कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ, भूमिका व प्रस्तावना
कर्मयोग
अर्थात्
स्वामी विवेकानन्दजी के व्याख्यानों का
हिन्दी-अनुवाद
अनुवादक
पण्डित बदरीदत्त शर्मा
प्रकाशक
इंडियन प्रेस, लिमिटेड, प्रयाग
सन् १६२३ ईसवी
[ चतुर्थ बार ] \hfill [ मूल्य ॥) ]
Published by
K. Mittra,
at The Indian Press, Ltd.,
Allahabad.
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Printed by
Bishweshwar Prasad,
at The Indian Press, Ltd.,
Benares-Branch.
परिचय
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शिक्षित भारतवासी मात्र श्रीयुत स्वामी विवेकानन्द के नाम और काम से परिचित हैं। आपने वङ्ग-भूमि को अपने जन्म से पवित्र किया था और वहीं सामयिक उच्च शिक्षा प्राप्त की, जिससे आपके मानसिक भाव तो उन्नत हुए परन्तु आत्मा की तुष्टि न हुई। अपने जीवनोद्देश के अन्वेषण में आप व्यग्र थे ही, इसी अवसर में दैवसंयोग से अथवा भारत के सौभाग्य से आपको परमहंस स्वामी रामकृष्ण जैसे सद्गुरु का आदर्श मिल गया। जैसा आपका उद्देश उच्च था वैसा ही उच्च आदर्श भी आपको मिला। महात्मा रामकृष्णजी के उपदेश और आदर्श से आपके हृदय में ज्ञान का प्रकाश हुआ और आप सांसारिक मोह के आवरण को उल्लंघन करके यथार्थ में स्वामी विवेकानन्द बन गये।
संन्यास धारण करने के पश्चात् उक्त स्वामीजी ने पश्चिम की यात्रा की। आपकी इस यात्रा का उद्देश यह था कि अध्यात्म-विद्या की उस अमृत-धारा से (जिसका स्रोत और केन्द्र सनातन काल से भारतवर्ष रहा है) पाश्चात्य भूमि को (जो प्रकृतिवाद या देहवाद के वायु से शुष्क हो रही थी) संसिक्त और आप्लावित करें। कैसा पवित्र उद्देश था। इसके लिए उक्त महात्मा ने यूरोप और अमेरिका आदि प्रान्तों में जो कुछ उद्योग और यत्न किया,
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परिचय
वह किसी शिक्षित व्यक्ति से छिपा नहीं है। यह स्वामीजी के ही उपदेश का प्रभाव है कि आज अमेरिका में घर घर वेदान्त की चर्चा है और वहाँ के पुरुष ही नहीं किन्तु स्त्रियाँ भी वेदान्त के रहस्य को जानने के लिए उत्कण्ठित और उत्सुक हैं। वहाँ के अनेक स्त्री-पुरुषों ने स्वामीजी से दीक्षा लेकर वेदान्त के प्रचार का व्रत धारण किया है। इसी व्रत को धारण करके मिस निवेदिता आदि कई स्त्रियाँ इस देश में भी पदार्पण कर चुकी हैं, जिनके आचार-विचार और उद्देश से यहाँ के शिक्षित समुदाय ने प्रायः अपनी सहानुभूति प्रकट की है।
उक्त महात्मा का उद्देश क्या था और उन्होंने उसकी सिद्धि के लिए क्या उद्योग किया, उनके आचार-विचार कैसे थे ? इन बातों से प्रायः हिन्दी-पाठक अनभिज्ञ हैं। कारण यह कि उनका सारा वर्क (काम) देशकालानुसार अँगरेज़ी भाषा में है। अतः हिन्दी पाठकों के परिचयार्थ प्रशंसित स्वामीजी के कतिपय व्याख्यानों का ( जो उन्होंने अमेरिका में कर्मयोग पर दिये थे ) हिन्दी-अनुवाद पाठकों की भेंट किया जाता है। इससे हिन्दी-पाठक स्वामीजी के पवित्र सिद्धान्त और उच्च विचारों का अनुभव कर सकेंगे।
यहाँ पर यह निवेदन कर देना भी आवश्यक है कि यह स्वामीजी के व्याख्यानों का शब्दशः अनुवाद नहीं है। प्रत्येक भाषा का पदविन्यास और लेखनप्रणाली का क्रम भिन्न भिन्न होने से तथा एक भाषा के शब्दों का दूसरी भाषा के शब्दों में ठीक ठीक पर्याय न मिलने से उनके आशय को अपने शब्दों और वाक्यों में व्यक्त करने के लिए हम बाध्य हुए हैं। ऐसा करने पर भी
परिचय
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हमने उनके लक्ष्य और तात्पर्य पर पूरा पूरा ध्यान रक्खा है और कहीं कहीं उसकी पुष्टि में अपनी तरफ़ से जो टिप्पणी की है, वह फ़ुटनोट में देदी है। आशा है कि हिन्दी के पाठक इससे लाभ उठा कर हमको सफल-परिश्रम करेंगे।
कानपुर, } अनुवादक
ता० ३१।१२।०६ } बदरीदत्त शर्मा
सूचीपत्र
| पृष्ठ | |
|---|---|
| १—पहला अध्याय—कर्म का मनुष्य-चरित्र पर प्रभाव ... | १ |
| २—दूसरा अध्याय—निष्काम कर्म का महत्व ... ... | १७ |
| ३—तीसरा अध्याय—धर्म क्या है ... ... ... | ३३ |
| ४—चौथा अध्याय—परमार्थ में स्वार्थ ... ... | ४५ |
| ५—पाँचवाँ अध्याय—बेलाग रहना ही सच्चा त्याग है ... | ५६ |
| ६—छठा अध्याय—मुक्ति ... ... ... | ७८ |
| ७—सातवाँ अध्याय—कर्म-योग का आदर्श ... ... | ८५ |