कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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पञ्चदश अध्याय-३ ] [ ४७१
रूपो से अनेक देशो मे प्रकाशित रहती हैं ।१२। हे ससार की आदि
रूपा देवि ! यदि कोई अपने हृदय मे देवताओ आदि से वन्दित आपके
चरणारविन्दो का भक्ति भाव पूर्वक ध्यान और आपका नाम-श्रवण
करता है, तो उसे धर्म रूपी ऐश्वर्य और सम्पूर्ण सिद्धियो की प्राप्ति
होती है ।१३। यह पवित्र माया-स्तव शुकदेव जी द्वारा कहा गया था ।
राजा शशिध्वज ने इसे मार्कण्डेयजी से प्राप्त करके सिद्धि-लाभ किया
।१४। वन मे स्थित कोकामुख नामक स्थान में तपस्या करते हुए राजा
शशिध्वज सुदर्शन चक्र से निहत होकर वैकुण्ठ को प्राप्त हुए ।१५।