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सर्वकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 30

चौथा अध्याय ] [ २८३
विप्रस्य लक्षणं ब्रूहि त्वद्भक्तिं का च तत्कृता ।
यतस्तवानुग्रहेण वाग्बाणा ब्राह्मणा कृता ॥१३॥
वेदा मामीश्वरं प्राहुरव्यक्तं व्यक्तिमत्परम् ।
ते वेदा ब्राह्मणामुखे नानाधर्मे प्रकाशिताः ॥१४॥
यो धर्मो ब्राह्मणानां हि सा भक्तिर्मम पुष्कला ।
तयाहं तोषितः श्रीशः संभवामि युगे-युगे ॥१५॥
ब्राह्मण द्वारा वेदाध्ययन से तीनो लोको के निवासी पुष्टि को
प्राप्त हो रहे हैं, प्राणी रूप मेरे देह को श्रेष्ठ ब्राह्मण ही पुष्ट करने
हैं ॥११॥ इसलिए शुद्ध सत्वगुण का आश्रिन हुआ मैं ब्राह्मणो को मैं
नमस्कार करता हूँ, तब ब्राह्मण भी मुझे विश्वमय समझ कर कर ही
मेरी सेवा करते हैं ॥१२॥ विशाखयूप नरेश ने कहा-हे प्रभो ! आप मेरे
प्रति ब्राह्मणों के लक्षण कहिये । वे आपकी भक्ति किस प्रकार करते
हैं, जिस भक्ति को करके वे आपके अनुग्रह से वाग्बाण स्वरूप हो
जाते हैं ॥१३॥ कल्कि बोले-हे राजन् ! अव्यक्त एव वेद ही मेरे
ईश्वर हैं । ब्राह्मण के मुख मे यह वेद विभिन्न कर्मों का प्रकाश करते
हैं ॥१४॥ ब्राह्मणों का धर्माचरण मेरे प्रति भक्ति रूप मे प्रकट है । उनकी
उसी भक्ति से संतुष्ट होकर मैं युग-युग मे प्रकट होता हूँ ॥१५॥
ऊर्द्ध्वन्तु त्रिवृतं सूत्रं सधवार्निर्मितं शनैः ।
तन्तुत्रयमधोवृत्तं यज्ञ सूत्रं विदुर्बुधाः ॥१६॥
त्रिगुणं तद्ग्रन्थियुक्तं वेदप्रवरसंमितम् ।
शिरोधरात् नाभिमध्यात् पृष्ठाद्धं परिमाणकम् ॥१७॥
यजुर्विदां नाभिभितं सामगानामयं विधिः ।
वामस्कन्धेन विधृतं यज्ञ सूत्रं बलप्रदम् ॥१८॥
मृद्भस्मचन्दनाद्यैस्तु धारयेत् तिलक द्विजः ।
भाले त्रिपुण्ड्रं कर्माङ्गं केश पर्यन्तमुज्ज्वलम् ॥१६॥
पुण्ड्रमंगुलिमानन्तु त्रिपुण्ड्रं तत् त्रिधा कृतम् ।
ब्रह्मविष्णुशिवावासं दर्शनात् पापनाशनम् ॥२०॥