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सर्वकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 56 में से

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सका ।।२४ ।।
प्रजातिं कांचन प्रज्ञायपयेदन्यत्र में मनोऽभूदित्याह नाहमेतामानन्दं
रतिं प्रजातिं प्राज्ञासिषमिति नहि प्रज्ञापेतौ पादावित्यां कांचन ।।२५ ।।
प्रज्ञा से रहित उपस्थ रति, आनन्द और प्रजोत्पत्ति को नहीं जना
सकता। वह कहता है कि मेरा मन अन्यत्र था जिससे मैं आनन्द, रति
और प्रजोत्पत्ति को जान न सका ।।२५ ।।
प्रज्ञपयेतामन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतामित्यां
प्राज्ञासिषमिति नहि प्रज्ञापेता धीः काचन सिध्येन्न प्रज्ञातव्य
प्रज्ञायेत ।।२६ ।।
प्रज्ञा से रहित पाद किसी गति को नहीं जना सकते वह कहता
है कि मेरा मन अन्य ठिकाने था इसलिये मैं गति को जान न सका।
प्रज्ञा से रहित बुद्धि किसी को नहीं जना सकती और जानने योग्य
जाना नहीं जा सकता ।।२६ ।।
न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यान्न गन्धं विजिज्ञासीत घ्रातारं
विद्यान्न रूपं विजिज्ञासीत रूपविदं विद्यान्न शब्दं विजिज्ञासीत
श्रोतारं विद्यान्नान्नरसं विजिज्ञासीतान्नरसविज्ञातारं विद्यान्न कर्म
विजिज्ञासीत कर्तारं विद्यान्न सुखदुःखे विजिज्ञासीत
सुखदुःखयोर्विज्ञातारं विद्यान्नानन्दं रतिं प्रजातिं ।।२७ ।।
मनुष्य वाणी को जानने की इच्छा न करे, वक्ता को जानना चाहिये।
मनुष्य गंध जानने की इच्छा न करे गंध के ज्ञाता को जानना चाहिये।
शब्द जानने की इच्छा न करे, श्रोता को जानना चाहिये। रस जानने
की इच्छा न करे, रस के ज्ञाता को जानना चाहिये। मनुष्य कर्म जानने
की इच्छा न करे, उसके कर्ता को जानना चाहिये। मनुष्य सुख दुःख
जानने की इच्छा न करे सुख दुःख के ज्ञाता को जानना चाहिये। मनुष्य