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सर्वकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 56 में से

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२४
वह नहीं चमकती तब मरता है। उसका तेज वायु में जाता है, और
प्राण वायु में जाता है। इस प्रकार यह देवता वायु में प्रवेश करके वायु
में रहते हैं, नष्ट नहीं होते। उसी वायु से वे सदा बाहर निकलते हैं-
यह देवता सम्बन्धी कथन हुआ, अब शरीर सम्बन्धी कहते हैं ।।२७।।
एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यद्वाचा वदत्यथैतन्म्रियते यन्न वदति तस्य
चक्षुरेव तेजो गच्छति प्राणं प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यच्चक्षुषा
पश्यत्यथैतन्म्रियते यन्न पश्यति तस्य श्रोत्रमेव तेजो गच्छति प्राणं
प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते यच्छ्रोत्रेण शृणोत्यथैतन्म्रियते यन्न शृणोति
तस्य मन एव तेजो गच्छति प्राणं प्राण एतद्वै ब्रह्म दीप्यते ।।२८।।
मनुष्य वाणी से बोलता है तब ब्रह्म ही प्रकाशता है, जब नहीं बोलता
तब मर जाता हैं. उसका तेज नेत्र में ही जाता है, प्राण प्राण में जाता
है। मनुष्य आंखों से देखता है तब ब्रह्म ही प्रकाशता है और नहीं देखता
तब मरता है। उसका तेज कान ही में जाता है और प्राण में जाता
है। अब मनुष्य कान से सुनता है, तब ब्रह्म ही प्रकाशता है और नहीं
सुनता तब मर जाता है। उसका तेज मन ही में जाता है, प्राण प्राण
में जाता है। मनुष्य मनसे विचार करता है ।।२८।।
यन्मनसा ध्यायत्यथैतन्म्रियते यन्न ध्यायति तस्य प्राणमेव तेजो
गच्छति प्राणं प्राणस्ता वा एताः सर्वा देवताः प्राणमेव प्रविश्य प्राणे
सुप्ता न मूर्च्छन्ते ।।२६।।
तब ब्रह्म ही प्रकाशता है जब नहीं विचार करता तब मर जाता
हैं उसका तेज़ मन में जाता है और प्राण प्राण में जाता हैं इस प्रकार
ये सब देवता (इन्द्रियां) प्राण ही में प्रवेश करके प्राण ही में लीन रहते
हैं और नष्ट नहीं होते ।।२६।।
तस्माद्वैव पुनरुदीरते तद्यदिह वा एवंविद्वांस उभौ