कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
उपासना करे अथवा चन्द्र की ओर दो दूर्वांकुर फेंक कर कहे—"हे
मरण रहित आनन्दमय देव चन्द्र में रहे हुए तेरे कोमल हृदय से ऐसा
करो कि मुझे मेरे पुत्र के आपत्ति सम्बन्धी शोक करने का प्रसंग कभी
न आवे।" उसकी सन्तति उसके आगे कभी नहीं मरेगी जिसके पहिले
से पुत्र है उसके सम्बन्ध में यह समझना ।। जिसके अभी पुत्र नहीं
है उसके सम्बन्ध में कहते हैं—ऐसा मनुष्य आगे लिखी हुई ऋग्वेद की
तीन ऋचायें पठन करे—"आप्या यस्व समेतु ते" (ऋ० १-६१-१६) (हे
सोम तेरी समृद्धि हो और तेरे अंगों में सामर्थ्य प्राप्त हो), "सन्तेपयाँसि
समुयन्तु वाजा" (ऋ० १-३१-४) (दूध और अन्न तुझे प्राप्त हो),
"यमादित्या अंशुमाप्या ययन्ति" (ऋ० १-६१-१८) (जिस किरण को
सूर्य आनन्दमयं बनाता है)। इन तीन ऋचाओं का जप करके वह प्रार्थना
करे—"हमारे प्राण, सन्तति और हमारे पशु इनसे (हमारे शत्रुओं को)
समृद्ध न कर। जो हमारा द्वेष करते हैं और जिनका हम द्वेष करते
हैं उनका प्राण, उनकी सन्तति, उनके पशु इनसे हमारी समृद्धि करे।
इस प्रकार मैं दैवी आवृत्ति करता हूँ।" ऐसा कहकर चन्द्र की तरफ
दाहिना हाथ ऊंचा करके पुनः दूर्वांकुर प्रदान करे ।।१६।।
अथ पौर्णमास्यां पुरस्ताच्चन्द्रमसं दृश्यमानमुपतिष्ठेतैतयैवावृता
सोमो राजासि विचक्षणः पञ्चमुखोऽसि प्रजापतिर्ब्राह्मणस्त एकं
मुखं तेन मुखेन राज्ञोऽत्सि ।।२०।।
पौर्णमासी के दिन चन्द्र पूर्व की ओर दिखाई देता है। उसकी इसी
प्रकार पूजा करते समय यह प्रार्थना करे—"तू सोम है, राजा है, ज्ञानी
है, पंच मुख वाला है, प्रजापति है, ब्राह्मण मेरा एक मुख है उस एक
मुख से तू राजाओं को खाता है ।।२०।।
तेन मुखेन मामन्नादं कुरु ।। राजा त एकं मुखं तेन मुखेन
विशोऽत्सि तेनैव मुखेन मामन्नदं कुरु ।। श्येनस्त एकं मुखं तेन
२१
मुखेन पक्षिणोऽत्सि तेन मुखेन मामन्नादं कुरु ।।२१।।
उसी मुख से मुझे अन्न खाने वाला कर। क्षत्रिय तेरा एक मुख
है, उस मुख से तू वैश्यों को खाता है। उसी मुख में मुझे अन्न खाने
वाला कर। श्येन पक्षी तेरा एक मुख है, उस मुख से तू पक्षियों को
खाता है। उसी मुख से तू मुझे अन्न खाने वाला कर ।।२१।।
अग्निस्त एकं मुख तेन मुखेनेमं लोकमत्सि तेन मुखेन
मामन्नादं कुरु। त्वयि पञ्चमं मुखं तेन मुखेन सर्वाणि भूतान्यत्सि
तेन मुखेन मामन्नादं कुरु।। मास्माकं प्राणेन प्रजया
पशुभिरवक्षेष्ठा ।।२२।।
अग्नि तेरा एक मुख है, उस मुखसे तू इस लोक को खाता है।
उस मुख से तू मुझे अन्न खाने वाला कर। तुझमें पाँचवाँ मुख है उससे
तू सब भूतों को खाता है, उससे तू मुझे अन्न खाने वाला कर। हमारे
प्राण, हमारी सन्तति, हमारे पशु इनसे तेरा क्षय न हो ।।२१।।
योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तस्य प्राणेन प्रजया
पशुभिरवक्षीयस्वेति स्थितिदैवीमावृतमावर्त आदित्यस्यावृतमन्वावर्त
इति दक्षिणं बाहुमन्वावर्तते ।।२२।।
जो हमारा द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं उसका प्राण,
उसकी सन्तति, उसके पशु इनसे तू क्षीण हो” । इस प्रकार मैं देवों
का संचार कराता हूँ, मैं आदित्य का संचार अनुसरता हूँ। ऐसा कह
कर दाहिना हाथ ऊंचा करके दूर्वांकुर प्रदार करे ।।२२।।
अथ संवेश्यञ्जायायै हृदयमभिमृशेत् ।। यत्ते सुसीमे हृदये
हितमन्तः प्रजापतौ ।। मन्येऽहं मां तद्विद्वांसं माहं पौत्रमघं
रुदमिति न हास्मात्पूर्वाः प्रजाः प्रैति ।।२३।।
अब अपनी स्त्री को पास बुलाकर, उसके हृदय को स्पर्श करके
२२
कहे-जो मुझमें तेरे कोमल हृदय में प्रजापति के अर्थ प्रविष्ट हुआ है,
उससे कभी नाश न होने वाले आनन्द को प्राप्त हुई, हे सुन्दरी, तुझे
पुत्र सम्बन्धी शोक करने का प्रसंग कभी न प्राप्त हो। उसकी सन्तति
उसके पहिले कभी नहीं मरेगी ।।२३।।
अथ प्रोष्यायन्पुत्रस्य मूर्धानमभिमृशति ं गादंगात् संभवसि
हृदयादधिजायसे । आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम् ।।
असाविति नामास्य गृह्णाति। अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं
भव ।।२४।।
प्रवास करके वापस आने पर पुत्र का मस्तक सूँघे कहे तू मेरे प्रत्येक
अवयव से उत्पन्न हुआ है, तू हृदय से उत्पन्न हुआ है, हे पुत्र सचमुख
तू मेरी आत्मा है, सो तू सौ वर्ष पर्यन्त जी।" वह उसका नाम लेकर
कहे "तू पत्थर हो, तू परशु हो, सोने का डेला हो ।।२४।।
तेजो वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम् ।। असाविति
नामास्य गृह्णाति । येन प्रजापतिः प्रजाः पर्यगृह्णीतारिष्ट्यै तेन
त्वा परिगृह्णाम्यसावित्यथास्य दाक्षेणे कर्णे जपति अस्मै
प्रयन्धि मघवन्नृजीषिन्नितीन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहीति सव्ये
माच्छिथा मा व्यथिष्ठाः शतं शरद आयुषो जीव पुत्र। ते नाम्ना
मूर्धानमभिजिघ्राम्यसाविति त्रिरस्य मूर्धानमभिजिघ्रेद् गवां त्वा
हिंकारेणाभिहिंकरोमीति त्रिरस्य मूर्धानमभिहिंकुर्यात् ।।२५।।
हे पुत्र, तू सचमुच तेज है सो तू सौ वर्ष तक जी।" उसका नाम
लेकर आलिंगन करते हुए वह कहता है- प्रजापति ने प्राणी मात्र का
कल्याण के लिये आलिंगन किया, वैसे ही मैं तेरा आलिंगन करता हूँ।
पश्चात् पुत्र के दाहिने कान में यह मन्त्र कहे- "अस्मे प्रयन्धि
मघवन्नृजीषिन् (ऋ० ३-२६-१०) (हे चपल इन्द्र तू इसको दे)" और
२३
बांए कान में कहे— 'इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहि (ऋ० २-२१-६) (हे
इन्द्र तू श्रेष्ठ द्रव्य दे), पश्चात् तीन बार मस्तक सूँघते हुए कहे" तू
हमारा वंश छेद न कर, दुखी न होते हुए सौ वर्ष तक जी। हे पुत्र
यह मैं तेरा नाम लेकर तेरा मस्तक सूंघता हूँ।।' पश्चात् “मैं गाय
के हुँकार के समान तुझ पर हुँकारता हू”, ऐसा कह कर वह पुत्र के
मस्तक पर तीन बार हुँकार करे।। २५ ।।
अथातो दैवः परिमर एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यदग्निर्ज्वलत्यथैतन्म्रियते
यन्न ज्वलति तस्यादित्यमेव तेजो गच्छति वायुं प्राण एतद्वै ब्रह्म
दीप्यते ।।२६ ।।
अब देवपरिमर (सब देवताओं का ब्रह्म में लीन होना) कहते
हैं—अग्नि जलते हुए ब्रह्म ही प्रकाशता है, वह नहीं जलता है, तब मरता
है। उसका तेज सूर्य में जाता है और प्राण वायु में जाता हैं सूर्य प्रकाशता
है तब ब्रह्म ही प्रकाशता है ।। २६ ।।
यदादित्यो दृश्यतेऽथैतन्म्रियते यन्न दृश्यते तस्य चन्द्रमसमेव
तेजो गच्छति वायुं प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यच्चन्द्रमा
दृश्यतेऽथैतन्म्रियते यन्न दृश्यते तस्य विद्युतमेव तेजो गच्छति वायु
प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यद्विद्युद्विद्योततेऽथैतन्म्रियते यन्न विद्योतते
तस्य वायुमेव तेजो गच्छति वायुं प्राणस्ता वा एताः सर्वा देवता
वायुमेव प्रविश्य वायौ सृप्ता न मृच्छन्ते तस्मादेव पुनरुदीरत
इत्यधिदैवतमथाध्यात्मम् ।।२७ ।।
वह नहीं दीखता तब मर जाता है। उसका तेज चन्द्रमा ही में जाता
है, प्राण वायु में जाता है। चन्द्र दीखता है तब ब्रह्म की प्रकाशता है—वह
नहीं दीखता तब मर जाता है। उसका तेज बिजली में जाता है और
प्राण वायु में जाता हैं बिजली चमकती है तब ब्रह्म ही प्रकाशता है,
२४
वह नहीं चमकती तब मरता है। उसका तेज वायु में जाता है, और
प्राण वायु में जाता है। इस प्रकार यह देवता वायु में प्रवेश करके वायु
में रहते हैं, नष्ट नहीं होते। उसी वायु से वे सदा बाहर निकलते हैं-
यह देवता सम्बन्धी कथन हुआ, अब शरीर सम्बन्धी कहते हैं ।।२७।।
एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यद्वाचा वदत्यथैतन्म्रियते यन्न वदति तस्य
चक्षुरेव तेजो गच्छति प्राणं प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यच्चक्षुषा
पश्यत्यथैतन्म्रियते यन्न पश्यति तस्य श्रोत्रमेव तेजो गच्छति प्राणं
प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यच्छ्रोत्रेण शृणोत्यथैतन्म्रियते यन्न शृणोति
तस्य मन एव तेजो गच्छति प्राणं प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते ।।२८।।
मनुष्य वाणी से बोलता है तब ब्रह्म ही प्रकाशता है, जब नहीं बोलता
तब मर जाता हैं. उसका तेज नेत्र में ही जाता है, प्राण प्राण में जाता
है। मनुष्य आंखों से देखता है तब ब्रह्म ही प्रकाशता है और नहीं देखता
तब मरता है। उसका तेज कान ही में जाता है और प्राण में जाता
है। अब मनुष्य कान से सुनता है, तब ब्रह्म ही प्रकाशता है और नहीं
सुनता तब मर जाता है। उसका तेज मन ही में जाता है, प्राण प्राण
में जाता है। मनुष्य मनसे विचार करता है ।।२८।।
यन्मनसा ध्यायत्यथैतन्म्रियते यन्न ध्यायति तस्य प्राणमेव तेजो
गच्छति प्राणं प्राणस्ता वा एताः सर्वा देवताः प्राणमेव प्रविश्य प्राणे
सुप्ता न मूर्च्छन्ते ।।२६।।
तब ब्रह्म ही प्रकाशता है जब नहीं विचार करता तब मर जाता
हैं उसका तेज़ मन में जाता है और प्राण प्राण में जाता हैं इस प्रकार
ये सब देवता (इन्द्रियां) प्राण ही में प्रवेश करके प्राण ही में लीन रहते
हैं और नष्ट नहीं होते ।।२६।।
तस्माद्वैव पुनरुदीरते तद्यदिह वा एवंविद्वांस उभौ
२५
पर्वतावभिप्रवर्तेयातां तुस्तूर्षमाणौ दक्षिणश्चोत्तरश्च न हैवैनं
स्तृण्वीयातामथ य एनं द्विषन्ति यांश्च स्वयं द्वेष्टि त एनं सर्वे
परितो म्रियन्ते ।।३०।।
उसी प्राण से वे फिर बाहर निकलते हैं। यह दक्षिण और उत्तर
के दोनों पर्वत ऐसा जानने वाले को पीस डालने के लिये आगे बढ़ने
पर भी नहीं पीस सकेंगे। परन्तु जो उससे द्वेष करते हैं और वे सब
जिससे वह द्वेष करता है उसके पास आकर मर जाते हैं।।३०।।
अथातो निःश्रेयसादानं एता ह वै देवता अहंश्रेयसे विवदमाना
अस्माच्छरीरादुच्चक्रमुस्तद्दारुभूतं शिश्येथैतद्वाक्प्रविवेश ।।३१।।
अब निःश्रेयसादान (प्राणों का श्रेष्ठत्व ग्रहण) कहते हैं, देवता
अपनी श्रेष्ठता के लिये वाद करने लगे और शरीर के बाहर निकल
गये और शरीर लकड़ी के समान पड़ा रहा। पश्चात् वाणी ने उसमें
प्रवेश किया।।३१।।
तद्वाचा वदच्छिश्य एव् अथैनच्चक्षुः प्रविवेश तद्वाचा वदच्चक्षुषा
पश्यच्छिश्य एवाथैतच्छ्रोत्रं प्रविवेश तद्वाचा वदच्चक्षुषा पश्यच्छ्रोत्रेण
शृण्वच्छिश्य एवाथैतन्मनः प्रविवेश तद्वाचा वदच्चक्षुषा पश्यच्छ्रोत्रेण
शृण्वन्मनसा ध्यायच्छिश्य एवाथैतत्प्राणाः प्रविवेश तत्तत एव
समुत्तस्थौ तद्देवाः प्राणे निःश्रेयसं विचिन्त्य प्राणमेव
प्रज्ञात्मानमभिसंस्तूय सहैतैः सर्वैरस्माल्लोकदुच्चक्रमुस्ते वायुप्रतिष्ठा
आकाशात्मानः स्वर्युस्तथा एवैवंविद्वान् सर्वेषां भूतानां प्राणमेव
प्रज्ञात्मानमभिसंस्तूय सहैतैः सर्वैरस्माच्छरीरादुत्क्रामति न वायुप्रतिष्ठा
आकाशात्मा न स्वरेति स तद्भवति ।।३२।।
परन्तु वाणी से बोलता हुआ भी वह पड़ा ही रहा। पश्चात् नेत्र
ने प्रवेश किया परन्तु वाणी से बोलता हुआ और नेत्र से देखता हुआ
२६
भी वह पड़ा रहा। पश्चात् कर्णेन्द्रिय ने प्रवेश किया परन्तु वाणी से
बोलता, नेत्रों से देखता और कर्णों से सुनता हुआ भी वह पड़ा ही रहा।
पश्चात् मन ने उसमें प्रवेश किया परन्तु वाणी से बोलता हुआ, नेत्रों
से देखता हुआ, कानों से सुनता हुआ और मन से विचार करता हुआ
भी वह पड़ा ही रहा। पश्चात् प्राण ने उसमें प्रवेश किया-तत्काल ही
वह उठ खड़ा हुआ। तब प्राण का श्रेष्ठत्व स्वीकार करे प्राण ही एक
जानने वाला आत्मा है ऐसा जानकर सब देवता प्राणों के साथ उस
शरीर से बाहर निकले और वायु में स्थिर होकर और आकाश में लीन
होकर स्वर्गलोक में गये। ऐसा जानने वाले मनुष्य को प्राणों का श्रेष्ठत्व
विदित होता है और प्राण ही प्रज्ञात्मा है ऐसा वह जानता है और इसी
प्रकार वह शरीर से बाहर निकलता है और वायु में स्थिर होकर और
आकाश में लय होकर स्वर्गलोक में जाता है।।३२।।
यत्रैतद्देवास्तत्प्राप्य तदमृतो भवति यदमृता देवाः ।। ३३ ।।
जिस स्थान में वे देवता होते हैं उस स्थान में वह जाता है इस
अवस्था को पहुँचने पर यह जानने वाला मनुष्य उन देवताओं को प्राप्त
हुए अमरत्व से अमर हो जाता है।।३३।।
अथातः पितापुत्रीयं संप्रदानमिति चाचक्षते पिता पुत्रं
प्रेष्यान्नह्वयति नवैस्तृणैरगारं संस्तीर्याग्निमुपसमाधायोदकुम्भं
सपात्रमुपनिधायाहतेन वाससा संप्रच्छन्नः स्वयं श्येत एत्य पुत्र
उपरिष्टादभिनिपद्यत इन्द्रियैरस्येन्द्रियाणि संस्पृश्यापि वास्याभिमुखत
एवासीताथास्मै संप्रयच्छति वाचं मे त्वयि दधानीति पिता वाचं
ते मयि।।३४।।
अब आगे पिता पुत्रीय सम्प्रदान (पिता का पुत्र को देने का उपदेश),
कहते हैं-(पिता मरते समय अपने पुत्र को बुलाता है) उसके पहले
२७
घर में नयी घास बिछाकर, अग्नि सिद्ध करके, उसके पास पात्रों के
साथ पानी का घड़ा रखकर श्वेत वस्त्र पहन करके और कोरा कपड़ा
ओढ़कर आ बैठता है और पुत्र के ऊपर झुकता है और अपने इन्द्रियों
से उसकी इन्द्रियों को स्पर्श करता है अथवा वह उसके आगे बैठकर
यह उपदेश करे— "मेरी वाणी तुममें स्थित हो।" पुत्र कहे "तुम्हारी
वाणी मैं ग्रहण करता हूँ ।।३४।।
दध इति पुत्रः प्राणं में त्वयि दधानीति पिता प्राणं ते मयि
दध इति पुत्रश्चक्षु में त्वयि दधानीति पिता चक्षुस्ते मयि दध इति
पुत्रः श्रोत्रं में त्वयि दधानीति पिता श्रोत्रं ते मयि दध इति पुत्रो
मनो में त्वयि ।।३५।।
पिता कहे, "मेरा प्राण तुझमें प्रविष्ट हो।" पुत्र कहे, "तुम्हारा प्राण
मैं ग्रहण करता हूँ।" पिता कहे, "मेरे नेत्र तुझमें स्थित हों" पुत्र कहे,
"तुम्हारे नेत्र मैं ग्रहण करता हूँ।" पिता कहे, "मेरा कर्ण तुझमें प्रविष्ट
हो।" पुत्र कहे "तुम्हारे कर्ण अपने में ग्रहण करता हूँ।" पिता कहे,
"मेरा अन्न रस तुझमें स्थित हो।" ।।३५।।
दधानीति पिता मनस्ते मयि दध इति पुत्रोऽन्नरसान्मे त्वयि
दधानीति पितान्नरसांस्ते मयि दध इति पुत्रः कर्माणि में त्वयि
दधनीति पिता कर्माणि ते मयि दध इति ।।३६।।
पुत्र कहे, "तुम्हारे अन्न रस को अपने में ग्रहण करता हूँ।" पिता
कहे, "मैं अपने कर्म तुझको देता हूँ। पुत्र कहे, "मैं तुम्हारे कर्म अपने
में ग्रहण करता हूँ।" पिता कहे, "मैं अपने सुख दुःख तुझमें प्रविष्ट
कराता हूँ ।।३६।।
पुत्रः सुखदुःखे मे त्वयि दधानीति पिता आनन्दं रतिं प्रजातिं
ते मयि दध इति पुत्र इत्यां में त्वयि दधानीति ।।३७।।
२८
पुत्र कहे, “तुम्हारे सुख दुःख मैं ग्रहण करता हूँ।” पिता कहे “मेरा
आनंद, संतोप तुझे प्राप्त हो।” पुत्र कहे, “तुम्हारा आनन्द, सन्तोष
और सन्तति अपने में ग्रहण करता हूँ।।३७।।
पिता इत्यां ते मयि दध इति पुत्रो धियो विज्ञातव्यं कामान्मे
त्वयि दधानीति पिता धियो विज्ञातव्यं कामांस्ते मयि दध इति
पुत्रोऽथ दक्षिणावृदुपनिष्क्रामति तं पितानुमन्त्रयते यशोब्रह्मवर्च-
समन्नाद्यं कीर्तिस्त्वा जुषतामित्यथेतरः सव्यमसमन्ववेक्षते पाणि-
नान्तर्धाय वसनान्तेन वा प्रच्छाद्य स्वर्गांल्लोकान्कामानवाप्नुहीति
स यद्यगदः ।।३८ ।।
पिता कहे, “मेरा गमन तुझमे होने दे।” पुत्र कहे, “तुम्हारा गमन
मैं अपने में कराता हूँ।” पिता कहे “मेरा मन तुझमें रहने दे।” पुत्र
कहे, “तुम्हारा मन मैं मुझमें प्रविष्ट कराता हूँ।” पिता कहे, “मेरी प्रज्ञा
तुझमें रहने दे।” पुत्र कहे, “तुम्हारी प्रज्ञा को मैं ग्रहण करता हूँ।”
यदि वह बहुत बीमार हो तो “मेरे प्राण तुझमें रहने दे” इतना कहे
और पुत्र “तुम्हारे प्राण मैं अपने में ग्रहण करता हूँ” ऐसा उत्तर दे।
पश्चात् दाहिने नेत्र से पिता को देखते हुए पुत्र पिता को प्रदक्षिणा करते
हुए चला जाता है। पिता उसको बुलाकर कहता है “मेरा यश, ब्रह्मवर्चस्
और सम्मान तुझे हमेशा प्राप्त हो।” इसके पश्चात् कोई अपने हाथ
से अथवा वस्त्र से अपने को ढककर स्कन्ध से पीछे देखे और कहे,
स्वर्गलोक तथा सम्पूर्ण इच्छित पदार्थ तुझको प्राप्त हो। इसके पश्चात्
यदि पिता अच्छा हो जाय तो वह पुत्र के अधिकार में रहे।।३८।।
स्यात्पुत्रस्यैश्वर्ये पिता वसेत्परिव्राव्रजेद्यद्युवै प्रेयाद्यदेवैनं
समापयति तथा समापयितव्यो भवति तथा समापयितव्यो
भवति।।३६।।
२६
अथवा संन्यास ग्रहण करे। परन्तु यदि मर जाय तो उसकी अंत
क्रिया योग्यता के अनुसार कर दे। उसकी क्रिया योग्यता के अनुसार
कर दे। । ३६ । ।
३०
तृतीयोध्यायः
ॐ प्रतर्द्नो ह वै देवोदासिरिन्द्रस्य प्रिय धामोपजगाम युद्धेन
पौरुषेण च तं हेन्द्र उवाच प्रतर्दन वरं ते ददानीति से होवाच
प्रतर्दनस्त्वमेव मे वृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमं मन्यस
इति ।।१।।
दिवोदास का पुत्र प्रतर्दन युद्ध और पराक्रम से इन्द्र के परम
धाम को पहुँचा, उससे इन्द्र ने कहा, “हे प्रतर्दन! मैं तुझे क्या वरदान
दूं?” प्रतर्दन ने कहा “आपको जो पसन्द हो जिसको आप मनुष्य के
लिये सर्वाधिक हितकारी समझते हों वह वरदान मुझे दीजिये ।।१।।
तं हेन्द्र उवाच न वै वरं परस्मै वृणीते त्वमेव वृणीष्वेत्यवरो
वै तर्हि किल म इति होवाच प्रतर्दनोऽथो खल्विन्द्रः सत्यादेव नेयाय
सत्यं हीन्द्रः स होवाच मामेव विजानीह्येतदेवाहं मनुष्याय हिततमं
मन्ये यन्मां विजानीयात् त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रमहनमरुन्मुखान्यतीन्साला-
वृकेभ्यः प्रायच्छं बहीः संधा अतिक्रम्य दिवि प्रह्लादीयान-
तृणमहमन्तरिक्षे पौलोमान्पृथिव्यां कालखाञ्जान् तस्य मे तत्र न
लोम च नामीयते स यो मां विजानीयान्नाय केन च कर्मणा लोको
मीयते न मातृवधेन न पितृवधेन न स्तेयेन न भ्रूणहत्यया नास्य
पापं च न चकृषो मुखान्नीलं वेतींति ।।२।।
इन्द्र बोला “कोई दूसरेको दिया वरदान स्वयं पसन्द नहीं करता,
अतः तू अपने लिये आप ही वरदान मांग।” प्रतर्दन बोला “मुझे पसन्द
करने के लिये कुछ है ही नहीं।” इन्द्र ने कभी सत्य का त्याग नहीं
किया क्योंकि इन्द्र सत्य रूप है। इन्द्र बोला “तू मुझ ही को जान,
मनुष्य के लिये मैं यही उत्तम हित मानता हूँ कि यह मुझे पहिचाने।
३५
त्वष्टा के तीन मस्तक वाले पुत्र को मैंने मार डाला था, वेद से रहित
संन्यासियों को मैंने भेड़ियों को दे दिया। अनेक संधियों का अतिक्रमण
करके आकाश में प्रह्लाद के वंशजों को मैंने मारा था फिर भी मेरे
शिर का एक बाल भी टूटने न पाया। जो मुझको जानता है, (जीवात्मा
और परमात्मा के बीच, में जिसको अद्वैत भाव होता है) उसका लोक
(सुख) किसी कर्म से, मातृवध से, पितृवध से, चोरे से और भ्रूणहत्या
से कभी नष्ट नहीं होता। कभी वह पाप कर्म करने की इच्छा करता
है तो भी उसके मुख की कान्ति फीकी नहीं पड़ती'' ।। २ ।।
स होवाच प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा तं मामायुरमृतमित्युपास्वायुः
प्राणः प्राणो वा आयुः प्राण एवामृतं यावद्ध्यस्मिञ्छरीरे प्राणो
वसति तावदायुः प्राणेन ह्येवामुष्मिल्लोकेऽमृतत्वमाप्नोति प्रज्ञयां
सत्यं संकल्पं स यो म आयुरमृतमित्युपास्ते सर्वमायुरस्मिंल्लोक
एवाप्नोत्यमृतत्वमक्षितिं स्वर्गे लोके ।। ३ ।।
इन्द्र बोला :- “मैं प्राण रूप हूँ। प्रज्ञा रूप, आयुष् और अमृत
रूप से मेरी उपासना कर। आयुष् प्राण रूप है, प्राण आयुष् रूप है
और प्राण को अमृत से कहा है। जब तक इस शरीर में प्राण रहता
है तब तक आयुष्य रहता है मनुष्य प्राण करके इस लोक में अमृतत्व
को प्राप्त करते हैं और प्रज्ञा से सत्यसंकल्प को प्राप्त करते हैं। जो
आयुष्य रूप और अमृत रूप से मेरी उपासना करता है वह इस लोक
में पूर्ण आयुष्य को प्राप्त होता है और स्वर्ग में अमृत भाव को प्राप्त
करता है और अक्षयरूप होता है ।। ३ ।।
तद्धैक आहुरेकभूयं वै प्राणा गच्छन्तीति न हि कश्चन
शक्नुयात्सकृद्वाचा नाम प्रज्ञापयितुं चक्षुषा रूपं श्रोत्रेण शब्दं
मनसा ।। ४ ।।
तब प्रतर्दन बोला “शास्त्रवित् कहते हैं कि जब कर्मेन्द्रिय और
३२
ज्ञानेन्द्रिय रूप प्राण एकत्र होकर गमन करते हैं तब वाणी. से नाम
जानने को कोई समर्थ नहीं होता। वैसे ही चक्षु रूप को, श्रोत्र शब्द
को और मन ध्यान को नहीं जान सकता।।४।।
ध्यानमित्येकभूयं वै प्राणा भूत्वा एकैकं सर्वाण्येवैतानि
प्रज्ञापयन्ति वाचं वदन्तीं सर्वे प्राणा अनुवदन्ति चक्षुः पश्यत्सर्वे
प्राणा अनुपश्यन्ति ।।५।।
जब प्राण एक रूप हो जाता है तब वह भिन्न-भिन्न जानने की शक्ति
देता है। इस प्रकार जब वाणी बोलती है तब सब प्राण उसके पीछे
बोलते हैं। जब चक्षु देखता है तब उसके पीछे सब प्राण देखते हैं।।५।।
श्रोत्रं शृण्वत्सर्वे प्राणा अनुशृण्वन्ति मनो ध्यायत् सर्वे प्राणा
अनुध्यायन्ति प्राणं प्राणन्तं सर्वे प्राणा अनुप्राणन्तीत्येवमुहैवैतदिति
हेन्द्र उवाचास्तीत्येव प्राणानां निःश्रेयसादानमिति ।।६।।
जब श्रोत्र सुनता है तब उसके पीछे सब प्राण सुनते हैं और जब
मन विचारता है तब उसके पीछे सब प्राण विचारते हैं। जब प्राण श्वास
लेता है तब सब प्राण उसके पीछे श्वास लेते हैं।" इन्द्र बोला :--"इस
प्रकार है तो सही, परन्तु उत्कृष्ट सुख तो प्राण को ही होता है।।६।।
जीवति वागपेतो मूकान्विपश्यामो जीवति चक्षुरपेतोऽ-
न्धान्विपश्यामो जीवति श्रोत्रापेतो बघिरान्विश्यामो जीवति
बाहुच्छिन्नो जीवत्यूरुच्छिन्न इत्येवं हि पश्याम ।।७।।
हम गूंगे को देखते हैं उससे जान सकते हैं कि वाणी रहित मनुष्य
जीता है, अंधे को देखकर जान सकते हैं कि चक्षु रहित मनुष्य जीता
हैं. बहरे को देखकर जान सकते हैं कि श्रोत्र रहित जीता है, हाथ से
रहित जीता है, तैसे ही उरू कटा हुआ जीता है।।७।।
इत्यथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति
३३
तस्मादेतमेवोक्थमुपासीत यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा ।। ८ ।।
इस प्रकार देखते हैं कि प्राण ही प्रज्ञात्मा रूप है, इस शरीर को
धारण करके वह इसको उठाता है, इसलिये उसकी उक्थ रूप से
उपासना करनी चाहिये। जो प्राण है वह ही प्रज्ञा रूप है, जो प्रज्ञा है
सो प्राण रूप है ।। ८ ।।
स प्राणः सह ह्येतावस्मिञ्छरीरे वसतः सहोत्क्रामतस्तस्यैषैव
दृष्टिरेतद्विज्ञानं यत्रैतत्पुरुषः सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन्प्राण
एवैकधा भवति ।। ६ ।।
इस प्राण का स्वरूप इस प्रकार है :-प्राण और प्रज्ञा इस शरीर
में साथ रहते हैं, उनमें से दोनों साथ ही उत्क्रमण करते हैं, यह उसकी
दृष्टि विज्ञान रूप है। जब पुरुष सुषुप्ति अवस्था में होता है, जब वह
कुछ भी स्वप्न नहीं देखता, उस समय प्राण एक ही प्रकार का होता
है।। ६ ।।
तदैनं वाक् सर्वैर्नामभिः सहाप्येति चक्षुःसर्वै रूपैः सहाप्येति
श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यातैः सहाप्येति स यदा
प्रतिबुध्यते ।। १० ।।
पीछे वाणी सब नामों सहित उसमें प्रवेश करती है, चक्षु सर्व रूपों
सहित उसमें प्रवेश करते हैं, श्रोत्र सब शब्दों सहित उसमें प्रवेश करते
हैं और मन सर्व संकल्पों सहित उसमें प्रवेश करता है ।। १० ।।
यथाग्नेर्ज्वलतो विस्फुलिंगा · विप्रतिष्ठेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः
प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकास्तस्यैषैव
सिद्धिरेतद्विज्ञानं ।। ११ ।।
जब मनुष्य जागरितावस्था में आता है तब जैसे जलते हुए अग्नि
में से सब दिशाओं में चिनगारियां उड़ती हैं वैसे ही इस आनन्द रूप
३४
आत्मा में से सब प्राण अपने अपने स्थान पर जा जाकर बैठते हैं।
प्राणों से देव और देवों से लोक होते हैं इस रीति का उसका प्रमाण
और विज्ञान है ।।११।।
यत्रैतत्पुरुषः आर्तो मरिष्यन्नाबल्यं न्येत्य संमोहं न्येति
तदाहुरुदक्रमीच्चित्तं न शृणोति न पश्यति न वाचा वदत्यथास्मिन्प्राण
एवैकधा भवति ।।१२।।
कोई एक पुरुष रोगग्रस्त होता है और मरण के समीप होता है,
बल से रहित होता है, भान रहित अवस्था में पड़ता है, तब उसके पास
बैठने वाले कहते हैं कि उसका चित्त जाता रहा है, वह सुनता नहीं
है, यह देखता नहीं है, वह वाणी से बोलता नहीं है, वह इस प्राण में
एक रूप हो गया है।।१२।।
तदैनं वाक् सर्वैर्नामभिः सहाप्येति चक्षुः सर्वै रूपैः सहाप्येति
श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यातैः सहाप्येति स यदा
प्रतिबुध्यते यथाग्नेर्ज्वलतो विस्फुलिंगा विप्रतिष्ठेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः
प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः ।।१३।।
पीछे सब नामों सहित वाणी उसमें प्रवेश करती है, सब रूप सहित
चक्षु उसमें प्रवेश करते हैं, सर्व शब्दों सहित श्रोत्र उसमें प्रवेश करते
हैं और सब संकल्पों सहित मन उसमें प्रवेश करता है। जब वह जाग्रत
होता है तब जैसे जलते हुए अग्नि की चिनगारियां सब दिशाओं में
उड़ती हैं इसी प्रकार आनन्द रूप आत्मा में से प्राण अपने-अपने स्थान
पर चले जाते हैं। प्राणों में से देवताओं का और देवताओं में से लोकों
का उद्भव होता है ।।१३।।
स यदास्माच्छरीरादुत्क्रामति वागस्मात्सर्वाणि नामान्यभिविसृजते
वाचा सर्वाणि नामान्याप्नोति प्राणोऽस्मात्सर्वान्गन्धानभिविसृजते
३५
प्राणेन सर्वान्गन्धानाप्नोति ।।१४।।
जब इस शरीर में से प्राण का उत्क्रमण होता है तब शरीर से वाणी
सब नामों का त्याग करती है, वाणी की सहायता से सब नामों की
प्राप्ति होती है। प्राण सर्व गंधों का त्याग करता है। प्राण की सहायता
से सब गंध शरीर को प्राप्त होता है ।।१४।।
चक्षुरस्मात्सर्वाणि रूपाण्यभिविसृजते चक्षुषा सर्वाणि
रूपाण्याप्नोति श्रोत्रमस्मात्सर्वाञ्छब्दानभिविसृजते श्रोत्रेण
सर्वाञ्छब्दानाप्नोति मनोऽस्मात्सर्वाणि ध्यातान्यभिविसृजते मनसा
सर्वाणि ध्यातान्याप्नोति सैषा प्राणे सर्वाप्तिः ।।१५।।
चक्षु शरीर में से सब रूपों का त्याग करता है, शरीर को चक्षु से
सर्व रूपों की प्राप्ति होती है। मन शरीर में से सर्व संकल्पों का त्याग
करता है, मनसे उसको सर्व संकल्पों की प्राप्ति होती है। प्राण की
विद्यमानता से शरीर को इन सब की प्राप्ति होती है ।।१५।।
यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राण स ह्येतावस्मिञ्छरीरे
वसतः सहोत्क्रामतोऽथ खलु यथा प्रज्ञायां सर्वाणि भूतान्येकीभवन्ति
तद्व्याख्यास्यामः ।।१६।।
प्राण प्रज्ञा रूप है सो प्राण है। अब जिस प्रकार प्रज्ञा में सब भूत
एक भाव को प्राप्त होता है, उसका वर्णन करते हैं ।१६।।
वागेवास्या एकमंगमुदूढं तस्यै नाम परस्तात्प्रतिविहिता
भूतमात्रा घ्राणमेवास्या एकमंगमुदूढं तस्य गन्धः परस्तात्प्रतिविहिता
भूतमात्रा ।।१७।।
वाक् देवता ने अपना एक अंश निकाल लिया इससे उसका विषय
शब्द भूत मात्रा रूप से बाहर जाता रहा है। जिह्वा ने अपना एक अंश
निकाल लिया इसके उसका विषय रस भूत मात्रा रूप से बाहर जाता
३६
रहा। हाथ ने एक अंश निकाल लिया इससे उसका विषय सुख और
दुःख मात्रा रूप से बाहर जाता रहा ।। १७ ।।
चक्षुरेवास्या एकमंगमुदूढं तस्य रूपं परस्तात्प्रतिविहिता
भूतमात्र श्रोत्रमेवास्या एकमंगमुदूढं तस्य शब्दः परस्तात्प्रतिविहिता
भूतमात्रा जिह्वैवास्या एकमंगमुदूढं तस्या अन्नरसः परस्तात्प्रतिविहिता
भूतमात्रा हस्तावेवास्या ।। १८ ।।
चक्षु, श्रोत्र, जिह्वा और हाथ ने अपने-अपने अंश निकाले और
उनके विषय रूप, शब्द, अन्नरस और कर्म भूतमात्रा रूप से बाहर जाते
रहे ।। १८ ।।
एकमंगमुदूढं -तयोः कर्म परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा
शरीरमेवास्या एकमंगमुदूढं तस्य सुखदुःखे परस्तात्प्रतिविहिता
भूतमात्रा उपस्थ एवास्या एकमंगमुंदूढं तस्यानन्दो रतिः प्रजातिः
परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा पादौवेवास्या एकमंगुदूढं तयोरित्या
परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा प्रज्ञैवास्या एकमंगमुदूढं तस्यै धियो
विज्ञातव्यं कामाः परस्तात्प्रतिविहिता भूतमात्रा ।। १९ ।।
उपस्थेन्द्रिय ने अपना एक अंश निकाल लिया इससे उसका विषय
आनन्द रति और प्रजोत्पत्ति भूत मात्रा रूप से बाहर जाता रहा। पादों
ने अपना एक अंश निकाल लिया इससे उनका विषय गति भूत मात्रा
रूप से बाहर जाती रही। प्रज्ञा ने अपना एक अंश निकाल लिया इससे
उसका विषय बुद्धि, ज्ञान और काम भूत तन्मात्रा रूप से बाहर जाता
रहा ।। १९ ।।
प्रज्ञया वाचं समारुह्य वाचा सर्वाणि सामान्याप्नोति प्रज्ञया
प्राणं समारुह्य प्राणेन सर्वान्गन्धानाप्नोति प्रज्ञया चक्षुः समारुह्य
चक्षुषा सर्वाणि ।। २० ।।
३७
प्रज्ञा वाणी से आरूढ़ होने से-उसी रूप बनने से-वाणी से सब
नामों को प्राप्त करती है। प्रज्ञा से प्राण में आरोहण होने से प्रज्ञा
प्राणों से सब गंधों को प्राप्त करती हैं। प्रज्ञा से चक्षु में आरोहण होने
से प्रज्ञा चक्षु से सब रूपों को प्राप्त करती है ।।२०।।
रूपाण्याप्नोति प्रज्ञया श्रोत्रं समारुह्य श्रोत्रेण सर्वाञ्छब्दानाप्नोति
प्रज्ञया जिह्वां समारुह्य जिह्वया सर्वानन्नरसानाप्नोति प्रज्ञया हस्तौ
समारुह्य हस्ताभ्यां सर्वाणि कर्माण्थाप्नोति प्रज्ञया शरीरं
समारुह्य शरीरेण ।।२१।।
प्रज्ञा से श्रोत्र में ओरोहण होने से प्रज्ञा श्रोत्र से सब शब्दों को
प्राप्त करती है। प्रज्ञा से जिह्वा में आरोहण होने से प्रज्ञा जीभ से सब
रसों को प्राप्त करती है। प्रज्ञा से हस्तों में आरोहण होने से प्रज्ञा दोनों
हाथों से सब कर्मों को प्राप्त करती है।।२१।।
सुखदुःखे आप्नोति प्रज्ञयोपस्थं समारुह्योपस्थेनानन्दं रतिं
प्रजातिमाप्नोति प्रज्ञया पादौ समारुह्य पादाभ्यां सर्वा इत्या
आप्नोति प्रज्ञयैव धियं समारुह्य प्रज्ञयैव धियो विज्ञातव्यं
कामानाप्नोति ।।२२ ।।
प्रज्ञा से उपस्थेन्द्रिय से आरोहण होने से प्रज्ञा उपस्थ से आनन्द,
रति और प्रजोत्पत्ति की शक्ति प्राप्त करती है। प्रज्ञा से दोनों पैरों में
समारोहण होने से प्रज्ञा पैरों से सर्व गति को प्राप्त करती है। प्रज्ञा
में मनमें आरोहण होने से प्रज्ञा मनसे विज्ञान और काम को प्राप्त करती
है ।।२२ ।।
नही प्रज्ञापेता वाङ्नाम किंचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह
नाहमेतन्नाम प्राज्ञासिषमिति न हि प्रज्ञापेतः प्राणो गन्धं कंचन
प्रज्ञापयेदन्यत्र मे ।।२३।।
३८
प्रज्ञा से रहित वाणी किसी नाम को भी नहीं जान सकती। उस
समय ऐसा कहा जाता है कि मेरा मन दूसरे ठिकाने था मैंने उस नाम
को नहीं जाना।।२३।।
मनोऽभूदित्याह नाहमेतं गन्धं प्राज्ञासिषमिति नहि प्रज्ञापेतं
चक्षू रूपं चिंन प्रज्ञपयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतद्रूपं
प्राज्ञासिषमिति नहि प्रज्ञापेतं श्रोतं कंचन प्रज्ञपयेदन्यत्र मे
मनोऽभूदित्याह नाहमेतं शब्दं प्राज्ञासिषमिति नहि प्रज्ञापेता
जिह्वान्नरसं कंचन प्रज्ञपयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतमन्नरसं
प्राज्ञासिषमिति नहीं प्रज्ञापेतौ हस्तौ कर्म किंचन प्रज्ञपयेतामन्यत्र
मे मनोज्भूदित्याह नाहमेतत्कर्म प्राज्ञासिषमिति नहि प्रज्ञापेतं
शरीरं सुखदुःखं किंचन प्रज्ञपयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह
नाहमेतत्सुखदुःखं प्राज्ञासिषमिति नहि प्रज्ञापेत उपस्थ आनन्दं
रतिं ।।२४।।
सच है कि प्रज्ञा से रहित घ्राण किसी गंध को भी नहीं जना सकता।
ऐसा कहा जाता है कि मेरा मन दूसरे ठिकाने था, इसलिये मैंने
गंध को नहीं जाना। प्रज्ञा से रहित चक्षु किसी रूप को भी नहीं जना
सकता वह कहता है कि मेरा मन दूसरे ठिकाने था इसलिये मैंने रूप
को नहीं देखा। प्रज्ञा से रहित श्रोत्र किसी भी शब्द को सुना नहीं सकता,
ऐसा कहता है कि मेरा मन दूसरे ठिकाने था इसलि मैंने शब्द नहीं
सुना। प्रज्ञा से रहित जीभ रस के स्वाद को नहीं जना सकती, वह
कहता है कि मेरा मन दूसरे ठिकाने था इसलिये मैंने रस को नहीं जाना।
प्रज्ञा से रहित हाथ किसी कर्म को नहीं जना सकता, वह कहता है
कि मेरा मन दूसरे ठिकाने था इसलिये मैंने कर्म को नहीं जाना। प्रज्ञा
से रहित शरीर किसी भी सुख दुःख को नहीं जानता। ऐसे कहता है
कि मेरा मन दूसरे ठिकाने था इसलिये मैं इस सुख दुःख को जान न
३६
सका ।।२४ ।।
प्रजातिं कांचन प्रज्ञायपयेदन्यत्र में मनोऽभूदित्याह नाहमेतामानन्दं
रतिं प्रजातिं प्राज्ञासिषमिति नहि प्रज्ञापेतौ पादावित्यां कांचन ।।२५ ।।
प्रज्ञा से रहित उपस्थ रति, आनन्द और प्रजोत्पत्ति को नहीं जना
सकता। वह कहता है कि मेरा मन अन्यत्र था जिससे मैं आनन्द, रति
और प्रजोत्पत्ति को जान न सका ।।२५ ।।
प्रज्ञपयेतामन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतामित्यां
प्राज्ञासिषमिति नहि प्रज्ञापेता धीः काचन सिध्येन्न प्रज्ञातव्य
प्रज्ञायेत ।।२६ ।।
प्रज्ञा से रहित पाद किसी गति को नहीं जना सकते वह कहता
है कि मेरा मन अन्य ठिकाने था इसलिये मैं गति को जान न सका।
प्रज्ञा से रहित बुद्धि किसी को नहीं जना सकती और जानने योग्य
जाना नहीं जा सकता ।।२६ ।।
न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यान्न गन्धं विजिज्ञासीत घ्रातारं
विद्यान्न रूपं विजिज्ञासीत रूपविदं विद्यान्न शब्दं विजिज्ञासीत
श्रोतारं विद्यान्नान्नरसं विजिज्ञासीतान्नरसविज्ञातारं विद्यान्न कर्म
विजिज्ञासीत कर्तारं विद्यान्न सुखदुःखे विजिज्ञासीत
सुखदुःखयोर्विज्ञातारं विद्यान्नानन्दं रतिं प्रजातिं ।।२७ ।।
मनुष्य वाणी को जानने की इच्छा न करे, वक्ता को जानना चाहिये।
मनुष्य गंध जानने की इच्छा न करे गंध के ज्ञाता को जानना चाहिये।
शब्द जानने की इच्छा न करे, श्रोता को जानना चाहिये। रस जानने
की इच्छा न करे, रस के ज्ञाता को जानना चाहिये। मनुष्य कर्म जानने
की इच्छा न करे, उसके कर्ता को जानना चाहिये। मनुष्य सुख दुःख
जानने की इच्छा न करे सुख दुःख के ज्ञाता को जानना चाहिये। मनुष्य