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सर्वकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 56 में से

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प्रज्ञा वाणी से आरूढ़ होने से-उसी रूप बनने से-वाणी से सब
नामों को प्राप्त करती है। प्रज्ञा से प्राण में आरोहण होने से प्रज्ञा
प्राणों से सब गंधों को प्राप्त करती हैं। प्रज्ञा से चक्षु में आरोहण होने
से प्रज्ञा चक्षु से सब रूपों को प्राप्त करती है ।।२०।।
रूपाण्याप्नोति प्रज्ञया श्रोत्रं समारुह्य श्रोत्रेण सर्वाञ्छब्दानाप्नोति
प्रज्ञया जिह्वां समारुह्य जिह्वया सर्वानन्नरसानाप्नोति प्रज्ञया हस्तौ
समारुह्य हस्ताभ्यां सर्वाणि कर्माण्थाप्नोति प्रज्ञया शरीरं
समारुह्य शरीरेण ।।२१।।
प्रज्ञा से श्रोत्र में ओरोहण होने से प्रज्ञा श्रोत्र से सब शब्दों को
प्राप्त करती है। प्रज्ञा से जिह्वा में आरोहण होने से प्रज्ञा जीभ से सब
रसों को प्राप्त करती है। प्रज्ञा से हस्तों में आरोहण होने से प्रज्ञा दोनों
हाथों से सब कर्मों को प्राप्त करती है।।२१।।
सुखदुःखे आप्नोति प्रज्ञयोपस्थं समारुह्योपस्थेनानन्दं रतिं
प्रजातिमाप्नोति प्रज्ञया पादौ समारुह्य पादाभ्यां सर्वा इत्या
आप्नोति प्रज्ञयैव धियं समारुह्य प्रज्ञयैव धियो विज्ञातव्यं
कामानाप्नोति ।।२२ ।।
प्रज्ञा से उपस्थेन्द्रिय से आरोहण होने से प्रज्ञा उपस्थ से आनन्द,
रति और प्रजोत्पत्ति की शक्ति प्राप्त करती है। प्रज्ञा से दोनों पैरों में
समारोहण होने से प्रज्ञा पैरों से सर्व गति को प्राप्त करती है। प्रज्ञा
में मनमें आरोहण होने से प्रज्ञा मनसे विज्ञान और काम को प्राप्त करती
है ।।२२ ।।
नही प्रज्ञापेता वाङ्नाम किंचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह
नाहमेतन्नाम प्राज्ञासिषमिति न हि प्रज्ञापेतः प्राणो गन्धं कंचन
प्रज्ञापयेदन्यत्र मे ।।२३।।