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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

पाँचवाँ अध्याय ६१

पाँचवाँ अध्याय ६१

के भय हैं । (१) हम अपने मन को बुरे भावों के प्रवेश के लिए खोल देते हैं । (२) हम ऐसा बुरा आदर्श बना रहे हैं, जिससे न मालूम कितने यात्री मार्ग भूल कर भटकेंगे और हमें शाप देंगे। यह भी सम्भव है कि हमारी बुराई से सैकड़ों वर्ष के पीछे लोगों को हानि पहुँचे । बुराई करने से न केवल हम अपने को गिराते हैं, किन्तु दूसरों की भी हानि करते हैं । इसके विपरीत भलाई से हमारा अपना भी भला होता है और दूसरों को भी लाभ पहुँचता है । मनुष्य की अन्य वृत्तियों की भाँति पाप-पुण्य की वृत्तियाँ भी बाहर से अपनी सहायता ढूँढ़ती हैं ।

कर्मयोग की शिक्षा के अनुसार मनुष्य के कर्म उस समय तक नष्ट नहीं होते, जब तक उनका फल नहीं हो लेता । प्रकृति की कोई शक्ति कर्म को अपना फल उत्पन्न करने से रोक नहीं सकती । यदि मैं बुरा काम करता हूँ तो मुझको उसका अनिष्ट फल अवश्य उठाना पड़ेगा । संसार में कोई शक्ति ऐसी नहीं है, जो इसकी प्रतिबाधक हो सके । इसी प्रकार यदि मैं अच्छा काम करता हूँ तो उसके इष्ट फल को भी कोई शक्ति नहीं रोक सकती । कर्मयोग के सम्बन्ध में अब एक अत्यन्त सूक्ष्म और विचारणीय सिद्धान्त यह आता है कि हमारे जितने कर्म हैं ( चाहे वे शुभ हों चाहे अशुभ ) परस्पर मिश्रित होते हैं । हम उनको अलग अलग करके यह नहीं कह सकते कि यह काम अच्छा है, यह बुरा । चाहे वह काम बिलकुल अच्छा हो या बिलकुल बुरा हो । कोई ऐसा कर्म नहीं है, जिसमें बुराई व भलाई दोनों एक ही समय में न रहती हों । दृष्टान्त की रीति पर समझो, मैं तुम्हारे सामने इस समय भाषण कर

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रहा हूँ। तुम समझते हो, मैं अच्छा काम कर रहा हूँ। परन्तु याद रक्खो, इस समय वायु-मण्डल में करोड़ों जन्तु मेरी उच्चा-रण-क्रिया से मर रहे होंगे। इस प्रकार मैं साथ साथ बुराई भी करता जा रहा हूँ। अतः मनुष्य का कोई काम ऐसा नहीं है जिसको हम बिलकुल अच्छा या बिलकुल ही बुरा कह सकें। जिस काम का प्रभाव हम पर अच्छा पड़ रहा है, उसको हम अच्छा कहते हैं। तुम मेरी वक्तृता को इसलिए अच्छा समझते हो कि तुम पर उसका प्रभाव अच्छा पड़ रहा है। किन्तु वायुमण्डल के सूक्ष्म जन्तु ऐसा न समझेंगे। इन जन्तुओं को तुम नहीं देखते, तुम केवल अपने आस पास के मनुष्यों को देख रहे हो। मेरे भाषण का जो तुम पर प्रभाव पड़ रहा है, उसको तुम अनुभव कर रहे हो। परन्तु वायु-मण्डल के सूक्ष्म जन्तुओं पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा है, इसको तुम नहीं जानते। इसी प्रकार यदि हम अपने बुरे कामों की पड़ताल करें तो हमको मालूम होगा कि उससे कहीं अच्छे परि-णाम भी उत्पन्न होते होंगे। वह मनुष्य जो भलाई में मिली हुई बुराई को देखता है और बुराई में मिश्रित भलाई को भी देखने की योग्यता रखता है, वास्तव में बुद्धिमान् और कर्मयोग के रहस्य को जाननेवाला है।

इस सिद्धान्त का परिणाम यह है कि हम चाहे कितनी ही चेष्टा करें, कोई काम ऐसा नहीं कर सकते जो बिलकुल ही अच्छा या बुरा हो और न कोई ऐसा कर्म हो सकता है जो साथ साथ सुख-दुःख देनेवाला न हो। हम दूसरों को बिना कष्ट पहुँचाये न जी सकते हैं, न श्वास ले सकते हैं। हमारे भोजन का प्रत्येक

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ग्रास ऐसा है जो दूसरों के मुख से छीना जाता है। हमारा जीना दूसरों के जीवन को नष्ट करनेवाला है। यह भगवद्गीता का सिद्धान्त है। चाहे मनुष्य हो या पशु पक्षी, या कीड़े मकोड़े हों, इनमें से किसी न किसी को मरना अवश्य है। जब यह बात है तो किसी को हानि न पहुँचानेवाला सिद्धान्त किसी कर्म से सिद्ध नहीं हो सकता। तो अब अच्छे-बुरे की कसौटी क्या रही ? यही कि जिस काम में लाभ अधिक है, हानि कम, वह अच्छा है और जिसमें हानि अधिक लाभ कम है, वही बुरा है।

दूसरी विचारणीय बात यह है कि कर्म का अन्तिम परिणाम क्या है ? प्रत्येक देश के निवासी विश्वास रखते हैं कि एक ऐसा समय आवेगा, जब यह सृष्टि स्वर्ग-धाम बन जावेगी। तब रोग, मृत्यु, दुःख और पाप नाम को भी न रहेंगे। यह बात सुनने में बहुत अच्छी मालूम होती है, भाव भी अच्छा है और इससे मूर्खों को धर्म के लिए कुछ प्रेरणा भी होती है। परन्तु ज़रा सोचने से पता लग जायगा कि ऐसा कभी हो नहीं सकता। जब कि पाप और पुण्य एक ही माता (सृष्टि) के गर्भ से दो यमल (जोड़ुवाँ) पुत्र उत्पन्न हुए हैं तब यह क्योंकर सम्भव है कि हम एक ही समय में कोई ऐसा काम कर सकते हैं, जिसमें पाप और पुण्य दोनों मिश्रित न हों। पूर्णता से तुम्हारा क्या अभिप्राय है ? निर्दोष जीवन का होना असम्भव है। क्योंकि जीवन वास्तव में उस संग्राम का नाम है जो हमारी आन्तरिक और वाह्य वृत्तियों में हो रहा है और यदि हम इस संग्राम में परास्त हो जावें तो फिर जीवन समाप्त हो जाता है। हमारे आध्यात्मिक और शारीरिक सम्बन्ध का ही नाम

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जीवन है। वह कोई पृथक् या स्वतंत्र वस्तु नहीं है। किन्तु मानसिक वा शारीरिक चेष्टाओं का मिश्रित परिणाम है। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि जब यह झगड़े न रहेंगे, तब जीवन भी न रहेगा।

पूर्ण आनन्द और निराबाध सुख का (जो मुक्ति में प्राप्त होता है) आशय कुछ और है। जब वह अवस्था आ जायगी, तब यह संग्राम बन्द हो जायगा। परन्तु उस समय यह जीवन ही न रहेगा। जब तक जीवन है, न तो संसार के झगड़े शान्त होंगे और न उस अवस्था की प्राप्ति हो सकती है। जिस समय हम उस आनन्द का हज़ारवाँ भाग भी प्राप्त कर लेंगे, यह संसार बिलकुल शान्त हो जायगा और हमारा नाम या चिह्न तक शेष न रहेगा। किन्तु इस संसार में इस पूर्णानन्द की आशा करना व्यर्थ है। हम पहले कह चुके हैं कि इस संसार की सहायता करने में हम अपनी सहायता आप करते हैं। कर्म करने का मुख्य तात्पर्य यह है कि हम अपने आप को पवित्र बना लेते हैं। दूसरों की भलाई की चेष्टा में हम अपने आप को भूल जाते हैं। यही सच्चा त्याग है, जो हमको अपने जीवन में सीखना है। मनुष्य मूर्खता से समझता है कि मैं अपने आपको प्रसन्न कर सकता हूँ। परन्तु वर्षों के लगातार आन्दोलन से उसकी आँख खुल जाती है और वह समझने लगता है कि सच्ची प्रसन्नता स्वार्थ के नाश में है। निःस्वार्थ होकर ही हम अपने को शान्त और प्रसन्न कर सकते हैं। उदारता, संवेदना और सहानुभूति के पवित्र भाव ही हमारी स्वार्थ-बुद्धि को कम करते हैं। लोभी, कृपण और निर्दय ही अधिक स्वार्थी होते हैं। स्वार्थ का नाश ही सच्चा त्याग है। यहाँ आकर

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ही हमको विदित होता है कि भक्ति, ज्ञान और कर्म इन तीनों का उद्देश एक ही है। भक्ति और कर्म मिल कर ही ज्ञान को उत्पन्न करते हैं। ज्ञान का उदय होते ही "मैं" का आवरण उठ जाता है और केवल "तू ही तू" दिखाई देता है। मनुष्य चाहे इस रहस्य को समझे या न समझे, पर कर्म-योग उसे इस पदवी तक पहुँचा ही देता है। धार्मिक उपदेशक अमूर्त्त या अव्यक्त ईश्वर का नाम सुन कर सम्भव है कि चौंक पड़ें, किन्तु वे अपने आस्तिक होने का घमण्ड रखते हैं ! उनका चरित्र चाहे कैसा ही अच्छा हो, पर उनमें पूर्ण वैराग्य और सच्चा त्याग कभी उत्पन्न हो नहीं सकता। त्याग ही सदाचार का मूल है। बिना त्याग के यदि सदाचार हुआ भी तो कभी कभी वह अत्याचार के रूप में परिणत हो जाता है।

इस संसार में भिन्न भिन्न प्रकार के मनुष्य हैं। प्रथम ईश्वर कोटि वाले मनुष्य हैं, जिनमें पूर्ण वैराग्य है और जो नाना भाँति के कष्ट उठा कर यहाँ तक कि अपने प्राण-पण से भी दूसरों का उपकार करते हैं। जिनका कोई स्वार्थ होता ही नहीं और यदि होता भी है तो वह यही कि दूसरों का भला करना। ऐसे मनुष्य उच्च-कोटि के होते हैं। यदि किसी देश में ऐसे श्रेष्ठ व उदार मनुष्य सौ भी हों तो उसको निराश होने का कोई कारण नहीं है। परन्तु शोक है कि संसार में ऐसे मनुष्य बहुत ही कम होते हैं। दूसरे वे सज्जन मनुष्य हैं, जो उस समय तक परोपकार करते रहते हैं जब तक उनके स्वार्थ में बाधा नहीं पड़ती। ऐसे मनुष्यों की गणना मध्यम कोटि में है। तीसरी श्रेणी में उन कुटिल स्वभाव वाले मनुष्यों की

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गणना है, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के हित का नाश करते हैं। ऐसे लोग अधम कोटि के हैं। राजर्षि भर्तृहरि जी का कथन है कि संसार में एक चौथी श्रेणी के मनुष्य और भी हैं। वे कौन हैं ? जो अकारण अर्थात् अपना भी कोई लाभ नहीं, पर दूसरों को हानि पहुँचाते हैं। जिस प्रकार उच्च-कोटि में वे धर्मात्मा मनुष्य हैं जो आप हानि उठा कर भी दूसरों को लाभ पहुँचाते हैं, वैसे ही अधम कोटि में वे नीच मनुष्य हैं, जो अपने लाभ के लिए दूसरों को हानि पहुँचाते हैं। परन्तु जो अकारण दूसरों की हानि करते हैं, अपना कोई लाभ नहीं तो भी दूसरे के हित में बाधा डालते हैं, ऐसे कुटिल-स्वभाव मनुष्यों के लिए मानव-कोश में कोई शब्द नहीं मिलता, जिससे उनको सम्बोधित किया जावे। श्रीमान् भर्तृहरिजी की सम्मति में सबसे उच्च कोटि के वे मनुष्य हैं, जिनके हृदय में सच्चा त्याग है और जो दूसरों के लिए अपना जीवन-दान कर देते हैं।

संस्कृत में दो शब्द हैं, प्रवृत्ति और निवृत्ति। संसार से सम्बन्ध का नाम प्रवृत्ति है और संसार से उपरत होना निवृत्ति कहलाती है। प्रवृत्ति में "मेरा", "तेरा" पन रहता है। काम, अहङ्कार और स्वार्थ के भाव इसमें बने रहते हैं; पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा इन तीनों एषणाओं के संस्कार जाग्रत रहते हैं। दूसरे शब्दों में प्रवृत्ति की व्याख्या यों भी की जा सकती है कि दूसरों से छीन कर सारा धन और ऐश्वर्य अपने अधिकार में कर लिया जावे। निवृत्ति मार्ग वह है, जिसमें मनुष्य कर्म तो करता है, पर अपने लिए कुछ नहीं करता। अपना पराया यह भाव ही