कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
त्रयोदश-अध्याय-३ ] [ ४५७
इति तस्य वर लब्ध्वा चिरायु सुस्यत्रानराः ।
बलरामास्त्रभिन्नात्मा मोक्षमापाकुतोभयम् ॥१६॥
तथा क्षेत्रे सूतपुत्रो निहतो लोमहर्षण ।
बलरामास्त्रयुक्तात्मा नैमिषेऽभूत्स्ववाञ्छया ॥२०।
तब लक्ष्मणजी ने उसे आश्वासन दिया कि अगले जन्म मे जब मैं
बलदेवावतार लूँगा, तब तुम मेरे हाथ से मृत्यु को प्राप्त होकर वानर
भाव से मुक्त हो जाओगे ॥१६॥ “समुद्र स्योत्तरे तीरे द्विविदो नाम
वानरः” यही वह मन्त्र है, जिसे लिखा हुआ देखने पर ऐकाहिक ज्वर
नष्ट होजाता है ॥१७। इस मन्त्र को द्वार पर अथवा ताल । पत्र पर लिख
कर देखना चाहिये तब ऐकाहिक ज्वर का नाश होना सम्भव है ॥१८।
लक्ष्मणजी से इस प्रकार वर को प्राप्त हुआ वह द्विविद नामक वानर
स्वस्थ शरीर से बहुत काल जीवित रहा और बलदेवजी का अवतार
होने पर उनके अस्त्र से मृत्यु को प्राप्त होकर अभयात्मिका मुक्ति को
प्राप्त हो गया ॥१६। इसी प्रकार अपनी इच्छा से सूत पुत्र लोमहर्षण
भी नैमिषारण्य मे बलदेव जी के अस्त्र से ही मारे गये ॥२०।
जाम्बंवाश्च पुरा भूपा वामनत्व गते हरौ :
तस्याप्यूर्ध्वगतं पाद तत्र चक्रे प्रदक्षिणम् ॥२१।
मनोजवं त निरीक्ष्य वामनः प्राह विस्मित ।
मत्तो वृणु वर काममृक्षाधीश महाबल ॥२२।
इति त हृष्टवदनो ब्रह्माङ्गो जाम्बवान्मुदा ।
प्राह भो चक्रदहनान्मम मृत्युर्भविष्यति ॥२३।
इत्युक्ते वामन प्राहकृष्णजन्मनि मे तव ।
मोक्षश्चक्रेण संभिन्नशिरसः सम्भविष्यति ॥२४।
मम कृष्णावतारे तु सूर्यभक्तस्य भूपतेः ।
सत्राजितस्तु मण्यर्थे दुर्वाद समजायत ॥२५।
हे राज्ञाग्रो ! वामनावतार मे वामनजी ने जब तीन पग में ही
तीनो लोकों को नाप लिया, तब उनके ऊर्ध्वलोक मे रखे हुए चरण की
४५८ ] कल्कि पुराण
जाम्बवत ने प्रदक्षिणा की थी ।२१। उस समय उस जाम्बवान् को मन के
समान द्रुत वेग वाला देख कर वामनजी अत्यन्त आश्चर्य चकित होकर
बोले—हे ऋक्षाधीश ! तुम महाबली हो, मुझसे इच्छित वर मांगो
।२२। यह सुन कर हर्षित मन हुए ब्रह्मांश रूप जाम्बवान् ने कहा कि
हे प्रभो ! मेरी मृत्यु आपके चक्र से हो, यही वर प्रदान कीजिये ।२३।
जाम्बवान् के वचन सुन कर वामनजी ने कहा—कृष्णावतार मे मेरे चक्र
से तुम्हारा शिर कटेगा और तुम मोक्ष को प्राप्त हो जाओगे ।२४।
तदनन्तर कृष्णावतार हुआ । उस समय मैं सूर्य का भक्त सत्राजित् नामक
एक राजा हुआ था। तब एक मणि के कारण दुर्वाद उत्पन्न हो
गया ।२५।
प्रसेनस्य मम भ्रातुर्वधस्तु मणिहेतुकः ।
सिंहात्तस्यापि मण्यर्थे वधो जाम्बवता कृतः ।२६।
दुर्वादभयभीतस्य कृष्णस्यामिततेजस ।
मण्यन्वेषणचित्तस्य ऋक्षेणाभूद्रणो बिले ।२७।
स निजेशं परिज्ञाय बच्चाक्रग्रस्तबन्धनम् ।
मुक्तो बभूव सहसा कृष्ण पश्यन्सलक्ष्मणम् ।२७।
नवदूर्वादलश्याम दृष्ट्वा प्रादान्निजात्मजाम् ।
तदा जाम्बवती कन्या प्रगृह्य मणिना सह ।२६।
द्वारका पुरमागत्य सभाया मामुपाह्वयत् ।
आहूय मह्यं प्रददौ मणि मुनिगणार्च्चितम् ।३०।
प्रसेन नामक मेरा अनुज था । उसे एक सिंह ने मणि के लिए
मार डाला । फिर वह सिंह भी उसी मणि के कारण जाम्बवान् के
द्वारा वध को प्राप्त हुआ ।२६। उधर कलंक के भय से अमित तेज वाले
भगवान् श्रीकृष्ण उस मणि की खोज करने लगे, तभी एक गिरि-गुहा
में जाम्बवान् के साथ उनका घोर युद्ध हुआ ।२७। तभी जाम्बवान्
अपने स्वामी को पहचान गया । भगवान् के चक्र से उसका शिर कट
चतुर्दश-अध्याय-३ ] [ ४५६
गया। लक्ष्मण सहित भगवान् का दर्शन करते हुए जाम्बवान् की मोक्ष
की प्राप्ति हुई ।२८। तब उस ऋक्षराज ने अपने प्रभु की श्यामल मूर्ति
का दर्शन करते हुए उन्हे अपनी पुत्री जाम्बवती के सहित वह मणि
भेट कर दी ।२६। फिर श्रीकृष्ण ने द्वारका की राज सभा मे आकर
मुझे वहाँ बुलाया और महर्षियो के द्वारा पूजित वह मणि उ होंने मुझे
दे दी ।३०।
सोऽह ता लज्जया तेन मशिना कन्यकां स्वकाम् ।
विवाहेन ददावस्मै लावण्याज्जगृहे मणिम् ।३१।
ता सत्यभामामादाय मणि मय्यर्प्य स प्रभुः ।
द्व रकामागत्य पुनर्गजाह्वयमगाद्विभुः ।३२।
गते कृष्णे मा निहत्य शतधन्वाग्रहीन्मणिम् ।
अतोऽहमिह जानामि पूर्वजन्मनि यत्कृतम् ।३३।
मिथ्याभिशापात्कृष्णस्य नैवाभून्मोचन मम ।
अतोऽह कल्किरूपाय कृष्णाय परमात्मने ।
दत्त्वा रमा सत्यभाभारूपिणी यामि सद्गतिम् ।३४।
यह देख कर मैं अत्यन्त लज्जित हुआ और मैंने अपनी सत्यभामा
नाम की कन्या के सहित वह मणि श्रीकृष्ण को ही दे दी। उन दोनो
के लावण्य से आकर्षित होकर उन्होने उन्हे ग्रहण कर लिया ।३१।
तदनन्तर श्रीकृष्ण ने मणि मेरे पास रख दी और स्वय सत्यभामा को
साथ लेकर द्वारका से हस्तिनापुर को चले गये ।३२। श्रीकृष्ण के चले
जाने पर शतधन्वा नामक एक राजा ने मणि के निमित्त मेरा वध कर
दिया और मणि को ले लिया । इस प्रकार इन कल्किजी ने अपने
पूर्वावतार में जो किया, उस सब को मैं भले प्रकार जानता हूँ ।३३।
श्रीकृष्ण को मैंने झूठा कलंक लगाया था, इसी पाप से उस जन्म में मैं
मोक्ष को प्राप्त नही हो सका । यही कारण हैं कि इस जन्म में अपनी
रमा रूपिणी सत्यभामा को कल्कि रूप कृष्ण को देकर मैं सद्गति को
प्राप्त करूँगा ।३४।
४६० ] [ कल्कि-पुराण
सुदर्शनास्त्रघातेन मरण मम काङ्क्षितम् ।
मरणोऽभूदिति ज्ञात्वा रणे वाञ्छामि मोचनम् ।३५।
इत्यसौ जगतामीशः कल्कि श्वशुरघातनम् ।
श्रुत्वैवाधोमुखस्तस्थौ ह्रिया धर्मभिया प्रभु ।३६।
अत्याश्चर्यमपूर्वमुत्तममिद श्रुत्वा नृपा विस्मिता
लोका संसदि हर्षिता मुनिगणा कल्केर्गुणाकर्षिताः ।
आख्यान परमादरेण सुखद धन्य यशस्य पर
श्रीमद्भूपशशिध्वजेरितवजो मोक्षप्रद चाभवन् ।३७।
यह जान कर कि युद्धस्थल मे मरने से मोक्ष की प्राप्ति संभव
है, मैंने यह अभिलाषा की थी कि कल्किजी के सुदर्शन चक्र-प्रहार से
मेरा मरण हो जायगा ।३५। जगदीश्वर भगवान् कल्कि ने अपने श्वसुर
का इस प्रकार मारा जाना स्मरण करके ही धर्मभय और लज्ज से अपना
मुख झुका लिया था ।३५। इस अत्यन्त विस्मय युक्त, अपूर्व और श्रेष्ठ
उपाख्यान को सुन कर राजागण विस्मित हो उठे तथा सभी सभासद्
आनन्द विभोर हुए । कल्किजी के गुणो के प्रति मुनिगण भी आकर्षित
हो रहे थे । राजा शशिध्वज के कहे हुए इस उपाख्यान के सुनने वाला
प्राणी सुखी, धन्य और यशस्वी होकर अन्त मे मोक्ष को प्राप्त करता है,
उसका कभी पुनर्जन्म नही होता ।३७।
तृतीयांश—
चतुर्दश अध्याय
ततः कल्किर्महातेजाः श्वशुरं तं शशीध्वजम् ।
समामन्त्र्य वचश्चित्रैः सह भूपैर्ययौ हरिः ।१।
शशीध्वजो वरं लब्ध्वा यथाकामं महेश्वरीम् ।
स्तुत्वा मायां त्यक्तमायः सप्रियः प्रययौ वनम् ।२।
कल्किः सेनागणैः सार्द्धं प्रययौ काञ्चनीं पुरीम् ।
गिरिदुर्गावृता गुप्तां भोगिभिविषवर्षिभिः ।३।
विदार्य दुर्गं सगणः कल्किः परपुरञ्जयः ।
छित्त्वा विषायुधान्बाणांस्तां पुरीं ददृशोऽच्युतः।४।
मणिकाञ्चनचित्राढ्यां नागकन्यागणावृताम् ।
हरिचन्दनवृक्षाढ्यां मनुजैः परिवर्जिताम् ।५।
सूतजी बोले—फिर अत्यन्त तेज वाले कल्किजी ने अपने अद्भुत
वचनों के द्वारा अपने श्वसुर राजा शशीध्वज को सन्तुष्ट किया और
राजाओं के सहित उठ कर चले गये ।१। राजा शशीध्वज भी इच्छा-
नुसार वर प्राप्त करके, महेश्वरी माया का स्तव करते हुए अपनी पत्नी
सहित विषय-बन्धन से मुक्त होकर वन को गये ।२। इधर कल्किजी ने
पर्वत रूपी दुर्ग से आवृत्त काञ्चनीपुरी को प्रस्थान किया इस पुरी की
रक्षा विष-वर्षक सर्प करते हैं ।३। शत्रुओं के पुर के विजेता कल्किजी
अपनी सेना सहित आगे बढ़े और उस कठिन दुर्ग को तोड कर तथा
विष-वर्षक सर्पों को मार कर पुरी में प्रविष्ट हुए ।४। वहाँ उन्होंने देखा
कि वह नगरी सर्वत्र मणियों और स्वर्ण से युक्त है तथा सब ओर नाग
४६१,
४६२ ] [ कल्किक पुराण
कन्याएँ छाई हुई हैं। वह पुरी स्थान स्थान पर कल्पवृक्षो से सुशोभित हो
रही है। वहाँ मनुष्य तो नाम को भी नही हैं। ५।
विलोक्य कल्कि. प्रहसन्नाह भूपान्तिकमित्यहो ।
सर्पस्येयं पुरी रम्या नराया भयदायिनी ।
नागनारीगणार्कीर्णा कि यास्यमो वदन्त्विह ।६।
इतिकर्त्तव्यताव्यग्रं रमानाथ हरिं प्रभुम् ।
भूपास्तदनुरूपाश्च खे वागाहाशरीरिणि ।७।
विलोक्य नेमां सेनाभि प्रवेष्टु भोस्त्वमर्हसि ।
त्वां विनान्ये मरिष्यन्ति विषकन्यादृशादपि ।८।
आकाशवाणीमाकर्ण्य कल्कि. शुकसहायकृत् ।
ययावेकः खड्गधरस्तुरगेण त्वरान्वित. ।६।
गत्वा ता ददृशे वीरो धीरा धैर्यनाशिनीम् ।
रूपेणालक्ष्य लक्ष्मीशं प्राह प्रहसितानना ।१०।
यह देख कर हँसते हुए कल्किजी ने राजाओ से कहा—हे राजन्
यह सर्पपुरी कैसी आश्चर्यमयी एवं मनुष्यो के लिए अत्यन्त भयावनी
है। इसमे नागकन्यो का ही निवास है। अब कहिए कि इसमे प्रवेश करें
अथवा नही ? ।६। रमानाथ कल्किजी और सब राजागण भी यह निश्चय
नही कर पाये कि क्या करना चाहिये, इसलिए अत्यन्त चिंतित हुये ।
तब आकाशवाणी सुनाई दी ।७। इस पुरी मे सेना-सहित प्रविष्ट नही
होना चाहिए। क्योकि जैसे ही पुरी निवासिनी विष-कन्याओ की दृष्टि
पड़ेगी, वैसे ही नष्ट हो जाओगे ।८। आकाशवाणी का निर्देश सुन कर
कल्किजी एकाकी ही खड्ग लेकर घोड़े पर चढ़े और शुक को साथ
लेकर चल दिये ।६। कुछ आगे जाने पर उन्हें एक अपूर्व कन्या दिखाई
दी, जिसे देखते ही ज्ञानी जन भी धैर्य छोड देते हैं । वह कन्या अपूर्व
रूप वाले कल्किजी को देख कर हँसती हुई बोली ।१०।
चतुर्दश अध्याय-३ ] [ ४६३
ससारेऽस्मिन् नयनोर्वीक्षणक्षीणदेहा
लोका भूपाः कति कति गता मृत्युमत्युग्रवीर्याः ।
साहं दीनासुरसुरन प्रेक्षण प्रेमहीना
ते नेत्राब्जद्वयरससुधाप्लाविता त्वां नमामि । ११।
क्वाहं विषेक्षणादीना क्वामृतेक्षणसङ्गमः ।
भवेऽस्मिन्भाग्यहीनायाः केनाहो तपसा कृतः । १२।
कासि कन्यासि सुश्रोणि कस्मादेषा गतिस्तव ।
ब्रूहि मां कर्मणा केन विषनेत्र तवाभवत् । १३।
चित्रग्रीवस्य भार्याहं गन्धर्वस्य महामते ।
सुलोचनेति विख्याता पत्युरत्यन्तकामदा ।१४।
एकदाहं विमानेन पत्या पीठे न सङ्गता ।
गन्धमादनकुञ्जेषु रेमे कामकलाकुला ।१५।
विषकन्या ने कहा — इस संसार मे अत्यन्त पराक्रमी अनेक
राजागण तथा अन्यान्य मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं। इस लिए
मैं अत्यन्त दुःखित हूँ । देवता, दैत्य और मनुष्य किसी के साथ भी
मेरा परिणय संभव नहीं है। मैं आपके अमृत के समान दृष्टि प्रवाह मे
बहती हुई आपको नमस्कार कर रही हूँ ।११। मैं मन्द भाग्य वाली और
विष-दृष्टि से युक्त हूँ और आपकी दृष्टि अमृतमयो है । मैं किस तपस्या
के प्रभाव से आपका दर्शन प्राप्त कर सकी हूँ ।१२। कल्किजी ने कहा —
हे सुश्रोणि ! तुम कौन एव किका कन्या हो ? तुम इस अवस्था को
किस प्रकार प्राप्त हुई हो ? किस कर्म-दोष से तुम्हे यह विष दृष्टि
मिली है । १३। विषकन्या ने कहा— हे महामते ! चित्रग्रीव नामक जो
गन्धर्व हैं मैं उनकी पत्नी सुलोचना हूँ । मेरे द्वारा मेरे पति का मन
अत्यन्त अनन्दित रहता था ।१४। एक समय की बात है — जब मैं
अपने पति के साथ विमाना रूढ़ होकर गन्धमादन पर्वत के एक कुञ्ज मे
शिला पर बैठ कर विहार-रत्त हो गई । १५।
तत्र यक्षमूनिं दृष्ट्वा विकृताकारमातुरम् । १६।
रूपयौवनगर्नेण कटाक्षेणाहसं मदात् । १६।
४६४ ] [ कल्कि पुराण
सोपालम्भ मुनिः श्रुत्वा वचन च ममाप्रियम् ।
शशाप मा क्रुधा तत्र तेनाह विषदर्शना ।१७।
निक्षिप्ताह सर्पपुरे काञ्चन्या नागिनोगणे ।
पतिहोना दैवहीना चरामि विषवर्षिणी ।१८।
न जाने केन तपसा भवद्दृष्टिपथ गता ।
त्यक्तशापामृताक्षाह पतलोक व्रजाम्यत ।१६।
अहो तेषामस्तु शाप प्रसादो मा सतामिह ।
पत्यु. शापहृषेर्मोक्षात्तव पादाब्जदशनम् ।२०।
उस समय मैं अपने रूप यौवन के गर्व से अत्यन्त मदोन्मत्त हो
रही थी । वहाँ विकट शरीर वाले यक्षमुनि को देख कर मैं उन पर
कटाक्ष करती हुई, उनकी हँसी उडाने लगी ।१६। मेरे मुख से अपने
प्रति अपमानजनक वचन सुन कर मुनि क्रोधित हो उठे और उन्होने
मुझे जो शाप दिया, उससे मैं तुरन्त विषदृष्टि को प्राप्त हो गई ।१७। तब
मुझे इस कांचनीपुरी मे नागिनियो के मध्य डाल दिया गया । तभी से
मेरी दृष्टि विष की वर्षा किया करती है । इस प्रकार मै अभागी पति से
हीन होकर यहां एकाकी विचरती हूँ ।१८। मुझे ज्ञात नही कि अपनी
किस तपस्या के फल से मैं आपकी दृष्टि के सामने आ गई हूँ। आपके
दर्शन से मैं शाप-मुक्त होकर अमृतवर्षिणी दृष्टि से सम्पन्न हो गई हूँ ।
अब मैं अपने पति के पास गमन करती हूँ ।१६। अहा ! साधुओ के
प्रसन्न होने की अपेक्षा त शाप देना भी श्रेष्ठ है क्योकि शाप के कारण
ही तो मोक्ष स्वरूप आपके चरणाम्बुज का दर्शन प्राप्त हो सका है ।२०।
' इत्युक्त्वा सा ययौ स्वर्गं विमानेनार्कवर्चसा ।
कल्कितु तत्पुराधीश नृप चक्रे महामतिम् ।२१।
अमर्षस्तत्सुतो धीमान् सहस्रो नाम तत्सुतः ।
सहस्रत सुतश्चसीद्राजा विश्रुतवानसि ।२२।
बृहद्भानानां भूतानां संभूता यस्य वंशजा ।
चतुर्दश अध्याय-३ ] [ ४६५
तं मनुं भूपशार्दूलं नानामुनिगणैर्वृतम् । २३।
अयोध्याया चाभिषिच्य मथुरामगमद्धरिः ।
तस्यां भूपं सूर्यकेतुमभिषिच्य महाप्रभम् । २४।
यह कह कर वह विषकन्या सूर्य जैसे तेजस्वी विमान पर चढ
कर स्वर्ग को गई । कल्किजी ने महामति नामक एक राजा को उस
पुरी के राज्य पर अभिषिक्त किया । २१। उस राजा महामति का पुत्र
अमर्ष हुआ । अमर्ष का पुत्र धीमान् सहस्र और सहस्र का पुत्र अत्यन्त
प्रसिद्ध राजा असि हुआ ।।२२। उसी राजा के वंश मे बृहन्बल राजाओ
की उत्पत्ति हुई । नृपशार्दूल मनु को अयोध्या का राज्य देकर अनेक
मुनियो के सहित कल्किजी मथुरा पहुंचे और उन्होने अत्यन्त प्रभा
से सम्पन्न सूर्यकेतु को मथुरा के राज्य पर विधिवत् अभिषिक्त किया
।२३-२४।
भूप चक्रे ततो गत्वा देवापिं वारणावते ।
अरिस्थल वृकस्थल माकन्दञ्च गजाह्वयम् ।२५।
पञ्चदेशेश्वरं कृत्वा हरिः शम्बलमाययौ ।
शौम्भ पौड्र पुलिन्दञ्च सुराष्ट्रं मगधन्तथा ।
कविप्राज्ञसुमन्तेभ्यः प्रददौ भ्रातृवत्सलः ।२६।
कीकट मध्यकर्णाटध्रमोड्र कलिङ्गकम् ।
अङ्ग वङ्ग स्वगोत्रेभ्यः प्रददौ जगदीशवरः ।२७।
स्वयं शम्बलमध्यस्थ कङ्केन कलापकान् ।
देशं विशाखयूपाय प्रादात्कल्कः प्रतापवान् ।२८।
चोलबर्बरकर्वाख्यान्दारकाद्देशमध्यगान् ।
पुत्रेभ्यः प्रददौ कल्किः कृतवर्म्मपुरस्कृतान् ।२६।
याधा करते हुए कल्किजी ने देवापि को राज्य देकर र_
अरिस्थल, वृकस्थल, माकन्द, हस्तिनापुर और वारणावत-इन पाँच
देशो का अधिपति बनाया और फिर शम्बल ग्राम के लिए चल पडे ।
४६६ ] [ कल्कि पुराण
फिर भ्रातृवत्सल कल्किजी ने कवि, प्राज्ञ और सुमन्त्र को शोम्भ,
पौण्ड्र, पुलिन्द और मगध देश का राज्य दिया । २५-२६। फिर जगदीश्वर
कल्किजी ने अपने गोत्र बान्धवो को वीकट, मध्यकर्नाटक, आन्ध्र, उड्र
कलिंग, अङ्ग और बगादि देश प्रदान किये ।२७। फिर स्वयं शम्भल में
रह कर विशाखयूप-नरेश को ककक और कपाल प्रदेशो का राजा
बनाया ।२८। तदनन्तर उन्होने कृतवर्म्म आदि पुत्रो को द्वारका देश के
मध्य मे स्थित चोल, बर्बर तथा कर्व आदि प्रदेशो का राज्य प्रदान किया
।२६।
पित्रे धनानि रत्नानि ददौ परमभक्तितः ।
प्रजाः समाश्वास्य हरिः शम्भलग्रामवासिन. ।३०।
पद्मया रमया कल्किर्गृहस्थो मुमुदे भृशम् ।
धर्मश्चतुष्पादभवत्कृतपूर्णां जगत्त्रयम् ।३१।
देवा यथोक्तफलदाश्चरन्ति भुवि सर्वतः ।
सर्वशस्या वसुमती हृष्टपुष्टजनावृता ।
शाठ्याचौर्यान्तृतेर्हीना आधिव्याधिविवर्जिता ।३२।
विप्रा वेदविदः सुमङ्गलयुता नार्यस्तु चार्याव्रतैः ।
पूजाहोमपरा. पतिव्रतधरा यागोद्यता क्षत्रियाः ।
वैश्या वस्तुषु धर्मतो विनिमयैः श्रीविष्णुपूजापरा ।
शूद्रास्तु द्विजसेवनाद्धरिकथालापाः सपर्यापरा. ।३३।
फिर भगवान् कल्किजी अपने पिताको अत्यन्त भक्तिपूर्वक धन-रत्न
आदि भेंट करके और शम्भल ग्राम के निवासियो को सन्तुष्ट करके रमा
और पद्मा के साथ गृहस्थाश्रम के सुख भोगने लगे । तब तक धर्म के
चारो चरणो सम्पन्न हुए तीनो लोको में सत्युग का आविर्भाव हो गया
।३०-३१। भक्तो को इच्छित फल प्रदान करते हुए देवगण सम्पूर्ण
पृथिवी पर विचरण करने लगे । धरा के सब धान्यो से परिपूर्ण होने
के कारण सभी प्राणी हृष्ट-पुष्ट हो गए । शाठ्य, चौर्य अनृत, आधि,
चतुर्दश अध्याय-३ ] [ ४६७
व्याधि आदि सभी दुख भूमण्डल से अदृश्य हो गये ।३२। ब्राह्मण
वेदपाठी हुए, स्त्रियाँ पतिव्रत धर्म के पालन पूर्वक धर्मानुष्ठान मे लगी ।
सर्वत्र पूजन और होम होने लगे । क्षत्रिय भी यज्ञादि शुभ कर्मों मे उद्यत
हुए । विष्णु-पूजन मे रत रहते हुए वैश्य गण भी वस्तु विनिमय का
धर्म पूर्वक व्यापार करने लगे । शूद्रगण द्विज सेवा-परायण हुए । सभी
प्राणी भगवान् का गुण कीर्तन, श्रवण और उपासना मे तत्पर रहते
हुए जीवनचर्या चलाने लगे ।३३।
तृतीयांश—
पंचदश अध्याय
शशिध्वजो महाराज स्तुतत्वा माया गत कुत ।
का वा मायास्तुतिः सूत वद तत्वविदा वर ।
या त्वत्कथा विष्णुकथ वक्तव्या सा विशुद्धये ।१।
शृणुध्व मुनय सर्व मार्कण्डेयाय पृच्छते ।
शुक प्राह विशुद्धात्मा मायास्तवमनुत्तमम् ।२।
तच्छृणुष्व प्रवक्ष्यामि यथाधीत यथाश्रुतम् ।
सर्वकामप्रद नृणा पापतापविनाशनम् ।६।
भल्लाटनगर त्यक्त्वा विष्णुभक्तः शशिध्वजः ।
आत्मससारमोक्षाय मायास्तवमल जगौ ।४।
ओ ह्रीकारा सत्वसारा विशुद्धा ब्रह्मादीना मातर वेदबोध्याम्
तन्वी स्वाहा भूततन्मात्रकक्षां वन्देवन्या देवगन्धर्वसिद्धै. ।५।
शौनक जी बोले- हे सूतजी ! भगवती माया की स्तुति करके
महाराज शशिध्वज कहाँ गये ? हे तत्त्वज्ञानियो मे श्रेष्ठ ! माया की
स्तुति के विषय मे बताइये । माया और विष्णु की कथा मे कोई भेद
नही होने से पुनीत होने के उद्देश्य से उस स्तव को हमारे प्रति कहिये
।१। सूत जी न कहा- हे ऋषियो ! मर्कण्डेयजी, के पूछने पर शुकदेव
जी ने जो श्रेष्ठ माया-स्तोत्र कहा था, वही तुम्हारे प्रति कहता हूँ,
सुनिये ।२। जिस माया-स्तव को मैंने सुना और पढा है, जो सुनने से
सब की कामनाएं पूर्ण करने वाला और पाप-ताप का नाशक है, उस
४६८
पञ्चदश अध्याय-३ ] [ ४६६
माया स्तव को सुनो । ३। शुकदेव जी बोले - विष्णु भक्त महाराज शशि-
ध्वज ने जब अपने भल्लाटनगर को छोड़ कर संसार से विमुख होने के
उद्देश्य से माया-स्तव किया ।४। शशिध्वज बोले- हे, ह्रींकार मयी,
सत्यसार रूपिणी, विशुद्धा मायादेवी ! आप ब्रह्मादि देवताओ की
जननी हैं। वेद भी आपकी महिमा का वखान करते हैं। समस्त भूतगण
और तन्मात्राएं आपकी कोख मे स्थित रहते है । आप देव, गंधर्व और
सिद्धगणो से वन्दित, सूक्ष्म स्वरूप तथा स्वाहा रूपिणी हैं, मैं आपकी
वन्दना करता हूँ ।५।
लोकातीतां द्वैतभूतां समीडे भूतैर्भंव्या व्याससामासिकाद्यैः
विद्वद्गीता कालकल्लोललोला लीलापाङ्गक्षिप्तसंसारदुर्गाम् ।३।
पूर्णा प्राप्या द्वैतलभ्या शरण्यामाद्ये शेषे मध्यतो या विभाति
नानारूपैर्देवतिर्यङ्मनुष्यैस्तामाधारा ब्रह्मरूपा नमामि ।७।
यस्या भासा त्रिजगद्भाति भूतैर्न भात्येतत्तदभावे विधातुः ।
कालोदेवकर्म चोपाधयो ये तस्या भाषा ताँ विशिष्टां नमामि
भूमौ गन्धो रसताप्सु प्रतिष्ठा रूप तेजस्येव वायौ स्पृशत्वम् ।
खे शब्दो वा यच्चिदाभास्ति नाना
मताभ्येताविश्वरूपा नमामि ।६।
सावित्री त्व ब्रह्मरूपा भवानी भूतेशस्य श्रीपतेः श्रीस्वरूपा ।
शचीशक्रस्यापि नाकेश्वरस्य पत्नी श्रेष्ठा भासि माये जगत्सु
माप लोको से परे, द्वैतभूता, भव्या तथा व्यासादि ऋषियों
के द्वारा वन्दिता हैं। भगवान् विष्णु भी आपका स्तोत्र करते हैं। आप
काल की लहरो में लहराती रहती हैं। सभी जीव आपकी विलास लीला
में पडते हैं । ऐसी आप संसार दुर्ग से तारने वाली को नमस्कार करता
हूँ ।६। सृष्टि के आदि, मध्य और लय काल मे आप ही स्थित रहती
हो । आप सब की आश्रयदाता को पूर्ण भाव या द्वैतभाव से ही पाया
जा सकता है। देवता, तिर्यक् और मनुष्यादि योनियो मे आप ही
वक्त होकर प्रकाशित है। आप संसार की आश्रयभूता एव ब्रह्म-
४७० ] [ कल्कि-पुराण
स्वरूपिणी को नमस्कार है ।७। आपकी महिमा से ही यह त्रिलोकी
पञ्चभूतात्मिका रूप से प्रकाशित है। काल, दैव, कर्म, उपाधि आदि
कोई भी विधाता द्वारा निश्चित भाव आपके प्रकाश के बिना प्रकाशित
नही हो सकता। ऐसी आप प्रभावती को मेरा नमस्कार है ।८। आप
ही पृथिवी में गन्ध, जल मे रस, तेज मे रूप, वायु में स्पर्श और आकाश
मे शब्द रूप से विविध रूपो मे प्रतिष्ठित रहती हैं। आप जगत् मे व्याप्त
विश्वरूपिणी को नमस्कार है ।६। आप ही ब्रह्मरूपा सावित्री है, भगवान्
विष्णु की लक्ष्मी, शंकर की भवानी तथा देवराज इन्द्र की शची हैं।
हे माये ! सम्पूर्ण विश्व मे आप इसी प्रकार व्याप्त हो रही हैं ।१०।
बाल्ये बाला युवती यौवने त्वन्नाधक्ये या स्थविरा कालरूपा
नानाकार्यैर्गगयोगैरूपास्या ज्ञानातीता कामरूपा विभासि ।११
वरेण्या त्व वरदा लोकसिद्धयासाध्वीधन्या लोकमान्या सुकन्या
चण्डी दुर्गा कालिका कालिकाख्या । नानदेशे
रूपवेशैर्विभासि ।१२।
तव चरणसरोज देवि ! देवादिवन्द्य यदि हृदयसरोजे ।
भावयन्तीह भक्त श्रुतियुगकुहरे वा सश्रुत
धर्म्मसम्पज्जनयति जगदाद्ये सर्वसिद्धञ्च तेषाम् ।१३।
मायास्तवमिद पुण्य शुकदेवेन भाषितम् ।
मार्कण्डेयादवाप्यापि सिद्ध लेभे शशिध्वज. ।१४।
कोकामुखे तपस्तप्त्वा हरिं ध्यात्वा वनान्तरे ।
सुदर्शनेन निहतो वैकुण्ठं शरण ययौ ।१५।
आप शैशवावस्था मे बाला, यौवनावस्था मे युवती और वृद्धा-
वस्था में वृद्धा रूप वाली रहती हैं। आप ही काल से कल्पित, ज्ञानातीता
और कामरूपा है। आप विभिन्न रूपो में प्रकाशित होने वाली ईश्वरी
का यज्ञ और योग के द्वारा पूजन किया जाता है। मैं आपकी वन्दना
करती हूँ ।११। हे वरेण्या ! आप ही उपासको को वरदात्री और सिद्धि
के देने वाली हैं। आप लोकों के द्वारा मान्या, साध्वी, एव सब प्रकार
से धन्या हैं। आप ही श्रेष्ठ कन्या, चण्डी, दुर्गा, कालिका आदि विभिन्न
पञ्चदश अध्याय-३ ] [ ४७१
रूपो से अनेक देशो मे प्रकाशित रहती हैं ।१२। हे ससार की आदि
रूपा देवि ! यदि कोई अपने हृदय मे देवताओ आदि से वन्दित आपके
चरणारविन्दो का भक्ति भाव पूर्वक ध्यान और आपका नाम-श्रवण
करता है, तो उसे धर्म रूपी ऐश्वर्य और सम्पूर्ण सिद्धियो की प्राप्ति
होती है ।१३। यह पवित्र माया-स्तव शुकदेव जी द्वारा कहा गया था ।
राजा शशिध्वज ने इसे मार्कण्डेयजी से प्राप्त करके सिद्धि-लाभ किया
।१४। वन मे स्थित कोकामुख नामक स्थान में तपस्या करते हुए राजा
शशिध्वज सुदर्शन चक्र से निहत होकर वैकुण्ठ को प्राप्त हुए ।१५।
तृतीयांश-
षोडश अध्याय
एतद्व कथित विप्राः शशिध्वजविमोक्षणम् ।
कल्केः कथामप्रतिमा शृण्वन्तु विबुधर्षभो ।१।
वेदो धर्मं कृतयुग देवलोकश्चराचर ।
हृष्ट पुष्टाः सुसतुष्टा कल्कौ राजनि चाभवन् ।२।
नानादेवादिलिङ्गेषु भूषणैर्भूषितेषु च ।
इन्द्रजालिकवद्वृत्तिकल्पकाः पूजका जना ।३।
न सन्ति मायामोहाढ्या पाखण्डाः साधुवञ्चकाः ।
तिलकाचितसर्वाङ्गाः कल्कौ राजनि कुत्रचित् ।४,
शम्भले वसत्तस्तस्य पद्माया रमया सह ।
प्राह विष्णुयशाः पुत्रं देवान्यष्टु जगद्धितान् ।५।
सूतजी बोले-हे ब्राह्मणो ! इस प्रकार राजा शशिध्वज को
मोक्ष प्राप्ति का प्रसग मैने आपको सुनाया। अब कल्किजी के विचित्र
आख्यान को पुनः कहता हूँ, इसे सुनिये ।१। जब भगवान् कल्किजी
राज्य सिंहासन पर प्रतिष्ठित हुए, तब वेद, धर्म, सत्युग, देवगण और
चराचर युक्त विश्व हृष्ट, एव सतुष्ट हो गया ।२। पूर्व युग मे पूजा करने
वाले मनुष्य देव मूर्तियों को विभिन्न प्रकार के वस्त्रालंकारो से अलंकृत
करके इन्द्रजाल के समान रहस्य-कल्पना किया करते थे ।३। अब वह
माया मोह से आवृत्त साधु वंचक पाखण्ड समाप्त हो गया । कल्किजी के
४७२
षोडश अध्याय ] [ ४७३
राज्य मे सभी मनुष्य सर्वाङ्ग मे तिलक लगाने लगे ।४। पद्म और रमा
के साथ जब कल्किजी शम्भल ग्राम में सुख पूर्वक निवास कर रहे थे,
तभी एक दिन उनके पिता विष्णुयशजी ने अपने पुत्र से देवताओ को
सन्तुष्ट करने वाले यज्ञ का अनुष्ठान करने को कहा ।५।
तच्छुत्वा प्राह पितरं कल्किः परमहर्षितः ।
विनयावनतो भूत्वा धर्मकामार्थसिद्धये ।६।
राजसूयैर्वाजपेयैरश्वमेधैर्महामखैः ।
नानायागै कर्मतन्त्रैरीजे क्रतुपति हरिम् ।७।
गङ्गायमुनोर्मध्ये स्नात्वावभृथमादरात् ।
कृपरामवसिष्ठाद्यैर्व्यास धौम्यकृतव्रणैः ।
अश्वत्थाममधुच्छन्दोमन्दपालैर्महात्मनः ।८।
दक्षिणाभिः समभ्यर्च्य ब्राह्मणान्वेदपारगान् ।६।
चव्यैश्चोष्यैश्च पेयैश्च पूगशष्कुलियावकैः ।
भोजयामास विधिवत्सर्वकर्मसमृद्धिभि ।१०।
पिता के वचन सुन कर हर्षित हुए कल्किजी ने विनय पूर्वक
कहा – धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि के प्रयोजन से मैं कर्म तन्त्र विहित
राजसूय, वाजपेय और अश्वमेधादि महायज्ञो के अनुष्ठान द्वारा भगवान्
विष्णु को प्रसन्न करूँगा ।६-७। फिर कल्किजी ने कृपाचार्य, परशुराम,
वसिष्ठ, व्यास, धौम्य, अकृतव्रण अश्वत्थामा, मधुच्छन्द तथा मन्दपाल
आदि महात्मा महर्षियो और वेदज्ञानियो को आमन्त्रित कर उनका पूजन
किया । तदनन्तर गङ्गा-यमुना के मध्य मे स्थित यज्ञ मे दीक्षित होकर
उन्होने स्नान किया और दक्षिणा दी ।८-६। फिर उन्होने अनेक प्रकार
के चर्व्य, चोष्य, पेय, पूप, शष्कुलि और यावक आदि भोज्य पदार्थों
के द्वारा उन ब्राह्मणो को श्रेष्ठ भोजन कराया ।१०।
यत्र वह्निर्वृतं पाके वरुणो जलदो मरुत् ।११।
परिवेष्टा द्विजान्कामैः सत्रार्थै रतोषयत् ।
तृतीय अंश: अध्याय ४-५ (भगवान् कल्कि वैकुण्ठ-लीला व उपसंहार)
४७४ ] [ कल्कि पुराण
वाद्यैर्नृत्यैश्च गीतैश्च पितृयज्ञमहोत्सवै १२।
कल्कि कमलपत्राक्ष प्रहर्षं प्रददौ वसु ।
स्त्रीबालस्थविरादिभ्यः सर्वेभ्यश्च यथोचितम् ।१३।
रम्भा तालधरा नन्दी हूहूगायति नृत्यति ।
दत्त्वा दानानि पात्रेभ्योब्राह्मणेय स ईश्वर. ।१४।
उवास तीरे गगाया पितृवाक्यानुमोदित ।
सभाया विष्णुयशसः पूर्वराजकथा प्रिया ।१५।
कथयन्तो हसन्तश्च हर्षयन्तो द्विजा बुधा ।
तत्रागतस्तुम्बुरुणानारद. सुरपूजित ।१६।
यज्ञ का भले प्रकार परिपाक हुआ । अग्नि ने पाक किया,
वरुण ने जल प्रदान किया और वायु परोसने लगा । पद्माक्ष कल्किजी
ने इस प्रकार श्रेष्ठ अन्नादि, नृत्य, वाद्य, गीतादि से उत्सव करते हुए
सब के आनन्द की वृद्धि की । बालक, स्त्री, वृद्ध आदि सब को धन से
यथोचित सत्कृत किया ।११-१३। रम्भादि नाचने लगी, नन्दी ताल देने
लगे, हुई गन्धर्व ने गीत गाया, उस समय ब्राह्मणो और सत्पात्रो को
धन प्रदान करने के पश्चात् कल्किजी अपने पिता की अनुमति से गङ्गा-
त पर रहने लगे । विष्णुयश की विद्वत्सभाव मे विद्वान् विप्रगण राजाओ
को सन्तोष देने वाली कथाएं कहने लगे । इस प्रकार जब सभी ज्ञानी-
जन एव द्विजजन आनन्द मे निमग्न थे, तभी राजा तुम्बरु ओर देवताओ
द्वारा पूजित नारदजी वहाँ आये ।१४-१६ ।
तं पूजयामास मुदी पित्रा सह यथाविधि ।
तौ सपूज्य विष्णुयशा प्रोवाच विनयान्वितः ।
नारद वैष्णवं प्रीत्या वीणापाणि महामुनिम् ।१७।
अहो भाग्यमहो भाग्य मम जन्मशताजितम् ।
भवद्विधाना पूर्णांनां यन्मे मोक्षाय दर्शनम् ।१८।
अद्याग्नयश्च सुहुतास्तृप्ताश्च पितर. परम् ।
षोडश अध्याय-३ ] [ ४७५
देवाश्च परिसन्तुष्टास्तवावेक्षणपूजनात् ।१९।
यत्पूजाया भवेत्पूज्यो विष्णुर्यन्मम दर्शनम् ।
पापसंघ स्पर्शनाच्च किमहो साधुसङ्गत ।२०।
साधूना हृदय धर्मो वाचो देवा सनातनाः ।
कर्मक्षयाणि कर्माणि यतः साधुर्हरि. स्वयम् ।२१।
उस अवसर पर प्रफुल्लित हृदय वाले विष्णुयश जी ने उन
दोनो का विधिवत् पूजन किया और फिर उन्होने वीणापाणि विष्णु
भक्त नारदजी से विनय पूर्वक कहा ।१७। विष्णुयश बोले—मेरा अहो-
भाग्य है । सौ जन्मो से संचित पुन्य के प्रभाव से ही आप परम पूर्ण
पुरुषो के दर्शन मेरे मोक्ष के उद्देश्य से ही प्राप्त हुए हैं ।१८। आपके
दर्शन और पूजन के होने से हमारे पितरो की भी तृप्ति हो गई तथा
अग्नि मे दी हुई आहुत के सफल होने से देवगण भी सन्तुष्ट हो गए हैं
।१९। जिनके पूजन मे भगवान् विष्णु का पूजन निहित है, उनके दर्शन
मात्र से ही पुनर्जन्म का नाश हो जाता है । उनके स्पर्श मात्र से पापो के
पुञ्ज भी समूल मिट जाते हैं । ऐसे साधुओ का सग भी अद्भुत ही है
।२०। साधुओ का हृदय धर्म, वाणी सनातनदेव और कर्म ही कर्म को
क्षीण करते हैं । इस प्रकार साधु ही साक्षात् हरि हैं ।२१।
मन्ये न भौतिको देहो वैष्णवस्य जगत्त्रये ।
यथावतारे कृष्णस्य सतो दुष्टयिविग्रहे ।२२।
पृच्छामि त्वामतो ब्रह्मन्मायांसंसारवारिधौ ।
नौकाया विष्णुभक्त्या च कर्णधारोऽसि पारकृत् ।२३।
केनाहं यातनागारान्निर्वाणपदमुत्तमम् ।
लप्स्यामीह जगद्बन्धो कर्मणा शर्म तद्वद ।२४।
अहो बलवती माया सर्वाश्चर्यमयी शुभा
पितर मातर विष्णुर्तैव मुञ्चति कर्हिचित् ।२५।
पूर्णो नारायणो यस्य सुत. कल्किर्जगत्पतिः
४७६ ] [ कल्कि पुराण
त विहाय विष्णुयशा मत्तो मुक्तिमभीप्सति ।२६।
दुष्टो को दण्ड देने वाला श्रीकृष्णावतार जिस प्रकार भौतिक
देह से युक्त नही है, वैसे ही तीनो लोको मे विष्णु भक्तो के शरीर भी
पञ्चभूत से युक्त प्रतीत नही होते ।२२। हे ब्रह्मन् ! इस माया मय ससार
सागर मे आप ही विष्णुभक्ति रूपिणी नौका के द्वारा पार कराने वाले
हैं । इसी लिये मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ ।२३। हे विश्ववन्द्यो !
आप मुझे यह बताने की कृपा करिये कि मै इस ससार रूपी यातनागार
से मुक्त होकर श्रेष्ठ निर्वाणपद को किस कर्म के द्वारा प्राप्त कर सकता
हूँ ? ।२४, नारदजी ने कहा—अहो ! यह माया कैसी आश्चर्यमयी,
उज्वला ओर बलवती है, जिसके प्रभाव से स्वय भगवान् भी अपने पिता
माता को मुक्त नही करा पाते ।२५। जिन विष्णुयशजी के पुत्र साक्षात्
भगवान् जगत्पति कल्कि हैं,वे मुझसे मोक्ष की कामना व्यक्त करतेहैं।२६।
विविच्येत्थ ब्रह्मसुतः प्राह ब्रह्मयशः सुतम् ।
विविक्ते विष्णुयशस ब्रह्मसम्पद्विवर्द्धनम् ।२७।
देहावसाने जीव सा दृष्ट्वा देहावम्बनम् ।
मायाऽह कर्तुं मिच्छन्त यन्मे तच्छृणु मोक्षदम् ।२८।
विन्ध्याद्रौ रमणी भूत्वा मायोवाच यथेच्छया ।२
अह मोया मया त्यक्त कथजोवतुमिच्छसि ।३०।
नाह जीवाम्यह माये कायेऽस्मिञ्जीवनाश्रये
अहमित्यन्यथाबुद्धिर्विना देह कथ भवेत् ।३१।
देहबन्धे यथाश्लेपास्तथ बुद्धि कथ तव ।
मायाधीनां विना चेष्टा ते कुतो वद ।३२।
ब्रह्मसुवन नारदजी ने यह सोच कर ब्रह्मज्ञान देने के विचार से
विष्णुयशजी से कहा ।२७। नारदजी बोले—जब देह के नष्ट होने पर
पुनः देह का आश्रय प्राप्त करने की जीव ने कामना की तब माया ने जो
कुछ कहा था, उसे सुनो ! इसके सुनने से ही मोक्ष मिल जाता है ।२८।
उन भगवती माया ने विन्ध्याचल पर स्वेच्छा से नारी रूप धारण करके