सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 228 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 70

६७ लंकाकाण्ड
वदन मलीन, बलहीन, दीन देखि, मानो
मिटे घटे तमीचर-तिमिर भुवनके ।
लोकपति-कोक-सोक मूँदे कपि-कोकनद,
दंड द्वै रहे हैं रघु-आदित-उवनके ॥ ३ ॥
श्रीजानकीजी विनय और प्रेमपूर्वक त्रिजटासे कहती हैं कि
'क्या आर्यपुत्रके कोई समाचार मिले ?' त्रिजटा बोली—'हाँ जी,
पाये हैं; भानुकुलकेतु ( श्रीरामचन्द्र ) समुद्रपर पुल बाँधकर इस पार
उतर आये । घोर राक्षस ( रावण ) के दूत यह सब देख-देखकर
आये हैं । उन लोगोंके मुख मलिन हो गये हैं और वे बलहीन तथा
दीन हो गये हैं । मानो चौदहों भुवनका राक्षसरूपी अन्धकार मिटना
और घटना चाहता है । इन्द्रादि लोकपालरूप चक्रवाकोंकी शोक-
निवृत्ति और वानरसेनारूप मुँदे हुए कमलोंकी प्रफुल्लताके लिये
श्रीरामरूप सूर्यके उदित होनेमें केवल दो ही दण्ड ( घड़ी ) काल
रह गया है ।
झूलना
सुभुजु मारीचु खरु त्रिसिरु दूषनु बालि,
दलत जेहि दूसरो सरु न साँध्यो ।
आनि परबाम बिधि बाम तेहि रामसों
सकत संग्रामु दसकंधु काँध्यो ॥
समुझि तुलसीस-कपि-कर्म घर-घर घैरु,
बिकल सुनि सकल पाथोधि बाँध्यो ।