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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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५७ सुन्दरकाण्ड
कनककिरीट कोटि, पलँग, पेटारे, पीठ
काढ़त कहार सब जरे भरे भारहीं ॥
प्रबल अनल बाढ़ें जहाँ काढ़े तहाँ डाढ़े,
झपट-लपट भरे भवन-भँडारहीं ।
'तुलसी' अगारु न पगारु न बजारु बच्यो,
हाथी हथसार जरे, घोरे घोरसारहीं ॥२३॥
अनेक प्रकारके पेय पदार्थ, पकान्न, अचार, सीधा (चावल-
दाल आदि) और अनेक प्रकारके धान बखारोंमें ही जल रहे हैं ।
करोड़ों सोनेके मुकुट, पलंग, पिटारे और सिंहासन निकालनेमें कहार-
लोग भार लिये हुए ही जल रहे हैं। प्रबल अग्निके बढ़ जानेसे जो
वस्तुएँ जहाँ निकालकर रखीं वहीं जल गयीं तथा अग्निकी झपट
और लपट घर और भण्डारमें भर गयीं । गोसाईंजी कहते हैं कि न
तो घर बचा, न दीवार या बाजार ही बचा । हाथी हाथीखानेमें
और घोड़े घुड़सालहीमें जल गये ।
हाट-बाट हाटकु पिघिलि चलो घी-सो घनो,
कनक-कराही लंक तलफति तायसों ।
नाना पकवान जातुधान बलवान सब
पागि-पागि ढेरी कीन्ही भलीभाँति भायसों ॥
पाहुने कृसानु पवमानसौं परोसो, हनु-
मान सनमानि कै जेंवाए चित-चायसों ।
'तुलसी' निहारि अरिनारि दै-दै गारि कहैं,
'बावरें सुरारि बैरु कीन्हौ रामरायसों' ॥२४॥