कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
पाँचवाँ अध्याय
पाँचवाँ अध्याय
बेलाग रहना ही सच्चा त्याग है
जिस प्रकार हमारे कर्मों का फल हम को मिलता है, उसी प्रकार हम पर दूसरों के कर्म का और दूसरों पर हमारे कर्म का प्रभाव पड़ता है। जब कोई मनुष्य नीच कर्म करने लगता है तो दिन-ब-दिन वह गिरने लगता है और जो अच्छे कर्म करता है, वह प्रति दिन ऊपर को उठता जाता है। कर्मों के इस अमिट प्रभाव का सदा चक्र चल रहा है और हमारे कर्मों का परस्पर एक दूसरे पर प्रभाव पड़ रहा है। प्राकृतिक विज्ञान का एक उदाहरण देता हूँ। कल्पना करो, मेरी मनोवृत्ति एक विशेष प्रकार की है, इसलिए जिन मनुष्यों की मनोवृत्तियाँ उससे मिलती हैं, उनकी प्रवृत्ति भी वैसी ही होगी जैसी कि मेरी होगी। यदि एक कमरे में कई सितारों की खूँटियाँ इस तरह उमेठी जायँ कि इन सब से एक ही तरह की आवाज़ निकले और सब अलग अलग रख दिये जायँ तो एक के तार के छेड़ देने से दूसरों में से वैसी ही आवाज़ अपने आप निकलने लगेगी। इससे यह परिणाम निकाला जा सकता है कि इन सब सितारों में एक स्वर भरा हुआ था। बहुत से मनुष्यों की वृत्तियाँ, जो परस्पर अविरुद्ध हैं, इसी प्रकार एक विशेष भाव से भावित की जा सकती हैं। इसमें सन्देह नहीं कि दूरी तथा अन्य कारणों से इन भावों में कुछ
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न कुछ अन्तर अवश्य होगा। परन्तु इन सब भावों में एक जैसा प्रभाव अवश्य काम करता होगा। कल्पना करो, मैं एक बुरा काम कर रहा हूँ। मेरी वृत्ति एक विशेष अवस्था पर ठहरी हुई है। संसार में जितनी मनोवृत्तियाँ मेरी वृत्ति से मेल खाती हैं, सम्भव है मेरे मन के भावों का कुछ न कुछ प्रभाव उन सब पर पड़ता हो।
इस सादृश्य का विवरण इस प्रकार किया जा सकता है, जैसे प्रकाश की धारें एक स्थान-विशेष पर पहुँचने के लिए करोड़ों वर्षों तक भ्रमण करती रहती हैं वैसे ही यह भी सम्भव है कि मन के भावों की लहरें उस समय तक हज़ारों वर्ष बराबर चक्कर में रहें, जब तक उनके प्रविष्ट होने के लिए कोई उपयोगी और अनुकूल अन्तःकरण न मिल जावे। इसलिए हमारे आस पास की हवा वैसे ही भावों की धारों को लिये हुए होती है, जैसे कि उसमें बसाये जाते हैं। प्रत्येक भाव, जो किसी मस्तिष्क-विशेष से निकलता है, उस समय तक बराबर चक्कर लगाता रहता है जब तक उसको अनुकूल मन न मिल जाय। जो मन जिस भाव के धारण करने की योग्यता रखता है वह उसको दूर से भी खींच कर अपने पास बुला लेता है। पाप-कर्म करते समय मनुष्य की वृत्तियाँ उसी ढङ्ग की हो जाती हैं और उनसे जो भावों की लहरें उठती हैं वे उसी ढङ्ग के रङ्ग में डूबी हुई होती हैं। यही कारण है कि पापी प्रायः पाप की ओर झुकता है। यही दशा धर्मात्मा की है। उसका मन सदा पवित्र भावों की धारों को, जो हवा में चक्कर लगा रही हैं, अपनी ओर आकर्षित करेगा और इसलिए उसकी निष्ठा धर्म में दृढ़ होती जायगी। बुराई करने से हमको दो प्रकार