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सर्वकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 56 में से

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पृष्ठ 25

२३

बांए कान में कहे— 'इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहि (ऋ० २-२१-६) (हे
इन्द्र तू श्रेष्ठ द्रव्य दे), पश्चात् तीन बार मस्तक सूँघते हुए कहे" तू
हमारा वंश छेद न कर, दुखी न होते हुए सौ वर्ष तक जी। हे पुत्र
यह मैं तेरा नाम लेकर तेरा मस्तक सूंघता हूँ।।' पश्चात् “मैं गाय
के हुँकार के समान तुझ पर हुँकारता हू”, ऐसा कह कर वह पुत्र के
मस्तक पर तीन बार हुँकार करे।। २५ ।।
अथातो दैवः परिमर एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यदग्निर्ज्वलत्यथैतन्म्रियते
यन्न ज्वलति तस्यादित्यमेव तेजो गच्छति वायुं प्राण एतद्वै ब्रह्म
दीप्यते ।।२६ ।।
अब देवपरिमर (सब देवताओं का ब्रह्म में लीन होना) कहते
हैं—अग्नि जलते हुए ब्रह्म ही प्रकाशता है, वह नहीं जलता है, तब मरता
है। उसका तेज सूर्य में जाता है और प्राण वायु में जाता हैं सूर्य प्रकाशता
है तब ब्रह्म ही प्रकाशता है ।। २६ ।।
यदादित्यो दृश्यतेऽथैतन्म्रियते यन्न दृश्यते तस्य चन्द्रमसमेव
तेजो गच्छति वायुं प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यच्चन्द्रमा
दृश्यतेऽथैतन्म्रियते यन्न दृश्यते तस्य विद्युतमेव तेजो गच्छति वायु
प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यद्विद्युद्विद्योततेऽथैतन्म्रियते यन्न विद्योतते
तस्य वायुमेव तेजो गच्छति वायुं प्राणस्ता वा एताः सर्वा देवता
वायुमेव प्रविश्य वायौ सृप्ता न मृच्छन्ते तस्मादेव पुनरुदीरत
इत्यधिदैवतमथाध्यात्मम् ।।२७ ।।
वह नहीं दीखता तब मर जाता है। उसका तेज चन्द्रमा ही में जाता
है, प्राण वायु में जाता है। चन्द्र दीखता है तब ब्रह्म की प्रकाशता है—वह
नहीं दीखता तब मर जाता है। उसका तेज बिजली में जाता है और
प्राण वायु में जाता हैं बिजली चमकती है तब ब्रह्म ही प्रकाशता है,