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सर्वकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

तृतीयांश—
पंचदश अध्याय
शशिध्वजो महाराज स्तुतत्वा माया गत कुत ।
का वा मायास्तुतिः सूत वद तत्वविदा वर ।
या त्वत्कथा विष्णुकथ वक्तव्या सा विशुद्धये ।१।
शृणुध्व मुनय सर्व मार्कण्डेयाय पृच्छते ।
शुक प्राह विशुद्धात्मा मायास्तवमनुत्तमम् ।२।
तच्छृणुष्व प्रवक्ष्यामि यथाधीत यथाश्रुतम् ।
सर्वकामप्रद नृणा पापतापविनाशनम् ।६।
भल्लाटनगर त्यक्त्वा विष्णुभक्तः शशिध्वजः ।
आत्मससारमोक्षाय मायास्तवमल जगौ ।४।
ओ ह्रीकारा सत्वसारा विशुद्धा ब्रह्मादीना मातर वेदबोध्याम्
तन्वी स्वाहा भूततन्मात्रकक्षां वन्देवन्या देवगन्धर्वसिद्धै. ।५।
शौनक जी बोले- हे सूतजी ! भगवती माया की स्तुति करके
महाराज शशिध्वज कहाँ गये ? हे तत्त्वज्ञानियो मे श्रेष्ठ ! माया की
स्तुति के विषय मे बताइये । माया और विष्णु की कथा मे कोई भेद
नही होने से पुनीत होने के उद्देश्य से उस स्तव को हमारे प्रति कहिये
।१। सूत जी न कहा- हे ऋषियो ! मर्कण्डेयजी, के पूछने पर शुकदेव
जी ने जो श्रेष्ठ माया-स्तोत्र कहा था, वही तुम्हारे प्रति कहता हूँ,
सुनिये ।२। जिस माया-स्तव को मैंने सुना और पढा है, जो सुनने से
सब की कामनाएं पूर्ण करने वाला और पाप-ताप का नाशक है, उस
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