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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 228 में से

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पृष्ठ 59

यहाँ ओल्में ( गिरवीं ) हैं। माल्यवान् ! तुम्हारे वचन पागलोंके-से
हैं। यह 'ईश्वर' नामका व्यक्ति कौन है जो मेरे-जैसे शूरवीरके
प्रतिकूल जा सकता है ?
भूमि भूमिपाल, ब्यालपालक पताल, नाक-
पाल, लोकपाल जेते, सुभट-समाजु है।
कहै मालवान, जातुधानपति ! रावरे को
मनहूँ अकाजु आनै, ऐसो कौन आजु है ॥
रामकोहु पावकु, समीरु सीय-सासु, कीसु
ईस-बामता विलोकु, बानरको ब्याजु है।
जारत पचारि फेरि-फेरि सो निसंक लंक,
जहाँ बाँको बीरु तोसो सूर-सिरताजु है ॥२२॥
तब माल्यवान् कहने लगा—'पृथ्वीमें जितने राजा हैं, पातालमें
जितने सर्पराज हैं, जितने स्वर्गके अधिपति और लोकपाल हैं और
जितना वीरोंका समाज है, हे राक्षसेश्वर ! उनमेंसे आज ऐसा कौन
है जो मनसे भी आपका अपकार करनेकी सोचे ? किन्तु यह अग्नि
तो श्रीरामचन्द्रजीका क्रोध है और वायु जानकीजीका श्वास है।
और देखो, वानरके रूपमें यह ईश्वरकी प्रतिकूलता ही है, वानरका
तो बहानामात्र है। इसीसे जहाँ तुम्हारे समान शूरशिरोमणि बाँका
वीर मौजूद है, वहीं यह बार-बार बलपूर्वक किसी प्रकारकी शङ्का
न करता हुआ लङ्काको जला रहा है।'
पान-पकवान बिधि नाना के, सँधानो, सीधो,
बिबिध-बिधान धान बरत बरवारहीं।