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सर्वकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 56 में से

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पर्वतावभिप्रवर्तेयातां तुस्तूर्षमाणौ दक्षिणश्चोत्तरश्च न हैवैनं
स्तृण्वीयातामथ य एनं द्विषन्ति यांश्च स्वयं द्वेष्टि त एनं सर्वे
परितो म्रियन्ते ।।३०।।
उसी प्राण से वे फिर बाहर निकलते हैं। यह दक्षिण और उत्तर
के दोनों पर्वत ऐसा जानने वाले को पीस डालने के लिये आगे बढ़ने
पर भी नहीं पीस सकेंगे। परन्तु जो उससे द्वेष करते हैं और वे सब
जिससे वह द्वेष करता है उसके पास आकर मर जाते हैं।।३०।।
अथातो निःश्रेयसादानं एता ह वै देवता अहंश्रेयसे विवदमाना
अस्माच्छरीरादुच्चक्रमुस्तद्दारुभूतं शिश्येथैतद्वाक्प्रविवेश ।।३१।।
अब निःश्रेयसादान (प्राणों का श्रेष्ठत्व ग्रहण) कहते हैं, देवता
अपनी श्रेष्ठता के लिये वाद करने लगे और शरीर के बाहर निकल
गये और शरीर लकड़ी के समान पड़ा रहा। पश्चात् वाणी ने उसमें
प्रवेश किया।।३१।।
तद्वाचा वदच्छिश्य एव् अथैनच्चक्षुः प्रविवेश तद्वाचा वदच्चक्षुषा
पश्यच्छिश्य एवाथैतच्छ्रोत्रं प्रविवेश तद्वाचा वदच्चक्षुषा पश्यच्छ्रोत्रेण
शृण्वच्छिश्य एवाथैतन्मनः प्रविवेश तद्वाचा वदच्चक्षुषा पश्यच्छ्रोत्रेण
शृण्वन्मनसा ध्यायच्छिश्य एवाथैतत्प्राणाः प्रविवेश तत्तत एव
समुत्तस्थौ तद्देवाः प्राणे निःश्रेयसं विचिन्त्य प्राणमेव
प्रज्ञात्मानमभिसंस्तूय सहैतैः सर्वैरस्माल्लोकदुच्चक्रमुस्ते वायुप्रतिष्ठा
आकाशात्मानः स्वर्युस्तथा एवैवंविद्वान् सर्वेषां भूतानां प्राणमेव
प्रज्ञात्मानमभिसंस्तूय सहैतैः सर्वैरस्माच्छरीरादुत्क्रामति न वायुप्रतिष्ठा
आकाशात्मा न स्वरेति स तद्भवति ।।३२।।
परन्तु वाणी से बोलता हुआ भी वह पड़ा ही रहा। पश्चात् नेत्र
ने प्रवेश किया परन्तु वाणी से बोलता हुआ और नेत्र से देखता हुआ