कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली ७३
तुलसीस बल रघुबीरजू कें बालिसुतु
ताहि न गनत, बात कहत करेरी-सी।
'बकसीस ईसजू की खीस होत देखिअत,
रिस काहें लागति, कहत हौं मैं तेरी-सी ॥
चढ़ि गढ़-मढ़ दृढ़, कोटकें कँगूरें, कोपि
नेकु धक्का देहिं, दैहैं ढेलनकी ढेरी-सी।
सुनु दसमाथ ! नाथ-साथके हमारे कपि
हाथ लंका लाइहैं तौ रहेगी हथेरी-सी ॥१०॥
तुलसीदासजीके स्वामी श्रीरामचन्द्रके बलपर बालिपुत्र अङ्गद
उस (रावण) को कुछ नहीं समझते और कड़ी-कड़ी बातें कहते
हैं कि 'आज शिवजीकी दी हुई सम्पत्ति नष्ट होती दिखायी देती है,
इससे तुम क्रोधित क्यों होते हो ? मैं तो तुम्हारे हितकी ही बात
कहता हूँ । हे रावण ! सुनो, हमारे स्वामीके साथके बंदर जब गढ़के
मकानोंपर और कोटके सुदृढ़ कँगूरोंपर चढ़ जायेंगे और क्रोधित
होकर जरा भी धक्का देंगे तो सब ढेलोंकी ढेरीके समान ढह जायेंगे।'
और उन्होंने लङ्कामें हाथ डाला तो वह हथेलीके समान सपाट
(चौपट) हो जायगी।
'दूषनु, बिराधु, खरु, त्रिसिरा, कबंधु बधे
तालऊ बिसाल बेधे, कौतुकु हे कालिको ।
एक ही बिसिख बस भयो बीर बाँकुरो सो,
तोहू है बिदित बलु महाबली बालिको ॥
'तुलसी' कहत हित, मानतो न नेकु संक,
मेरो कहा जैहैं, फलु पैहै तू कुचालिको ।