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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

२८० ] [ कल्किपुराण
सोमसूर्यकुले जातौ देवापिमरुसंज्ञकौ ।
स्थापयित्वा कृतयुगं कृत्वा यास्यामि सद्गतिम् ।४४।
इति तद्वचनं श्रुत्वा राजा कल्कि हरि प्रभुम् ।
प्रणम्य प्राह सद्धर्मान् वैष्णवान् मनसेप्सितान् ।४५।
इति नृपवचन निशम्य कल्कि कलिकुलनाशनवासनावतार ।
निजजनपरिषद्विनोदकारीमधुरवचोभिराह साधुधर्मान् ।४६म।
राजा से वार्तालाप करते हुए भगवान् कल्कि ने ब्राह्मण क्षत्रिय
वैश्य तथा आश्रमादि के धर्मों का सक्षिप्त रूप से वर्णन किया
।४१। कल्कि बोले – हमारे जो अंश कलि से प्राप्त पाप के द्वारा भ्रष्ट
होगये थे, वे हमारे अवतरित होनेपर धर्म मार्ग पर आ गये हैं। हे
राजन् ! तुम राजसूय या अश्वमेध यज्ञ करते हुए मेरी आराधना
करो ।४२। मै ही परलोक हूँ, सनातन धर्म मे ही हूँ, काल, स्वभाव और
सस्कार सभी मेरे कर्म के अनुगत रहते हैं ।४३। मैं चन्द्रवंश और सूर्यवंश
मे क्रमश उत्पन्न देवापि और मरु नामक राजाओ को स्थापित करके
तथा इस युग को सतयुग रूप करके सद्गति को प्राप्त हूँगा ।४४। यह
सुनकर विशाखयूप नरेश ने भगवान कल्कि को प्रणाम किया और उनसे
वैष्णव धर्म का प्रसग कहने का अनुरोध किया ।४५। राजा की कामना
सुन कर कलिकुल का नाश करने की इच्छा से भूमण्डल पर अवतरित
भगवान् कल्कि अपने परिजनो और अनुयायियो के हृदयो को आनन्दित
करने वाली मिष्ठ वाणी से साधु धर्म की व्याख्या करने लगे .४६।
— ❀ —

चतुर्थ-अध्याय 1
ततः कल्कि सभा मध्ये राजामानो रवियथा ।
बभाषे तं नृप धर्म-मयो धर्मान् द्विज प्रियान् ।१।
कालेन ब्रह्मणो नाशे प्रलये मयि सङ्गताः ।
अहमेवासमेवाग्रे नान्यत् कार्यमिदं मम ।२।
प्रसुप्तलोकतन्त्रस्य द्वैतहीनस्य चात्मन ।
महानिशान्ते रन्तु मे समुद्भूतो विराट् प्रभुः ।३।
सहस्रशीर्षा पुरुषा सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
तदङ्गजोऽभवद्ब्रह्मा वेदवक्रो महाप्रभुः ।४।
सूतजी बोले मुनीश्वरो ! उस समय सभा के मध्य मे भगवान्
कल्कि सूर्य के समान विराजमान होकर विशङ्खयूप नरेश के प्रति धर्म-
प्रसङ्ग कहने लगे ।१। कल्कि बोले—कालान्तर मे जब यह ब्रह्माण्ड
नाश को प्राप्त होगा तब प्रलय होने पर मुझ मे विलोन हो जायगा ।
सृष्टि से पूर्व मैं ही विद्यमान था, अन्य कुछ भी नही था । इस सम्पूर्ण
जगत् का कारण मैं ही हूँ ।२। सम्पूर्ण विश्व की प्रसुप्ति और द्वैतहीना-
त्मिका महा रात्रि का अन्त होने पर मैं सर्वशक्ति सम्पन्न विराट्र्मूर्ति रूप
मे आविर्भूत होता हूँ ।३। वह विराट्मूर्त्ति सहस्र मस्तक, सहस्र नेत्र
और सहस्र चरण वाली हुई, उसी मूर्ति के अङ्ग से ब्रह्माजी
उत्पन्न हुए ।४।
जीवोपाधेर्ममांशाच्च प्रकृत्या मायया स्वया ।
ब्रह्मोपाधिः स सर्वज्ञो मम वाग्वेदशासितः ।।
२८१

२८२ ] [ कल्किपुराण
ससर्ज जीव जातानि कालमाया शयोगतः
देवा मन्वादयो लोका स प्रजापतयः प्रभुः ॥६॥
गुणिन्‍या मायायाशा मे नानोपाधौ ससजरे ।
सोपाधय इमे लोका देवा सस्थाणुजङ्गमाः ॥७॥
ममांशा मायया सृष्टा यतो मय्याविशन् लये ।
एवविधा ब्राह्मणा ये मच्छरीरा मदात्मिकाः॥८॥
मामुद्धरन्ति भुवने यज्ञाध्ययनसत्क्रियाः ।
मां प्रसेवन्ति शसन्ति तपोदानक्रियास्विह ॥६॥
स्मरन्त्यामोदयन्त्येव नान्ये देवादयस्तथा ।
ब्राह्मणा वेदवक्तारो वेदा मे मूर्तयः पराः ॥१०॥
ब्रह्म उपाधि वाले सर्वज्ञपुरुष ने मेरी वेद वाणी के शासनानुसार
मेरी माया प्रकृति की शक्ति, काल और अंश के सम्मिश्रण से इस जीवो-
पधारी जाति को प्रकट किया । इस प्रकार मनु आदि प्रजापतियों के
सहित देवता प्रकट हुए।५-६। मेरे अंश से त्रिगुणात्मिका माया अनेक
प्रकार की उपाधि धारण करके इस लोक में देवता एव स्थावर जंगम
सृष्टि प्रकट करती है ।७। माया सृष्टि का रचियता मेरा अंश अन्त मे मुझ
में ही लय हो जाता है । इसी प्रकार ब्राह्मण मेरे ही आत्म स्वरूप एव
देह हैं ।८। क्योकि ब्राह्मण यज्ञ वेदाध्ययन आदि श्रेष्ठ कार्यों के द्वारा
मेरा उद्धार तथा तप दानादि द्वारा मेरी सेवा करते हैं ।६। वेदवक्ता
ब्राह्मण जिस प्रकार स्मरण द्वारा मुझे प्रसन्न करते हैं, उस प्रकार
देवतादि अन्य कोई भी मुझे प्रसन्न नहीं करते, क्योकि वेद ही मेरी
परम मूर्ति है ।१०।
तस्मादिमे ब्राह्मणाजास्तै पुष्टस्त्रिजगज्जनाः ।
जगन्तिमे शरीराणि तत्पोषे ब्रह्मणो वरः ॥११॥
तेनाहं तान्ममस्यामि शुद्धसत्वगुणाश्रयः।
ततो जगन्मय पूर्वं मां सेवन्तेऽखिलाश्रयाः ॥१२॥

चौथा अध्याय ] [ २८३
विप्रस्य लक्षणं ब्रूहि त्वद्भक्तिं का च तत्कृता ।
यतस्तवानुग्रहेण वाग्बाणा ब्राह्मणा कृता ॥१३॥
वेदा मामीश्वरं प्राहुरव्यक्तं व्यक्तिमत्परम् ।
ते वेदा ब्राह्मणामुखे नानाधर्मे प्रकाशिताः ॥१४॥
यो धर्मो ब्राह्मणानां हि सा भक्तिर्मम पुष्कला ।
तयाहं तोषितः श्रीशः संभवामि युगे-युगे ॥१५॥
ब्राह्मण द्वारा वेदाध्ययन से तीनो लोको के निवासी पुष्टि को
प्राप्त हो रहे हैं, प्राणी रूप मेरे देह को श्रेष्ठ ब्राह्मण ही पुष्ट करने
हैं ॥११॥ इसलिए शुद्ध सत्वगुण का आश्रिन हुआ मैं ब्राह्मणो को मैं
नमस्कार करता हूँ, तब ब्राह्मण भी मुझे विश्वमय समझ कर कर ही
मेरी सेवा करते हैं ॥१२॥ विशाखयूप नरेश ने कहा-हे प्रभो ! आप मेरे
प्रति ब्राह्मणों के लक्षण कहिये । वे आपकी भक्ति किस प्रकार करते
हैं, जिस भक्ति को करके वे आपके अनुग्रह से वाग्बाण स्वरूप हो
जाते हैं ॥१३॥ कल्कि बोले-हे राजन् ! अव्यक्त एव वेद ही मेरे
ईश्वर हैं । ब्राह्मण के मुख मे यह वेद विभिन्न कर्मों का प्रकाश करते
हैं ॥१४॥ ब्राह्मणों का धर्माचरण मेरे प्रति भक्ति रूप मे प्रकट है । उनकी
उसी भक्ति से संतुष्ट होकर मैं युग-युग मे प्रकट होता हूँ ॥१५॥
ऊर्द्ध्वन्तु त्रिवृतं सूत्रं सधवार्निर्मितं शनैः ।
तन्तुत्रयमधोवृत्तं यज्ञ सूत्रं विदुर्बुधाः ॥१६॥
त्रिगुणं तद्ग्रन्थियुक्तं वेदप्रवरसंमितम् ।
शिरोधरात् नाभिमध्यात् पृष्ठाद्धं परिमाणकम् ॥१७॥
यजुर्विदां नाभिभितं सामगानामयं विधिः ।
वामस्कन्धेन विधृतं यज्ञ सूत्रं बलप्रदम् ॥१८॥
मृद्भस्मचन्दनाद्यैस्तु धारयेत् तिलक द्विजः ।
भाले त्रिपुण्ड्रं कर्माङ्गं केश पर्यन्तमुज्ज्वलम् ॥१६॥
पुण्ड्रमंगुलिमानन्तु त्रिपुण्ड्रं तत् त्रिधा कृतम् ।
ब्रह्मविष्णुशिवावासं दर्शनात् पापनाशनम् ॥२०॥

२८४ ] [ कल्किपुराण
ज्ञानियों का कहना है कि ब्राह्मण की सधवा नारी के द्वारा
सूत्र को त्रिवृत्त करे तथा उस त्रिवृत सूत्र को पुनः तिवृत करे यही यज्ञ
सूत्र है। १६। वेद प्रवर युक्त उस सूत्र में गाँठ लगावे। यजुर्वेदी ब्राह्मण
को यही यज्ञोपवीत कण्ठ से नाभि तक तथा पृष्ठ के आधे भाग तक
धारण करे। सामवेदी ब्राह्मण को नाभि तक धारण करना चाहिए।
यज्ञोपवीत बाँये कन्धे पर धारण करने से बल का देने वाला होता है-
।१७-१८। द्विज को मृत्तिका भस्म और चन्दनादि का तिलक लगाना
चाहिये। मस्तक पर केश पर्यन्त उज्ज्वल त्रिपुण्ड्र लगाना चाहिये। १६।
पुण्ड्र का प्रमाण एक अंगुल और त्रिपुण्ड्र इससे तिगुना होता है।
त्रिपुण्ड्र में ब्रह्मा, विष्णु और शिव निवास करते हैं। यह दर्शन करते
ही पाप का नाश करने में समर्थ है। २०।
ब्राह्मणाना करे स्वर्गा वाचो वेदा करे हरिः ।
गात्रे तीर्थानि रागश्च नाडीषु प्रकृतिस्त्रिवृत् ।२१
सावित्री कण्ठकुहरे हृदय ब्रह्म सहितम् ।
तेषा स्तनान्तरे धर्मं पृष्ठोऽधर्म. प्रकीर्तितः ।२२।
भू देवा ब्राह्मणा राजन् ! पूज्या वन्द्या सदुक्तिभि ।
चतुराश्रम्यकुशला मम धर्म, प्रवर्त्तका. ।२३।
बालाश्चापि ज्ञानवृद्धास्तपोवृद्धा मम प्रियाः ।
तेषा वच पालयितुमवतारा कृता मयाः ।२४।
महाभाग्य ब्राह्मणाना सर्वपापप्रणाशनम् ।
कलिदोषहर श्रुत्वा मुच्यते सर्वतो भयात् ।२५।
ब्राह्मणों के हाथों में स्वर्ग और भगवान् विष्णु निवास करते
हैं वाणी में वेद देह में तीर्थ और राग तथा नाडी में त्रिगुणात्मिका प्रकृति
है। २१। ब्राह्मणों के कण्ठ में सावित्री, हृदय में ब्रह्म वक्षस्थल के
मध्य में धर्म एवं पृष्ठ देश में अधर्म का निवास रहता है। २२। हे
राजन् ! चारों आश्रमों के धर्म को जानने वाले, मेरे धर्म के प्रवर्त्तक—

कलिकपुराण ] [ २८५
देवता ब्राह्मण श्रेष्ठ वनशो के द्वारा वन्दनीय हैं ।२३। ज्ञानवृद्ध और
ब्राह्मणो के बालको के प्रति मैं अत्यन्त प्रेम करता और उनके वचन
पालनार्थ ही अवतार धारण करता हूँ ।२४। सभी पापो का नाशक,
कलि काल के दोषो का हरण करने वाला ब्राह्मणो के महाभाग्य रूपी
चरित्र को सुनने से सदा सब भय नष्ट हो जाते हैं ।२५।
इति कलिकवचः श्रुत्वा कलिदोषविनाशनम् ।
प्रणम्य तं शुद्धमनाः प्रययौ वैष्णवाग्रणीः ।२६।
गते राजानि सन्ध्यायां शिवदत्तशुको बुधः ।
चरित्वा कलिकनुगतः स्तुत्वा तं पुरतः स्थितः ६७।
तं शुकं प्राह कलिकस्तु सस्मितं स्तुतिपाठकम् ।
स्वागतं भवता कस्मात् देशात् किं खादितं ततः ।२८।
शृणु नाथ ! वचो मह्यं कौतूहलसमन्वितम् ।
अहं गंतश्च जलधेर्मध्ये सिंहल संज्ञके ।२६।
यथा वृत्तं द्वीप गते तच्चित्रं श्रवणप्रियम् ।
बृहद्रथस्य नृपतेः कन्यायाश्चरितामृतम् ।३०।
कलियुग के दोषो को नष्ट करने वाले भगवान् कलिक के वचन
सुनकर पवित्र हृदय वैष्णव श्रेष्ठ राजा उन्हें प्रणाम करके चला गया
।२६। राजा के चले जाने पर शिव प्रदत्त ज्ञानी शुक संध्या के समय
भ्रमण से लौटकर भगवान् कलिक के समक्ष स्तुति करके खड़ा हुआ ।
उनके स्तोत्र-पाठ को सुन कर कलिक भगवान् बोले—तुम किधर से आ
रहे हो ? तुमने वहाँ क्या भोजन किया ? शुक बोला—हे नाथ !
आप मुझसे कौतुकमय वाणी सुनिये । मैं समुद्र के मध्य स्थित सिंहल
द्वीप में गया था ।२६। उस द्वीप में घटित वृत्तान्त सुनने में बड़ा अच्छा
है । राजा बृहद्रथ की कन्या का चरित्र अमृत के समान श्रेष्ठ है ।३०।
कौमुद्यामिह जाताया जगतां पापनाशनम् ।
चरितं सिंहले द्वीपे चातुर्वर्ण्यजनावृते ।३१।

२८६ ] [ कल्किपुराण

प्रासाद-हर्म्य-सदन-पुर-राजि-विराजिते ।
रत्न-स्फटिक-कुडद्यादि-स्वलताभिभूषिते ।३२।
स्त्रीभिरुत्तमवेशाभिः पद्मिनीभि समावृते ।
सरोभि सारसैहंसरुपकूलजलाकुले ।३३।
भृङ्ग रङ्ग प्रसङ्गाढ्ये पद्म कल्हारकुन्दकैः ।
नानाम्बुजलताजाल-वनोपवन-मण्डिते ।३४।
देशे बृहद्रथो राजा महाबलपराक्रमः ।
तस्य पद्मावती कन्या धन्या रेजे यशस्विनी ।३५।

इस कन्या ने रानी कौमुदी के गर्भ से जन्म लिया है । इसका
चरित्र श्रवण से पाप नाशक है । उस द्वीप मे चारो वर्ण के मनुष्यो का
निवास है । ३१। भवन, अटारी, गृह युक्त नगर मे वहाँ का राजा सुशो-
भित है । उसका भवन रत्न, स्फटिक, मणि तथा स्वर्ण आदि की पच्ची-
कारी से विभूषित हो रहा है ।३२। वहाँ पद्मिनी प्रभृति स्त्रियाँ श्रेष्ठ
वस्त्रादि से सुशोभित रहती हैं । सरोवरों मे सारस और हंस आदि पक्षी
कलोल करते हैं । ।३३। वह द्वीप विभिन्न प्रकार की पद्मलताओ के
जालो से सुशोभित है । उपवनो मे कल्हार, कुन्द आदि के पुष्पो पर भोरे
गुंजार करते हैं ।३४। वहाँ का राजा बृहद्रथ महाबली और पराक्रमी है ।
उसकी पद्मावती नाम की कन्या भी अत्यन्त यशस्विनी है ।३५।

भुवने दुर्लभा लोकेऽप्रतिमा वरवर्णिनी ।
काम मोह करी चारु चरित्रा चित्र निर्मिता ।३६।
शिव सेवापरा गौरी यथा पूज्या सुसम्मता ।
सखीभिः कन्यकाभिश्च जप ध्यान परायणा ।३७।
ज्ञात्वा ताञ्च हरेर्लक्ष्मीं समुद्भूतां वराङ्गप्राम् ।
हरः प्रादुरभूत्साक्षात्पार्वत्या मह हर्षित ।३८।
सा तमालोक्य वरदं शिव गौरी समन्वितम् ।
लज्जिताधोमुखी किञ्चन्नोवाच पुरतः स्थिता ।३६।

चतुर्थ अध्याय ] [ २८७
हरस्तामाह सुभगे ! तव नारायण पति ।
पाणि ग्रहीष्यति मुदा नान्यो योग्यो नृपात्मज ।४०।
श्रेष्ठ मुख वाली,सुन्दर चरित्रमयी, कामदेव को भी मोहित करने
वाली उस कन्या की समानता ससार मे कोई नही कर सकता ।३६।
जिस प्रकार गिरिजा भगवान शकर की सेवा परायण है, उसी प्रकार पूज-
नीया पद्मावती अपनी सखियो के साथ जप ध्यान-परायण रहती हैं ।
।३७। भगवान विष्णु की प्रिया लक्ष्मी जी को पद्मावती के रूप मे उत्पन्न
हुई जानकर पार्वती जी के साथ भगवान शकर वहाँ पधारे ।३८। वरदाता
शिवजी को पार्वती जी के सहित आये देख कर उस कन्या ने लज्जा से
शिर नीचा कर लिया और अवाक् खडी रही ।३६। तब शिवजी बोले—
हे सुभगे ! तुम्हारे पति भगवान नारायण ही तुम्हारा पाणि ग्रहण करेगे ।
क्योकि अन्य कोई राजकुमार तुम्हारे योग्य नही है ।४०।
कामभावेन भुवने ये त्वा पश्यन्ति मानवा ।
तेनैव वयमा नार्यो भविष्यन्त्यपि तत्क्षणात् ।४१।
देवासुरास्तथा नागा गन्धर्वाश्चारणादयः ।
त्वया रन्तु तथाकाले भविष्यन्ति किल स्त्रियः ।४२।
विना नारायण देव त्वत्पाणिग्रहणार्थिनम् ।
गृह याहि तपस्त्यक्त्वा भाग्यस्तननुत्तमम् ।४३।
मा क्षोभये हरेः पत्नि कमले विमल कुरु ।
इति दत्वा वर सोयस्तत्रैवान्तर्दधे हर ।४४।
हरवरमिति सा निशम्य पद्मा समुचितमात्मनोरथ प्रकाशम् ।
विकसितवदना प्रणम्य सोम निजजन कालयभाविवेश रामा
मृत्युलोक के वासी जो मनुष्य तुम्हारी ओर काम भाव से दृष्टि
पात करेगे, वे तत्काल अपनी आयु के अनुकूल स्त्रीत्व भाव को प्राप्त हो
जायेंगे ।४१। देवता, दैत्य, नाग, गधर्व चारण आदि मे भी जो कोई
तुम पर कुदृष्टि डालेगे वे भी स्त्रीत्व को उसी समय प्राप्त होगे ।४२।

२८८ ] [ कल्कि पुराण
भगवान नारायण के अतिरिक्त जो कोई भी तुम्हारा पाणिग्रहण करना
चाहेगा, वह ऐसी ही दशा को प्राप्त होगा । अब तुम तपस्या को छोड़-
कर भोग के योग्य अपना रूप बनालो और अपने घर को प्रस्थान करो
।४३। हे कमले ! तुम हरि की पत्नी हो, हर प्रकार का क्षोभ त्याग कर
मन को स्वस्थ करो । इस प्रकार वर प्रदान करके शिवजी अन्तर्ध्यान
होगये ।४४। भगवान शंकर से मनोवाञ्छित वरदान प्राप्त करके प्रफुल्ल
मुख हुई पद्मा शिवजी को प्रणाम करके अपने पितृ-गृह को गई ।४५।
—❀—
पंचम अध्याय
गते बहुतिथे काले पद्मा वीक्ष्य बृहद्रथः ।
निरूढ यौवना पुत्री विस्मित पापशङ्कया ।१।
कौमुदी प्राह महिषी पद्मोद्वाहेऽत्र क नृपम् ।
वरयिष्यामि सुभगे ! कुलशील समन्वितम् ।२।
सा तमाह पति देवी शिवेन प्रतिभाषितम् ।
विष्णुरस्यः पतिरिति भविष्यति न सशय ।३।
इति तस्यावच. श्रुत्वा राजा प्राह कदेतिताम् ।
विष्णुः सर्व गुहावासः पाणिमस्या ग्रहीस्यति ।४।
न मे भाग्योदयः कश्चित् ये न जामातर हरिम् ।
वरयिष्यामि कन्यार्थे वेदवत्या मुनेर्यथा ।५।
इमा स्वय वरा पद्मा पद्मामिव महोदधे ।
मथनेऽसुरदेवाना तथा विष्णुर्ग्रहीष्यति ।६।
शुकदेव जी ने कहा — बहुत समय व्यतीत होने पर जब पुत्री को

पञ्चम अध्याय ] [ २८६
राजाबृहद्रथ ने उसे यौवनावस्था के लक्षणो से युक्त देखा तब वह पाप की
शका से चिन्ता करने लगा ।१। तब राजा ने अपनी रानी कौमुदी के प्रति
कहा कि हे सुभगे ! तुम मुझे परामर्श दो कि अपनी प्रिय पुत्री के विवा-
हार्थ किस शीलगुण सम्पन्न एव श्रेष्ठ कुलोत्पन्न राजा को आमन्त्रित
किया जाय ? ।२। यह सुन कर रानी कौमुदी ने राजा को भगवान् शकर
के वचन स्मरण कराते हुए कहा कि इसके पति भगवान् श्री हरि ही
होगे, इसमे सशय नही है ।३। उसके यह वचन सुनकर राजा बृहद्रथ ने
रानी से पूछा कि हे प्रिये । यह तो बताओ कि भगवान् विष्णु कितने
समय मे इसका पाणिग्रहण कर लेगे ।४। हे प्रिये ! अभी तो हमारा
ऐसा भाग्योदय नही हुआ जन पडता कि जिससे प्रभाव से वेदवती के
समान मैं भी स्वयवर मे भगवान् श्री हरि को अपने जामाता के रूप मे
प्राप्त कर सकूँ ।५। देवताओ और दैत्यो के द्वारा मथन किये जाते
समुद्र से उत्पन्न हुई पद्मासना पद्मा के समान मेरी इस पद्मा को स्वय-
वर मे भगवान् श्री हरि वरण करलें ।६।
इति भूपगणान्भूप समाहूय पुरस्कृतान् ।
गुणशीलवयोरूप विद्याद्रविण सवृतान् ।७।
स्वयवरार्थं पद्मायाः सिंहले बहुमङ्गले ।
विचार्य कारयामास स्थान भूपनिवेशनम् ।८।
तत्रायाता नृपाः सर्व विवाह कृत निश्चयाः ।
निज सैन्यैः परिवृता, स्वर्णांरत्न विभूषिता ।६।
रथान्गजानश्ववरान्समारूढा महाबला. ।
श्वेतच्छत्रकृतच्छायाः श्वेतचामर वीजिताः ।१०।
शस्त्रास्त्रतेजसा दीप्ता देवा सेन्द्राइवाभवन ।
रुचिराश्वः सुकर्मा च मदिराक्षो दृढाशुगः ।११।
कृष्णसारः पारदश्च जीमूतः क्रूरमर्दन ।
काश कुशाम्बुर्वसुमान् कङ्कः क्रथन सञ्जयौ ।१२।
गुरुमित्रः प्रमार्थी च विजृम्भ सञ्जयोक्षम ।

२६० ] [ कल्कि पुराण
एते चान्ये च बहवः समायाता महाबलाः ।१३।
ऐसा सोचते हुए राजा वृहद्रथ ने, अपनी कन्या के स्वयवर के
निमित्त गुणवान, शीलवान, रूपवान, विज्ञ एव महान् ऐश्वर्य वाले
युवावस्था से परिपूर्ण राजाओ को सम्मान सहित आमन्त्रित किया ।७। इस
प्रकार उस सिंहल देश मे पद्मा के स्वयवर का उत्सव मनाया जाने लगा
बहुत प्रकार के मगल होने लगे और राजाओ के निवास आदि के लिए
स्थान सज्जित किये जाने लगे ।८। विवाह की इच्छा से सुवर्ण, मणि-
रत्नादि से विभूषित हुए राजागण देश विदेश से अपनी सेनाओ के
सहित वहाँ आने लगे ।६। वे सभी बलवान् राजागण रथ, अश्व, गज
आदि विभिन्न वाहनो पर सवार होकर वहाँ आये। उनके ऊपर श्वेत
छत्र लगाये और चमर डुलाये जाते थे । १०। उस समय शस्त्रादि से
दैदीप्यमान वे सब राजागण ऐसे शोभा पाने लगे जैसे देवताओ के समाज
मे इन्दु सुशोभित होते हैं। रुचिराश्व, सुकर्मा, मदिराक्ष, दृढाशुग, कृष्ण-
सार, पारद, जीमूत क्रूरमर्दन, शश, कुशाम्बु, वसुमान, कक, क्रथन,
सजय, गुरुमित्र, प्रमाथी, विजृम्भ सञ्जय, अक्षम आदि अनेक महा-
पराक्रमी नरेशगण वहाँ एकत्र होगये ।११-१३।
विविशुस्ते रङ्गगता स्वस्वस्थानेषु पूजिता. ।
वाद्यताण्डवसन्हृष्टाश्चित्र माल्यम्बराधराः ।१४।
नानाभोगसुखोद्रिक्ता कामरामा रतिप्रदा. ।
तानालोक्य सिंहलेश स्वा कन्या वरवर्णिनीम् ।१५।
गौरी चन्द्रनना श्यामा तारहारविभूषिताम् ।
मणिमुक्ताप्रवालैश्च सर्वाङ्गालकृतां शुभाम् ।१६।
कि माया मोहजननी कि वा कामप्रियां भुवि ।
रूपलावण्यसम्पन्न्या न चान्यमिह दृष्टवान ।१७।
स्वर्गे क्षितौ वा पातालेऽप्यह सर्वत्रगो यदि ।
पश्चद्वासीगणाकीर्णां सखीभिः परिवारिताम् ।१८।

पंचम अध्याय ] [ २६१
वे राजागण विविध प्रकार के वस्त्राभूषण, माला आदि से विभूषित
होकर रगभूमि मे आकर सादर सम्मानित होते हुए सुखपूर्वक अपने-२
अपने स्थान पर बैठ गये ।१४। विभिन्न प्रकार के भोगो और ऐश्वर्य से
सम्पन्न, रमणीय, चरित्र वाले एव सब को प्रसन्न करने के स्वभाव
वाले राजाओ को देखकर सिंहलेश बृहद्रथ ने अपनी वरवर्णिनी कन्या को
स्वयवर मे बुलाया ।१५। गौरी, चन्द्रानना, श्यामा मणि-मोती रत्नो
आदि से सब प्रकार विभूषित, अत्यन्त सुन्दर हार को धारण किये हुए
वह पद्मावती मोहमयी माया अथवा कामदेव की साक्षात् पत्नी ही अव-
तरित हुई प्रतीत होने लगी । मैं स्वर्ग, मर्त्यलोक, पाताल सभी लोको मे
तो गमन करता हूँ । परन्तु ऐसी रूप लावण्य वाली कोई अन्य कन्या
मैंने कही भी नही देखी । उस कन्या के पीछे दासियां चल रही थी तथा
उसके चारो ओर सखियां थी ।१६-१८।
दौवारिकैर्वेत्रहस्तै शासितान्तः पुराद्बहिः ।
पुरोबन्दिगणाकीर्णा प्रापयामास ता शनैः ।१९।
नूपुरैः किङ्किणीमिश्र क्वणन्ती जनमोहिनीम् ।
स्वागताना नृपाणाञ्च कुल शील गुणान्बहून ।२०।
शृण्वन्ती हसगमना रत्नमालाकरग्रहा ।
रुचिरापाङ्गभङ्गेन प्रेक्षन्ती लोलकुण्डला ।२१।
नृत्यत्कुन्तलसोपान गण्ड मण्डल मडिता ।
किञ्चित्स्मेरोल्लसद्द्रकदशनद्योतदीपिता ।२२।
वेदीमध्यारुणा क्षौमवसना कोकिलस्वना ।
रूप लावण्य पण्येन क्रतुकामा जगत्त्रयम् ।२३।
समागता तां प्रसमीक्ष्य भूपाः समोहिनी काम विमूढ चित्ताः ।
पेतुः क्षितौ विस्मृतवस्त्रशस्त्रा रथाश्वमत्तद्विपवाहनास्ते ।२४।
नगर के बाहर दौवारिकगण हाथो मे बेत लिए हुए अन्त पुर के
शासन मे सलग्न थे । सभास्थल के अगले भाग मे बंदीगण खडे थे । उस
रग भूमि मे राजकुमारी पद्मा मदगति से प्रविष्ट हुई ।१९। नूपुर और

२६२ ] [ कल्कि पुराण
किङ्किणी से लोको को मोहने वाली झंकार करती हुई और आगत नरेशो
के कुल, गुण, शील आदि का वर्णन श्रवण करती हुई वह हंसगति वाली
राजकन्या हाथ मे रत्नमाला लिए हुए अपने चंचल अंगो से शोभा को
पाती हुई और कटाक्षपूर्वक सब को देखती हुई बढ़ती जा रही थी । वह
हिलते हुए कुण्डल वाली, केशकुन्तल की चंचलता से युक्त, सुन्दर ग्रीवा
वाली, विकसित मुख से मद मुमकराती हुई, जिसके दांतो की पक्तियाँ
चमक रही थी, लाल रंग के रेशमी वस्त्र धारण किये हुए, कोकिला
जैसे कण्ठ स्वर वाली, जिसके रूप लावण्य से तीनो लोक मोहित हो रहे
थे, उस मनमोहिनी सुकुमारी राज कन्या को रंगभूमि मे घूमती हुई देख-
कर कामदेव के वशीभूत हुए राजागण ऐसे विह्वल चित्त होगये कि
उनके शस्त्रास्त्र और वस्त्रादि सभी खुल-खुल कर पृथिवी पर गिरने
लगे ।१६-२४।
तस्याः स्मरक्षोभ निरीक्षणेन स्त्रियो बभूवुः कमनीयरूपाः ।
बृहन्नितम्बस्तनभारनम्रा सुमध्यमास्तत्स्मृतिजातरूपा. ।२५।
विलासहास व्यसनातिचित्राः कान्तानन. शोणसरोज नेत्राः ।
स्त्रीरूपमात्मानमवेक्ष्य भूपास्तामन्वगच्छन्विशदानुवृत्त्या ।२६।
अह वटस्थः परहर्षितात्मा पद्माविवाहोत्सवदर्शनाकुल. ।
तस्या वचोऽन्तर्हृदि दुःखितायाः श्रोतु स्थित. स्त्रीत्वमितेषु तेषु ।
जाहीहि कल्के कमलाविलाप श्रुत विचित्रं जगतामधीश ।
गते विवाहोत्सवमङ्गले सा शिव शरण्य हृदये निधाय ।२८।
तान्दृष्ट्वा नृपती.गजाश्वरथिभिरत्यक्तान्सखित्व गतान् ।
स्त्रीभावेन समन्विताननुगतानपद्मा विलोक्यान्तिके ।
दीना त्यक्तविभूषणा विलिखती पादागुलै. कामिनी ॥
ईशं कर्तुं निजनाथमीश्वरवचस्तथ्य हरिसाऽस्मरत् ।२६।
काम से विमोहित हुए उन राजाओ ने जैसेही उस राजकन्या को
वासनामय नेत्रो से देखा वैसे ही वे जिस रूप पर लालायित हुए थे, वैसे

पचम अध्याय ] [ २६३
ही रूप वाली कमनीय नारी का रूप उन्हे प्राप्त होगया ।२५। इस प्रकार
नारी सुलभ हास, विलास, व्यसन, चातुर्य, सुन्दर मुख और कमल जैसे
नेत्रो को प्राप्त हुए वे राजागण अपने को स्त्री हुए देख कर पद्मा के पीछे
पीछे उसकी सहेली बनकर चलने लगे ।२६। उस समय पद्मा के
विवाह का वह उत्सव देखने के निमित्त मैं पास ही के एक वृक्ष
पर बैठ गया था । जब वे राजागण स्त्री रूप हो गये, तब तो पद्मा
अत्यन्त शोकित ही उठी । मैं उसके विलाप को सुनता रहा ।
हे लोक स्वामिन् ! उस मगलमय उत्सव के इस प्रकार समाप्त
हो जाने पर पद्मा ने भगवान् शकर का ध्यान कर जो विलाप
किया था, उस करुण विलाप को आप श्रवण कीजिये । पद्मा ने
देखा कि सभी राजागण मुझे देखते ही अपने हाथी, अश्व, रथ
आदि से विलग होकर स्त्री रूप मे मेरी सहेली होकर साथ-साथ
चल रहे हैं, तो वह अत्यन्त दीनतापूर्वक अपने आभूषणो को
त्याग कर धरती को कुरेदने लगी । फिर वह शिवजी के वर-
दान की सफलता के हेतु भगवान् विष्णु का पति भाव से ध्यान
करने लगी ।२७-२६।

षष्ठ अध्याय
तत. सा विस्मितमुखी पद्मा निजजनैर्वृता।
हरिं पतिं चिन्तयन्तो प्रोवाच विमला स्थिताम् ॥१॥
विमले किं कृतं धात्रां ललाटे लिखनं मम ।
दर्शनादपि लोकानां पुंसां स्त्रीभावकारकम् ॥२॥
ममापि मन्दभाग्याया पापित्या. शिवमेवनम् ।
विफलत्वं मनुप्राप्त बीजमुप्त यथोपरे ॥३॥
हरिर्लक्ष्मीपति सर्वजगतामधिप प्रभु ।
मत्कृतेऽप्यभिलाष किं करिष्यति जगत्पति, ॥४॥
यदि शम्भोर्वचो मिथ्या यदि विष्णुर्न मां स्मरेत् ।
तदाहमनले देहं त्यक्ष्यामि करिभाविता ॥५॥
शुकदेव जी बोले—तदनन्तर विस्मित मुख वाली पद्मा अपनी
सहेलियो के मध्य स्थित हुई, भगवान् विष्णु को पतिरूप मे विचार करती
हुई, अपने निकट स्थित विमला नाम की सहेली से कहने लगी ।१।
पद्मा बोली — हे विमले ! क्या ब्रह्मा ने मेरे भाग्य मे यही लिख दिया
है कि जो पुरुष मुझे देखे, वह तुरन्त स्त्रीत्व को प्राप्त हो जाय ।२। हे
सखी ! जैसे मरुभूमि मे बोया गया बीज निष्फल होता है, वैसे ही मुझ
अभागिनी एव पापिनी द्वारा भगवान् शकर की, की गई उपासना व्यर्थ
होगई ।३। भगवान् रमापति विष्णु सम्पूर्ण विश्व के अधीश्वर और प्रभु
हैं मैं उन्हे पति रूप मे प्राप्त करने की कामना करूँ तो क्या वे मुझे स्वी-
कार करेगे ? ।४। यदि भगवान् शम्भु का वचन मिथ्या हो गया और
भगवान विष्णु ने मेरी कामना नही की तो मैं उन्ही भगवान् श्री हरि
का ध्यान करती हुई अपने देह को अग्नि कुण्ड मे डाल कर भस्म कर
दूँगी ।५।
२६४

षष्ठ अध्याय ] [ २६५
क्व चाह मानुषी दीना क्वाते देवो जनार्दनः ।
निगृहीता विधात्राह शिवेन परिवञ्चिता ।६।
विष्णौ च परित्यक्ता मदन्या नात्र जीवति ।७।
इति नाना विलपिन्या वचन शोचनाश्रयम् ।
पद्मायाश्चरुचेष्टाया। श्रुत्वायातस्तवान्तिके ।८।
शुकस्य वचनं श्रुत्वा कल्किः परमविस्मितः ।
त जगाद् पुनर्याहि पद्मा बोधयितु प्रियाम् ।६।
मत्सन्देशहरो भूत्वा यद्रूपगुणकीर्तनम् ।
श्रावयित्वा पुन कीर ! समायास्यासि बांधव ।१०।
कहाँ तो मैं दीन मानुषी और कहाँ वे जनार्दन प्रभु-इन दोनो
मे विवाह की कल्पना करने से ही मैं तो यह समझती हूँ कि विधाता
मुझ से विमुख है, तभी तो शिवजी ने मुझे वैसा वर देकर ठग लिया है-
।६। भगवान श्री हरि के द्वारा परित्यक्ता होकर मेरे अतिरिक्त और
कौन जीवित रह सकता है ।७। सुन्दर चरित्र वाली पद्मावती इस प्रकार
से विलाप करती थी । उसके शोकाकुल वचनो को सुनकर ही मैं आपके
निकट उपस्थित हुआ हूँ ।८। शुक के यह वचन सुनकर अत्यन्त विस्मय
को प्राप्त हुए कल्कि जी ने शुक के प्रति कहा—हे शुक मेरी प्रिया पद्मा
को आश्वासन देने के निमित्त तुम पुनः सिंहल देश को प्रस्थान करो ।६।
हे शुक ! तुम हमारे संदेश वाहक होकर पद्मा को हमारे रूप गुण का
वृत्तान्त सुनाना और फिर हे खग ! तुम शीघ्र ही यहाँ लौट आना ।१०।
सा मे पतिरह तस्या दैवविनिर्मितः ।
मध्यस्थेन त्वया योगमावयोश्च भविष्यति ।११।
सर्वज्ञसि विधिज्ञोऽसि कालज्ञोऽसि कथामृते ।
तामाश्वास्य ममाश्वासकथास्तस्याः समाहरः ।१२।
इति कल्केर्वचः श्रुत्वा शुक परमहर्षितः ।
प्रणम्य त प्रोतमनाःप्रययौ सिंहलं त्वरन् ।१३।

२६६ ] [ कल्कि पुराण
खगः समुद्रपारेण स्नात्वा पीत्वामृतं पय ।
बीजपूरफलाहारो ययौ नाजदिनिवेशमम् ।१४।
तत्र कन्यापुर गत्वावृक्षे नागेश्वरे वसन् ।
पद्मालोक्य तां प्राह मुको मानुष भाषया ।१५।
अवश्य ही पद्मा मेरी पत्नी और मैं उसका पति हूँ । विधाता ने
ही यह संयोग नियत किया है और यह कार्य तुम्हारी मध्यस्थता मे ही
सम्पन्न होना है । ११। तुम सर्वज्ञ हो, नियम और काल के भी ज्ञाता
हो । तुम अपने वचनामृत से समझा कर और मेरे द्वारा ग्रहण किये जाने
का आश्वासन देकर यहाँ लौट आओ । ।१२। कल्किजी का ऐसा आदेश
पाकर मुदित हुए शुक ने उन्हें प्रणाम किया और शीघ्रतापूर्वक सिंहल-
देश को प्रस्थान किया ।१३। मार्ग मे, समुद्र के पार जाकर शुक ने
स्नान करके उस मृतोपम जल का पान और बिजौरे के फलको भक्षण
किया और फिर राजभवन मे प्रविष्ट होगया ।१४। वह अन्त पुर मे
पहुंच कर राजकन्या के निवास स्थान पर जाकर नागकेशर के एक वृक्ष
पर चढ गया और पद्मा को देख कर मनुष्यो की भाषा मे उससे
बोला ।१५।
कुशलं ते वरारोहे ! रूप यौवन शालिनी ।
त्वा लोलनयनां मन्ये लक्ष्मी रूपमिवापराम् ।१६।
पद्मानना पद्मगन्धां पद्मनेत्रा कराम्बुजे ।
कमल कालयन्तीं त्वां लक्षयामि परां श्रियम् ।१७।
किं धात्रा सर्वजगतां रूपलावण्यसम्पदाम् ।
निर्मितासि वरारोहे ! जीवानां मोहकारिणि ! ।१८।
इति भाषितमाकर्ण्य कीरस्यामितमद्भुतम् ।
हसन्ती प्राह सा देवी त पद्मा पद्ममालिनी ।१६।
कस्त्वं कस्मादागतोऽसि कथ मा शुकरूपधृक् ।
देवो वा दानवो वा त्वमागतोऽसि दयापरः ।२०।

षष्ठ अध्याय ] [ २६७
शुक ने कहा—हे वरारोहे ! हे रूप यौवन सम्पने तुम कुशल
पूर्वक तो हो ? तुम अपने चंचल नेत्रो से सुशोभित द्वितीय लक्ष्मी ही
प्रतीत होती हैं ।१६। तुम कमल जैसे मुख वाली, कमलगंधा, कमलाक्ष
तथा कमल के समान हाथो वाली हो । अपने हाथ मे तुमने कमल
धारण किया हुआ है, यह लक्षण तुम्हारा लक्ष्मी होना सूचित करता है-
।१७। हे वरारोहे ! विधाता ने क्या सम्पूर्ण विश्व का रूप लावण्य
तुम्ही मे भर कर तुम्हे ही सब जीवो को मोहित करने वाली बना दियो
है ।१८। शुक के यह अद्भुत वचन सुनकर पद्ममालधारिणी पद्मा ने हँस-
कर कहा ।१६। तुम कौन हो ? कहाँ से आगमन हुआ है ? तुम इस शुक
वेश मे देवता हो अथवा दानव ? तुम यहाँ आकर किसलिए ऐसी दया
प्रदर्शित कर रहे हो ।२०।
सर्वज्ञोऽह कामगामी सर्वशास्त्रार्थतत्ववित् ।
देवगन्धर्वभूपानां सभासु परिपूजित ।२१।
चरामि स्वेच्छाया खे त्वामीक्षणार्थमिहागतः ।
त्वामह हृदि सतप्तं त्यक्तभोग मनस्विनीम् ।२२।
हास्यालाप-सखी-सङ्ग देहाभरण-वर्जिताम् ।
विलोक्याह दोनचेता पृच्छामि श्रोतुमोरितम् ।
कोकिलालाप-सन्ताप-जनक मधुर मृदु ।२३।
तव दन्तौष्ठजिह्वाग्रलुलिताक्षरपक्तय
यत्कर्णकुहरे मग्नास्तेषा किं वर्ण्यते तत ।२४।
सौकुमार्यं शिरीषस्य क्व कान्तिर्वा निशाकरे ।
पीयूष क्व वदन्त्येवानन्द ब्रह्मणि ते बुधा, ।२५।
शुक ने कहा— देवी ! मैं सब कुछ जानने वाला तथा सब शास्त्रो
का तत्वज्ञानी हूँ । मैं स्वेच्छापूर्वक सर्वत्र गमन क'ने मे समथ हूँ । देवता,
गधर्व अथवा राजाओ की सभा मे मेरा पूर्ण सम्मान होता है ।२१। मैं
गगन मडल मे अपनी इच्छा के अनुसार विचरण करता हूँ । तुम हृदय

२६८ ] [ कल्कि पुराण
मे सन्तप्त तथा भोग सुख से परे एवं मनस्विनो के दर्शनार्थ ही यहाँ आ
पहुँचा हूँ ।२२। तुमने हास्यालाप, सखियोका सग और आभरणको त्याग
रखा है । तुमको उस स्थिति मे देखकर दीन-हृदय हुआ मै तुम्हारी
कोकिल जैसी मधुर वाणी मे तुम्हारे सन्तप्त रहने कारण जानना चाहता
हूँ । २३। तुम्हारे, ओष्ठ और जिह्वा के अग्र भाग मे निसृत अक्षर
पक्तियाँ जिसके कानो को सुनाई पड जाय, उसकी तपस्या का प्रभाव
कहाँ तक कहा जा सकता है ? ।२४। तुम्हारे समक्ष शिरस के पुष्पो की
कमनीयता भी क्या है ? तथा चन्द्रकान्ति भी क्या वस्तु है ? ज्ञानीजन
जिस ब्रह्म रूपी पीयूष का वर्णन करते है, वह आनन्द भी तुम्हारी
क्या समता करेगा ? ।२५।
तिलकालकसमिश्र लोलकुण्डलमण्डितम् ।२६।
लोलेक्षणोल्लसद्वक्नेत्र पश्यताम् न पुनर्भव. ।२७।
बृहद्रथसुते ! स्वाधि वद भामिनि यत्कृते ।
तप क्षीणामिव तनू लक्षयामि रुज विना ।
कनकप्रतिमा यद्वत मासुभिर्मलिनीकृता ।२८।
कि रूपेण कुलेनापि धनेनाभिजनेन वा ।
सर्व निष्फलतामेति यस्यदैवमदक्षिणम् ।।२६।।
शृणु कीर समाख्यान यदि वा विदित तव ।
बाल्य-पौगण्ड-केंशोरे हरसेवा करोम्यहम् ।३०।।
तुम्हारे तिलक, अलक से युक्त चचल कुण्डलो से मण्डित तथा
चंचल नेत्रो से सुशोभित सुन्दर मुख का दर्शन करने वाले को
पुनर्जन्म धारण नही करना होता । २६ २७। हे बृहद्रथसुते ! अपने मान-
सिक दुख का कारण मुझे बताओ । हे भामिनि ! तुम्हारी देह बिना
रोग के ही, तप से क्षीण दिखाई दे रही है । जैसे मैल के कारण कचन
की प्रतिमा मैली हो जाती है, वैसे ही तुम्हारा देह भी मलीन होगया
है ।२८। पद्मा ने कहा—धन अथवा उच्च कुल मे उत्पन्न होने से ही

प्रथम अंश: अध्याय ४-७ (सिंहल द्वीप यात्रा व पद्मावती विवाह)

षष्ठ अध्याय ] [ २६६
क्या प्रयोजन सिद्ध होता है, अर्थात् दैव की प्रतिकूलता हो तो यह सभी
निष्फल हैं ।२६। हे कीर ! यदि तुम्हे हमारा वृत्तान्तज्ञात न हो तो सुनो—
मैने अपनी बाल और किशोर अवस्था मे भगवान शकर की आराधना
की थी ।३०।
तेन पूजाविधानेन तुष्टो भूत्वा महेश्वर ।
वर वरय पद्मे ! त्वमित्याह प्रियया सह ।।३१।।
लज्जयेधोमुखीमग्रे स्थिता मा वीक्ष्य शङ्कर. ।
प्राह ते भविता स्वामी हरिनारायण प्रभु ।।३२।।
देवो वा दानवो वान्यौ गन्धर्वो वा तवेक्षणात् ।
कामेन मनसा नारी भविष्यन्ति न सशय ।।३३।।
इति दत्वा वर सोम प्राह विष्ण्वर्च्चनं यथा ।
तथाह ते प्रवक्ष्यामि समाहितमना शृणु ।३४।
एता. सख्यो नृपा पूर्वमाहता ये स्वयम्बरे ।
पित्रा धर्मार्थिना दृष्ट्वा रम्या मा यौवनान्विताम् ।३५।
मेरे द्वारा किये गये उम पूजन से प्रसन्न हुए शिवजी ने पार्वतीजी
के सहित प्रकट होकर मुझवे कहा कि हे पद्मे ! वर माँगो ।३१। फिर
मुझे लज्जा पूर्वक सिर झुकाये देख कर उन्होने कहा कि तुम्हारे पति
भगवान् नारायण होगे ।३२। देवता, दानव, गन्धर्व अथवा जो कोई भी
हो, यदि तुम्हे काम-भाव से देखेगा तो तुरन्त स्त्री-रूप हो जायगा, इममे
सन्देह नही है ।३३। यह वर देने के पश्चात् शिवजी ने भगवान् विष्णु
की जो पूजन विधि बताई थी, वह कहती हूँ, समाहित चित्त से सुनो।३४।
यह जितनी भी सखियाँ हैं, सभी पहिले राजा थे । मेरे पिता ने मेरी
यौवनावस्था देख कर धर्म की रक्षा के निमित्त इन सब राजाओ को मेरे
स्वयम्बर मे बुलाया था ।३५।
स्वागतास्ते सुखासीना विवाहकृतनिश्चय ।
युवानो गुणवन्तश्चरूपद्रविणसम्मता• ।३६।