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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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पृष्ठ 65

पाँचवाँ अध्याय

बेलाग रहना ही सच्चा त्याग है

जिस प्रकार हमारे कर्मों का फल हम को मिलता है, उसी प्रकार हम पर दूसरों के कर्म का और दूसरों पर हमारे कर्म का प्रभाव पड़ता है। जब कोई मनुष्य नीच कर्म करने लगता है तो दिन-ब-दिन वह गिरने लगता है और जो अच्छे कर्म करता है, वह प्रति दिन ऊपर को उठता जाता है। कर्मों के इस अमिट प्रभाव का सदा चक्र चल रहा है और हमारे कर्मों का परस्पर एक दूसरे पर प्रभाव पड़ रहा है। प्राकृतिक विज्ञान का एक उदाहरण देता हूँ। कल्पना करो, मेरी मनोवृत्ति एक विशेष प्रकार की है, इसलिए जिन मनुष्यों की मनोवृत्तियाँ उससे मिलती हैं, उनकी प्रवृत्ति भी वैसी ही होगी जैसी कि मेरी होगी। यदि एक कमरे में कई सितारों की खूँटियाँ इस तरह उमेठी जायँ कि इन सब से एक ही तरह की आवाज़ निकले और सब अलग अलग रख दिये जायँ तो एक के तार के छेड़ देने से दूसरों में से वैसी ही आवाज़ अपने आप निकलने लगेगी। इससे यह परिणाम निकाला जा सकता है कि इन सब सितारों में एक स्वर भरा हुआ था। बहुत से मनुष्यों की वृत्तियाँ, जो परस्पर अविरुद्ध हैं, इसी प्रकार एक विशेष भाव से भावित की जा सकती हैं। इसमें सन्देह नहीं कि दूरी तथा अन्य कारणों से इन भावों में कुछ

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