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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 228 में से

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पृष्ठ 62

५९ सुन्दरकाण्ड
सीताजीसे बिदाई
जारि-बारि, कै बिधूम, बारिधि बुताइ लूम,
नाइ माथो पगनि, भो ठाढ़ो कर जोरि कै ।
मातु ! कृपा कीजै, सहिदानि दीजै, सुनि सीय
दीन्ही है असीस चारु चूडामनि छोरि कै ॥
कहा कहौं तात ! देखे जात ज्यों बिहात दिन,
बड़ी अवलंब ही, सो चले तुम्ह तोरि कै ।
'तुलसी' सनीर नैन, नेहसों सिथिल वैन,
बिकल बिलोकि कपि कहत निहोरि कै ॥२६॥
फिर श्रीहनुमान्‌जीने लङ्काको जला और उसे धूमरहित कर
अपनी पूँछको समुद्रमें बुता (श्रीजानकीजीके) चरणोंमें शिर नवाया
और उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये; (तथा कहने लगे—)
'हे मातः ! कृपाकर कोई सहिदानी (चिह्न) दीजिये।' यह सुनकर
श्रीजानकीजीने आशीर्वाद दिया और अपना सुन्दर चूडामणि उतारकर
उसे देते हुए कहा—'भैया ! मैं तुमसे क्या कहूँ ? हमारे दिन
किस प्रकार कट रहे हैं, सो तो तुम देखे ही जाते हो। तुम्हारे
रहनेसे बड़ा सहारा था, उसे भी तुम तोड़कर चल दिये।' गोसाईंजी
कहते हैं—जानकीजीके नेत्रोंमें जल भर आया और वाणी शिथिल
हो गयी। (इस प्रकार सीताजीको) व्याकुल देख हनुमान्‌जी उन्हें
विनयपूर्वक समझाते हुए कहने लगे।
'दिवस छ-सात जात जानिबे न, मातु ! धरु
धीर, अरि-अंतकी अवधि रहि थोरिकै ।