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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 212

चतुर्दश अध्याय-३ ] [ ४६५
तं मनुं भूपशार्दूलं नानामुनिगणैर्वृतम् । २३।
अयोध्याया चाभिषिच्य मथुरामगमद्धरिः ।
तस्यां भूपं सूर्यकेतुमभिषिच्य महाप्रभम् । २४।
यह कह कर वह विषकन्या सूर्य जैसे तेजस्वी विमान पर चढ
कर स्वर्ग को गई । कल्किजी ने महामति नामक एक राजा को उस
पुरी के राज्य पर अभिषिक्त किया । २१। उस राजा महामति का पुत्र
अमर्ष हुआ । अमर्ष का पुत्र धीमान् सहस्र और सहस्र का पुत्र अत्यन्त
प्रसिद्ध राजा असि हुआ ।।२२। उसी राजा के वंश मे बृहन्बल राजाओ
की उत्पत्ति हुई । नृपशार्दूल मनु को अयोध्या का राज्य देकर अनेक
मुनियो के सहित कल्किजी मथुरा पहुंचे और उन्होने अत्यन्त प्रभा
से सम्पन्न सूर्यकेतु को मथुरा के राज्य पर विधिवत् अभिषिक्त किया
।२३-२४।
भूप चक्रे ततो गत्वा देवापिं वारणावते ।
अरिस्थल वृकस्थल माकन्दञ्च गजाह्वयम् ।२५।
पञ्चदेशेश्वरं कृत्वा हरिः शम्बलमाययौ ।
शौम्भ पौड्र पुलिन्दञ्च सुराष्ट्रं मगधन्तथा ।
कविप्राज्ञसुमन्तेभ्यः प्रददौ भ्रातृवत्सलः ।२६।
कीकट मध्यकर्णाटध्रमोड्र कलिङ्गकम् ।
अङ्ग वङ्ग स्वगोत्रेभ्यः प्रददौ जगदीशवरः ।२७।
स्वयं शम्बलमध्यस्थ कङ्केन कलापकान् ।
देशं विशाखयूपाय प्रादात्कल्कः प्रतापवान् ।२८।
चोलबर्बरकर्वाख्यान्दारकाद्देशमध्यगान् ।
पुत्रेभ्यः प्रददौ कल्किः कृतवर्म्मपुरस्कृतान् ।२६।
याधा करते हुए कल्किजी ने देवापि को राज्य देकर र_
अरिस्थल, वृकस्थल, माकन्द, हस्तिनापुर और वारणावत-इन पाँच
देशो का अधिपति बनाया और फिर शम्बल ग्राम के लिए चल पडे ।