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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

तीसरा अध्याय ३७

तीसरा अध्याय ३७

साथ पूरा करेगा तो उसे अपने आप कोई न कोई बड़ा काम मिल जायगा। जब हम सचाई और प्रेम के साथ कोई काम करने लगते हैं, प्रकृति देवी दूती बनकर हमें समाचार पहुँचाती है और हम समझ जाते हैं कि योग्यता का सर्टीफ़िकेट हमको मिल गया। यदि कोई मनुष्य किसी काम के योग्य नहीं है तो वह बहुत दिन तक उस पर अधिकार न रख सकेगा। प्रकृति की व्यवस्था अटल है। उसके विरुद्ध फल की आशा करना मूर्खता है। छोटा काम करने से मनुष्य नीचा या छोटा नहीं होता। किसी मनुष्य की परीक्षा उसके काम से न करनी चाहिए, किन्तु यह देखना चाहिए कि वह उस काम को किस प्रकार पूरा कर सकता है।

सबसे उत्तम और पवित्र वे कर्म हैं, जिनमें स्वार्थ का लेश भी न हो और जो केवल कर्त्तव्य या उपासना समझ कर किये गये हों। जिस कर्म में जितनी स्वार्थ की मात्रा बढ़ती जाती है, उतना ही उसका महत्त्व घटता जाता है। यही कर्म का सब से उच्च आदर्श है और यही कर्म का सीधा मार्ग है, इसीसे मनुष्य का आत्मा उन्नत होता है। परन्तु कर्म का यह आदर्श मनुष्य को तब प्राप्त होता है जब शुभ कर्मों के निरन्तर अभ्यास से उसके दुष्ट संस्कार क्षीण हो जाते हैं और उसका अन्तःकरण उदार भावों और उच्चाशयों का प्रसवक्षेत्र बन जाता है। केवल धर्म-बुद्धि से कर्म में प्रवृत्त होना चाहिए, यही एक कर्म के बन्धन से छूटने का मार्ग है। जो निःस्वार्थ कर्म करते हैं, उनमें ओज और प्रसाद चमकने लगते हैं। स्वार्थपरता ही मनुष्य को पाप की ओर ले जाती है, इसके प्रभाव से बचने के लिए केवल एक वस्तु की आवश्यकता

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है और वह प्रेम है। प्रेम ही धर्म का मूल है, इसके बिना मनुष्य अपने किसी अवस्था के धर्म का भी पालन नहीं कर सकता। पितृ-धर्म, पुत्र-धर्म, पति-धर्म, पत्नी-धर्म, गुरु-धर्म, शिष्य-धर्म, राज-धर्म और प्रजा-धर्म यहाँ तक कि मनुष्य-धर्म ये सब प्रेम के ही आश्रित हैं। जहाँ प्रेम है वहीं मनुष्य निष्काम भाव से अपने कर्त्तव्य-पालन की ओर झुकता है और जहाँ प्रेम नहीं, वहाँ जो कुछ किया जाता है अपने स्वार्थ के लिए। इससे परस्पर अविश्वास उत्पन्न होकर ईर्ष्या, द्वेष और मत्सरता की वृद्धि होती है।

चिड़चिड़े स्वभाव की स्त्रियाँ अपने पतियों पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहती हैं। पर यथार्थ में वे अपने इस बर्ताव से अपनी नीचता का परिचय देती हैं। यही दशा उन पतियों की है जो सदा अपनी पतिव्रता स्त्रियों में दोष ही देखा करते हैं। सदाचार स्त्री और पुरुष दोनों का भूषण है परन्तु वह बिना दोनों में सच्चे प्रेम के कभी रह नहीं सकता। जो पुरुष सदाचार से भ्रष्ट हो गये हैं, उनको धर्म के मार्ग पर लाना यद्यपि कठिन काम है, तथापि उनकी स्त्रियाँ यदि पतिव्रता और सदाचारिणी हों तो बहुत कुछ उन पर अपना प्रभाव डाल सकती हैं। इसी प्रकार धर्मात्मा और स्त्रीव्रत-पुरुष भी अपने सुचरित्र से अपनी कर्कशा और स्वैरिणी स्त्रियों का सुधार कर सकते हैं। पवित्रता और धर्मपरायणता दुष्टता को दबा सकती है। यदि स्त्री सदाचारिणी है और अपने पति के सिवा संसार के समस्त पुरुषों को अपने पुत्र, भाई या बाप के तुल्य समझती है, तो स्मरण रक्खो, एक भी ऐसा पुरुष न मिलेगा, जिसको उसे कुदृष्टि से देखने का साहस भी हो सके।

तीसरा अध्याय

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इसी प्रकार जो पुरुष सिवा अपनी स्त्री के अन्य सबको माँ, बहन और पुत्री की दृष्टि से देखता है, कोई भी स्त्री उसको अपने धर्म से पतित न कर सकेगी। संसार में जो पुरुष शिक्षक या उपदेशक होने का अभिमान करते हैं, कम से कम उनको तो "मातृवत् परदारेषु" इस आप्त-वाक्य पर अपना विश्वास अपने आचरण से दिखलाना चाहिए।

संसार में माता की पदवी सबसे बड़ी है। माता से अधिक कोई निःस्वार्थ नहीं होता। माता के प्रेम से केवल ईश्वर के प्रेम को उच्च कक्षा में रक्खा गया है। संसार के और सब प्रेम इससे बहुत नीची कक्षा में हैं। सबसे पहले माता हमको निष्काम कर्म की शिक्षा देती है। यदि ऐसे निःस्वार्थ शिक्षक को पाकर भी हम स्वार्थ में उन्मत्त रहे तो हमारे जीवन को धिक्कार है। वे पुरुष धन्य हैं कि जो अपने माता-पिता के निष्कपट प्रेम में ईश्वर के पवित्र प्रेम की झलक देखते हैं।

उन्नति का सरल और असन्दिग्ध मार्ग यह है कि अपने सामयिक कर्त्तव्य का पूर्ण ध्यान रहे और अपने साधारण धर्म का प्रतिपालन करते हुए दृढ़ता को सम्पादन किया जावे। अपने किसी कर्त्तव्य को भी लघु नहीं समझना चाहिए और न उसकी उपेक्षा करनी चाहिए। छोटा काम करने से कोई छोटा नहीं होता। मनुष्य के महत्त्व की परीक्षा उसके काम से नहीं करनी चाहिए, किन्तु उसके काम करने के ढंग से करनी चाहिए। उसके कर्त्तव्य कार्यों के करने का क्रम और ढंग ही उसके जाँचने की कसौटी है। एक चमार, जो थोड़ी देर में दृढ़ और अच्छा जूता बना लेता है, उस

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पण्डित प्रोफेसर से कहीं अच्छा है, जो रात-दिन व्यर्थ बकवाद करता रहता है।

कोई योगी जङ्गल में जाकर बहुत काल तक योग-साधन करता रहा। बारह वर्ष तक वह एक आसन पर बैठा हुआ तप करता रहा। एक दिन जब वह अपने ध्यान में बैठा था तब वृक्ष के ऊपर से उसके सिर पर कुछ पत्ते गिरे, उसने ऊपर देखा तो दो कौए आपस में लड़ रहे थे। योगी को क्रोध आया और वे दोनों उसी समय उसके क्रोधाग्नि से जल-भुन कर नीचे गिर पड़े। योगी अपने मन में बड़ा प्रसन्न हुआ कि अब मुझको योग-सिद्धि प्राप्त हो गई है। कुछ दिन के उपरान्त वह एक ग्राम में भिक्षा माँगने गया। किसी स्त्री के द्वार पर खड़े होकर आवाज़ दी—"माता ! भिक्षा दे जा।" भीतर से आवाज़ आई, ज़रा देर ठहर जा। योगी ने अपने मन में कहा, "अभागिनी स्त्री ! तू मेरे योग-बल को नहीं जानती और मुझे ठहराती है।" अभी वह सोच ही रहा था कि भीतर से फिर आवाज़ आई "बेटे ! बहुत क्रोध न कर, यहाँ कौए नहीं बसते।" अब तो योगी चकित रह गया और चुपचाप उसकी प्रतीक्षा करने लगा। थोड़ी देर में एक स्त्री बाहर आई। योगी उसके पाँव पर गिरा और कहने लगा—"माता ! तूने कैसे जाना।" उसने कहा—"बेटे ! मैं तेरे योग-ध्यान को नहीं जानती। मैं एक साधारण स्त्री हूँ। मैंने इस कारण तुझे ठहराया कि मेरा पति रोग-ग्रस्त है, मैं उसकी सेवा कर रही थी और यह मेरा धर्म है। मैं आयु भर अपने धर्म का आचरण करती रही। जब कुमारी थी, तब भी अपने धर्म का पालन करती रही और अब विवाह हो जाने पर भी धर्म को