कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दश-अध्याय-३ ] [ ४५६
गया। लक्ष्मण सहित भगवान् का दर्शन करते हुए जाम्बवान् की मोक्ष
की प्राप्ति हुई ।२८। तब उस ऋक्षराज ने अपने प्रभु की श्यामल मूर्ति
का दर्शन करते हुए उन्हे अपनी पुत्री जाम्बवती के सहित वह मणि
भेट कर दी ।२६। फिर श्रीकृष्ण ने द्वारका की राज सभा मे आकर
मुझे वहाँ बुलाया और महर्षियो के द्वारा पूजित वह मणि उ होंने मुझे
दे दी ।३०।
सोऽह ता लज्जया तेन मशिना कन्यकां स्वकाम् ।
विवाहेन ददावस्मै लावण्याज्जगृहे मणिम् ।३१।
ता सत्यभामामादाय मणि मय्यर्प्य स प्रभुः ।
द्व रकामागत्य पुनर्गजाह्वयमगाद्विभुः ।३२।
गते कृष्णे मा निहत्य शतधन्वाग्रहीन्मणिम् ।
अतोऽहमिह जानामि पूर्वजन्मनि यत्कृतम् ।३३।
मिथ्याभिशापात्कृष्णस्य नैवाभून्मोचन मम ।
अतोऽह कल्किरूपाय कृष्णाय परमात्मने ।
दत्त्वा रमा सत्यभाभारूपिणी यामि सद्गतिम् ।३४।
यह देख कर मैं अत्यन्त लज्जित हुआ और मैंने अपनी सत्यभामा
नाम की कन्या के सहित वह मणि श्रीकृष्ण को ही दे दी। उन दोनो
के लावण्य से आकर्षित होकर उन्होने उन्हे ग्रहण कर लिया ।३१।
तदनन्तर श्रीकृष्ण ने मणि मेरे पास रख दी और स्वय सत्यभामा को
साथ लेकर द्वारका से हस्तिनापुर को चले गये ।३२। श्रीकृष्ण के चले
जाने पर शतधन्वा नामक एक राजा ने मणि के निमित्त मेरा वध कर
दिया और मणि को ले लिया । इस प्रकार इन कल्किजी ने अपने
पूर्वावतार में जो किया, उस सब को मैं भले प्रकार जानता हूँ ।३३।
श्रीकृष्ण को मैंने झूठा कलंक लगाया था, इसी पाप से उस जन्म में मैं
मोक्ष को प्राप्त नही हो सका । यही कारण हैं कि इस जन्म में अपनी
रमा रूपिणी सत्यभामा को कल्कि रूप कृष्ण को देकर मैं सद्गति को
प्राप्त करूँगा ।३४।