कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
चौथा अध्याय
चौथा अध्याय
परमार्थ में स्वार्थ
पूर्व इसके कि हम इस बात को बतावें कि धर्म के पालन करने से कहाँ तक हमारे आत्मा की उन्नति होती है, हमको संक्षेप से यह बता देना चाहिए कि भारतवर्ष में कर्म से क्या तात्पर्य्य लिया जाता है। प्रत्येक धर्म में तीन बातें होती हैं। (१) दर्शनशास्त्र, (२) उपाख्यान, (३) कर्म-काण्ड। इसमें सन्देह नहीं कि दर्शन-शास्त्र ही सारे मतों का आधार है। उपाख्यानों से महापुरुषों के जीवन-चरित्र और इतिहास के प्रसङ्ग में दर्शन की सजीव आकृति दिखलाई जाती है। कर्म-काण्ड और भी अधिक विस्तार के साथ दर्शन के प्रचार का प्रबन्ध करता है। इन सब के संघात को आगम या शास्त्र कहते हैं। प्रत्येक धर्म में कर्म-काण्ड सब से प्रधान अंश है। हम में से प्रत्येक मनुष्य आध्यात्मिक सिद्धान्तों को उस समय तक नहीं समझ सकता, जब तक उसमें आत्मिक शक्तियों का विकास न हो जावे। मनुष्य प्रत्येक बात में अपने को निपुण और योग्य समझता है, परन्तु जब काम करने का समय आता है तब उन सिद्धान्तों का समझना बड़ा कठिन हो जाता है। इसी लिए उन सिद्धान्तों की मूर्त्ति या रूपक बनाने का प्रबन्ध किया गया। इस प्रकार के चिह्न या संकेत प्रत्येक धर्म में हैं। हम लोग
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बिना संकेतों के और किसी प्रकार से ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। शब्द क्या हैं? हमारे भावों या विचारों की कृत्रिम मूर्त्तियाँ हैं। यह ब्रह्माण्ड भी इसी प्रकार की एक बड़ी मूर्त्ति है, जिसके भीतर परमात्मा गुप्त रीति से बैठा हुआ है। इन संकेतों को केवल मनुष्य ने नहीं बनाया। यह बात नहीं है कि एक धर्म के कुछ मनुष्य इकट्ठे हो कर बैठ गये और उन्होंने आपस में सम्मति करके कुछ संकेत बना लिये। ये संकेत स्वाभाविक हैं और क्रमशः इनकी उन्नति हुई है। अन्यथा यह कैसे सम्भव होता कि किन्हीं किन्हीं संकेतों के विषय में सब या प्रायः मनुष्यों के भाव या विचार एक से हो जाते। बहुत लोग समझते हैं कि मसीही-सूली का सम्बन्ध केवल ईसाई धर्म से है। पर यथार्थ में सूली का चिह्न मूसा की उत्पत्ति से पहले संसार में वर्त्तमान था। फेन्शीन और अजटक जातियों में मसीह की भावना उस समय से पाई जाती है, जब संसार को इतिहास लिखने का ज्ञान भी न था। इसी प्रकार सूली-प्राप्त मुक्ति-दाता की कल्पना भी किसी न किसी रूप में सब धर्मों में पाई जाती है। प्रत्येक महापुरुष की आकृति के आस पास मण्डलाकार वृत्त का चिह्न भी सदा से देखने में आता है। इसके सिवा स्वस्तिक का चिह्न भी सर्वत्र ही पाया जाता है। पहले प्रायः लोग यह समझते थे कि बौद्धों के कारण यह चिह्न संसार में फैल गया। पर खोज करने से प्रमाणित हुआ है कि बौद्धों से हज़ारों वर्ष पहले के लोगों में इसका प्रचार था। बाबुल और मिस्र में भी वह प्रचलित था। इससे सिद्ध है कि इन संकेतों को केवल सामयिक आवश्यकता ने नहीं उत्पन्न किया, किन्तु इनका
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कोई न कोई कारण अवश्य है, क्योंकि इनको सर्वत्र मनुष्य के मस्तिष्क से एक विशेष प्रकार का सम्बन्ध रहा है। इसी प्रकार भाषा भी केवल मनुष्य-रचित नहीं है, ऐसा कभी नहीं हुआ कि कुछ मनुष्य मिल कर इकट्ठे बैठ गये हों और यह सम्मति कर ली हो कि आओ, हम अपने भावों को प्रकाश करने के लिए कुछ शब्द गढ़ लें। शब्द और अर्थ को कोई मनुष्य एक दूसरे से पृथक् नहीं कर सकता। गूँगे और बहरे तक शब्द के संकेतों पर सोचते और विचार करते हैं। प्रत्येक भाव का मस्तिष्क में एक चित्र-विशेष खिंचा हुआ होता है। वेदान्त की परिभाषा में इसी को नाम और रूप कहते हैं। ये दोनों अनादि हैं, इनको कोई उत्पन्न नहीं कर सकता। संसार के शास्त्रीय सङ्केतों में हमको मनुष्य के धार्मिक सिद्धान्तों का पता मिलता है। यह कहना कि कर्म या उपासना की कोई आवश्यकता नहीं है, सुगम है। आज कल एक बालक भी ऐसा कहा करता है। परन्तु यह बात सुगमता से जानी जा सकती है कि जो लोग मन्दिर (स्थान-विशेष) में पूजा किया करते हैं, वे उन लोगों से भिन्न हैं, जो पूजा नहीं करते। इसलिए मन्दिर-विशेष, कर्म-विशेष और चिह्न-विशेषों का धर्म-विशेषों से सम्बन्ध है और प्रत्येक धर्म के अनुयायी उन चिह्नों से परमार्थ को सिद्ध करते हैं। अतएव कर्म की उपेक्षा करना ठीक नहीं। कर्मयोग के सम्बन्ध में इन सब बातों का जानना आवश्यक है।
इस कर्मयोग-विज्ञान के अनेक अङ्ग हैं। उनमें से एक यह है कि शब्द और अर्थ में क्या सम्बन्ध है और शब्द की शक्ति से क्या प्राप्त हो सकता है। प्रत्येक धर्म में शब्द की शक्ति स्वीकार की गई
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है और इस पर इतना अधिक बल दिया गया है कि कोई कोई धर्म तो केवल शब्द से ही सृष्टि की उत्पत्ति मानते हैं। ईश्वर के ज्ञान का वाह्य चिह्न भी शब्द ही है। ईश्वर ने पहले सोचा या इच्छा की, इसलिए यह सृष्टि शब्द से उत्पन्न हुई। आज-कल प्रकृति-विज्ञान उन्नति पर है, इसलिए लोगों की वृद्धि ऊपर की तरफ़ नहीं जाती। हृदय कठोर हो रहे हैं। जितने ही जो लोग अधिक आयुवाले हैं, उतने ही वे संसार के कुत्ते बने जा रहे हैं और उनमें उसी परिमाण से कठोरता आ रही है और प्रमाद बढ़ रहा है। तो भी कभी कभी मनुष्यता का ध्यान आ ही जाता है और कोई कोई साधारण सी बातें मनुष्य को तत्त्वानुसन्धान की ओर आकर्षित कर ही देती हैं और फिर इसको ज्ञान का आश्रय लेना ही पड़ता है। यदि हम दर्शन-शास्त्र और शब्द-शास्त्र के धार्मिक मूल्य की थोड़ी देर के लिए उपेक्षा करके देखें, तब भी हमको मानना पड़ेगा कि मनुष्य-जीवन के अभिनय में कर्म ने बहुत बड़ा काम किया है। मैं तुमसे केवल बातचीत कर रहा हूँ, तुमको छूता नहीं। मेरी उच्चारण-क्रिया से वायु में लहरें उठती हैं और मेरे शब्द तुम्हारे कान में जाकर तुम्हारी रगों और नसों को छूते हैं और तुम्हारे मन पर प्रभाव डालते हैं। तुम इस प्रभाव को रोक नहीं सकते। यह शब्द की विचित्र शक्ति है। एक मनुष्य दूसरे को अपशब्द कहता है, दूसरा मुष्टिप्रहार से उसके मुँह को लाल कर देता है। यह भी शब्द का ही प्रभाव है। और भी शब्द के प्रभाव पर ज़रा ध्यान दो। एक मनुष्य दुःख से मर्माहत होकर विलाप कर रहा है, दूसरा उसके पास आकर मधुर और शान्ति-पूर्ण वचनों से आश्वा-