
कहै मालवान, जातुधानपति ! रावरे को
मनहूँ अकाजु आनै, ऐसो कौन आजु है ॥
रामकोहु पावकु, समीरु सीय-सासु, कीसु
ईस-बामता विलोकु, बानरको ब्याजु है।
जारत पचारि फेरि-फेरि सो निसंक लंक,
जहाँ बाँको बीरु तोसो सूर-सिरताजु है ॥२२॥
तब माल्यवान् कहने लगा—'पृथ्वीमें जितने राजा हैं, पातालमें
जितने सर्पराज हैं, जितने स्वर्गके अधिपति और लोकपाल हैं और
जितना वीरोंका समाज है, हे राक्षसेश्वर ! उनमेंसे आज ऐसा कौन
है जो मनसे भी आपका अपकार करनेकी सोचे ? किन्तु यह अग्नि
तो श्रीरामचन्द्रजीका क्रोध है और वायु जानकीजीका श्वास है।
और देखो, वानरके रूपमें यह ईश्वरकी प्रतिकूलता ही है, वानरका
तो बहानामात्र है। इसीसे जहाँ तुम्हारे समान शूरशिरोमणि बाँका
वीर मौजूद है, वहीं यह बार-बार बलपूर्वक किसी प्रकारकी शङ्का
न करता हुआ लङ्काको जला रहा है।'
पान-पकवान बिधि नाना के, सँधानो, सीधो,
बिबिध-बिधान धान बरत बरवारहीं।

५७ सुन्दरकाण्ड
कनककिरीट कोटि, पलँग, पेटारे, पीठ
काढ़त कहार सब जरे भरे भारहीं ॥
प्रबल अनल बाढ़ें जहाँ काढ़े तहाँ डाढ़े,
झपट-लपट भरे भवन-भँडारहीं ।
'तुलसी' अगारु न पगारु न बजारु बच्यो,
हाथी हथसार जरे, घोरे घोरसारहीं ॥२३॥
अनेक प्रकारके पेय पदार्थ, पकान्न, अचार, सीधा (चावल-
दाल आदि) और अनेक प्रकारके धान बखारोंमें ही जल रहे हैं ।
करोड़ों सोनेके मुकुट, पलंग, पिटारे और सिंहासन निकालनेमें कहार-
लोग भार लिये हुए ही जल रहे हैं। प्रबल अग्निके बढ़ जानेसे जो
वस्तुएँ जहाँ निकालकर रखीं वहीं जल गयीं तथा अग्निकी झपट
और लपट घर और भण्डारमें भर गयीं । गोसाईंजी कहते हैं कि न
तो घर बचा, न दीवार या बाजार ही बचा । हाथी हाथीखानेमें
और घोड़े घुड़सालहीमें जल गये ।
हाट-बाट हाटकु पिघिलि चलो घी-सो घनो,
कनक-कराही लंक तलफति तायसों ।
नाना पकवान जातुधान बलवान सब
पागि-पागि ढेरी कीन्ही भलीभाँति भायसों ॥
पाहुने कृसानु पवमानसौं परोसो, हनु-
मान सनमानि कै जेंवाए चित-चायसों ।
'तुलसी' निहारि अरिनारि दै-दै गारि कहैं,
'बावरें सुरारि बैरु कीन्हौ रामरायसों' ॥२४॥

कवितावली ५८
बाज़ार तथा राहमें ढेर-का-ढेर सोना घीके समान पिघलकर
बहने लगा। अग्निके तापसे सोनेकी लङ्कारूपी कराही खदक रही
है, उसमें बलवान् राक्षसरूपी अनेक प्रकारकी मिठाइयोंको बड़े प्रेमसे
पागकर खूब ढेर लगा दिया है और अपने अग्निरूपी पाहुनेको वायु-
द्वारा परसवाकर हनुमान्‌जीने बड़े चावसे आदरपूर्वक भोजन कराया
है। यह देखकर शत्रु की स्त्रियाँ गाली दे-देकर कहती हैं—'अरे !
पागल रावणने श्रीरामचन्द्रके साथ वैर किया है !'
रावनु सो राजरोगु बाढ़त बिराट-उर,
दिनु-दिनु बिकल, सकल सुख राँक सो ।
नाना उपचार करि हारे सुर, सिद्ध, मुनि,
होत न बिसोक, औत पावै न मनाक सो ॥
रामकी रजाइतें रसाइनी समीरसनु
उतरि पयोधि पार सोधि सरवाक सो ।
जातुधान-बुट पुटपाक लंक-जातरूप-
रतन जतन जारि कियो है मृगांक-सो ॥२५॥
विराट् पुरुषके हृदयमें रावणरूपी राजरोग बढ़ रहा था,
जिससे व्याकुल होकर वह दिनोंदिन समस्त सुखोंसे हीन होता
जाता था। देवता, सिद्ध और मुनिगण अनेक प्रकारकी ओषधि
करके हार गये; परन्तु न तो वह शोकरहित होता था, न कुछ
भी चैन पाता था। तब श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे रसवैद्य
हनुमान्‌जीने समुद्रके पार उतरकर और ( लङ्कारूपी ) शिकारेको
ठीक करके राक्षसरूपी बूटियोंके रसमें लङ्काके सोने और रत्नोंको
यत्नपूर्वक फूँककर मृगाङ्क ( एक प्रकारका रसौषधि-विशेष ) बना डाला।

५९ सुन्दरकाण्ड
सीताजीसे बिदाई
जारि-बारि, कै बिधूम, बारिधि बुताइ लूम,
नाइ माथो पगनि, भो ठाढ़ो कर जोरि कै ।
मातु ! कृपा कीजै, सहिदानि दीजै, सुनि सीय
दीन्ही है असीस चारु चूडामनि छोरि कै ॥
कहा कहौं तात ! देखे जात ज्यों बिहात दिन,
बड़ी अवलंब ही, सो चले तुम्ह तोरि कै ।
'तुलसी' सनीर नैन, नेहसों सिथिल वैन,
बिकल बिलोकि कपि कहत निहोरि कै ॥२६॥
फिर श्रीहनुमान्‌जीने लङ्काको जला और उसे धूमरहित कर
अपनी पूँछको समुद्रमें बुता (श्रीजानकीजीके) चरणोंमें शिर नवाया
और उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये; (तथा कहने लगे—)
'हे मातः ! कृपाकर कोई सहिदानी (चिह्न) दीजिये।' यह सुनकर
श्रीजानकीजीने आशीर्वाद दिया और अपना सुन्दर चूडामणि उतारकर
उसे देते हुए कहा—'भैया ! मैं तुमसे क्या कहूँ ? हमारे दिन
किस प्रकार कट रहे हैं, सो तो तुम देखे ही जाते हो। तुम्हारे
रहनेसे बड़ा सहारा था, उसे भी तुम तोड़कर चल दिये।' गोसाईंजी
कहते हैं—जानकीजीके नेत्रोंमें जल भर आया और वाणी शिथिल
हो गयी। (इस प्रकार सीताजीको) व्याकुल देख हनुमान्‌जी उन्हें
विनयपूर्वक समझाते हुए कहने लगे।
'दिवस छ-सात जात जानिबे न, मातु ! धरु
धीर, अरि-अंतकी अवधि रहि थोरिकै ।

३. अरण्यकाण्ड (पंचवटी व शूर्पणखा प्रसंग)

कवितावली ६०
वारिधि बँधाइ सेतु ऐहैं भानुकुलकेतु
सानुज कुसल कपिकटकु वटोरि कै॥
बचन विनीत कहि, सीताको प्रबोधु करि,
'तुलसी' त्रिकूट चढ़ि कहत डफोरि कै।
'जै जै जानकीस दससीस-करि-केसरी'
कपीसु कूद्यो बात-घात उदधि हलोरि कै ॥२७॥
'मातः ! धैर्य धारण करो। आपको छः-सात दिन बीतते
कुछ मालूम न होंगे। अब शत्रुके नाशकी अवधि थोड़ी ही रह गयी
है। भाईके सहित सूर्यकुलकेतु ( श्रीरामचन्द्रजी) वानरसेना
एकत्रित कर, समुद्रमें पुल बाँध यहाँ ( शीघ्र ही) सकुशल पधारेंगे।'
इस प्रकार नम्र वचन कह, जानकीजीको समझाकर हनुमान्‌जी
त्रिकूट पर्वतपर चढ़ गये और बड़े जोरसे चिल्लाकर बोले—
'रावणरूप गजराजके लिये मृगराजतुल्य जानकीवल्लभ (भगवान्
श्रीराम) की जय हो।' (ऐसा कहकर) कपिराज (श्री-
हनुमान्‌जी) वायुके आघातसे समुद्रमें हिलोरें उत्पन्न करते हुए
(समुद्रके उस पार) कूद गये।
साहसी समीरसनु नीरनिधि लंघि, लखि
लंक सिद्धपीठु निसि जागो है मसानु सो।
'तुलसी' बिलोकि महासाहसु प्रसंन भई
देबी सीय-सारिखी, दियो है बरदानु सो॥
बाटिका उजारि, अच्छधारि मारि, जारि गढ़,
भानुकुलभानुको प्रतापभानु-भानु-सो।

६१ सुन्दरकाण्ड
करत बिसोक लोक-कोकनद, कोक कपि,
कहै जामवंतु, आयो, आयो हनुमानु सो ॥२८॥
साहसी वायुनन्दनने समुद्रको लाँघ और लङ्कारूपी सिद्धपीठको
जान उसमें रातभर मसान-सा जगाया है । उनके इस महान्
साहसको देख श्रीजानकीजी-जैसी देवी प्रसन्न हुईं और उन्हें
वरदान दिया । उस समय जाम्बवान् कहने लगे—‘वाटिकाको
उजाड़, अक्षयकुमारकी सेनाका संहार कर और फिर लङ्काको जलाकर
भानुकुलभानु श्रीरामचन्द्रके प्रतापरूप सूर्यकी किरणके समान
लोकरूपी कमल और वानररूपी चक्रवाकोंको शोकरहित करते
हनुमान्‌जी आ गये, आ गये ।'
गगन निहारि, किलकारी भारी सुनि, हनु-
मान पहिचानि भये सानँद सचेत हैं ।
बूडत जहाज बच्यो पथिकसमाजु, मानो
आजु जाए जानि सब अंकमाल देत हैं ॥
‘जै जै जानकीस, जै जै लखन-कपीस’ कहि,
कूदैं कपि कौतुकी नटत रेत-रेत हैं ।
अंगदु मयंदु नलु नील बलसील महा
बालधी फिरावैं, मुख नाना गति लेत हैं ॥२९॥
· किलकारीके उच्च शब्दको सुनकर (सब वानर और भालू )
आकाशकी ओर देखने लगे और हनुमान्‌जीको पहचानकर
आनन्दित और सचेत हो गये । मानो जहाजके साथ पथिकोंका
समाज डूबता-डूबता बच गया । वे सब आज अपना नया जन्म

कवितावली ६२
जान एक दूसरेसे गले लगकर मिलने लगे। 'जय जानकीश, जय
जानकीश, जय लक्ष्मणजी, जय सुग्रीव' ऐसा कहते हुए वे कौतुकी
वानर कूदते हैं और समुद्रकी रेतीपर नाचते हैं। बलशाली अङ्गद,
मयन्द, नील, नल—ये सब अपनी विशाल पूँछोंको घुमाते हैं और
अनेक प्रकारसे मुँह बनाते हैं।
आयो हनुमानु प्रानहेतु, अंकमाल देत,
लेत पगधूरि एक, चूमत लँगूल हैं।
एक बूझें बार-बार सीय-समाचार, कहें
पवनकुमारु, भो विगत-श्रम-सूल हैं॥
एक भूखे जानि, आगें आनैं कंद-मूल-फल,
एक पूजैं बाहु बलमूल तोरि फूल हैं।
एक कहैं 'तुलसी' सकल सिधि ताकें, जाकें
कृपा-पाथनाथ सीतानाथु सानुकूल हैं॥३०॥
अपने प्राणोंकी रक्षा करनेवाले हनुमान्‌जीको आया देख कोई
उनसे गले लगकर मिलते हैं, कोई चरणधूलि लेते हैं, कोई पूँछ
चूमते हैं, कोई बार-बार जानकीजीके समाचार पूछते हैं। जिन्हें
कहनेहीसे हनुमान्‌जीकी सारी थकावट और व्यथा जाती रही।
कोई हनुमान्‌जीको भूखे जान उनके आगे कन्द-मूल-फल लाकर
रख देते हैं। कोई फूल तोड़कर हनुमान्‌जीकी बलशालिनी भुजाओंका
पूजन करते हैं। कोई कहते हैं कि कृपासिन्धु सीतानाथ जिसके
ऊपर अनुकूल हैं उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
सीयको सनेहु, सीलु, कथा तथा लंकाकी
कहत चले चायसों, सिरानो पथु छनमें।

६३ सुन्दरकाण्ड

कह्यो जुवराज बोलि बानरसमाजु, आजु
खाहु फल, सुनि पेलि पैठे मधुबनमें ॥
मारे बागवान, ते पुकारत देवान गे,
'उजारे बाग अंगद', देखाए घाय तनमें ।
कहै कपिराजु, करि काजु आये कीस, तुल-
सीसकी सपथ, महामोदु मेरे मनमें ॥३१॥

फिर वे सब श्रीजानकीजीके प्रेम और शीलकी तथा लङ्काकी
कथा बड़े चावसे कहते हुए चले, (जिससे) क्षणमात्रमें रास्ता
समाप्त हो गया । [किष्किन्धा में पहुँचनेपर] युवराज (अङ्गद) ने
कपिसमाजको बुलाकर कहा, 'आज सब लोग फल खाओ।' यह
सुनकर वे सब-के-सब बलपूर्वक मधुवनमें घुस गये । उन्होंने जिन
बागवानोंको मारा, वे पुकारते हुए दरबारमें गये और शरीरमें घाव
दिखाकर कहने लगे कि युवराज अङ्गदने बागोंको उजाड़ दिया
और [हमलोगोंको मारा], तब सुग्रीवने कहा - तुलसीके स्वामी
(श्रीरामचन्द्रजी) की शपथ है, आज मेरे मनमें बड़ा आनन्द है;
मालूम होता है, वानरगण कार्य कर आये हैं ।

भगवान् रामकी उदारता

नगरु कुबेरको सुमेरुकी बराबरी,
विरंचि-बुद्धिको विलासु लंक निरमान भो ।
ईसहि चढ़ाइ सीस बीसबाहू बीर तहाँ,
रावनु सो राजा रज-तेजको निधानु भो ॥

कवितावली [L1b] ६४
'तुलसी' तिलोककी समृद्धि, सौंज, संपदा
सकेलि चाकि राखी रासि, जाँगरु जहानु भो।
तीसरे उपास बनवास सिंधु पास सो
समाजु महाराजजू को एक दिन दानु भो ॥३२॥

कुबेरकी पुरी लङ्का (स्वर्णमय होनेके कारण) सुमेरुके समान
है। वह मानो ब्रह्माकी बुद्धिका कौशल ही बनकर खड़ा हो गया
है। वहाँ राजसी तेजकी खान, बीस भुजाओंवाला रावण श्रीमहादेव-
जीको अपने मस्तक चढ़ाकर राजा हुआ। तुलसीदासजी कहते
हैं—मानो तीनों लोकोंकी विभूति, सामग्री और सम्पत्तिकी राशिको
एकत्रित कर यहीं चाँक लगाकर (सीमा बाँधकर) रख दी है
तथा इसीका भूसा आदि सारा संसार बन गया। यही सारी
सम्पत्ति वनवासी महाराज रामजीको समुद्रतटपर तीन दिन
उपवास करनेके बाद [ विभीषणको देते समय ] एक दिनका
दान हो गयी।

इति सुन्दरकाण्ड

लंकाकाण्ड
राक्षसोंकी चिन्ता
बड़े बिकराल भालु-बानर बिसाल बड़े,
'तुलसी' बड़े पहार लै पयोधि तोपिहैं।
प्रबल प्रचंड बरिबंड बाहुदंड खंडि
मंडि मेदिनीको मंडलीक-लीक लोपिहैं ॥
लंकदाहु देखें न उछाहू रह्यो काहुन को,
कहैं सब सचिव पुकारि पाँव रोपि हैं।
'बाँचिहै न पाछैं त्रिपुरारिहू मुरारिहू के,
को है रन रारिको जौं कोसलेसु कोपिहैं ॥ १ ॥
लंकाका दाह देखकर किसीका उत्साह नहीं रहा। पीछे सब
मन्त्रिगण प्रणपूर्वक पुकार-पुकारकर कहने लगे—'महाभयानक भालू
और बड़े विशालकाय वानर बड़े-बड़े पहाड़ लाकर समुद्रको तोप
(पाट) देंगे। वे अत्यन्त प्रबल, पराक्रमी और दुर्द्दण्ड वीरोंके
भुजदण्डोंका खण्डन कर, और उनसे पृथ्वीको समलंकृत कर
त्रिभुवनविजयी (रावण) की मर्यादाका लोप कर देंगे।' शिवजी
और विष्णु भगवान्के बचानेपर भी कोई नहीं बचेगा। यदि
श्रीरामचन्द्रजीने क्रोध किया तो उनसे युद्ध करनेवाला भला कौन है ?
क० ५-

कवितावली ६६
त्रिजटाका आश्वासन
त्रिजटा कहत बार-बार तुलसीखरीसों,
'राधौ बान एकहीं समुद्र सातौ सोषिहैं।
सकुल सँघारि जातुधान-धारि, जम्बुकादि,
जोगिनी-जमाति कालिकाकलाप तोषिहैं ॥
राजु दै नेवाजिहैं बजाइ कै बिभीषनै,
बजैंगे ब्योम बाजने विबुध प्रेम पोषिहैं।
कौन दसकंधु, कौन मेघनादु बापुरो,
को कुंभकर्नु कीटु, जब रामु रन रोषिहैं' ॥ २ ॥
त्रिजटा राक्षसी तुलसीदासकी स्वामिनी श्रीजानकीजीसे बार-बार
कहती है कि श्रीरामचन्द्रजी एक ही बाणसे सातों समुद्रोंको सोख
लेंगे। वे राक्षससेनाका कुलसहित संहार कर गीदड़ों, योगिनियों और
कालिकाओंके समूहोंको तृप्त करेंगे। वे डंकेकी चोट विभीषणको
राज्य देकर उसपर अनुग्रह करेंगे। उस समय आकाशमें बाजे बजने
लगेंगे और देवतालोग प्रेमसे पुष्ट हो जायँगे । जब युद्धक्षेत्रमें
श्रीरघुनाथजी कुपित होंगे तब भला रावण क्या चीज़ है, बेचारा
मेघनाद भी किस गिनतीमें है और कीटतुल्य कुम्भकर्ण भी क्या है।
बिनय-सनेह सों कहति सिय त्रिजटासों,
पाए कछु समाचार आरजसुवनके ।
पाए जू, बँधायो सेतु, उतरे भानुकुलकेतु,
आए देखि-देखि दूत दारुन दुवनके॥

६७ लंकाकाण्ड
वदन मलीन, बलहीन, दीन देखि, मानो
मिटे घटे तमीचर-तिमिर भुवनके ।
लोकपति-कोक-सोक मूँदे कपि-कोकनद,
दंड द्वै रहे हैं रघु-आदित-उवनके ॥ ३ ॥
श्रीजानकीजी विनय और प्रेमपूर्वक त्रिजटासे कहती हैं कि
'क्या आर्यपुत्रके कोई समाचार मिले ?' त्रिजटा बोली—'हाँ जी,
पाये हैं; भानुकुलकेतु ( श्रीरामचन्द्र ) समुद्रपर पुल बाँधकर इस पार
उतर आये । घोर राक्षस ( रावण ) के दूत यह सब देख-देखकर
आये हैं । उन लोगोंके मुख मलिन हो गये हैं और वे बलहीन तथा
दीन हो गये हैं । मानो चौदहों भुवनका राक्षसरूपी अन्धकार मिटना
और घटना चाहता है । इन्द्रादि लोकपालरूप चक्रवाकोंकी शोक-
निवृत्ति और वानरसेनारूप मुँदे हुए कमलोंकी प्रफुल्लताके लिये
श्रीरामरूप सूर्यके उदित होनेमें केवल दो ही दण्ड ( घड़ी ) काल
रह गया है ।
झूलना
सुभुजु मारीचु खरु त्रिसिरु दूषनु बालि,
दलत जेहि दूसरो सरु न साँध्यो ।
आनि परबाम बिधि बाम तेहि रामसों
सकत संग्रामु दसकंधु काँध्यो ॥
समुझि तुलसीस-कपि-कर्म घर-घर घैरु,
बिकल सुनि सकल पाथोधि बाँध्यो ।

कवितावली ६८
बसत गढ़ बंक, लंकेस नायक अछत,
लंक नहि खात कोउ भात राँध्यो ॥४॥
जिसने सुबाहु, मारीच, खर, दूषण, त्रिशिरा और बालिके
मारनेमें दूसरा बाण सन्धान नहीं किया, उन्हीं रघुनाथजीसे विधिकी
वामताके कारण परस्त्रीको ले आकर क्या रावण युद्ध ठान सकता
है ? तुलसीदासके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीके और हनुमान्‌जीके कार्यों-
का स्मरण करके घर-घर (रावणकी) बदनामी होती रहती है ।
तथा समुद्र बाँधनेका समाचार सुनकर सब लोग व्याकुल हो गये हैं।
(लंका-जैसे) विकट गढ़में निवास करते और रावण-जैसे (दुर्दान्त)
शासकके रहते हुए भी लंकामें कोई पकाया हुआ भात नहीं खाता
[क्योंकि उन्हें हर समय आग लगनेका भय बना रहता है]।
'बिस्वजयी भृगुनायक-से बिनु हाथ भए हनि हाथ हजारी ।
बातुल मातुलकी न सुनी सिख का 'तुलसी' कपि लंक न जारी ॥
अजहूँ तौ भलो रघुनाथ मिलें, फिरि बूझिहै, को गज, कौन गजारी।
कीर्ति बड़ो, करतूति बड़ो, जन-बात बड़ो, सो बड़ोई बजारी ॥५॥
[ लंकापुरीमें रहनेवाले नर-नारी कहते हैं—] हजार
भुजाओंवाले (सहस्रार्जुन) को मारनेवाले परशुराम-जैसे विश्व-
विजयी वीर भी (इन रघुनाथजीके सामने) निहत्थे हो गये ।
देखो, इस पागल रावणने अपने मामा (माल्यवान्) की भी शिक्षा
नहीं मानी; तो तुलसीदासजी कहते हैं क्या हनुमान्‌जीने लंकाको
नहीं जलाया ? यदि यह श्रीरघुनाथजीसे मेल कर ले तो अब भी अच्छा
है। नहीं तो फिर मालूम हो जायगा कि कौन हाथी है और कौन

४९ लंकाकाण्ड
सिंह है ? इस (रावण) की कीर्ति बड़ी है, करनी बड़ी है
और जनतामें बात भी बड़ी है, परन्तु यह है बड़ा बजारा
(बकवादी*) ।
समुद्रोत्चरण
जब बाहन भे बनबाहन-से, उतरे बनरा, 'जय राम' रढैं।
'तुलसी' लिएँ सैल-सिला सब सोहत, सागरु ज्यों बल बारि बढ़ें॥
करि कोपु करें रघुबीरको आयसु, कौतुक हीं गढ़ कूदि चढ़े।
चतुरंग चमू पलमें दलि कैं रन रावन-राइ-सुहाड़ गढ़े ॥ ६ ॥
जब [ सेतु बाँधते समय ] पत्थर नावके समान हो गये, तब
वानरलोग समुद्रपार उतर आये और 'रामचन्द्रजीकी जय' कहने
लगे। गोसाईंजी कहते हैं—वे सब हाथोंमें पर्वत और शिलाएँ
लिये ऐसे सुशोभित हो रहे हैं जैसे ज्वार आनेपर समुद्र सुशोभित
होता है। वे बड़ा क्रोध करके श्रीरामचन्द्रजीका आज्ञाका पालन करते
हैं, खेलहीसे कूदकर लंका-गढ़पर चढ़ गये हैं, मानो एक ही पलमें
युद्धमें चतुरंगिणी सेनाको नष्टकर दुष्ट रावणकी सुदृढ़ हड्डियोंका
मरम्मत कर डालेंगे।
बिपुल बिसाल बिकराल कपि-भालु, मानो
कालु बहु बेष धरें, धाए किएँ करषा ।
लिए सिला-सैल, साल, ताल औ तमाल तोरि,
तोपैं तोयनिधि, सुरको समाजु हरषा ॥
डगे दिगकुंजर, कमठ कोलू कलमलै,
डोले धराधर धारि, धराधरु धरषा ।

  • बजारीका अर्थ दलाल या मिथ्यावादी भी हो सकता है ।

४. किष्किन्धाकाण्ड (सुग्रीव मैत्री व लंका प्रस्थान)

'तुलसी' तमकि चलैं, राघौकी सपथ करें,
को करै अटक कपिकटक अमरषा ॥७॥
बहुत-से बड़े-बड़े भयंकर बानर और भालु इस प्रकार दौड़े
मानो अनेक वेष धारण किये काल ही क्रोधित हो दौड़ रहा हो। कोई
शिला, कोई पर्वत, कोई शाल, कोई ताड़ और कोई तमालके वृक्ष
तोड़ लाये और समुद्रको तोपने लगे। यह देखकर देवसमाज हर्षित
हुआ। दिशाओंके हाथी डोलने लगे, कच्छप और वाराह कलमला
गये, पहाड़ काँपने लगे और शेष दब गये। गोसाईंजी कहते हैं—
श्रीरामचन्द्रजीकी दुहाई देकर सब बानर तमककर चलते हैं। भला
ऐसा कौन है जो उस क्रोधभरे कपिकटकको रोक सके ?
आए सुक, सारनु, बोलाए ते कहन लागे,
पुलक सरीर सेना करत फहम हीं।
'महाबली बानर विसाल भालु काल-से
कराल हैं, रहें कहाँ, समाहिंगे कहाँ महीं' ॥
हँस्यो दसकंधु रघुनाथको प्रतापु सुनि,
'तुलसी' दुरावै मुखु, सूखत सहम हीं।
: रामके बिरोधें बुरो बिधि-हरि-हरहू को,
सबको भलो है राजा रामके रहम हीं ॥८॥
सुक और सारण [वानर-सेना देखकर] लौट आये हैं। उनके
शरीर कपिकटकका खयाल करते ही पुलकित हो गये। बुलाकर
पूछनेपर वे कहने लगे—'महाबलवान् बानर और विशाल भालु
कालके समान भयंकर हैं। वे न जाने कहाँ रहते हैं और पृथ्वीमें

७१ लंकाकाण्ड
कहाँ समायेंगे ।' श्रीरामचन्द्रका प्रताप सुनकर रावण हँसा ।
गोसाईं जी कहते हैं—डरसे उसका मुँह सूख गया है, (किन्तु वह)
उसे (हँसकर) छिपाता है। श्रीरामचन्द्रजीसे वैर करनेसे तो ब्रह्मा,
विष्णु और शिवका भी अहित होता है। सबकी भलाई तो महाराज
रामकी कृपामें ही है।
अङ्गदजीका दूतत्व
'आयो! आयो! आयो सोई बानरु बहोरि!' भयो
सोरु चहुँ ओर लंकाँ आएँ जुबराजकें।
एक काढैं सोंज, एक धोंज करें, 'कहा हैहै,
पोच भई,' महासोचु सुभटसमाजकें ॥
गाज्यो कपिराजू रघुराजकी सपथ करि,
मूँदे कान जातुधान मानो गाजें गाजकें।
सहमि सुखात बातजातकी सुरति करि,
लवा ज्यों लुकात तुलसी झपटें बाजकें ॥९॥
लंकामें युवराज (अङ्गदजी) के आनेपर वहाँ चारों ओर यही
शोर हो गया कि वही (लंका जलानेवाला) वानर फिर आ गया,
वही वानर फिर आ गया। कोई असबाब निकालने लगे और कोई
दौड़ने और कहने लगे कि 'भाई! बड़ा बुरा हुआ; न जाने अब
क्या होगा ?' इस प्रकार वीरसमाजमें बड़ी चिन्ता हो गयी। जब
कपिराज (अङ्गद) श्रीरामचन्द्रजीकी दोहाई देकर गरजे तो राक्षसों ने
कान मूँद लिये, मानो बिजलौ कड़की हो। वे लोग हनुमान्जीके
स्मरणकर डरके मारे सूख गये और ऐसे छिपने लगे जैसे बाजके
झपटनेपर लवा पक्षी छिप जाता है।

कवितावली ७३
तुलसीस बल रघुबीरजू कें बालिसुतु
ताहि न गनत, बात कहत करेरी-सी।
'बकसीस ईसजू की खीस होत देखिअत,
रिस काहें लागति, कहत हौं मैं तेरी-सी ॥
चढ़ि गढ़-मढ़ दृढ़, कोटकें कँगूरें, कोपि
नेकु धक्का देहिं, दैहैं ढेलनकी ढेरी-सी।
सुनु दसमाथ ! नाथ-साथके हमारे कपि
हाथ लंका लाइहैं तौ रहेगी हथेरी-सी ॥१०॥
तुलसीदासजीके स्वामी श्रीरामचन्द्रके बलपर बालिपुत्र अङ्गद
उस (रावण) को कुछ नहीं समझते और कड़ी-कड़ी बातें कहते
हैं कि 'आज शिवजीकी दी हुई सम्पत्ति नष्ट होती दिखायी देती है,
इससे तुम क्रोधित क्यों होते हो ? मैं तो तुम्हारे हितकी ही बात
कहता हूँ । हे रावण ! सुनो, हमारे स्वामीके साथके बंदर जब गढ़के
मकानोंपर और कोटके सुदृढ़ कँगूरोंपर चढ़ जायेंगे और क्रोधित
होकर जरा भी धक्का देंगे तो सब ढेलोंकी ढेरीके समान ढह जायेंगे।'
और उन्होंने लङ्कामें हाथ डाला तो वह हथेलीके समान सपाट
(चौपट) हो जायगी।
'दूषनु, बिराधु, खरु, त्रिसिरा, कबंधु बधे
तालऊ बिसाल बेधे, कौतुकु हे कालिको ।
एक ही बिसिख बस भयो बीर बाँकुरो सो,
तोहू है बिदित बलु महाबली बालिको ॥
'तुलसी' कहत हित, मानतो न नेकु संक,
मेरो कहा जैहैं, फलु पैहै तू कुचालिको ।

७३ लंकाकाण्ड
बीर-करि-केसरी कुठारपानि मानी हारि,
तेरी कहा चली, बिड़ ! तोसे गनै घालि को॥११॥
देखो, उन्होंने दूषण, विराध, खर, त्रिशिरा और कबन्धको
मारा, बड़े विशाल ताड़ोंका भी (एक ही बाणसे) छेदन किया—
ये सब उनके कलके ही कौतुक हैं। जिस महाबलशाली बालिका
बल तुझे भी विदित है, वह बाँका वीर भी उनके एक ही बाणके
अधीन हो गया। हम तेरे हितकी बात कहते हैं, परन्तु तू जरा भी
भय नहीं मानता; सो मेरा क्या जायगा, तू ही अपनी कुचालका
फल पावेगा। जो वीररूपी गजराजोंके लिये सिंहके समान हैं,
उन कुठारपाणि परशुरामजीने भी जिनसे हार मान ली, अरे नीच !
उनके सामने तेरी क्या चल सकती है? तेरे जैसोंको पासंगके
बराबर भी कौन गिनता है ?
तोसों कहौं दसकंधर रे, रघुनाथ विरोधु न कीजिए बौरै।
बालि बली, खरु दूषनु और अनेक गिरे जे-जे भीतिमें दौरै ॥
ऐसिअ हाल भई तोहि धों, न तु लै मिलु सीय चहै सुखु जौं रे।
रामकें रोष न राखि सकैं तुलसी बिधि, श्रीपति, संकरु सौ रे॥१२॥
'अरे दशकन्ध ! मैं तुझसे कहता हूँ, तू भूलकर भी रघुनाथ-
जीसे विरोध न करना। महाबली बालि और खर-दूषणादि जो वीर
दीवारपर दौड़े वे ही गिर पड़े। तेरी भी ऐसी ही दशा होनेवाली है;
नहीं तो, यदि सुख चाहता है तो जानकीजीको लेकर मिल। अरे,
श्रीरामचन्द्रके क्रोधसे सैकड़ों ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी रक्षा नहीं
कर सकते।