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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 37

२६० ] [ कल्कि पुराण
एते चान्ये च बहवः समायाता महाबलाः ।१३।
ऐसा सोचते हुए राजा वृहद्रथ ने, अपनी कन्या के स्वयवर के
निमित्त गुणवान, शीलवान, रूपवान, विज्ञ एव महान् ऐश्वर्य वाले
युवावस्था से परिपूर्ण राजाओ को सम्मान सहित आमन्त्रित किया ।७। इस
प्रकार उस सिंहल देश मे पद्मा के स्वयवर का उत्सव मनाया जाने लगा
बहुत प्रकार के मगल होने लगे और राजाओ के निवास आदि के लिए
स्थान सज्जित किये जाने लगे ।८। विवाह की इच्छा से सुवर्ण, मणि-
रत्नादि से विभूषित हुए राजागण देश विदेश से अपनी सेनाओ के
सहित वहाँ आने लगे ।६। वे सभी बलवान् राजागण रथ, अश्व, गज
आदि विभिन्न वाहनो पर सवार होकर वहाँ आये। उनके ऊपर श्वेत
छत्र लगाये और चमर डुलाये जाते थे । १०। उस समय शस्त्रादि से
दैदीप्यमान वे सब राजागण ऐसे शोभा पाने लगे जैसे देवताओ के समाज
मे इन्दु सुशोभित होते हैं। रुचिराश्व, सुकर्मा, मदिराक्ष, दृढाशुग, कृष्ण-
सार, पारद, जीमूत क्रूरमर्दन, शश, कुशाम्बु, वसुमान, कक, क्रथन,
सजय, गुरुमित्र, प्रमाथी, विजृम्भ सञ्जय, अक्षम आदि अनेक महा-
पराक्रमी नरेशगण वहाँ एकत्र होगये ।११-१३।
विविशुस्ते रङ्गगता स्वस्वस्थानेषु पूजिता. ।
वाद्यताण्डवसन्हृष्टाश्चित्र माल्यम्बराधराः ।१४।
नानाभोगसुखोद्रिक्ता कामरामा रतिप्रदा. ।
तानालोक्य सिंहलेश स्वा कन्या वरवर्णिनीम् ।१५।
गौरी चन्द्रनना श्यामा तारहारविभूषिताम् ।
मणिमुक्ताप्रवालैश्च सर्वाङ्गालकृतां शुभाम् ।१६।
कि माया मोहजननी कि वा कामप्रियां भुवि ।
रूपलावण्यसम्पन्न्या न चान्यमिह दृष्टवान ।१७।
स्वर्गे क्षितौ वा पातालेऽप्यह सर्वत्रगो यदि ।
पश्चद्वासीगणाकीर्णां सखीभिः परिवारिताम् ।१८।

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