कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ अध्याय ] [ २६६
क्या प्रयोजन सिद्ध होता है, अर्थात् दैव की प्रतिकूलता हो तो यह सभी
निष्फल हैं ।२६। हे कीर ! यदि तुम्हे हमारा वृत्तान्तज्ञात न हो तो सुनो—
मैने अपनी बाल और किशोर अवस्था मे भगवान शकर की आराधना
की थी ।३०।
तेन पूजाविधानेन तुष्टो भूत्वा महेश्वर ।
वर वरय पद्मे ! त्वमित्याह प्रियया सह ।।३१।।
लज्जयेधोमुखीमग्रे स्थिता मा वीक्ष्य शङ्कर. ।
प्राह ते भविता स्वामी हरिनारायण प्रभु ।।३२।।
देवो वा दानवो वान्यौ गन्धर्वो वा तवेक्षणात् ।
कामेन मनसा नारी भविष्यन्ति न सशय ।।३३।।
इति दत्वा वर सोम प्राह विष्ण्वर्च्चनं यथा ।
तथाह ते प्रवक्ष्यामि समाहितमना शृणु ।३४।
एता. सख्यो नृपा पूर्वमाहता ये स्वयम्बरे ।
पित्रा धर्मार्थिना दृष्ट्वा रम्या मा यौवनान्विताम् ।३५।
मेरे द्वारा किये गये उम पूजन से प्रसन्न हुए शिवजी ने पार्वतीजी
के सहित प्रकट होकर मुझवे कहा कि हे पद्मे ! वर माँगो ।३१। फिर
मुझे लज्जा पूर्वक सिर झुकाये देख कर उन्होने कहा कि तुम्हारे पति
भगवान् नारायण होगे ।३२। देवता, दानव, गन्धर्व अथवा जो कोई भी
हो, यदि तुम्हे काम-भाव से देखेगा तो तुरन्त स्त्री-रूप हो जायगा, इममे
सन्देह नही है ।३३। यह वर देने के पश्चात् शिवजी ने भगवान् विष्णु
की जो पूजन विधि बताई थी, वह कहती हूँ, समाहित चित्त से सुनो।३४।
यह जितनी भी सखियाँ हैं, सभी पहिले राजा थे । मेरे पिता ने मेरी
यौवनावस्था देख कर धर्म की रक्षा के निमित्त इन सब राजाओ को मेरे
स्वयम्बर मे बुलाया था ।३५।
स्वागतास्ते सुखासीना विवाहकृतनिश्चय ।
युवानो गुणवन्तश्चरूपद्रविणसम्मता• ।३६।