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सर्वकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 31

२८४ ] [ कल्किपुराण
ज्ञानियों का कहना है कि ब्राह्मण की सधवा नारी के द्वारा
सूत्र को त्रिवृत्त करे तथा उस त्रिवृत सूत्र को पुनः तिवृत करे यही यज्ञ
सूत्र है। १६। वेद प्रवर युक्त उस सूत्र में गाँठ लगावे। यजुर्वेदी ब्राह्मण
को यही यज्ञोपवीत कण्ठ से नाभि तक तथा पृष्ठ के आधे भाग तक
धारण करे। सामवेदी ब्राह्मण को नाभि तक धारण करना चाहिए।
यज्ञोपवीत बाँये कन्धे पर धारण करने से बल का देने वाला होता है-
।१७-१८। द्विज को मृत्तिका भस्म और चन्दनादि का तिलक लगाना
चाहिये। मस्तक पर केश पर्यन्त उज्ज्वल त्रिपुण्ड्र लगाना चाहिये। १६।
पुण्ड्र का प्रमाण एक अंगुल और त्रिपुण्ड्र इससे तिगुना होता है।
त्रिपुण्ड्र में ब्रह्मा, विष्णु और शिव निवास करते हैं। यह दर्शन करते
ही पाप का नाश करने में समर्थ है। २०।
ब्राह्मणाना करे स्वर्गा वाचो वेदा करे हरिः ।
गात्रे तीर्थानि रागश्च नाडीषु प्रकृतिस्त्रिवृत् ।२१
सावित्री कण्ठकुहरे हृदय ब्रह्म सहितम् ।
तेषा स्तनान्तरे धर्मं पृष्ठोऽधर्म. प्रकीर्तितः ।२२।
भू देवा ब्राह्मणा राजन् ! पूज्या वन्द्या सदुक्तिभि ।
चतुराश्रम्यकुशला मम धर्म, प्रवर्त्तका. ।२३।
बालाश्चापि ज्ञानवृद्धास्तपोवृद्धा मम प्रियाः ।
तेषा वच पालयितुमवतारा कृता मयाः ।२४।
महाभाग्य ब्राह्मणाना सर्वपापप्रणाशनम् ।
कलिदोषहर श्रुत्वा मुच्यते सर्वतो भयात् ।२५।
ब्राह्मणों के हाथों में स्वर्ग और भगवान् विष्णु निवास करते
हैं वाणी में वेद देह में तीर्थ और राग तथा नाडी में त्रिगुणात्मिका प्रकृति
है। २१। ब्राह्मणों के कण्ठ में सावित्री, हृदय में ब्रह्म वक्षस्थल के
मध्य में धर्म एवं पृष्ठ देश में अधर्म का निवास रहता है। २२। हे
राजन् ! चारों आश्रमों के धर्म को जानने वाले, मेरे धर्म के प्रवर्त्तक—