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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 33

२८६ ] [ कल्किपुराण

प्रासाद-हर्म्य-सदन-पुर-राजि-विराजिते ।
रत्न-स्फटिक-कुडद्यादि-स्वलताभिभूषिते ।३२।
स्त्रीभिरुत्तमवेशाभिः पद्मिनीभि समावृते ।
सरोभि सारसैहंसरुपकूलजलाकुले ।३३।
भृङ्ग रङ्ग प्रसङ्गाढ्ये पद्म कल्हारकुन्दकैः ।
नानाम्बुजलताजाल-वनोपवन-मण्डिते ।३४।
देशे बृहद्रथो राजा महाबलपराक्रमः ।
तस्य पद्मावती कन्या धन्या रेजे यशस्विनी ।३५।

इस कन्या ने रानी कौमुदी के गर्भ से जन्म लिया है । इसका
चरित्र श्रवण से पाप नाशक है । उस द्वीप मे चारो वर्ण के मनुष्यो का
निवास है । ३१। भवन, अटारी, गृह युक्त नगर मे वहाँ का राजा सुशो-
भित है । उसका भवन रत्न, स्फटिक, मणि तथा स्वर्ण आदि की पच्ची-
कारी से विभूषित हो रहा है ।३२। वहाँ पद्मिनी प्रभृति स्त्रियाँ श्रेष्ठ
वस्त्रादि से सुशोभित रहती हैं । सरोवरों मे सारस और हंस आदि पक्षी
कलोल करते हैं । ।३३। वह द्वीप विभिन्न प्रकार की पद्मलताओ के
जालो से सुशोभित है । उपवनो मे कल्हार, कुन्द आदि के पुष्पो पर भोरे
गुंजार करते हैं ।३४। वहाँ का राजा बृहद्रथ महाबली और पराक्रमी है ।
उसकी पद्मावती नाम की कन्या भी अत्यन्त यशस्विनी है ।३५।

भुवने दुर्लभा लोकेऽप्रतिमा वरवर्णिनी ।
काम मोह करी चारु चरित्रा चित्र निर्मिता ।३६।
शिव सेवापरा गौरी यथा पूज्या सुसम्मता ।
सखीभिः कन्यकाभिश्च जप ध्यान परायणा ।३७।
ज्ञात्वा ताञ्च हरेर्लक्ष्मीं समुद्भूतां वराङ्गप्राम् ।
हरः प्रादुरभूत्साक्षात्पार्वत्या मह हर्षित ।३८।
सा तमालोक्य वरदं शिव गौरी समन्वितम् ।
लज्जिताधोमुखी किञ्चन्नोवाच पुरतः स्थिता ।३६।