कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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वाद्यैर्नृत्यैश्च गीतैश्च पितृयज्ञमहोत्सवै १२।
कल्कि कमलपत्राक्ष प्रहर्षं प्रददौ वसु ।
स्त्रीबालस्थविरादिभ्यः सर्वेभ्यश्च यथोचितम् ।१३।
रम्भा तालधरा नन्दी हूहूगायति नृत्यति ।
दत्त्वा दानानि पात्रेभ्योब्राह्मणेय स ईश्वर. ।१४।
उवास तीरे गगाया पितृवाक्यानुमोदित ।
सभाया विष्णुयशसः पूर्वराजकथा प्रिया ।१५।
कथयन्तो हसन्तश्च हर्षयन्तो द्विजा बुधा ।
तत्रागतस्तुम्बुरुणानारद. सुरपूजित ।१६।
यज्ञ का भले प्रकार परिपाक हुआ । अग्नि ने पाक किया,
वरुण ने जल प्रदान किया और वायु परोसने लगा । पद्माक्ष कल्किजी
ने इस प्रकार श्रेष्ठ अन्नादि, नृत्य, वाद्य, गीतादि से उत्सव करते हुए
सब के आनन्द की वृद्धि की । बालक, स्त्री, वृद्ध आदि सब को धन से
यथोचित सत्कृत किया ।११-१३। रम्भादि नाचने लगी, नन्दी ताल देने
लगे, हुई गन्धर्व ने गीत गाया, उस समय ब्राह्मणो और सत्पात्रो को
धन प्रदान करने के पश्चात् कल्किजी अपने पिता की अनुमति से गङ्गा-
त पर रहने लगे । विष्णुयश की विद्वत्सभाव मे विद्वान् विप्रगण राजाओ
को सन्तोष देने वाली कथाएं कहने लगे । इस प्रकार जब सभी ज्ञानी-
जन एव द्विजजन आनन्द मे निमग्न थे, तभी राजा तुम्बरु ओर देवताओ
द्वारा पूजित नारदजी वहाँ आये ।१४-१६ ।
तं पूजयामास मुदी पित्रा सह यथाविधि ।
तौ सपूज्य विष्णुयशा प्रोवाच विनयान्वितः ।
नारद वैष्णवं प्रीत्या वीणापाणि महामुनिम् ।१७।
अहो भाग्यमहो भाग्य मम जन्मशताजितम् ।
भवद्विधाना पूर्णांनां यन्मे मोक्षाय दर्शनम् ।१८।
अद्याग्नयश्च सुहुतास्तृप्ताश्च पितर. परम् ।